विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष : चालीस पार कि महिलाओ कि स्वास्थ्य समस्याएँ

                             चालीस की उम्र एक ख़ास उम्र होती है ,बालों की कालिमा के साथ -साथ शरीर की लालिमा भी खोने लगती है । सच पु...

                            





चालीस की उम्र एक ख़ास उम्र होती है ,बालों की कालिमा के साथ -साथ शरीर की लालिमा भी खोने लगती है । सच पुछा जाए तो चालीस की शुरुआत से ही कई समस्याएं शुरू हो जाती हैं। कई शारीरिक समस्याएं इतनी तेजी से और चुपचाप हमला करती हैं कि मनुष्य को संभलने का मौका ही नहीं मिलता। कुछ अंदर ही अंदर शरीर को खोखला करती रहती हैं और उनका असर देर से सामने आता है। बीमारी के आने से पहले ही सतर्कता रखने में ही समझदारी है। हर साल पूरे शरीर की भी जांचें और परीक्षण करा लें। खानपान की आदतें बदलें और अनुशासन तथा संयम के रहना सीखें। खुद की फिटनेस  का धयान रखे |

                      औरतें जो घर की धुरी होती हैं।  सबके स्वास्थ्य का धयान रखती हैं पर कहीं न कही अप[ने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतती हैं कम उम्र में सब चल जाता है पर चालीस पार ये लापरवाही अक्सर बहुत भारी पड़ती है । आज हम यहाँ ४० पार कि औरतों के स्वास्थ्य से सम्बंधित कुछ बीमारियों कि चर्चा  करेंगे। ………… जानकारी ही इलाज है

चालीस पार कि महिलाओ कि स्वास्थ्य समस्याएँ 

ओस्टियोपोरोसिस
ओस्टियोपोरोसिस के बारें में अपने कई बार सुना होगा। हम सभी जानते है कि बढती उम्र के साथ समस्या में हड्डियाँ कमजोर होती चली जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में हर आठ पुरुषों में से एक पुरुष को और तीन महिलाओं में से एक महिला को ओस्टियोपोरोसिस की समस्या है। यह आंकड़ा ही इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है ,शरीर में विटामिन डी के स्तर के कम होने पर और सही मात्रामें विटामिन सी का सेवन न करने के कारण बोने डेंसिटी कम होने लगती है जिसका परिणाम हड्डियों के कमजोर होने के रूप में दिखाई देता है। भारतियों में बोन डेंसिटी कम होने के कारण यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है।
 
अक्सर हमें इस समस्या के होने का पर  शुरुआत में नहीं चल पता है। जब आपकी हड्डियों में फ्रेक्चर देखने को मिलता है तभी जाकर इस बात का पता चल पता है कि व्यक्ति ओस्टियोपोरोसिस कि समस्या का शिकार हो रहा है। यहीं कारण है कि ओस्टियोपोरोसिस को साइलेंट किलर कहा जाता है। कुछ साधारण टेस्ट से इसका पता चल जाता है । 



थायरॉयड 
अक्सर माना जाता है कि थायरॉयड महिलाओं की एक समस्या है। परन्तु सत्य यह है कि थायरॉयड पुरुषों और महिलाओं दोनों को ही होता है। यह अलग बात है कि थायरॉयड महिलाओं को पुरुषों कि तुलना में ज्यादा परेशान करता है। थायरॉयड हमारे शरीर में सबसे बड़ा ग्लेंड है जोकि गर्दन पर होती  है। इसका आकर तितली के पंखों कीतरह होता है। हमारा शरीर कितनी जल्दी एनर्जी को बर्न करता है जिससे प्रोटीन का निर्माण हो इसका नियंत्रण थायरॉयड ही करता है। साथ ही हमारा शरीर अन्य हार्मोन्स के प्रति कितना संवेदनशील हैइस बात का भी निर्धारण भी थायरॉयड द्वारा ही किया जाता है।थायरॉयड ग्लेंड थायरॉयड हार्मोन का निर्माण करता है विशेष रूप से थायरोक्सिन और टीडोथीरोनिन हार्मोन का। यह हार्मोन शरीर के मेटाबोलिज्म के रेट को बढाता है और शरीर के सिस्टम में अन्य प्रकार के विकास और गतिविधियों के रेट को प्रभावित करता है। हायपर थायरॉयड यानि ओवर एक्टिव थायरॉयड और हायपो थायरॉयड यानि अंडर एक्टिव थायरॉयड, थायरॉयड ग्लेंड की दो सबसे सामान्य परेशानियाँ है।


इसके कुछ सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं - फटीगथकान होना, वजन का बढ़ना और ठण्ड बर्दाश्त न कर पाना। स्किन का शुष्क या मोटा होनाबालों का पतला या कमजोर होना, आईब्रो का हल्का होना, नाख़ून का कमजोर होना।


कोलेस्ट्रॉल : 

बढती उम्र में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने कि सम्भावना बहुत रहती है कोलेस्ट्रॉल की जांच करने के लिए लिपिड टेस्ट किया जाता है. यह दो तरह का होता है HDl व्  LDl ,इसमें पहले वाला बहुत खतरनाक होता है यह रक्त नलिकाओं में जम जाता है । कार्डियोवैस्कुलर यानी दिल की बीमारियों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेवार यह  कोलेस्ट्रॉल ही होता है. इस टेस्ट से खून में कोलेस्ट्रॉल की मात्र को जांचा जाता है. बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल दिल की बीमारियों को जन्म देता है. हालांकि, महिलाओं में एस्ट्रोजेन हार्मोन के कारण दिल की बीमारियों के होने का खतरा कम होता है, लेकिन मीनोपॉज के बाद इस हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, इसलिए यह जांच कराना बहुत जरूरी हो जाता है.


हिमोग्लोबिन की कमी  : 

हिमोग्लोबिन की जांच को कंपलीट ब्लड टेस्टके नाम से भी जाना जाता है. वैसे तो यह जांच हमेशा करानी चाहिए, लेकिन चालीस के बाद हिमोग्लोबिन की जांच कराना बहुत जरूरी होता है. यह एक सामान्य खून की जांच है, जिससे रक्त में लाल रक्त कणिकाओं की मात्र को जांचा जाता है. लाल रक्त कोशिकाओं यानी रेड सेल्स में ही हिमोग्लोबिन होता है, जिसके जरिये शरीर के दूसरे हिस्सों में ऑक्सीजन का प्रवाह होता है. चालीस के बाद महिलाओं के लिए यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनमें एनीमिया या रेड ब्लड सेल्स की अकसर कमी पायी जाती है. इसका प्रमुख कारण है, खुराक में आयरन की कमी. हालांकि, इस कमी को पूरा करने के लिए खाने में हरी सब्जियां, सेब व आयरन के पूरक तत्वों का सेवन किया जा सकता है.



मधुमेह :-


          शूगर टेस्ट: आजकल की लाइफस्टाइल में शूगर का बढ़ना आम है. खास कर चालीस की उम्र पार करनेवाले लोगों में यह तेजी से बढ़ रहा है. यदि शरीर में शूगर का स्तर बढ़ जाये, तो डायबिटीजहोने की संभावना बढ़ जाती है. शूगर की जांच के लिए खून का नमूना लिया जाता है. हाइ ब्लड शूगर का अर्थ है कि व्यक्ति डायबिटीज का रोगी है, जबकि लो ब्लड शूगर के लिए भी मेडिकल ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ती है. यह टेस्ट किडनी की बीमारियों को पहचानने में भी मदद करता है. यह टेस्ट साल में एक बार कराना चाहिए, खास कर महिलाओं को.


  
सिरम क्रि एटनीन टेस्ट

सिरम क्रि एटनीन टेस्ट के द्वारा किडनी की बीमारियों का पता चलता है. इसके स्तर के आधार पर बीमारियों की विभिन्न अवस्थाओं का वर्गीकरण किया जाता है. सिरम क्रिएटनीन मांसपेशियों के मेटाबॉलिज्म और वजन तथा उम्र का बॉयोप्रोडक्ट है. गुरदे की बीमारी की दशा में मानव शरीर में सिरम क्रिएटनीन का स्तर बढ़ जाता है और मूत्र का बनना कम हो जाता है. विशेषज्ञों के मुताबिक किडनी की बीमारियों का शुरुआती अवस्था में पता नहीं चल पाता. इस कारण किडनी की बीमारियों से काफी अधिक मौतें होती हैं. सिरम क्रिएटिन टेस्ट चालीस के बाद जरूरी जांचों में एक है.

मैमोग्राम और पेल्विक अल्ट्रासाउंड
ये दोनों जांच चालीस के बाद महिलाओं को जरूर कराना चाहिए. यदि विशेषज्ञों की मानें, तो भारत में सन् 2017 तक ढाई लाख से अधिक महिलाएं ब्रेस्ट  कैंसर से पीड़ित होंगी. इंडियन मेडिकल रिसर्च काउंसिल के अनुसार शहरों में रहनेवाली प्रति एक लाख में से 30-33 प्रतिशत महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर का शिकार हो सकती है, जिनमें ज्यादातर संख्या चालीस पार की महिलाओं की होंगी. लिहाजा महिलाओं के लिए ब्रेस्ट कैंसर  की पहचान करने के लिए मैमोग्राफी टेस्ट कराना चाहिए. पेल्विक अल्ट्रासाउंड टेस्ट गायनोक्लॉजिकल बीमारियों को जांचने के लिए कराया जाता है. समय रहते पता चलने से सर्वाइकल  कैंसर से होने वाली मौतों से बचा जा सकता है  आपकी उम्र 40 पार हो गयी हो  हो, यह टेस्ट हर साल अवश्य कराएं.



जीवन की दूसरी पारी -मेनोपॉज 

मनोपॉज, किसी भी महिला को हर महीने के मासिक धर्म के झंझट से तो मुक्ति दिला देता है, मगर साथ की कुछ अन्य समस्याओं को सामने लाकर खड़ा कर देता है। मेनोपॉज का अर्थ है महिला की प्रजनन शक्ति और मासिक धर्म पर विराम चिन्ह लगना। उम्र के इस पड़ाव में महिला को बहुत से शारीरिक व मानसिक बदलाओं से गुजरना पड़ सकता है। महिलाओ की मीनोपॉज की आयु ४५से ५१ साल की होती है। जैसे ही महिलाएं उम्र में चालीस का पड़ाव पार करती है वे मानसिक और शारीरिक बदलाओं को महसूस करने लगती है। परेशानी होने पर भी महिलाये बढती उम्र को दोष देकर चुप्पी साधे रहती है। यही चुप्पी कई बार समस्याओं को गंभीर स्थिति में लाकर खड़ा कर देती है।जैसे-जैसे महिलाओं कि उम्र बढती जाती है उनके शरीर के हारमोंस - एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन का निर्माण कम होने लगता है। मीनूपॉज केवल एक रात में जन्म लेने वाली समस्या नही है। इसके कुछ सामान्य लक्षण हैं - हॉट फ्लेशेस, अनियमित मासिक धर्म, बेचेनी, फटीग, जोड़ो, मांस पेशियों में दर्द होना, यादाश्त कमजोर होना और रात में ठीक से नींद न ले पाना


                         


                 उम्र तो बढ़नी ही है पर अगर महिलाएं अपने स्वास्थ्य कि नियमित जांच कराती रहे तो तो बढती उम्र बोझ नहीं लगती | इसी के अगले अंक में हम बात करेंगे कि चालीस पार कि महिलाएं अपने खान –पान में क्या –क्या बदलाव करे

डॉ उमा अग्रवाल 

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