अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष : चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ

                                        अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष  चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ ....... टूट जाते ...

                    
                  
अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष

 चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ .......

टूट जाते हैं कुछ लोग 
सांसों के टूटने से पहले 
जब जीवन के
टीभते  दर्द के 
अनेक नाम ,अनेक रूप 
गढ़ लेते हैं 
अपनी सर्वमान्य परिभाषा 
"निराशा "
कि  छोटे- बड़े रास्तों 
पगडंडियों से होते हुए 
अपनी समस्याओं का समाधान खोजते 
क्यों पहुँच जाते हैं 
एक ही जगह 
चौराहों की गुमटियों पर
जहाँ  
फूट जाती है कुछ आँखें 
आँखों के फूटने से पहले 
दिखती  ही नहीं 
साफ़ -साफ़ शब्दों में लिखी 
वैधानिक चेतावनी
कि  पैसे देकर 
खरीदते हैं "धीमी मौत "
समय के साथ 
रगड़ते -घिसटते 
अतिशय पीड़ा झेलते 
जब तय कर देता है डॉक्टर एक तारीख
आह ! दुर्भाग्य  
मर जाते हैं कुछ लोग
 मौत के आने से पहले 


 मैं जहाँ जा रही हूँ वहां मेरे साथ इस यात्रा में मेरी सहेली सुलेखा है। विशाल प्रांगण से होते हुए ईमारत में अन्दर घुसने से ठीक पहले मैं  धडकते दिल से मुख्य द्वार  पर लगा बोर्ड देखती हूँ … "क ख ग कैंसर हॉस्पिटल "। कैंसर एक ऐसा शब्द जिसको सुनकर भय के  अनगिनत केकड़े शरीर पर रेंगने लगते हैं । कैंसर जैसे जिंदगी मृत्यु की तरफ रेंग -रेंग कर चल रही हो ,सब ख़त्म कर देने के लिए सब लील जाने के लिए । मैं सुलेखा का हाथ कस कर पकड़ लेती हूँ । मैं आश्वस्त हो जाना चाहत हूँ की एक -दूसरे का साथ शायद उस पीड़ा को कम कर दे जो एक शोध के लिए हम अन्दर देखने जा रहे हैं । हम एक बड़े से वार्ड में प्रवेश करते हैं जहाँ मरीज ही मरीज हैं। .... तम्बाकू का दुष्परिणाम भोगते हुए मरीज ……… या अस्पताल की भाषा में कहें तो बेड संख्या । बेड नंबर -१ पर लेटा  मरीज बुरी तरह खांसता  है ,उसका दाहिना गाल फूल कर चार गुना हो गया है लाल ,सडा ,पीब भरा | दर्द की टीस  के साथ मरीज उलटी कर देता है ........ खून की उल्टी .... कैंसर की तीसरी अवस्था ।दर्द की सिहरन के साथ सुलेखा को उबकाई   आती है  ।"नहीं मैं और नहीं देख सकती कह कर सुलेखा मेरा हाथ छुडा  कर बाहर भाग जाती है । "जो सुलेखा से देखा नहीं जा रहा  है वो कोई भोग  रहा है ।
                                          मैं आगे बढती हूँ बेड नंबर -२।  ओपरेशन के बाद गाल सिल  दिया गया है  । मरीज ठीक हो गया है पर होठ ,गाल ,नाक एक विचित्र स्तिथि में आ गए हैं बोलने में लडखडाहट है जो शायद पूरी उम्र रहेगी । बेड नंबर ३ व् चार की असहनीय यंत्रणाओं को देखते हुए मेरी दृष्टि पड़ती है बेड नंबर -५ के मरीज पर... शांत ,निश्चेष्ट ,सफ़ेद कफ़न ओढ़े । साथ में रोती -बिलखती २६ -२७ साल की स्त्री ,गोद में ६ माह का शिशु लिए । शायद पत्नी ही होगी ,और वह नन्हा  शिशु उसका पुत्र ,जो  पिता  शब्द सीखने से पहले ही  पिता के स्नेह से वंचित हो गया । वहीँ जमीन पर पसरी अपने जवान पुत्र की मौत पर मातम मनाती बदहवास अर्धविक्षिप्त सी माँ ।  हे विधाता ! एक साथ चार मौते ...,एक दिख रही है ,तीन दिख नहीं रही । क्यों आखिर क्यों? नशे की दिशा भटके क़दमों के साथ  ये नशा लील लेता है इतनी सारी  जिंदगियाँ एक साथ  । अनमयस्क सी मैं बाहर की तरफ भागती हूँ ।  
                                 बाहर खुली हवा में एक बेचैन कर देने वाली घुटन है । रह -रह कर बेड नंबर १,, ……… के मरीज मुझे याद आ रहे हैं । शायद उनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं है……… या शायद उनसे मेरा बहुत घनिष्ठ रिश्ता है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से ,एक आत्मा को दूसरी आत्मा से जोड़ता है .......... हमारे बीच मानवता का रिश्ता है । अनमयस्क सी मैं चल पड़ती हूँ और मेरे साथ चल पड़ती हैं फूटपाथ पर कुकुरमुत्तों की तरह उगी पान की गुमटियां और उस पर सजे  सिगरेट के पैकेट व् ख़ूबसूरती से लटकाये गए तम्बाकू के गुटखे । जिन पर साफ़ -साफ़ लिखी वैधानिक् चेतावनी " तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है  "मुझे मुंह चिढा रही है । जानते समझते हुए भी बच्चे ,किशोर ,युवा और कुछ वृद्ध उसे खरीद कर ले जा रहे हैं और साथ में खरीद कर ले जा रहे हैं ............. अतिशय पीड़ा ,एक धीमी मौत ।
        आज  स्कूल में चार्ट कॉम्पटीशन है । विषय है "से नो टू  टुबैको "। कक्षा ३ ,४ और ५ के ढेर सारे  बच्चे चार्ट बना रहे हैं ।  तरह -तरह की आकृतियों  के बीच बड़ा -बड़ा लिखा है "से नो टू  टुबैको "। इनमें से किसी की प्रथम पुरूस्कार मिलेगा ,किसी को द्वितीय किसी को तृतीय । पर मैं खोज उन बच्चों को जो हार जायेंगे । आज की इस प्रतियोगिता में नहीं । उम्र के किसी पड़ाव में ,किसी समय में किसी उलझन में "से नो टू  टुबैको " कहने वाले बच्चे  ,एक सिगरेट का पैकेट या एक तम्बाकू का गुटखा खरीद कर "से यस टू  टुबैको कहते हुए लील जायेंगे ..........तम्बाकू नहीं , ये सारे चार्ट ,ये सारे भाषण ,ये सारे मार्च पास्ट.... और ये सारा उत्साह और धीरे -धीरे तब्दील होने लगेंगे बेड नंबर १ ,,३ के मरीजों में ।  
                   हर वर्ष  अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस मनाया  जाता  है । जोर -शोर से तम्बाकू और उसके उत्पादों की खराबियाँ  बतायी जाती हैं । स्कूलों  में विशेष कार्यक्रम होते हैं । सेमिनार्स होते हैं । ज्यादातर सबको बचपन से ही रट  जाता है “कि तम्बाकू धीरे धीरे सुरसा के मुंह की तरह पूरी दुनिया को लीलने को आमादा है | ४५० ग्राम तम्बाकू में निकोटीन मात्रा लभग ६५ ग्राम होती है और  इसकी ६ ग्राम मात्रा से एक कुत्ता ३ मिनट में ही मर जाता है|भारत में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गालों में होने वाले कैंसर का मुख्य कारण खैनी अथवा जीभ के नीचे रखी जाने वाली, चबाने वाली तम्बाकू है। इसी प्रकार गले के ऊपरी भाग में, जीभ में और पीठ में होने वाला कैंसर बीड़ी पीने से होता है। सिगरेट से गले के निचले भाग में कैंसर होता पाया जाता है, इसी से अंतड़ियों का भी कैंसर संभव हो जाता है।तम्बाकू का नियमित सेवन व्यक्ति को धीरे –धीरे मृत्यु के करीब ला देता है और वह असमय काल कवलित हो जाता है |  मन में अजीब सा मंथन है.……आखिर क्या है जो तमाम वैधानिक चेतावनियों ,जानकारी और  हर साल मनाये जाने वाले “से नो टू टुबैको “वाले दिवस के बावजूद कुछ लोग उस दिशा में बढ़ जाते हैं जो वर्जित क्षेत्र है |ज्यादातर तम्बाकू खाने की शुरुआत किशोरावस्था या युवावस्था में ही होती है |जो उम्र ऊर्जा व उत्साह  से भरी होती है उसमें क्यों चुनते हैं कुछ लोग धीमी मौत |क्यों बचपन से दब्बू सा बबलू  जिसने जीवन में अब तक कभी  कौन से जूते  खरीदने हैं  का भी निर्णय स्वयं से नहीं लिया चौदह साल की उम्र में दोस्तों के कहने पर “अरे ये तो मुन्ना है ,छोटा बेबी ,दूध पीता बच्चा ,जा माँ की गोद में खेल कहकर उकसाए जाने पर “दूसरों की नजर में खुद को बड़ा साबित करने के लिए तम्बाकू खा लेता है |वही राहुल प्रेम में असफल हो जाने पर , रामरती पति की असमय मृत्यु के बाद समाज से लड़ने की हिम्मत जुटाने के लिए ,सोमेश असफल विवाह के बाद ,मयंक  बेरोजगारी से जूझते  हुए एक के बाद एक इंटरव्यू में असफल होने के बाद तम्बाकू में अपने दुःख का समाधान ढूँढने लग जाते हैं |
                                  मानव मन भी कितनी विचित्रताओ से भरा है |हर मन की समस्या अलग ,उसकी उलझन अलग ,उसकी  मानसिक गुत्थी अलग | कितने लोग कितने दुःख कितने कारण पर इन सब के बीच एक समानता है सब के सब निराश हैं ...जीवन की किसी हार से किसी पराजय बोध से | पर सबने एक ही समाधान खोजा है ......... तम्बाकू के छोटे –छोटे दानों में |जो कुछ क्षण के लिए उनके अवसाद को दूर कर सके जीवन की निराशा से निकाल सके |ये सब निराश लोग  बुझते जीवन में आशा की चिंगारी जलाने के लिए उस गाडी पर सवार हो जाते हैं जो उन्हें धीरे –धीरे चिता की ओर ले जाती है |इनमें से कई हमारे प्रियजन हैं |मेरे मन में यह शास्वत प्रश्न है ....... आखिर  क्यों टूट गए ये लोग |सुख दुःख तो जीवन का हिस्सा हैं |आशा –निराशा में दिन –रात की सी आंख मिचौली है |फिर पराजय बोध इतना ,इस कदर क्यों हावी हो गया की पढ़े लिखे लोग भी इस दिशा की तरफ बढ़ चले |

                           मुझे पता है, शायद सब को पता हो | जितने भी नशीले पदार्थ  होते हैं,उन सब में एक गुण अवश्य होता है ..... वो है बार –बार उनको खाने का मन जिसे हम आम भाषा में  एडिक्शन कहते हैं | अक्सर किशोरावस्था में उत्सुकता वश या मित्रों के साथ इन पदार्थो का सेवन शुरू होता है फिर इसके नशे का आनंद  आने लगता है। इसकी मात्रा बढ़ाई जाती है। जो लोग बार-बार लोग इसका सेवन करते है, उनका शरीर इस मादक पदार्थ का आदी हो जाता है और फिर वह उसको छोड़ नहीं पाते। छोड़ने से कई प्रकार के लक्षण जैसे- बेचैनी, घबराहट होने लगती है। इस कारण लोग इसके आदी हो जाते है, उसी प्रकार जैसे लोग शराब या अन्य पदार्थों के आदी हो जाते है और जब कोई किसी पदार्थ का आदि हो जाए तो उसका नियमित सेवन उसकी बाध्यता हो जाती है |फिर सब कुछ जानते समझते हुए भी व्यक्ति अपने आप को उस नशे के चुंगल से मुक्त नहीं कर पाता |मेरा मन व्यग्र है | काश की इन भटके हुए लोगों को वापस लाया जा सके | काश की हमारे अपने प्रियजन इसके गंभीर परिणामों को न भुगते |काश की इस नशे का लती किसी का भाई बेटा  पति अपने अंतिम दिन कैंसर हॉस्पिटल में न  गुज़ारे | ख़ुशी की बात है कि कुछ नशा मुक्ति केंद्र हैं जो बड़े ही प्यार से वैज्ञानिक तरीकों द्वारा इन मासूमों को वापस सहज सरल जीवन में ले आते हैं | पर इसमें मरीज की संकल्प शक्ति का बहुत योगदान होता है ,अन्यथा नशे की लत से निकलना संभव नहीं |यहाँ मैंने जानबूझ कर मरीज शब्द प्रोयोग किया है ,क्योकि मेरे विचार से नशे के चुंगल में फंसने वाले सब मरीज ही हैं ........... मन के मरीज ,भावनाओं के मरीज ,कमजोर जिजीविषा के मरीज | इनमें से कितने हैं जो नशा मुक्तिकेंद्र में जा कर अपनी संकल्प शक्ति जगा पाते होंगे | शायद कुछ .... आंकड़े भी यही कहते हैं | बाकी के लिए कहीं न कहीं किसी न  किसी अस्पताल का बिस्तर तय हैं .....और तय है एक दर्द भरी मौत | काश की इनके नशा करने के शुरूआती दिनों में ही इन्हें  इस काल कोठरी से वापस खींचा जा सके |
                 अगर समस्या है तो समाधान भी अवश्य होगा | बेहतर हैं की नशे की आदत की शुरुआत ही न हो या हो गयी हो तो शुरू में ही इसे सुधारा जा सके |पर कैसे ? किस तरह ? अपने प्रश्न का उत्तर खोजने मैं कमरे में टहलने लगती हूँ |वहीं  मेरा  बारह वर्षीय बेटा नीद में कुनमुनाता है |मैं स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरती हूँ | बेटा गहरी नींद में है फिर भी मेरे हाथ फेरने पर वो मुस्कुराता है |  गहरी नींद में भी उसे अहसास होता है स्नेह का | सहसा मैं मुस्कुरा उठती हूँ ..... शायद यही मेरे प्रश्न का उत्तर है | नींद की अपनी एक दुनिया है ,जैसे की नशे की अवस्था की एक दुनिया हैं ...... इस दुनिया के भीतर इस दुनिया से बिलकुल अलग | एक अहसास स्नेह का ,एक प्यार भरे हाथ का स्पर्श ,कुछ भावनाओं से भरे  मीठे शब्द | बस इतना ही जरूरी है........ या शायद ...इसी की कमी है | कुछ प्रतिशत को छोड़ कर नशा करने वाला निराश व्यक्ति कहीं न कही खुद से घृणा करने लग जाता है| कभी –कभी चाहते हुए भी नशा नहीं छोड़ पाता है ,असफल प्रयासों से  उसकी मनहस्तिथि और कमजोर हो जाती है | अगर उसी समय उसको परिवार से निरंतर ताने उलाहने मिलते हैं तो वो उस अपमान को फिर नशे से ही भूलाने की कोशिश में लग जाता  हैं और  नशे की आदत छोड़ना और मुश्किल हो जाता है | पर ये तस्वीर बदली जा सकती है जब ये कदम तम्बाकू –सिगरेट की तरफ उठ रहे हों तभी उनको किन्ही दो स्नेह भरे हाथों का सहारा मिल जाए ,दो मीठे शब्द मिल जाए ,अपने वजूद का हल्का सा अहसास मिल जाए तो इन  क़दमों को वापस नशा मुक्त जीवन की तरफ मोड़ा जा सकता है |
                          अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगी कि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं खाता ,पूरे परिवार को खाता है | मेरे विचार से जितना जरूरी है तम्बाकू के नशे को रोकने  के लिए जन जागरण अभियान ........ ये चार्ट ,ये स्लोगन ,ये लेख ये मार्चपास्ट हैं  उतना ही जरूरी है निराशा ,अवसाद या किसी  कारण से तम्बाकू की तरफ मुड गए लोगों की नशा मुक्त सामान्य जीवन में  वापसी ........ तभी शायद कैंसर हॉस्पिटल के बेड नंबर १ ,२ ,३ पर कोई यंत्रणा भोगता मरीज नहीं होगा ,बेड नंबर ५ के बगल में रोती  हुई पत्नी नहीं होगी | ये हो सकता है ....जब स्नेह से भरे दो हाथ थाम लेंगे उन हाथों को जो बढ़ रहे हैं किसी गुटखे किसी सिगरेट  की तरफ | हमारी आपकी और समस्त मानवता की तभी जीत है जब कोई नशे के आदि दो हाथ गुटखा तम्बाकू दूसरी तरफ फेंक कर कहेंगे ...........”नो टू टुबैको “ और गा उठेंगे ..........

कह दो कि न  पुकारे ,ये सर्द स्याह रातें
लौट आई हैं बहारे अब मेरे गुलिस्तान में


एक कोशिश है ......... कर के देखते हैं         
       


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नाम

“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues children's day deepawali special E.book family&relatives father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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