October 2014

                                                     

आभा दुबे की कवितायेँ




आभा दुबे जी नारी मनोभावों को पढने में सिद्धहस्त हैं। बड़ी ही सहजता से वो एक शिक्षित नारी को परिभाषित करती हैं ,वो रो नहीं सकती चीख नहीं सकती घुटन अन्दर ही अन्दर दबाती है। ………क्योंकि जहीन औरतों को यही तालीम दी जाती है। नारी जीवन की कठोरता को ओ निराश लड़की में व्यक्त करती हैं। …… कहीं न कहीं आभा जी को पढना मुझे खुद को पढने जैसा लगा ,एक नारी को पढने जैसा लगा। वो अपने प्रयास में कितना सफल हो पाई हैं ,पढ़िए और जानिए 


आभा दुबे की कवितायेँ 





1....तालीम का  सच....
--------------


पढ़ी-लिखी सर्वगुणसंपन्न ,जहीन, घरेलू औरतें ,
रोतीं नहीं, आंसू नहीं बहातीं 
बंद खिड़की दरवाजों के पीछे ,
अन्दर ही अन्दर घुटती हैं,
सिसकती हैं कि आवाज बाहर ना चली जाये कहीं,
हाँ, सच तो है ,
ऐसी औरतें भी भला रोती हैं कहीं?

शेयर करती हैं सुबह की  चाय सबके  साथ...
ओढ़ के चौड़ी,नकली,मुस्कराहट,
बारी -बारी देखती हैं सबकी आँखों में खुद को ,
पढ़ ले ना कोई चेहरे से,
बंद कमरे की रात की कहानी,
डूबी रहती हैं अंदेशे में,
किसी ने चेहरे को पढ़ा तो नहीं?

अगर किसी ने पूछ लिया,
है ये माथे पे निशां कैसा ?
देंगी वही घिसा-पिटा जवाब ,
हंस के कहेंगी, ओह ये....!
 रात वाशरूम में पांव स्लिप कर गया था ,
या...
सीढियां उतरते पैर फिसल गया था, ...
अब कौन बताये इन्हें ...
आये दिन, एक ही तरह के हादसे , होते हैं भला  कहीं?

ऐसे ही मसलों से दो चार होती औरतें,
सोचती रहती हैं मन ही मन ,
अच्छा होता हम अनपढ़ और जाहिल ही रहतीं !
कम से कम बुक्का फाड़के , चिल्ला के, रो तो सकतीं थीं !
दिल तो हल्का हो जाता !
अपनी ही तालीम बोझ तो नहीं लगती...!
तालीम ही ऐसी मिली कि हर बात पे सोचो....लोग क्या कहेंगे

बड़े मसले होते हैं इन पढ़ी-लिखी, घरेलू, जहीन औरतों के पास ,
कुछ दिखाने के , कुछ छिपाने के,
पर करें भी क्या ?.....तालीम ही ऐसी मिली....!

2....देह ...!

देह ...!

__________

एक देह में छिपी है कितनी देह
एक पिंजरा कितनी उड़ानों को  कर सकता है कैद ?

एक ही घर में  कितने लोग 
 उनका अपना - अपना अकेलापन 
 घर के भीतर कई  मकान
होते हैं कितने आंसू ? उन  आँखों के समंदर  में ..?

एक औरत हमेशा ही  सहती है सितम 
फिर  भी पहनती है इच्छाओं  की  चूड़ियाँ 
देखती है सपने 
लेकिन उसका होना, सबके होने में होना होता है 
इस तरह वह अक्सर 
छिपा लेती है  
अपने मन और तन का सच
एक देह मरती है तो कितने देह की मौत हो जाती है ...?



3.....वो पागल ...!
वो पागल !
____________

उसके पास दिमाग नहीं है
याददाश्त भी कमजोर है
एक हद तक भूलने की बीमारी जैसा

वो तर्क नहीं करती
हाजिर रहती है , हर आवाज पर
हाथ बंधे, सर झुकाए आज भी,
जिसने जिस रूप में देखना चाहा, आती है वो  नजर
बदले में तैयार रहता है एक संबोधन उसके लिए,
पागल ...

सुना है, कि...
प्रेम से बोलने वाला , प्रेम में बोलनेवाला ,
सबसे खूबसूरत शब्द होता है ये--
पागल
पर पागलपन में ही सही
वो नहीं भूल पाती,  अपने औरतपन को ,
हर हाल  याद रहता है उसे
कि, प्रकृति को संतुलन प्रदान करती
और जीवों की तरह,
हाड़-मांस, रक्त-मज्जा, अस्थियों के मेल से
बनी है वो भी
उन्ही के जैसी भावनाओं से लदी-फदी
पर, जब वो मिलती है ,
नारी छवियों की आड़ में , छवियों को भंजाते-भुनाते, लोगों से,
खुद-जैसी ही छवियों की कैदी औरतों से ,
तब वो करती है स्त्री-विमर्श
जो बनती है सुर्खियाँ, अखबारों की

और मैं देखती हूँ ख़बरों में छाई हुई  पागल के उम्दा पागलपन को,
मैं खुश होती हूँ
कि वो पागल,
औरत है और औरत ही रहेगी...
क्यूंकि उसके पास दिमाग नहीं है....!



4.....तलाश .....

बाज़ार में खड़ी हूँ 
यकीन खरीद रही हूँ 

इच्छाओं की बुझी राख में 
ढूंढ रही हूँ जिंदगी के अवशेष 

रौशनी को छूने की कोशिश में 

जलें हैं हाथ बार बार 

दरअसल  मेरा जीना 
मेरे होने के खिलाफ एक अलिखित  समझौता है

निभाना है जिसे,
रहती सांसों तक....

5.....ओ ! निराश लड़की ...
______________

बहुत ही कम है तुममें ,
धैर्य और सहिष्णुता
और तुम पढ़ती हो
निराशा के क्षणों में ,
पाब्लो नरूदा की कविताएँ ...

डर है मुझे ...
कहीं फिर ना हो जाये
नरूदा, किसी, आत्महत्या का जिम्मेदार
क्यूंकि.तुम ....

पहले कविता पढ़ती हो
फिर शब्दों से सपने  बुनती हो
बना देती हो  कविता में सपनों की  कहानी
ढूंढती हो एक ऐसा सच, जैसा तुम चाहती हो
जीने लगती हो पात्र बनकर
 उन कविताओं के आसपास  ही कहीं
बसा लेती हो एक मायावी संसार उनमें ही

अंत में उलझ जाती हो
हकीकत की कठोर धरातल और सपनों के सतरंगी मायाजाल में
नतीजा ....
आत्मसात कर लेती हो मृत्यु का सच
 हार जाता है
कविताओं के बिम्ब से उभरे
रंगीन जीवन का दुह्स्वप्न ....
और जीत जाता है नरूदा
खुद के भावों  को तुम्हारे मन से जोड़ने में

ऐ निराश लड़की ....
मत बुनो
मत ढूंढो
कविताओं के आसपास
जीवन और मृत्यु का ताना-बाना
कविताएँ बहुत ही कोमल, नर्म, मखमली हुआ करती हैं
और जीवन ?
कठोर
 .....इसके रास्ते .... बहुत ही पथरीले .....



लेखिका



मेरा परिचय....
नाम --- आभा दुबे 
शिक्षा --स्नातक (मनोविज्ञान)
मूल निवास ---पटना 
वर्तमान पता ....
विद्या विहार , नेहरु नगर पश्चिम 
भिलाई (छत्तीसगढ़)

भावनावों को शब्दों में ढालना अच्छा लगता है..




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                                            मेरा इस शहर में नया -नया तबादला हुआ था । जिससे दोस्ती करता सब दीनानाथ जी के बारे में कुछ न कुछ बताते । दीनानाथ जी हमारे ही दफ्तर के दूसरे विभाग में काम करते थे । वे क्लर्क थे , पर हर कोई उनकी तारीफ करता था ........ क्या आदमी हैं ......... कहाँ -कहाँ तक उनकी पहुँच है , हर विभाग के अफसर के घर चाय -पानी है ।
एक दिन एक मित्र ने मुझसे यहाँ तक कह दिया कि अगर कोई काम अटके तो दीनानाथ जी से मिल लेना ,चुटकियों में काम हो जाएगा । पर मैंने सोचा मुझे क्या करना है ? दो रोटी खानी हैं और अपनी फकीरी में मस्त ! बच्चों के साथ खेलूं या दीनानाथ से मिलूँ ।
पर विधि का विधान , मेरी एक फाइल फंस ही गई । मैं लोगों के कहने पर उनके घर गया । दीनानाथ जी सोफे पर लेटे थे । स्थूलकाय शरीर, तोंद कमीज की बटन तोड़ कर बाहर आने की कोशिश कर रही थी । पान से सने दांत और बड़ी -बड़ी मूंछें जो उनके व्यक्तित्व को और भी रौबीला बना रही थीं । मैंने जाकर पाँव छुए (सबने पहले ही बता दिया था कि उन्हें पाँव छुआना पसंद है ), वे उठ बैठे ।
मैंने अपनी समस्या बताई। " बस इतनी सी बात " वे हंस पड़े ,ये तो मेरी आँख की पुतली के इशारे से हो जाएगा । उन्होंने कहा '' अब क्या बताएं मिश्राजी ,यहाँ का पत्ता-पत्ता मेरा परिचित है ।सब मेरे इशारे पर काम करते हैं !
उन्होंने अपने परिचय सुनाने शुरू किये ,फलाना अफसर बुआ का बेटा ,वो जीएम् ... उसकी पोस्टिंग तो मैंने करायी  है । दरअसल उसका अफसर मेरे साले के बहनोई का पडोसी है ।
मैं सुनता जा रहा था ,वो बोलते जा रहे थे । कोई लंगोटिया यार ,कोई कॉलेज का मित्र कोई रिश्तेदार ,और नहीं तो कोई मित्र के मित्र का पहचान वाला । मैं चमत्कृत था, इतना पावरफुल आदमी !! मुझे तो जैसे देव पुरुष मिल गए ! मेरा काम तो हुआ पक्का !!
मैं उनके साथ साहब से मिलने चल पड़ा । साथ में चल रहे थे उनके पहचान के किस्से !वो बताते जा रहे थे और साथ में जगह -जगह पर पान की पीक थूक रहे थे । मुझे उन्हें थूकते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कोई बड़ा अधिकारी किसी फाइल पर अपनी मोहर लगा रहा हो । सारा रास्ता उनकी मोहरों से रंग गया ।मैं मन ही मन सोच रहा था कि कितने त्यागी पुरुष हैं, इतनी पहचान होने पर भी साधारण जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।इन्हे तो संसद में होना चाहिए !!
सर्दी के दिन थे । सामने चाय की छोटी सी रेहड़ी थी ।मैने चाय पीने की ईक्षा  ज़ाहिर की । वे अनमने से हो गए । पर मैं क्या करता ? उंगलियाँ अकड़ी जा रही थीं । इसलिए उनसे क्षमा -याचना करते हुए एक चाय का आर्डर दे दिया । दीनानाथ जी मुँह  फेर कर खड़े हो गए।
वृद्ध चाय वाले ने मुझे चाय दी । मैंने चाय पीते हुए दीनानाथ जी को आवाज दी ।
बूढा चाय वाला बोला- उसे मत बुलाओ ,वो नहीं आएगा ।वो मेरा बेटा है । वो अब बड़ी पहचान वाला हो गया है । अब अपने बूढे बाप को भी नहीं पहचानता ।
चाय मेरे गले में अटक गई ।दूसरों से पहचान बढ़ाने के चक्कर में अपनी पहचान से इनकार करने वाले दीनानाथ जी अचानक मुझे बहुत छोटे लगने लगे ।

                              वंदना बाजपेयी 

                                
आखिर क्यों टूटते हैं गहरे रिश्ते
  


अभी ज्यादा दिन नहीं बीते,जब सुरेश व मोहन गहरे दोस्त हुआ करते थे,लेकिन आज दोनों एक दूसरे की चर्चा तो दूर्,नाम तक सुनना पसंद नहीं करते.अगर कहीं किसी ने गलती से भी किसी चर्चा में एक का नाम ले लिया.तो दूसरा बिफर पड़ता है.

आखिर क्यों टूटते हैं घनिष्ठ रिश्ते 


सीमा और रजनीश की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.दोनो ने लगभग 10 वर्षों की कड़ी प्रेम तपस्या के बाद एक वर्ष पूर्व विवाह किया,लेकिन इस एक साल के भीतर ही फ़ासले कुछ इस कदर बढ़े कि अब दोनों तलाक की तैयारी कर रहे हैं .बात सिर्फ़ सुरेश-मोहन या सीमा-रजनीश की ही नहीं है,न जाने कितने ऐसे रिश्ते हैं,जो जन्मते हैं,पनपते हैं,खिलते हैं और फिर यकायक मुरझा जाते हैं.जो कभी एक दूसरे के लिए जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार रहते हैं.वही एक दूसरे के जानी-दुश्मन बन जाने हैं.

कैसे बनते हैं रिश्ते 


दरअसल किसी भी मनुष्य के जीवन में दो तरह के रिश्ते होते हैं.मनुष्य जन्म लेते ही कई तरह के रिश्तों की परिभाषाओं में बंध जाता है, जिनका आधार रक्त सम्बन्ध होता है,लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है,वैसे-वैसे कुछ नए रिश्तों की दुनिया भी आकार लेने लगती है, जिनका वह ख़ुद चयन करता है. ऐसे रिश्तों की एक अलग अहमियत होती है,क्योंकि ये विरासत में नहीं मिलते,बल्कि इनका चयन किया जाता है.ऐसे रिश्तों को प्रेम का नाम दिया जाए या दोस्ती का या कोई और नाम दिया जाये,लेकिन ये बनते तभी हैं,जब दोनों पक्षों को एक दूसरे से किसी न किसी तरह के सुख या संतुष्टि की अनुभूति होती है.यह सुख शारीरिक,मानसिक,आर्थिक या आत्मिक किसी भी तरह का हो सकता है.जब एक पक्ष दूसरे के बिना ख़ुद को अपूर्ण,अधूरा महसूस करता है,तो अपनत्व का भाव पनपता है और जैसे-जैसे यह अपनत्व बढ़ता जाता है,रिश्ता प्रगाढ़ होता जाता है.

रिश्ते टूटने की वजह 


दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किन्हीं दो लोगों के बीच में पारस्परिक हितों का होना,बनना और बढ़ना रिश्तों को न केवल जन्म देता है ,बल्कि एक मज़बूत नींव भी प्रदान करता है,लेकिन जैसे ही पारस्परिक हित निजी हित में तब्दील होना शुरु होते हैं रिश्तों को ग्रहण लगाना शुरु हो जाता है.पारस्परिक हित में अपने हित के साथ-साथ दूसरे के हित का भी समान रुप से ध्यान रखा जाता है,जबकि निजी हित में अपने और सिर्फ़ अपने हित पर ध्यान दिया जाता है.निजहित को प्राथमिकता देने या स्वहित की कामना करने में उस समय तक कुछ भी ग़लत नहीं है जब तक दूसरे के हितों का भी पूरी तरह से ध्यान रखा जाये,लेकिन जब दूसरे के हितों की उपेक्षा करके अपने हित पर जोर दिया जाता है,तो रिश्ते को स्वार्थपरता की दीमक लग जाती है,जो धीरे-धीरे किसी भी रिश्ते को खोखला कर देती है.

स्वार्थ की भावना रिश्तों की दुनिया का वह मीठा जहर है,जो रिश्ते को असमय ही कालकवलित कर देती है.स्वार्थ की भावना उस समय और भी कुरूप्, भीषण और वीभत्स रुप धारण कर लेती है,जब दूसरे पक्ष के अहित की कीमत पर भी ख़ुद का स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश की जाती है.किसी भी रिश्ते में एक-दो बार ऐसे प्रयास सफल भी हो सकते हैं,लेकिन जब बार-बार किसी का अहित करके कोई अपना हित साधने की कोशिश करता है,तो रिश्ते जख्मी होने लगते हैं.ये ज़ख्म जितने गहरे होते जाते हैं, रिश्तों की दरार उतनी ही चौड़ी होती जाती है.मन के किसी कोने में या दिल के दर्पण पर स्वार्थ की परत के जमते ही रिश्तों का संसार दरकने लगता है और धीरे-धीरे एक समय ऐसा भी आता है,जब रिश्ता पूरी तरह टूट कर बिखर जाता है.

कैसे करे रिश्तों को बचाने की कोशिश 


सुदीर्घ और मज़बूत रिश्ते मनुष्य को न केवल भावनात्मक संबल देते हैं,बल्कि आत्मबल बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं. सदाबहार रिश्तों के हरे-भरे वृक्षों की छाया में मनुष्य ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है,जबकि किसी भी तरह के रिश्ते का बिखरना ऐसे घाव दे जाता है,जिसकी जीवन भर भरपाई नहीं हो पाती .इसलिए जहाँ तक हो सके रिश्तों को टूटने से बचाने की कोशिश करनी चहिये.

रिश्तों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि स्वार्थ के बजाय त्याग और स्वहित के बजाय पारस्परिक हित को प्रधानतादी जाये.दूसरे के अहित की कीमत पर भी अपना हित साधने के बजाए जब अपना अहित होने पर भी दूसरे का हित करने की भावना जन्म लेती है,तो रिश्ते ऐसी चट्टान बन जाते हैं, जिनका टूट पाना असंभव हो जाता है.इस तरह रिश्तों का बंधन इतना मज़बूत होता जाता है कि कोई भी इससे बाहर नहीं निकल सकता.

रिश्तों की नाव को डूबने से बचाने के लिए यह जरूरी है कि इस नाव में स्वार्थपरता का सुराख न होने पाये,क्योंकि रिश्तों की नाव मझधार में तभी डूबती है जब पारस्परिकहित रुपी पतवार और त्यागरुपी खेवनहार लुप्त हो जाते हैं.

लेखक , संपादक

                                                                                              
                                                                              ओमकार मणि त्रिपाठी 
                                                                               संस्थापक व् संपादक 
                                                                       सच का हौसला ( दैनिक समाचार पत्र )
                                                                         अटूट बंधन राष्ट्रीय हिंदी मासिक पत्रिका 
                                       
              
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
ॐ 





 ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः                                                                                  
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा  कश्चिद् दुःखभागभवेत।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ 


                                         भारतीय  संस्कृति का यह श्लोक मुझे सदैव प्रभावित करता रहा है। .....
जिसमें प्राणी मात्र की मंगलकामना निहित है।मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है ,एक का दुःख दूसरे पर प्रभाव डालता  है.इसीलिए  भारतीय दर्शन सदा से सबके सुख की कामना करना सिखाता है। कहीं न कहीं यह "अटूट बंधन "का  यह ब्लॉग बनाने का मेरा उद्देश्य भी यही रहा है। कहते हैं साहित्य समाज का दर्पण होता है ,परन्तु मेरा मानना  है की साहित्य समाज का  दर्पण होने के साथ -साथ समाज को सकारात्मक सोचने पर विवश भी करता है और उसे नयी दिशा देने में उत्प्रेरक का काम भी करता है।साहित्य की भूमिका एक दीपक की तरह होती है , जो किसी भी उद्देश्य से जलाया जाए सब का पथ आलोकित करता है |इस  ब्लॉग में मेरा प्रयास सदैव यही रहेगा की आप को उच्च कोटि की रचनायें , .......... चाहे वो साहित्य आध्यात्म ,धर्म ,सामाजिक सरोकारों से या संस्कृतिक चेतना से  सम्बंधित हो पढ़ने को मिले। इसके अतिरिक्त समस्याओं से घिरे मन को अपनी समस्याओं का सामना करने के लिए सकारात्मक सोंच और नयी दिशा मिले | आशा यहाँ समय व्यतीत करने के बाद आप कुछ शांति ,कुछ उत्साह का अनुभव करेंगे व् आपकी सकारात्मकता  का दायरा विकसित होगा।
                            आइये इस यात्रा में आगे बढें | आप सभी को जीवन में स्वास्थ्य , सफलता और खुशियाँ मिले |



                                                                                  वंदना बाजपेयी