February 2015
दिल्ली:जहाँ हर आम आदमी है ख़ास

                                       


बचपन की याद आती है जब माँ सुबह -सुबह हमें उठाते हुए कह रहीं थी "जरा  जल्दी उठ कर ठीक -ठाक कपडे पहन लो दिल्ली वाली चाची आने वाली हैं "वैसे तो हमारे घर मेहमानों का आना .-जाना लगा रहता था। उसमें कुछ ठीक -ठाक करने जैसा नहीं था ,पर चाची दिल्ली की थी।  चाची  पर इम्प्रैशन डालने का अर्थ सीधे संसद तक खबर।  हालाँकि   हम उत्तर प्रदेश के एक महानगर में रहते थे पर दिल्ली हमारे लिए दूर थी।  दिल्ली वो थी जहाँ की ख़बरों से अखबार पटे रहते थे। हमें अपने शह र की जानकारी हों न हो पर दिल्ली की हर घटना की जानकारी रहती थी गोया की हमारा शहर  दीवाने आम हो  और दिल्ली दीवाने ख़ास।  दिल्ली ,दिल्ली का विकास और दिल्ली के लोग हमारी कल्पना का आयाम थी।  बरसों बीते हम बड़े हुए ,हमारा विवाह हुआ और पति के साथ तबादले का शिकार होते हुए देश के कई शहरों का पानी पीते हुए आखिर कार दिल्ली पहुँच  ही गए। और दिल्ली आकर हमें पता चला की कितने भी आम हो अब हम आम आदमी /औरत नहीं रहे हैं। अब हम भी उन लोगों में शुमार हो गए हैं जो खबरे पढ़ते ही नहीं बल्कि ख़बरों का हिस्सा हैं।

                                                 पहला अनुभव हमें दिल्ली प्रवास के  दूसरे दिन ही हो गया जब हमारी प्रिय सखी का फोन दिल्ली पहुँचने की बधाई देने का आया।  बधाई  देने के बाद बोली "  बड़ी परेशानी होगी ,पानी नहीं आ रहा न तुम्हारे घर "अच्छा हमने सकपकाते हुए कहा ,पता नहीं नल खोल कर देखते हैं ,तुम्हें कैसे पता चला ?
अरे सुबह से क क क  चैनल पर दिखा रहे हैं  , दिल्ली में तुम्हारे एरिया में पानी नहीं आ रहा हैं लोग खाली बोतलें लेकर सड़कों पर हैं … टी वी नहीं देखा क्या तुमने ? पहली बार हमें बड़ा अटपटा लगा हमारे घर में पानी नहीं आ रहा है इसका पता हमसे पहले पूरे देश को है। हमारी निजी स्वतंत्रता का  कोई स्थान नहीं ? फिर तो यह रोज का सिलसिला हो गया।  हमने भी आपने आस -पास की बातों  पर ध्यान देना शुरू कर दिया क्योकि ,अडोस -पड़ोस में क्या हो रहा है इसकी खबर जाते ही सुदूर बसे परिवार के सदस्यों के लिए घटना की  आधिकारिक पुष्टि हमें
ही करनी होती थी अन्यथा हमारे समान्य ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह लगने का पूरा ख़तरा था।
                                                                    एक बार तो हमारी कश्मीर वाली बहन हमसे  कई दिन तक इस बात पर नाराज रही कि सर्दियाँ होते ही सारे रिश्ते दारों के हमारे घर में "अपना और बच्चों का धयान रखना "के हिदायत भरे फोन आने लगते  जबकि वो -१० डिग्री से नीचे जम रही होती पर  उसके यहाँ कोई फोन नहीं पहुँचता, इस पारिवारिक भेदभाव में हमारा कोई हाथ नहीं था। ये तो टी वी  चैनल वाले २४ घंटे दिल्ली की सर्दी का आँखों देखा हाल बताते रहते ,,सर्दी की भयावता को देख दूसरे शहरों के लोग रजाई में किटकिटाते हुए भाग्य को सराहते "भैया दिल्ली की सर्दी से राम बचाए ".|  एक बार कानपुर  में एक रिश्तेदार की शादी में जाने पर हम चर्चा का केंद्र बन गए"बताओ क्या दिन आ गए हैं  दिल्ली में अबकी गर्मी में दो -दो घंटे बिजली काट रहे हैं।  जब सुनते -सुनते हम हम थक गए तो पूँछ ही लिया "कानपुर में कितने घंटे आती है  ?कोई ठीक नहीं पर २४ घंटे में १० -११  घंटे तो आ ही जाती है।  उत्तर प्रदेश की औद्यौगिक राजधानी बिजली की किल्लत से बुरी तरह जूझ रहीं है ,उद्योग -धंधे चौपट हैं ,भीषण बेरोजगारी  ने लूट पाट  को बढ़ा दिया है. पर दिल्ली में २ घंटे बिजली गुल होना खबरों का शहंशाह  बन कर तख्ते  ताऊस पर बैठा है।


                                              एक बार तो हद हो गयी रात को ११ बजे माँ का फोन आया। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा "बिटिया अपना ,दामाद  जी का बच्चों का ध्यान रखना "क्यों माँ क्या हुआ इतनी घबराई हुई क्यों हो ?मैं उल्टा प्रश्न दागा। अभी -अभी टी वी चैनल में दिखा रहे हैं दिल्ली भूकंप से ज्यादा प्रभावित होने वाली जोंन  में आता हैं  ,हम तो घबरा गए। देखो ज्यादा बेख्याली में मत सोना। टंकी पूरी ना भरना … गमले………… माँ ने हिदायतों की पूरी लम्बी लिस्ट सुनानी शुरू कर दी। हमने बीच में ही माँ को रोकते हुए कहा माँ ठहरों जिस सेस्मिक जोंन  में दिल्ली  है उसी में आप का शहर भी है। चिंता न करिए।   माँ ने लगभग डांटते  हुए कहा "हमारा जी इतना घबरा रहा है ,और तुम्हे मजाक सूझ रहा है ,तुम्हे ज्यादा पता है या चैनल वालों  को.…  हम निरुत्तर हो गए हम बचपन में सुना चुटकुला याद आ गया "एक आदमी का परिक्षण कर रहे डॉक्टर ने नर्स से कहा ,ये मर चुका है तभी आदमी उठ कर बोला मैं जिन्दा हूँ ,मैं ज़िंदा हूँ , नर्स उसे टोंकते हुए बोली चुप राहों तुम्हें ज्यादा पता है या डॉक्टर को  "

                                 खैर अब तो हमें  ख़बरों में रहने की आदत हो गयी है दूसरे शहर तकलीफे आपदाए झेते रहे ,............पर.  खबर है तो दिल्ली की , …………  यहाँ हर आम घटना ,हर आम आदमी खबर का हिस्सा है चर्चा का विषय है इसीलिये यहाँ का हर आम आदमी ख़ास है।  और देखिये तो अब तो आम आदमी पार्टी भी चुनाव जीत कर ख़ास हो गयी है। 
वंदना बाजपेयी  
                     








कुछ ही मिनट विलंब के कारण ट्रेन छूट गयी कानोँ तक आवाज आई, पीरपैँती जानेवाली लोकल ट्रेन पाँच नंबर प्लेटफार्म पर खड़ी है गणतव्य तक पहुँचने
की नितांत आवश्यकता ने मतवाली गाड़ी के पीछे दौड़ लगाने को कहा हाँफते
हुए उस डब्बे के करीब पहुँचा जहाँ भीड़ कम दिखाई पड़ी देखते ही आँखेँ
झिलझिला गई, आदमी तो कम लेकिन बड़े गठ्ठर से लेकर छोटी बोड़िया की ढेर लगी
हुई



लो भैया ! हम भी बन गये साहित्यकार



कहते हैं की दिल की बात अगर बांटी न जाए तो दिल की बीमारी बन जाती है और हम दिल की बीमारी से बहुत डरते हैं ,लम्बी -छोटी ढेर सारी  गोलिया ,इंजेक्शन ,ई सी  जी ,टी ऍम टी और भी न जाने क्या क्या ऊपर से यमराज जी तो एकदम तैयार रहते हैं ईधर दिल जरा सा चूका उधर प्राण लपके ,जैसे यमराज न हुए विकेट  कीपर हो गए..... तो इसलिए आज हम अपने साहित्यकार बनने  का सच सबको बना ही देंगे।ईश्वर को हाज़िर नाजिर मान कर कहते है हम जो भी कहेंगे सच कहेंगे अब उसमें से कितना आपको सच मानना है कितन झूठ ये आप के ऊपर निर्भर है।
                   बात पिछले साल की है ,हम नए -नए साठ  साल के हुए थे , सठियाना तो बनता ही था। बात ये हुई कि एक दिन चार घर छोड़ के रहने वाली मिन्नी की मम्मी आई ,उन्होंने हमें बताया की कि इस पुस्तक मेले में उनके काव्य संग्रह ( रात रोई सुबह तक ) का विमोचन है .... उन्होंने  इतनी  देर तक अपनी कवितायें सुनाई कि पूछिए  मत, ऊपर से एक प्रति हमारे लिए एक हमारे पति के लिए ,एक बेटे के लिए ,एक बहु के लिए उपहार स्वरुप दे गयी।इस उम्र में वो अचानक से  इतनी महान  बन गयी और हम हम अभी तक करछुल ही चला रहे हैं.हमारे अहंकार की इतनी दर्दनाक हत्या  तरह से हत्या हो गयी  कि खून भी नहीं निकला। हमें अपने जवानी के दिन याद आने लगे जब हम भी कविता लिखते थे। आह !क्या कविता होती थी।  क्लास के सब सहपाठी वाह -वाह करते नहीं अघाते थे ,वो तो घर -गृहस्थी में ऐसे उलझे कि … खैर आप भी मुलायजा  फरमाइए ……
"तेरी याद में हम दो मिनट में ऐसे सूख गए
जैसे जेठ की दोपहर में कपडे सूख जाते  हैं "
और
जैसे दोपहर  के बाद शाम का मंजर नज़र आया
हमें तेरे मिलने के बाद जुदाई का भय सताया
                                            अब मोहल्ले की मीटिंगों  में  मिन्नी की मम्मी साहित्यकार कहलाये और हम.……… हमारे जैसी  प्रतिभाशाली नारी सिर्फ मुन्ना की मम्मी कहलाये ये बात हमें बिलकुल हज़म नहीं हुई। हमने आनन -फानन में मुन्ना को अल्टीमेटम दे दिया "मुन्ना अगले पुस्तक मेले में हमारी भी कविताओ की किताब आनी  चाहिए।हमने जान बूझ कर मुन्ना के बाबूजी से कुछ नहीं कहा ,क्योंकि इस उम्र तक आते -आते पति इतने अनुभवी हो जाते हैं कि उन पर पत्नी के साम -दाम ,दंड ,भेद कुछ भी काम नहीं करते। पर हमारे मुन्ना ने तो एक मिनट में इनकार कर दिया " माँ कहाँ इन सब चक्करों में पड़ी हो। पर इस बार हमने भी हथियार नहीं डाले मुन्ना से कह दिया "देखो बेटा ,अगर तुम नहीं छपवा सकते हो तो हम खुद छपवा लेंगे ,पर हमने भी तय कर लिया है अपना काव्य संग्रह लाये बिना हम मरेंगे नहीं।हमारी इस घोषणा को बहु ने बहुत सीरियसली लिया ( पता नहीं सास कितना जीएगी )तुरंत मुन्ना के पास जा कर बोली देखिये ,आप चाहे मेरे जेवर बेंच दीजिये पर माँ का काव्य संग्रह अगले पुस्तक मेले तक आना ही चाहिए।
                                                   काव्य संग्रह की तैयारी शुरू हो गयी एक प्रकाशक से बात हुई ,उसने रेट बता दिया ,बोला देखिये नए कवियों के काव्य संग्रह ज्यादा बिकते तो नहीं हैं ,आप उतनी ही प्रति छपवाईए जितनी
बाँटनी हो। हमने घर आकर गिनना शुरू किया पहले नियर एंड डिअर फिर ,एक बिट्टू ,बिट्टू की मम्मी ,उसके पापा ,गाँव वाला ननकू , मिश्राइन चाची ,मंदिर के पंडित जी ,दूध वाला ………अरे काम वाली को कैसे भूल सकते हैं वो भले ही पढ़ न पाए पर चार घरों में चर्चा  तो जरूर करेगी  …………कुल मिला कर १०० लोग हुए ,उस दिन हमें अंदाजा लगा कि एक आम आदमी कितना आम होता है की उसे फ्री में देने के लिए भी १०० -१५० से ज्यादा लोग नहीं मिलते। खैर वो शुभ दिन भी आया जब हमारा काव्य संग्रह (घास का दिल ) छप  कर आया।  हमारा दिल ख़ुशी से हाई जम्प लगाने लगा।
                                हम अपने मित्रों ,रिश्तेदारों को लेकर पुस्तक मेले पहुचे। वहां पहुच कर पता चला कि अगर कोई बड़ा साहित्यकार विमोचन करे तो हम जल्दी महान  बन सकते हैं।  हमने लोगों से कुछ बड़े साहित्यकारों  के नाम पूंछे ,पता लगाने पर मालूम हुआ कि एक बड़े साहित्यकार पुस्तक मेले में आये हुए थे। बहु ने मोर्चा संभाला तुरंत उनके पास पहुची "सर मेरी सासु माँ की अंतिम ईक्षा है आप जैसे महान  व्यक्ति के हाथो उनके संग्रह का  विमोचन हो ,अगर आप कृपा करे तो मैं आपकी आभारी रहूंगी। एक खूबसूरत स्त्री का आग्रह तो ब्रह्मा भी न ठुकराए तो वो तो बस साहित्यकार थे।  तुरंत मंच पर आ गए ,एक के बाद एक पुस्तकों का विमोचन हो रहा था ,जिनका विमोचन चल रहा था वो मंच पर थे , नीचे नन्ही सी भीड़ में कुछ वो थे जिनका कुछ समय पहले विमोचन हुआ था ,वो बधाईयाँ व् पुस्तके समेत रहे थे ,कुछ वो थे जिनका अगला विमोचन था। हमारी भी पुस्तक का विमोचन। …………… लाइट ,कैमरा एक्शन ,कट की तर्ज़ पर हुआ। मिनटों में हम अरबों की जन्संसंख्या वाले भारत वर्ष में उन लाखों लोगो में शामिल हो गए जिनके काव्य संग्रह छप चुके  है।
                                                   खुशी से हमारे पैर जमीन पर नही  पड  रहे थे ,अब मिन्नी की मम्मी ,चिंटू की दादी , दीपा की मौसी के सामने हमारी कितनी शान हो जाएगी। दूसरे दिन बहु  ने अपना फेस बुक प्रोफाइल खोला "हमारी तो ख़ुशी के मारे चीख निकल गयी बहु  ने हमारी विमोचन की पिक डाली थी ,५७ लोगों को टैग किया था। .... कुल मिला कर १५० लएक ५० कमेंट थे.………………लो भैया अब हम भी साहित्यकार बन गए। एक बधाई तो आपकी भी बनती है

वंदना बाजपेयी 





महान वैज्ञानिक स्टीफन विलियम हाकिंग  का जन्म 8 जनवरी 1942 को हुआ था | एक सामान्य स्वस्थ बच्चे के रूप में जन्म लेंने वाले हाकिंग का जन्म का दिन खास था क्योंकि उसदिन महान  वैज्ञानिक गैलिलियो का भी जन्म हुआ था | शायद सितारों ने पहले ही उनकी विज्ञान के प्रति रुझान की  भविष्यवाणी कर दी थी | हॉकिंग अपने परिवार की सबसे बड़ी संतान थे | उनके परिवार में उनके पिता फरक जो की डॉक्टर थे , माँ  गृहणी व् पिता द्वारा गोद लिए गए दत्तक पुत्र व दो बहिने थीं | बचपन से वो मेधावी छात्र थे और हमेशा  क्लास में अव्वल आते रहे | उनकी बुद्धि से प्रभावित लोग बचपन से ही उन्हें आइन्स्टीन कह कर बुलाते थे | गणित  उनका प्रिय विषय था , और सितारों से बात करना उनका प्रिय शगल | वो बड़े हो कर अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानना  चाहते थे | उनकी प्रतिभा और लगन काम आई मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविध्यालय में कॉस्मोलोजी विषय में रिसर्च करने के लिए चुन लिया गया |  



स्टीफन हॉकिंग :हिम्मतवाले कभी हारते नहीं 



                    

२१ वर्ष की आयु तक हॉकिंग  भी सामान्य मेधावी बालक थे जिसकी आँखों में सैकड़ो सपने थे  एक दिन वो घटना घट गयी जिसने उन्हें एक अलग कैटेगिरी में धकेल दिया ।  जब वो 21 साल के थे तो एक बार छुट्टियाँ  मनाने के लिए अपने घर पर आये हुए थे , वो सीढ़ी से उतर रहे थे की तभी उन्हें बेहोशी का एहसास हुआ और वो तुरंत ही नीचे गिर पड़े।उन्हें डॉक्टर के पास ले जाया गया, शुरू में तो सब ने उसे मात्र एक कमजोरी के कारण हुई घटना मानी पर बार-बार ऐसा होने पर उन्हें विशेषग्य डॉक्टरर्स  के पास ले जाया गया , जहाँ ये पता लगा कि वो एक अनजान और कभी न ठीक होने वाली बीमारी से ग्रस्त है जिसका नाम है न्यूरॉन मोर्टार डीसीज।इस बीमारी में शारीर के सारे अंग धीरे धीरे काम करना बंद कर देते है,और अंत में श्वास नली भी बंद हो जाने से मरीज घुट घुट के मर जाता है।

 डॉक्टरों ने कहा हॉकिंग बस 2 साल के मेहमान है। लेकिन हॉकिंग ने अपनी इच्छा शक्ति पर भरोसा था और उन्होंने कहा की मैं 2 नहीं २० नहीं पूरे ५० सालो तक जियूँगा । उस समय सबने उन्हें दिलासा देने के लिए हाँ में हाँ मिला दी थी, पर आज दुनिया जानती है की हॉकिंग ने जो कहा वो कर के दिखाया । 

अपनी इसी बीमारी के बीच में ही उन्होंने अपनी पीएचडीपूरी की और अपनी प्रेमिका जेन वाइल्ड से विवाह किया | विवाह के समय तक हाकिंग का दाहिना हिस्सा पूरी तरह से लकवाग्रस्त हो गया था और वे छड़ी के सहारे चलते थे | 


जैसे -जैसे वो विज्ञानं के क्षेत्र में आगे बढ़ते जा रहे थे , उनकी बीमारी उनके शरीर को और घेरती जा रही थी | उनके शरीर का बायाँ हिस्सा भी मंद पड़ गया , पर शारीरिक अक्षमता उनका हौसला न रोक सकी और उन्होंने अपने अनुसन्धान जारी रखे | कुछ समय बाद उन्हें व्हील चेयर की जरूरत महसोस हुई | उन्हें तकनिकी रूप से सुसज्जित व्हील चेयर उपलब्द्ध करायी गयी |

हॉकिंग मृत्यु को मात देते हुए अपना काम करते रहे | वो तीन बच्चों के पिता बने | वो शारीरिक रूप से अक्षम थे पर उन्होंने अपनी मानसिक शक्ति को पूरी तरह से अन्तरिक्ष के रहस्यों की खोज में लगा दिया | उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि इच्छा शक्ति से कुछ भी किया जा सकता है |

1995 में उनकी पहली पत्नी जेन ने उन्हें तलाक दे दिया| बाद में उन्होंने अपनी नर्स इलियाना मेसन से शादी की | जिससे उनका तलाक सन 2006 मैं हो गया | कहा जाता है कि जेन एक धार्मिक महिला थी और हॉकिंग ने अपने प्रयोगों से भगवान् के अस्तित्व को चुनौती दी थी | इस कारण बहुत से लोग उनसे खफा हुए थे| पर हॉकिंग ने उनकी परवाह नहीं की वो लगातार अपने प्रयोगों में आगे बढ़ते रहे, और अपनी मानसिक क्षमता से शारीरिक अक्षमता को जीत लिया |



स्टीफन हाकिंग का योगदान -


             स्टीफन हॉकिंग का आई क्यू १६० है जो जीनियस से भी ज्यादा है | दरअसल, जिस क्षेत्र में योगदान के लिए उनको याद किया जाता है, वह कॉस्मोलॉजी ही है। कॉस्मोलॉजी, जिसके अंतर्गत ब्रह्माण्ड  की उत्पत्ति, संरचना और स्पेस-टाइम रिलेशनशिप के बारे में अध्ययन किया जाता है। और इसीलिए उन्हें कॉस्मोलॉजी का विशेषज्ञ माना जाता है, जिसकी बदौलत वे थ्योरी ऑफ 'बिग-बैंग और 'ब्लैक होल्स की नई परिभाषा गढ़ पाने में कामयाब हो सके हैं।

पढ़िए -महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग के २१ अनमोल विचार

आइये जाने  दुनिया के महान वैज्ञानिक हॉकिंग से बात की बीबीसी संवाददाता टिम मफ़ेट ने।

पछताने से अच्छा है वो करो जो कर सकते  हैं :-


अपने जीवन पर बन रही इस फ़िल्म के बारे में पूछने पर हॉकिंग कहते हैं ''यह फ़िल्म विज्ञान पर केंद्रित है, और शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे लोगों को एक उम्मीद जगाती है। 21 वर्ष की उम्र में डॉक्टरों ने मुझे बता दिया था कि मुझे मोटर न्यूरोन नामक लाइलाज बीमारी है और मेरे पास जीने के लिए सिर्फ दो या तीन साल हैं। इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में इस बीमारी से लड़ने के बारे में मैने बहुत कुछ सीखा''


हॉकिंग का मानना है कि हमें वह सब करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, लेकिन हमें उन चीजों के लिए पछताना नहीं चाहिए जो हमारे वश में नहीं है।



किस उपलब्धि पर है सबसे ज्यादा गर्व :-

हॉकिंग को अपनी कौन सी उपलब्धि पर सबसे ज्यादा गर्व है? हॉकिंग जवाब देते हैं ''मुझे सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि मैंने ब्रह्माण्ड को समझने में अपनी भूमिका निभाई। इसके रहस्य लोगों के लिए खोले और इस पर किए गए शोध में अपना योगदान दे पाया। मुझे गर्व होता है जब लोगों की भीड़ मेरे काम को जानना चाहती है।
''



परिवार और दोस्तों के बिना कुछ नहीं'

यह पूछने पर कि क्या अपनी शारीरिक अक्षमताओं की वजह से वह दुनिया के सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक बन पाए, हॉकिंग कहते हैं, ''मैं यह स्वीकार करता हूँ मैं अपनी बीमारी के कारण ही सबसे उम्दा वैज्ञानिक बन पाया, मेरी अक्षमताओं की वजह से ही मुझे ब्रह्माण्ड पर किए गए मेरे शोध के बारे में सोचने का समय मिला। भौतिकी पर किए गए मेरे अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया कि दुनिया में कोई भी विकलांग नहीं है।''

गॉड पार्टिकल:दुनिया का विनाश  

          हॉकिंग ने आगाह किया है कि महज दो साल पहले वैज्ञानिकों ने जिस मायावी कण गॉड पार्टिकल’ की खोज की थी उसमें समूचे ब्रह्मांड को तबाह-बरबाद करने की क्षमता है।
एक्सप्रेस डॉट को डॉट यूके की एक रिपोर्ट के अनुसार हॉकिंग ने एक नई किताब स्टारमस’   में लिखा कि अत्यंत उच्च उर्जा स्तर पर हिग्स बोसोन अस्थिर हो सकता है। इससे प्रलयकारी निर्वात क्षय की शुरुआत हो सकती है जिससे दिक् और काल ढह जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि इस ब्रह्मांड में हर जो चीज अस्तित्व में है हिग्स बोसोन उसे रूप और आकार देता है।
हॉकिंग ने बतायाहिग्स क्षमता की यह चिंताजनक विशिष्टता है कि यह 100 अरब गिगा इलेक्ट्रोन वोल्ट पर अत्यंत अस्थिर हो सकती है। वह कहते हैंइसका यह अर्थ हो सकता है कि वास्तविक निर्वात का एक बुलबुला प्रकाश की गति से फैलेगा जिससे ब्रह्मांड प्रलयकारी निर्वात क्षय से गुजरेगा।
हॉकिंग ने आगाह कियायह कभी भी हो सकता है और हम उसे आते हुए नहीं देखेंगे। बहरहालउन्होंने कहा कि इस तरह के प्रलय के निकट भविष्य में होने की उम्मीद नहीं है। लेकिन उच्च उर्जा में हिग्स के अस्थिर होने के खतरे इतने ज्यादा हैं कि उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।


स्वर्ग-मृत्यु के बाद जीवन जैसी अवधारणा परियों के किस्से कहानी की तरह है.


मृत्यु के विषय में बताते हुए उन्होंने दिमाग की  तुलना कम्प्यूटर से करते हुए कहा कि , मैं दिमाग को एक कंप्यूटर की तरह समझता हूं जो उसके अलग-अलग हिस्सों के असफल होने की वजह से काम करना बंद कर देता है.
कंप्यूटर के खत्म होने के बाद कोई स्वर्ग अथवा मौत के बाद जीवन जैसी बात नहीं होती. जो लोग अंधेरे से डरते हैं यह उनके लिये परियों के किस्से कहानियों जैसा है.वास्तव में जब मस्तिष्क अपने आखिरी समय में होता है तो उसके बाद ऐसा कुछ नहीं होता.उसे कहीं जाना नहीं होता है | 
 हाकिंस ने मृत्यु के बाद के जीवन की अवधारणा को खारिज कर दिया और उन्होंने अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्तेमाल करते हुए धरती पर बेहतर जीवन की आवश्यकता पर बल दिया

एलियंस के बारे में 

 उन्होंने वैज्ञानिक समुदाय को झकझोर दिया है और वैश्विक स्तर पर एक आशंकाभरी बहस को भी जन्म दिया है. क्या धरती एलियन्स के निशाने पर आ सकती है? क्या किसी अंतरग्रहीय युद्ध में इंसानी प्रजाति और इस शानदार ग्रह का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है? यदि हां, तो ऐसा कब तक संभव है और क्या हम इसे टाल सकते हैं? डिस्कवरी टीवी चैनल पर प्रसारित किए जाने वाले कायर्क्रमों की बेहद चर्िचत श्रृंखला में स्टीफन हाकिंग ने मोटे तौर पर दो बातें कही हैं। पहली. अन्य ग्रहों पर जीवन की संभावना वास्तविक है, और दूसरी. एलियन्स से मेलजोल के प्रयास सुखद परिणाम ही लेकर आएं, यह जरूरी नहीं। इस संपर्क का परिणाम लगभग वैसा ही हो सकता है, जैसा क्रिस्टोफर कोलंबस के आने का 'नई दुनिया' (अमेरिका) के मूल निवासियों पर हुआ था। उनका मानना है कि जो एलियन्स धरती पर आएंगे वे असल में अपने ग्रहों पर संसाधनों का इतना अधिक दोहन कर चुके होंगे कि ये ग्रह प्राणियों के रहने योग्य नहीं रह गए होंगे। वे विशाल अंतरिक्षयानों में ही रहने को मजबूर होंगे और रास्ते में जो भी ग्रह आएगा, उसके संसाधनों को निशाना बनाएंगे। उनका बर्ताव दोस्ताना ही हो, यह जरूरी नहीं है।

‘ए ब्रीफ  हिस्ट्री ऑफ टाइम 

स्टीफन हाकिंग को लोकरुचि विज्ञान लेखन की कला में भी महारत हासिल है। उनकी एक पुस्तक ‘ए ब्रीफ  हिस्ट्री ऑफ टाइम’ ने आम जन की जिज्ञासाओं को न सिर्फ शांत ही किया है वरन् और जानने के लिये उत्सुक भी बनाया है। इस क्षेत्र में आगे आने के लिये इस पुस्तक ने कई युवाओं को आकृष्ट किया है। इसके बाद इसे अपडेट करते हुए उन्होंने लीनार्ड म्लोडिनोव के साथ ए ब्रीफर हिस्ट्री ऑफ टाइमलिखी है। इस पुस्तक में क्वांटम मेकेनिक्स, स्ट्रिंग थ्योरी, बिग बैंग थ्योरी और कई अन्य क्लिष्ट विषय अत्यंत सरल भाषा में समाहित हैं। ‘ब्लेक होल्स एण्ड बेबी यूनिवर्सेस एण्ड अदर एसेज और दी यूनिवर्स इन ए नटशैल’ ब्रह्माण्ड की परतों को उघाड़ती उनकी महत्वपूर्ण पुस्तक है। उनकी एक और पुस्तक ‘थ्योरी ऑफ एव्हरी थिंग’ है। इसमें उन्होंने सात व्याख्यानों की एक ाृंखला प्रस्तुत की है जिसमें बिगबैंग से लगा कर ब्लेक होल तथा स्ट्रिंग सिद्धांत का सिलसिलेवार वर्णन है। इस पुस्तक से हमें ब्रह्माण्ड के इतिहास पर उनके दृष्टिकोण से परिचय मिलता है। हाल ही में उनकी पुस्तक ‘ग्रेंड डिजाइन’ प्रकाशित हुई है। 

यह भी बेमिसाल है। इसमें कई ऐसे प्रश्नों को उठाया गया है जिनके उत्तर की तलाश में कई-कई महापुरुषों ने अपना सारा जीवन लगाया है। इसमें उन्होंने ब्रह्माण्ड कब और कैसे अस्तित्व में आया, क्यों यहाँ कुछ है, आखिर वास्तविकता क्या है, प्रकृति के नियम ऐसे क्यों बने हैं जिसमें हम जैसे प्राणियों का उदय हो सका है, क्या कोई भगवान है ब्रह्माण्ड जैसी इस महारचना के निर्माण के पीछे या यह विज्ञान सम्मत है आदि जैसे झकझोरने वाले प्रश्नों को हाकिंग ने बड़ी खूबसूरती से अपनी इस पुस्तक में उठाया और उत्तर देने का प्रयास किया गया है। 

 वे पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में जीवन की खोज के अभियान को समर्थन नहीं देते हैं। अपनी गणितीय अवधारणाओं के आधार पर वे मानते हैं कि अंतरिक्ष इतना विशाल है कि कई ऐसी जगहें अवश्य ही है जहाँ जीवन का होना निश्चित है। लेकिन वे सलाह देते हुए कहते हैं कि हमें उनसे संपर्क करने में से बचना चाहिये क्योंकि संपर्क होने पर एलियन संसाधनों की तलाश में पृथ्वी पर हमला करने सें नहीं चूकेंगे।

उनके अनुसार भविष्य का आकलन करना लगभग असंभव है और स्वयं ई·श्वर भी इसका अनुमान नहीं लगा सकता। उन्होंने कहा कि अनिश्चितता के नियम के कारण भविष्य का सही आकलन करना टेढ़ी खीर है। किसी कण की तरंगित क्रियाओं को ही समझा जा सकता है, उसकी वास्तविक स्थिति और गति को समझना असंभव है। 


मानव जाति ने हमेशा ही भविष्य पर नियंत्रण अथवा कम से कम, आकलन करना चाहा है कि आगे क्या होगा। यही कारण है कि खगोल विज्ञान इतना प्रसिद्ध हुआ है।

.बच्चो के लिए अच्छी खबर :कॉमिक किताब के पात्र होंगे हॉकिंग 
प्रख्यात ब्रिटिश वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग एक कॉमिक किताब के पात्र होंगे और यह किताब उनकी जिंदगी के तमाम पहलुओं के बारे में लोगों को बताएगी। ‘स्काई न्यूज’ की एक रिपोर्ट कहती है कि 71 साल के हॉकिंग जल्द ही एक कॉमिक किताब के पात्र के तौर पर पेश किए जाएंगे। इस किताब में हॉकिंग के कॉलेज के दिनों, कैंब्रिज में एक शोधकर्ता के तौर पर उनके काम और उनके कुछ अहम आविष्कारों के बारे में बताया जाएगा।
इस कॉमिक किताब का नाम है ‘स्टीफन हॉकिंग : रिडल्स ऑफ टाइम एंड स्पेस’। इसके लेखकों ने बताया कि इससे जानेमाने वैज्ञानिक के व्यक्तित्व और उनसे जुड़े मिथ के बारे में भी जानकारी मिलेगी। कलाकार जेच बैसेट ने कहा, ‘इस किताब में सबसे खास बात यह होगी कि इसमें यह बताया जाएगा कि वैज्ञानिक के दिमाग में क्या चल रहा है। तस्वीरों के जरिए एक गतिशील अंदाज में उनके कुछ अहम आविष्कारों को भी लोगों के सामने लाया जाएगा।’

स्टीफन हॉकिन्स को सर्वोच्च सम्मान 

भौतिकी के क्षेत्र में छोटे -बड़े १२ पुरूस्कार हासिलकर चुके हॉकिंग को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मशहूर गणितज्ञ प्रो.स्टीफन हॉकिंग को अमेरिका के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "मेडल ऑफ फ्रीडम" से सम्मानित करने की घोषणा की है। 


                                                 14 मार्च 2018 ७६ वर्ष की आयु में ये महान वैज्ञानिक न जाने कौन से रहस्यों की खोज करने पृथ्वी से दूर अन्तरिक्ष में चले गए | भले ही वो आज हमारे साथ नहीं हैं पर उनके किये काम , उनके द्वारा की गयी खोजे व् उनके विचार हमारे साथ हैं | वो समय समय पर हमें रास्ता दिखाते रहेंगे और समझाते रहेंगे अगर इच्छाशक्ति हो तो शारीरिक अक्षमताएं मनुष्य के मार्ग में बाधा नहीं है | 


अटूट बंधन की और से महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग  को भावभीनी श्रद्धांजलि 

प्रस्तुतकर्ता :अटूट बंधन परिवार 

अपने पाठको के लिए जानकारी उपलब्ध कराने हेतू  और स्टीफन हॉकिंग को सम्मान देने के लिए हमने यह जानकारी गूगल से विभिन्न श्रोतों से एकत्र की हैं ,इसके लिए हम गूल का आभार व्यक्त करते हैं 

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प्रेम  कविताओं का गुलदस्ता

प्रेम जितना सरल उतना कठिन ,जितना सूक्ष्म उतना विशाल ,जितना कोमल उतना जटिल। .... पर प्रेम के भावों से कोई अनछुआ नहीं ,प्रेम के लिए एक दिवस क्या एक जन्म भी काफी नहीं हैं। … तभी तो मान्यता है की प्रेमी  बार -बार जन्म लेते है ,ये कोई एक जन्म का खेल नहीं ………फिर भी हमारी भारतीय संस्कृति में वसंत ऋतु को प्रेम की ऋतु कहा गया है। ……… और क्यों न कहाँ जाए प्रकृति भी तो स्वेत  कफ़न हटा कर बदलती है सारी  करती है श्रृंगार ,तभी तो चारो और हर्ष उल्लास का वातावरण छा  जाता है  ............. ऐसे में अटूट बंधन परिवार अपने पाठकों के लिए लाया है- 



विशेष तोहफा ... एक गुलदस्ता प्रेम कविताओं का 

                                


बिहारी           

प्रेम पर लिखे काव्य की बात होती है तो सबसे पहले बिहारी का नाम याद आता है संयोग और वियोग श्रृंगार दोनों पर उनकी कलम चली है कविवर बिहारी ने अपनी एकमात्र रचना सतसई (सात सौ दोहों का संकलन) अपने आश्रयदाता महाराज जयसिंह से प्रेरणा प्राप्त कर लिखी थी। प्रसिद्ध है कि महाराज ने उनके प्रत्येक दोहे के भावसौदर्य पर मुग्ध होकर एक -एक स्वर्ण मुद्रा भेट की थी। 

संयोग का  उदाहरण देखिए -

1)बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सोह करे, भौंहनु हंसे दैन कहे, नटि जाय।।

2)कहत ,नटत,रीझत ,खीझत ,मिळत ,खिलत ,लजियात ।
भरे भौन में करत है,नैनन ही सों बात ।

वियोग का उदाहरण देखिये 

वियोग  की आग से नायिका का शरीर इतना गर्म है कि उस पर डाला गया गुलाब जल बीच में ही सूख जाता है -


औंधाई सीसी सुलखि, बिरह विथा विलसात।
बीचहिं सूखि गुलाब गो, छीटों छुयो न गात।।

बिहारी का वियोग, वर्णन बड़ा अतिशयोक्ति पूर्ण है। -

इति आवत चली जात उत, चली, छसातक हाथ।
चढी हिंडोरे सी रहे, लगी उसासनु साथ।।


 कबीर दास -
                            
कबीर दस का प्रेम लौकिक न हो कर पारलौकिक था। आत्मा नायिका है परमात्मा नायक ....... पर प्रेम का सच्चा अनोखा वर्णन जो शुद्ध  है सात्विक है और वास्तव में प्रेम के सारे गूढ़  रहस्य खोलने में सक्षम।


१ )प्रेम-गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं।
   जब मैं था तब हरि नहीं, जब हरि है मैं नाहिं।


२ )कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आइ।
   अंतर भीगी आत्मा, हरी भई बनराइ।


३ )पोथी पढ़-पढ़ जग मुवा, पंडित भया न कोय।
   ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होय।


४ )अकथ कहानी प्रेम की, कछू कही न जाय।
  गूंगे केरी सरकरा, खाइ और मुसकाय। 


सूरदास -

           कौन कह सकता है की सूरदास जन्मांध थे जहाँ उन्होंने कृष्ण के बाल रूप का सुन्दर वर्णन किया किया है वाही उनके कृष्ण प्रेम में डूबी गोपिकाओं और ऊधो के संवाद को भला कौन पाठक भूल सकता है। गोपिकाओं के प्रेम के आगे उधो का सारा ज्ञान बेकार है। .... उधो मन न भये दस -बीस कहती हुई गोपिकाओं के सरल , कोमल प्रेम भावो पर कौन न वारि - वारि जाये 



उधो मन न भये दस बीस


तुलसी दास -

                  तुलसी के आराध्य मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम भी प्रेम के इस कोमल भाव से अपरिचित नहीं है। ……… अपनी पत्नी अपनी प्रिया माँ  जानकी के प्रति एकनिष्ठ श्री राम उनके वियोग में तड़प उठते है , अपनी भावनाओं को पवनपुत्र हनुमान के माध्यम से माता जानकी तक पहुचाते हैं 
सुन्दरकाण्ड में इसका बड़ा मार्मिक वर्णन है। 

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥

नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू॥

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥

जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई॥

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं॥

प्भु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥



मीरा बाई -
               बात प्रेम की हो और प्रेम दीवानी मीरा का जिक्र न हो तो प्रेम कुछ अधूरा -अधूरा सा लगता है। कंहाँ की दीवानी मीरा ,एक तार उठा कर चल पड़ती है जोगन बन गली -गली ,नगर -नगर। अरे !जिसे प्रेम का धन मिल गया उसे और चाहिए भी क्या ?

 
मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरौ न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।।
छांड़ि दई कुल की कानि कहा करै कोई।
संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई।
अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
दधि मथि घृत काढ़ि लियौ डारि दई छोई।-
भगत देखि राजी भइ, जगत देखि रोई।
दासी मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोई।

हज़रत अमीर खुसरो-
                         
अमीर खुसरो अपने पीर हजरत  निजामुद्दीन औलिया देहलवी के अनन्य भक्त थे | इन्होने अपने पीर के लिए कई सारी रचनाएँ लिखीं | जब हज़रात निजामुद्दीन औलिया इस दार-ए-फानी से बिदा हुए तो इन्होंने उनकी याद में ये मशहूर रचना लिखी |प्रेम का एक रूप यह भी है। …………जो ईश्वर  के लिए है आत्मा विरहणी है। … छटपटा रही है पिया बावरे से मिलने के लिए ,  जरा गौर करिये भावो में डूबिये कितनी सच्चाई है इस प्रेम में ,कितनी शुद्धता कितनी सात्विकता ..आह !





अमीर खुसरों के दोहे



महादेवी वर्मा-
                  

            प्रियतम का इंतजार कितना कठिन कितना दुष्कर होता है यह विरह का भोगी ही जान सकता है महादेवी के विरह गीतों को पढ़ कर बरबस आँखें छलक जाती है। प्रेम में पूरी तरह
 निमग्न  ,प्रियतम के इंतज़ार से टूटी नायिका ही कह सकती है। ……………… जो तुम आ जाते एक बार.…………… पाठक सोच में पड़ जाता है आखिर कौन है इतना निष्ठुर ,क्यों नहीं आया ?
 -
                      

जो तुम आ जाते एक बार 
जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हंस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार

मैथिलीशरण गुप्त-
               यशोधरा की पीड़ा को सबसे पहले समझा मैथिली शरण गुप्त ने, सही कहते है जहाँ न जाए रवि वहां जाए कवि ……… एक त्यागी हुई पत्नी के प्रेम और त्याग की अनूठी दास्तान, प्रेम तो यही है की पति के सुख में ही सुख ,प्रेम ही है जिसमे नारी अपने सारे सुख त्याग कर पति के विशाल समाज उत्थान  के लिए  किये जाने वाले कार्यों में सहभागी बनना चाहती है.दुःख ………… है तो बस इतना की पति ने उसके प्रेम को कहीं न कही कमजोर समझ लिया तभी तो बिना बाताये चुप -चाप चले गए। ............. कविता में यशोधरा की पीड़ा के साथ -साथ प्रेम की उस परम अवस्था के भी दर्शन होते हैं जहाँ निज सुख से ज्यादा दूसरे का सुख अहम् हो जाता है    
                   
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते ?

मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना ?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते ।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

स्वयं सुसज्जित करके क्षण में,
प्रियतम को, प्राणों के पण में,
हमीं भेज देती हैं रण में -
क्षात्र-धर्म के नाते ।
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

हु‌आ न यह भी भाग्य अभागा,
किसपर विफल गर्व अब जागा ?
जिसने अपनाया था, त्यागा;
रहे स्मरण ही आते !
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

नयन उन्हें हैं निष्ठुर कहते,
पर इनसे जो आँसू बहते,
सदय हृदय वे कैसे सहते ?
गये तरस ही खाते !
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

जायें, सिद्धि पावें वे सुख से,
दुखी न हों इस जन के दुख से,
उपालम्भ दूँ मैं किस मुख से ?
आज अधिक वे भाते !
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।

गये, लौट भी वे आवेंगे,
कुछ अपूर्व-अनुपम लावेंगे,
रोते प्राण उन्हें पावेंगे,
पर क्या गाते-गाते ?
सखि, वे मुझसे कहकर जाते ।


हरिवंश राय बच्चन -
                 सभी इतने भाग्य शाली नहीं होते की प्रेम मिल ही जाए कई बार धोखा भी हो जाता है पर मन मानना कहाँ चाहता है ,जानता है की अब कोई आने वाला नहीं है फिर भी एक इतजार रहता है तभी तो कवि कह उठता है "कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो!" पढ़िए एक खूब सूरत कविता 
तुम मुझे पुकार लो
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
ज़मीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं ज़बान खोलता,
नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उम्मीद छोड़कर जिया,

इसीलिए अड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

तिमिर-समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
न कूल भूमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
न कट सकी, न घट सकी विरह-घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे दुलार लो!
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

उज़ाड़ से लगा चुका उम्मीद मैं बहार की,
निदाघ से उमीद की, बसंत के बयार की,
मरुस्थली मरीचिका सुधामयी मुझे लगी,
अंगार से लगा चुका, उमीद मैं तुषार की
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गड़ी,
इसीलिए खड़ा रहा कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार कर दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!



अमृता प्रीतम  -
                      प्रेम देह के स्तर  पर ही रहे तो वो प्रेम कहाँ है वो तो आकर्षण है ,सच्चे प्रेम को पाने के लिए गहरे उतरना पड़ेगा तभी तो अमृता प्रीतम कह उठती है 
मेरी सेज हाज़िर है
पर जूते और कमीज़ की तरह
तू अपना बदन भी उतार दे
उधर मूढ़े पर रख दे
कोई खास बात नहीं
बस अपने अपने देश का रिवाज़ है



कुछ नयी प्रेम  कविताओं का गुलदस्ता 




संगीता पाण्डेय -
                                विरह की दशा में कुछ भी अच्छा नहीं लगता ,हर चीज जो मन को सुकून देती है बेकार प्रतीत होटी है .... रह जाता है बस इंतज़ार ,दर्द और आंसुओं में छिपा प्रियतम 


-

बादल बूँदें धरती अम्बर,सब कुछ था पर  तुम न थे 
तुम सा ही दिखता था सबकुछ,तुम सा था पर तुम न थे 

धवल चांदनी में भी धुन थी, तेरी ही रुनझुन गुनगुन थी
बिछी  हर सिंगार की चादर,तुम सी थी पर  तुम न थे 

थी आजान या शहनाई,या बहती थी किसलय पुरवाई 
देवालय से आती ध्वनियाँ,तुम सी थी पर  तुम न थे 

ईद का मिलन,होली के रंग,या आतिशबाजी दिवाली की
कितने पावन दिवस गए सब ,तुम से थे पर तुम न थे  

हर एक दिन एक साल रहा, पतझर भी मधुमास रहा 
लगता था बसंत का मौसम, तुम जैसा पर तुम न थे 

मुक्त छंद थे,कवितायेँ थी,गीतों की भी मालाएं थी 
सपनो से रची -पगी कहानी,तुम सी थी पर तुम न थे 

पर अधजली चिट्ठियों के टुकड़े,और मुट्ठी से फिलसी रेत 
आँखों से जो नमक बह गया,तुम सा था और तुम ही थे 




हिमांशू निर्भय -
                     हिमांशू प्रेम को परिभाषित करना चाहते है कहाँ तक सफल है आप खुद बताये 



प्रेम क्या है 
 प्रेम के वृत्त मे,
आसक्ति के छोटे-छोटे बिन्दु,
नज़र आ ही जाते हैं,
जब,
इच्छाओं के त्रिभुज में ,
स्वार्थ के कोण,
अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते हैं ।
द्वैत के आयाम,
जब,
अद्वैत की परिधि को छू जाते हैं,
तो,
प्रेम की पूर्ण आकृति आ जाती है ।
किन्तु,
प्रेम का कोई रेखागणित नही होता।
----
प्रेम,
एक भाव है ।
स्वभाव है ।
दर्शन है ।
अनुभूति है ।
अभिव्यक्ति है ।
अनवरत बहता हुआ धारा की तरह / हवा की तरह ।
प्रेम,
प्रेम ही है ,
सिर्फ प्रेम ।

सोनी पाण्डेय 
                पति -पत्नी का प्रेम वासना से ऊपर उठ कर मंदिर का दीपक बन जाता है|


सोनी पाण्डेय की कविता


शिखा गुप्ता- 
                प्रेम में अगर शक हावी हो जाए तो कितनी तड़प होती है कितना दर्द होता है सहज ही जाना जा सकता है 


 संदेह के परे

मैं .....
हर बिन्दु पर सहेजती रही
तुम्हारा नाम
तुम ...
ढूंढते रहे एक शून्य
जिसके केंद्र में
मुझे करके स्थापित
धकेल सको
आदिम संदेहों को परे

वंदना बाजपेयी -
                     

माना  जानता है प्रेम उपहारों में नहीं है ,प्रेम दिखावे और प्रदर्शन में नहीं है। .... अगर मन में प्रेम हो तो घर गृहस्थी की छोटी -छोटी घटनाओं में,चिंता -फ़िक्र में ,सुख -दुःख में  परिलक्षित हो जाता है बस जरुरत है उसे समझने की ,पहचानने की …फिर देखिये जीवन कैसे प्रेम और आनंद से भर जाता है 




लाल गुलाब
आज यूं ही प्रेम का
उत्सव मनाते
लोगों में
लाल गुलाबों के
आदान-प्रदान के बीच
मैं गिन रही हूँ
वो हज़ारों अदृश्य
लाल गुलाब
जो तुमने मुझे दिए

तब जब मेरे बीमार पड़ने पर
मुझे आराम करने की
हिदायत देकर
रसोई में आंटे की
लोइयों से जूझते हुए
रोटी जैसा कुछ बनाने की
असफल कोशिश करते हो

तब जब मेरी किसी व्यथा को
दूर ना कर पाने की
विवशता में
अपनी डबडबाई आँखों को
गड़ा देते हो
अखबार के पन्नो में
तब जब तुम

"मेरा-परिवार " और "तुम्हारा-परिवार"
के स्थान पर
हमेशा कहते हो "हमारा-परिवार"

और सबसे ज़यादा
जब तुम झेल जाते हो
मेरी नाराज़गी भी
और मुस्कुरा कर कहते हो
"आज ज़यादा थक गई हैं मेरी मैडम क्यूरी "

नहीं , मुझे कभी नहीं चाहिए
डाली से टूटा लाल गुलाब
क्योंकि मेरा
लाल गुलाब सुरक्षित है
तुम्हारे हिर्दय में
तो ताज़ा होता रहता है
हर धड़कन के साथ।


प्रस्तुतकर्ता …… अटूट बंधन परिवार