कवि एवं कविता कर्म

                                                                                    माया मृग जी साहित्य के क्षेत्र में जाना -माना ...

                                                                                  


माया मृग जी साहित्य के क्षेत्र में जाना -माना  नाम है। …… उनकी खूबसूरत कविता के साथ -साथ पढ़िए कवि एवं  कविता-कर्म पर आलेख 

कवि एवं कविता - कर्म
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मैं साहित्‍यकार नहीं हूं.कुदरत का क्‍लर्क हूं.कुदरत जो डिक्‍टेट कराती है, वह लिपिबद्ध करता हूं .कुदरत को अगर सिर्फ पेड़ पौधे मानना हो तो बात अलग--- अगर इसे भीतर तक महसूस कर सकें तो सचमुच हम धन्‍य हो जाते हैं.कि कुदरत ने हमें चुना अपने किसी काम के लिए.पर ,यह तो सच ही है कि कुदरत हमें चुनती है कुछ ख़ास कामों के लिए
कई बार ऐसा भी लगता है कि कई घटनाएं भी कुदरत के आधीन हो घटती है और उस के अंतस में जो होता है हम उसे सही समय पर ही जान पाते हैं

घटनाएं दरअसल आकस्मिक नहीं होती.एक पूरी प्रक्रिया तय होती है पहले उसके बाद अचानक वे हमें दिखती हैं.यदि हमारी संवेदनशीलता विस्‍तृत हो जाए तो घटना से पूर्व उसकी प्रक्रिया का आभास पा जाती है
.इसी से शायद कवि को ब्रहृम कहा हमारे शास्‍त्रों में.ब्रह्म होना भगवान होने जैसा नहीं बल्कि एक संवेदनशील इन्‍सान होने जेसा ही मानना चाहिए
कई बार हम सब महसूस करते हैं किसी घटना को देखकर--- कि अरे यह तो पहले भी कहीं हुआ हे
कहीं देखा है;या कहीं पढा है.जबकि ऐसा होता नहीं.तो कहां देखा या सुना.सपने में--- नहीं.वह प्रक्रिया तब चल रही थी इस घटना की.हम उसके अंश भर से परिचित हो पाए क्‍योंकि हमारी संवेदना तब वहां से संवेदित थी.हम मन भर कर घूमते हैं मन से'हमारी संवेदनाएं हवा में यात्रा करती हैं.जहां से कुछ ग्रहण कर सकें, ले अाती हैं
अमृता प्रीतम विचार क े बारे में कहती हैं कि विचार पंख वाला बीज है, इस जमीन पर नमी ना हुई तो दूसरी जगह जा टिकेगा
यही बात हमारी संवेदना की है.वह पंखों पर रहती है हर समय.शुष्‍क बौद्धिक लोग कवि नहीं हो पाते.वे अच्‍छे लेखक हो सकते हैं पर कवि नहीं
कितना कुछ समझना बाक़ी है.बेशक, कुदरत असीम है
जितना समझते जाएं लगता जाएगा कि ओह अभी तो हमें कुछ भी नहीं पता.किनारे पर खड़े होकर समु्द्र की गहराई की नाप बताना बौद्धिकता है.धारा में डूबते हुए गहराई में उतरते जाना कविता है.कितना अजीब है यह सब.पर मुझे तो लगता है कि हां ऐसा ही है
बौद्धिक लोग आक्रामक और कवि दुनयिावी नजर से पलायनवादी क्‍यूं होते हैं.इसलिए कि धारा काे नापने के लिए बुदिध चाहिए, बहने के लिए धारा से प्रेम होना
कैलाश वाजपेयी की एक कविता का अंश है --
आंख भी ना बंद हो
और दुनिया अांख से ओझल हो जाए
कुछ ऐसी तरकीब करना
हर जीत के आगे और पीछे शिकस्‍त है
इसलिए सफलता से डरना
डूबना तो तय है
भरोसा नाव पर नहीं
नदी पर करना
कविता शब्‍दों में नहीं होती.दो शब्‍दों के बीच छूट गई खाली जगह में होती है.जैसे हम जब बहुत गहरे तक भीतर डूबे हों तो जो बोलते हैं उस समय वे शब्‍द उतनी बात नहीं कहते जितना बीच बीच में ली गई लंबी गहरी सांस कहती है.कविता वही गहरी सांस है
वही चुप और गहरी अांख है, जिसमें शब्‍द केवल सहारा देते हैं बात को.शब्‍द बात नहीं हैं.बात तो शब्‍दों के पीछे है.जब बहुत कुछ कहना हो तो क्‍या करें,
दीप्ति नवल कहती हैं
जब बहुत कुछ कहने को जी चाहता है .तब कुछ भी कहने को जी नहीं चाहता.यह चुप्‍पी कविता है
चुप्‍पी जितनी सघन होगी कविता उतने गहरे से अाएगी.आत्‍मदंभ और आत्‍मप्रशंसा में डूबे लोगों की कविता सतही इसीलिए हो जाती है.कि वे अपने भीतर उतर नहीं पाते.भीतर उतरने पर पता लगता है कि दरअसल हम तो कहीं हैं ही नहीं'जब हम हैं ही नहीं तो दंभ ि‍कस बात का.गर्व किस बात का.मुझे कोई कवि कहता है तो हंसी अा जाती है.मैं कैसे कवि हुआ.मैं तो कुदरत का क्‍लर्क ठहरा.कविता मेरी कैसे हुई.वह तो पंख वाली संवेदना थी.यहां ना उगती तो कहीं और उगती.आपने भी महसूस किया होगा कई बार हमारे भीतर कुछ चल रहा होता है
हम आलस्‍यवश या किसी कारण वश उसे नहीं लिखतेलिख पाते तो देखते हैं कि कुछ ही समय में लगभग वही बात कोई दूसरा लिख देता है हम चौकते हैं-- अरे ये तो मैं कल सोच रहा या रही थी
तो चूंकि मैने अपनी ज़मीन नहीं दी उसे.वह पंख वाली संवेदना कहीं अौर जाकर उग आई.विचार मरता नहीं, इसे ही कह सकते हैं- संवेदना मरती नहीं इसे ही कह सकते हैं;वह जगह बदल लेती है
वैसे ही जैसे विज्ञान कहता है ऊर्जा कभी नष्‍ट नहीं होती
बात एक ही है,ऊर्जा कह लो, संवेदना कह लो, विचार कह लो;वह अमृत्‍य है
देखिये कितनी मजेदार बात है;कुछ भी मर नहीं सकता और हम सबसे ज्‍यादा मृत्‍यु से डरते हैं
गीता में लिखा कि आत्‍मा मरती नहीं यानी वह नष्‍ट नहीं होती, विज्ञान कहता है ऊर्जा अक्षय है, बल्कि इससे भी अागे जाकर कहें तो कोई भी पदार्थ अक्षय है.अमर है.कोई भी चीज ना तो नष्‍ट की जा सकती है ना बनाई जा सकती है बस उसका रुप बदलना ही सारा खेल हैइसे अब कविता और संवेदना के साथ जोड़कर देखिये
कविता ना तो बनाई जा सकती है ना नष्‍ट की जा सकती है, वह बस शब्‍द बदलकर समय और संदर्भ बदलकर हर बार नई होकर दिखती हे
आप बताइये,क्‍या ऐसा कुछ है जो अाज तक ना कहा गया हो
क्‍या इस स्‍तर की कोई मौलिकता संभव है कि आज तक किसी ने कभी किसी रुप में ना कहा हो.हमारी कल्‍पना की उड़ान भी वहीं तक है जहां तक वह बात सृष्टि में मौजूद हो
जब पहले से मौजूद है तो हमारी मौलिकता क्‍या है
लिखने वाले की मौलिकता बस इतनी ि‍क रुप नया दे दिया.शब्‍द बदल गए.गीता के ि‍हसाब से कहूं तो देह बदल गई.आत्‍मा वही की वहीं.संवेदना वही की वही .जो प्रेम लाखों बरस पूर्व मौजूद था, उसकी संवेदना तब भी वही थी आज भी वही तो नई प्रेमकविता यानी समय और संदर्भ बदलकर उसी संवेदना की नई अभिव्‍यक्ति तो नयी बस अभिव्‍यक्ति---
तो क्‍या कविता अभिव्‍यक्ति मात्र है---
नहीं ना, वह तो अनुभूतिपरक हे यानी वही बात --- संवेदना ; संवेदना जो कि मौलिक नहीं है हमारीहमने यहीं कुदरत से ग्रहण की तो हम कुदरत के क्‍लर्क हुए कि ना हुए
मेरे दवारा लिखी गई एक कविता में आया था कि कविता दफ्तर की फाइल का निपटान नहीं है
कि कवि हाजरी भर दे .हाजरी भर भरना कविता नहीं है बौद्धिकता और शुष्‍कता हाजरी भरने या नोटशीट लिखने जैसा है
हम स्‍टेनो वाला काम करें पहले, कुदरत को पहले सुनें उसे अपने शब्‍दों में लिखें या टाइप करें और कुदरत को सौंप दें कि यह रहा वह जो आपने कहा कई बार हम सुनने में गलती भी कर सकते हैं मजे की एक और बात कविता केवल लिखने भर से पूरी नहीं हो जाती वह पूरी होती है पढ़े या सुने जाने से क्‍योंकि संवेदना तभी विस्‍तार पाती है जब वह पूरी प्रक्रिया से गुजरे यानी पहले संवेदना हवा की यात्रा कर हम तक आई---उसके बाद हमने ग्रहण ि‍कय अभिव्‍यक्ति दी उसेअब इसे वापस शब्‍दों से मुक्‍त करना है .यह काम पाठक करेगा .पाठक जितना सहृदय होगा कविता उतनी ही शीघ्रता से अपनी संवेदना को मुक्‍त कर सकेगी .नीरस पाठक से तो टकराकर लौटेगी ही इसलिए कविता पूरी होती है पढ़े या सुने जाने के बाद---
और चूंकि कवि की संवेदना व्‍याकुल रहती है मुक्‍त होने के लिए इसीलिए हम कविता फेसबुक पर डालते हैं, मित्रों को सुनाते हैं या पत्र पत्रिका अथवा ि‍कताब में छपवाते हैं



कर्ज, किताबें और यादें-- जिनका निपटारा नहीं
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भीतर सो जाती हैं मछलियां 

तो उदास हो जाती है नदी

गहरे पानी में तब भी शेष रहती है हलचल

कोई छोटा सा घोंघा चुपके से देखता है

सिर निकाल कर और 

सन्‍नाटे की अाहट भर से सहमकर सिमट जाता है

खोल मेंं पहले की तरह---।

उनीदी नदी मेंं चुपचाप पड़े रहते हैं कुछ फूल

कुछ पत्तियां और 

पानी में ऊपर नीचे आने जाने से थककर बैठ जाते हैं

संध्‍या आरती को जलाए गए बुझे दीये

पानी याद करता है कल की सांझ और परसों के उत्‍सव----।

एक स्‍वप्‍न है नदी की आंख में

जो आंख खोलने भर से डरता है 

कुछ ॠण हैं सपनों के जिन्‍हें चुकाना है जागने पर

कुछ यादें हैं जिनका कोई निपटारा नहीं---।

पता नहीं किसने छुआ होगा सोया हुआ जल

किसने पूछी मछलियों से उनकी दिनचर्या

घोंघों के लिए दिन कब होता है और रात कब


कुछ प्रश्‍न हैं जिनका उत्‍तर ढूंढना है नदी को

दोनों ओर किनारे हैं जिनमें बंधकर सोचना है उसे----।

मछुआरा जो दिखता है नाव खेता

डूबा हुआ है गहरे तक नदी के प्रेम में

नदी उसकी पहली और अाखिरी प्रेमिका है

सिर्फ खोजता नहीं नदी मेंं, नदी के साथ बहता है

उसे देर से पता लगा कि जिन्‍हें गाते गाते उम्र बीत गई 

नदी के वे गीत अब किताबों में हैं---।

मछुआरा नदी के कान में कहता है सुनी सुनाई बातों पर विश्‍वास मत करना

सच कहता हूं

किताबों से परे शेष जो भी हैं, गहरे मेंं बची हलचल में है

जहां एक घोंघा रह रहकर सिर निकालता है बाहर

और बार बार चला जाता है खोल के भीतर---।

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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues children's day deepawali special E.book family&relatives father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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