आखिर क्यों टूटते हैं गहरे रिश्ते

                                          आखिर क्यों टूटते हैं गहरे रिश्ते                                                         ...


                                          आखिर क्यों टूटते हैं गहरे रिश्ते 
                                                  


                                                (चित्र गूगल से साभार )


अभी ज्यादा दिन नहीं बीते,जब सुरेश व मोहन गहरे दोस्त हुआ करते थे,लेकिन आज दोनों एक दूसरे की चर्चा तो दूर्,नाम तक सुनना पसंद नहीं करते.अगर कहीं किसी ने गलती से भी किसी चर्चा में एक का नाम ले लिया.तो दूसरा बिफर पड़ता है.सीमा और रजनीश की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.दोनो ने लगभग 10 वर्षों की कड़ी प्रेम तपस्या के बाद एक वर्ष पूर्व विवाह किया,लेकिन इस एक साल के भीतर ही फ़ासले कुछ इस कदर बढ़े कि अब दोनों तलाक की तैयारी कर रहे हैं .बात सिर्फ़ सुरेश-मोहन या सीमा-रजनीश की ही नहीं है,न जाने कितने ऐसे रिश्ते हैं,जो जन्मते हैं,पनपते हैं,खिलते हैं और फिर यकायक मुरझा जाते हैं.जो कभी एक दूसरे के लिए जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार रहते हैं.वही एक दूसरे के जानी-दुश्मन बन जाने हैं.दरअसल किसी भी मनुष्य के जीवन में दो तरह के रिश्ते होते हैं.मनुष्य जन्म लेते ही कई तरह के रिश्तों की परिभाषाओं में बंध जाता है, जिनका आधार रक्त सम्बन्ध होता है,लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है,वैसे-वैसे कुछ नए रिश्तों की दुनिया भी आकार लेने लगती है, जिनका वह ख़ुद चयन करता है. ऐसे रिश्तों की एक अलग अहमियत होती है,क्योंकि ये विरासत में नहीं मिलते,बल्कि इनका चयन किया जाता है.ऐसे रिश्तों को प्रेम का नाम दिया जाए या दोस्ती का या कोई और नाम दिया जाये,लेकिन ये बनते तभी हैं,जब दोनों पक्षों को एक दूसरे से किसी न किसी तरह के सुख या संतुष्टि की अनुभूति होती है.यह सुख शारीरिक,मानसिक,आर्थिक या आत्मिक किसी भी तरह का हो सकता है.जब एक पक्ष दूसरे के बिना ख़ुद को अपूर्ण,अधूरा महसूस करता है,तो अपनत्व का भाव पनपता है और जैसे-जैसे यह अपनत्व बढ़ता जाता है,रिश्ता प्रगाढ़ होता जाता है.दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किन्हीं दो लोगों के बीच में पारस्परिक हितों का होना,बनना और बढ़ना रिश्तों को न केवल जन्म देता है ,बल्कि एक मज़बूत नींव भी प्रदान करता है,लेकिन जैसे ही पारस्परिक हित निजी हित में तब्दील होना शुरु होते हैं रिश्तों को ग्रहण लगाना शुरु हो जाता है.पारस्परिक हित में अपने हित के साथ-साथ दूसरे के हित का भी समान रुप से ध्यान रखा जाता है,जबकि निजी हित में अपने और सिर्फ़ अपने हित पर ध्यान दिया जाता है.निजहित को प्राथमिकता देने या स्वहित की कामना करने में उस समय तक कुछ भी ग़लत नहीं है जब तक दूसरे के हितों का भी पूरी तरह से ध्यान रखा जाये,लेकिन जब दूसरे के हितों की उपेक्षा करके अपने हित पर जोर दिया जाता है,तो रिश्ते को स्वार्थपरता की दीमक लग जाती है,जो धीरे-धीरे किसी भी रिश्ते को खोखला कर देती है.स्वार्थ की भावना रिश्तों की दुनिया का वह मीठा जहर है,जो रिश्ते को असमय ही कालकवलित कर देती है.स्वार्थ की भावना उस समय और भी कुरूप्, भीषण और वीभत्स रुप धारण कर लेती है,जब दूसरे पक्ष के अहित की कीमत पर भी ख़ुद का स्वार्थ सिद्ध करने की कोशिश की जाती है.किसी भी रिश्ते में एक-दो बार ऐसे प्रयास सफल भी हो सकते हैं,लेकिन जब बार-बार किसी का अहित करके कोई अपना हित साधने की कोशिश करता है,तो रिश्ते जख्मी होने लगते हैं.ये ज़ख्म जितने गहरे होते जाते हैं, रिश्तों की दरार उतनी ही चौड़ी होती जाती है.मन के किसी कोने में या दिल के दर्पण पर स्वार्थ की परत के जमते ही रिश्तों का संसार दरकने लगता है और धीरे-धीरे एक समय ऐसा भी आता है,जब रिश्ता पूरी तरह टूट कर बिखर जाता है.सुदीर्घ और मज़बूत रिश्ते मनुष्य को न केवल भावनात्मक संबल देते हैं,बल्कि आत्मबल बढ़ाने में भी मददगार साबित होते हैं. सदाबहार रिश्तों के हरे-भरे वृक्षों की छाया में मनुष्य ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है,जबकि किसी भी तरह के रिश्ते का बिखरना ऐसे घाव दे जाता है,जिसकी जीवन भर भरपाई नहीं हो पाती .इसलिए जहाँ तक हो सके रिश्तों को टूटने से बचाने की कोशिश करनी चहिये.रिश्तों को बचाने के लिए सबसे जरूरी है कि स्वार्थ के बजाय त्याग और स्वहित के बजाय पारस्परिक हित को प्रधानतादी जाये.दूसरे के अहित की कीमत पर भी अपना हित साधने के बजाए जब अपना अहित होने पर भी दूसरे का हित करने की भावना जन्म लेती है,तो रिश्ते ऐसी चट्टान बन जाते हैं, जिनका टूट पाना असंभव हो जाता है.इस तरह रिश्तों का बंधन इतना मज़बूत होता जाता है कि कोई भी इससे बाहर नहीं निकल सकता.रिश्तों की नाव को डूबने से बचाने के लिए यह जरूरी है कि इस नाव में स्वार्थपरता का सुराख न होने पाये,क्योंकि रिश्तों की नाव मझधार में तभी डूबती है जब पारस्परिकहित रुपी पतवार और त्यागरुपी खेवनहार लुप्त हो जाते हैं.
                                                                                              
                                                                              ओमकार मणि त्रिपाठी 

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