बड़ा होता आँगन (सम्पादकीय अंक -९ )

बड़ा होता आँगन   बार –बार दरवाजे पर आ कर परदेश गये बेटे की बाट  जोहती है माँ कि दीवार पर टंगे कैलेंडर पर बना देती है ...




बड़ा होता आँगन
 बार –बार दरवाजे पर आ कर
परदेश गये बेटे की
बाट  जोहती है माँ
कि दीवार पर टंगे कैलेंडर पर
बना देती है
बड़ा सा लाल गोला
बेटे के आने की तारीख का
कि इस इतजार में कैद होता हैं
उसका एक –एक पल
इसी इंतज़ार में कट जाता है
दिन का सूनापन
और वो स्याह राते
जिसमें बिस्तर पर अकेले पड़े –पड़े 
कराहती है,फिर आंसूओ से
 धुन्धलाये चश्मे को पोंछ कर
कोसती है आँगन को
मुआ इतना बड़ा हो गया
कि यहीं खेलता बेटा
नज़र ही नहीं आता 
*****


अम्माँ दूर नहीं हूँ तुमसे
जब तुम कराहती हो बिस्तर पर
एक पीर सी उठती है दिल में
चीर कर रख देती है कलेजा
हर रोज याद करता हूँ तुमको
रोटी और नाम की जद्दोजहद ने
बाँट दिया है मेरे तन और मन को
करता हूँ जोड़ने की कोशिश
जब ढूढता हूँ तुमको
तुम्हारे बनाये अचार के टुकड़ों में
या महसूस करता हूँ तुम्हारी अँगुलियों का स्पर्श
मिगौरी और मिथौरी  में 
हर होली ,दिवाली और त्यौहार सूना लगता है अम्माँ
पर मजबूर हूँ
इस बडे  आँगन में कैद हूँ
अपने छोटे  दायरे में

      टी वी पर खबर आ रही है “ सभ्यता का विकास चरम पर है दूरियां घट गयी हैं | आप रात को भारत में हैं सुबह अमेरिका में | पूरा विश्व एक आँगन में तब्दील हो गया है |या यूँ कहे हमारा आँगन बड़ा हो गया है | टी वी देखती हुई ८० वर्षीय  रामरती देवी एक उडती सी नज़र अपने आँगन पर डालती हैं .....वही कोने में चूल्हा जलता था जब चारों  बच्चे घेर के बैठ जाते थे | चूल्हे पर धीरे –धीरे सिकती हर रोटी के ४ टुकड़े कर सब की थाली में एक –एक टुकड़ा  डाल देती थी | देवरानी मुस्कुरा कर कहती थी “दीदी आप से सब बच्चे हिल मिल गए हैं अपना पराया समझ नहीं आता | पर अब ....... अब तो कोई नजर नहीं आता | बरसों पहले देवरानी न्यारी हो गयी ,और बच्चे अमेरिका में जा कर बस गए जिन्हें चार साल से देखा नहीं |रामरती देवी चश्मा पोंछ कर बुदबुदाती  हैं .....हां  शायद आँगन इतना बड़ा हो गया हैं कि कोई दिखता नहीं बरसों –बरस |
                      शंकुंतला देवी उम्र ७५ वर्ष  चलने –फिरने उठने –बैठने में असमर्थ एक कमरे में पड़े –पड़े पानी के लिए बच्चों को आवाज़ लगाती हैं | वही घर है ,आँगन भी वही है .... जब उनकी एक आवाज़ पर सारे बच्चे दौड़े चले आते थे.... वह भी कभी मूंगफली से कभी टॉफ़ी से कभी ,कभी भुने चनों से बच्चों की झोलियाँ भर देती थी | पर आज इतना पुकारने पर भी कोई नहीं आता .... घंटों बाद आती है परिचारिका उनके गीले हुए वस्त्रों को बदलने या पानी और दवाई देने | शकुंतला देवी मन ही मन सांत्वना देती है वह  तो अभी भी वही है ,घर भी वही पर शायद टी .वी वाला सही बोल रहा है .......... आँगन बड़ा हो गया है तभी तो उनकी आवाज़ आँगन को पार करके बच्चो तक पहुँच ही नहीं पाती |
           बर्फ की सिल्ली पर रखी फूलमती की मृत देह को शायद अभी भी प्रतीक्षा है अपने बेटे पप्पू की जो दस साल पहले विदेश जा कर बस गया था | कितना घबराई थी वो अपने कलेजे के टुकड़े अपने  बेटे को विदेश भेजते  समय | वैधव्य की मार झेलते हुए कैसे नमक रोटी खाकर पढ़ाया था पप्पू को | बेटे ने हाथ थाम कर कहा था “अम्माँ  बस एक साल की बात है ,लौट आउंगा | थरथराते होंठों से बस उसने इतना ही कहा था “ बेटा मेरी मिटटी खराब न होने देना ,आग तुम्ही देना “ अरे नहीं  अम्माँ  अब पूरा विश्व एक आँगन हो गया है ,दूरी रह ही कहाँ गयी है | विधि की कैसी विडम्बना है जो माँ अपलक १० साल से अपने बेटे का इंतज़ार कर रही थी उसकी मृत देह १० घंटे भी न कर सकी | इससे पहले कि देह सड़े रिश्ते के भतीजे को बुला कर पंचतत्व  में विलीन कर दी गयी | पप्पू न आ सका | इतने बड़े आँगन को पार करने में समय तो लगता ही है |
      अभी पिछले महीने हमने विदेशियों की परंपरा का निर्वहन करते हुए मदर्स डे ,फादर्स डे ,फैमिली डे मनाया | बहुत से लोगों को इस दिन दूर रहते हुए अपने माता –पिता की याद आई होगी | शायद फोन मिला कर “ हैप्पी मदर ,फादर ,फैमिली डे कहा हो “ शायद कोई कार्ड ,कोई गिफ्ट भी दिया हो | और प्रतीकात्मक रूप से अपने कर्तव्य की ईतिश्री करके अपने सर से बोझ उतार  लिया हो | पर समय कहाँ देख पाता  है कि बुजुर्गों के चेहरे की मुस्कुराहटों की नन्हीं सी शाम, इंतज़ार की लम्बी रात में कितनी जल्दी धंस जाती है | फिर शुरू हो जाता है अंतहीन पलों को गिनने का सफ़र जो कटते हुए भीतर से बहुत कुछ काट जाते हैं |जीवन संध्या में एकाकीपन कोई नयी बात नहीं है | बहुत कुछ कहा जा चुका है कहा जा रहा पर समस्या जस की तस है | एकाकीपन की समस्या से हर बुजुर्ग जूझ रहा है | वो भी जिनके बच्चे दूर विदेश में  हैं और वो भी जिनके बच्चे पास रह कर भी दिल से बहुत दूर हैं | बड़े होते आँगन में दायरे इतने संकुचित हो गए हैं कि किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है |
          अब तस्वीर को पूरा १८० डिग्री पर पलट कर देखते हैं | नीरज एक छोटे से कस्बे  में रहने वाला होनहार छात्र जिसने अपनी  कुशाग्र बुद्धि के दम पर एक  देश की सबसे प्रतिष्ठित इंजीनयरिंग परीक्षा पास की और  कंप्यूटर इंजिनीयर बना | जाहिर है उसके छोटे से कस्बे  में उसकी योग्यता लायक कोई नौकरी नहीं है  | देश के बड़े शहरों और विदेशों में उसका सुनहरा भविष्य इंतज़ार कर रहा है  |अब उसके पास  मात्र दो विकल्प हैं | या तो वो किसी मात्र पेट भरने लायक नौकरी कर के उस कस्बे  में रहे और जीवन भर अपनी  योग्यता के अनुसार पद न मिल पाने की वजह से कुंठित रहे या घर द्वार छोड़ कर कहीं और बस जाए | नीरज निष्ठुर नहीं है विवश है | हमारे अपने देश में ही बहुत से प्रान्त तरक्की में इतना पिछड़े हुए हैं कि वो अपने होनहार बच्चो को अच्छी नौकरियाँ उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं | बच्चे विवश हैं प्रान्त को, देश को छोड़ कर बाहर जाने को |आज नीरज अमेरिका में जरूर है पर उसका मन यही अम्माँ –बाबूजी के पास है | तन और मन का   यह बंटवारा नीरज को ३३ वर्ष की उम्र में उच्च रक्तचाप व् डायबिटीज की सौगात दे गया है |
          रितेश वैज्ञानिक है | अपने ही देश में रह रहे माता –पिता से चाह कर भी जल्दी –जल्दी  मिलने नहीं जा पाता  | जाना चाहता है पर कर्तव्य का बोझ इतना ज्यादा है कि  हर त्यौहार पर मन मसोस कर रह जाता है | जब कभी माँ की बीमारी की खबर सुनता है तो दर्द और तकलीफ की एक लम्बी रेखा खींच जाती है मन पर | बेचैन राते आँखों में कटती हैं | पर विवशता है काम की | अक्सर अपने बच्चों को गाँव की पनघट की ईमली के पेड़ों की , गेंहू के खेत की कहानियाँ सुनाता है | शायद उन किस्सों को सुना –सुना कर कल्पना में ही सही पर  वो सुकून के पल वो ममता की छांव का अहसास कर लेना चाहता है |  तरक्की की दौड़ में अंधराए हुए बच्चों पर दोष लगाते हुए हम यह भूल जाते हैं कि रोटी की चाह में घर से दूर गए ये बच्चे भी कहाँ पूरे  होते हैं इनके भी भावनाओं का एक कोना टूटा हुआ होता है | तभी तो सुदूर विदेशों में दिवाली पर  मिटटी के दिए ढूंढते हैं| रोली और कुमकुम से पूजा की थाली सजाते हैं | अपनी सभ्यता को समेटने का प्रयास तो करते हैं पर पर माँ का स्नेहिल स्पर्श और अपनों के साथ की कमी हमेशा रह जाती है .... हर बार प्रयास करते हैं सब कुछ पहले जैसा हो जाए पर हर ख़ुशी हर गम यह अहसास दिला देता है .... अपनों के बिना जीवन वैसा ही हैं जैसे शरीर बिना आत्मा का | परदेश में बसे बच्चे बहुधा एक खोखला और झूठा जीवन जी रहे होते हैं | गला काट प्रतिस्पर्धा  के वातावरण में उन्हें मित्र नहीं फ्रेनिमीज मिलते हैं | परिवार के सुरक्षित वातावरण प्रेम और स्नेह की कमी सदा खलती रहती है
                    परिवर्तन प्रकृति का नियम है | आज का सच ये है कि अगर बेटा  प्रतिस्पर्धा की दौड़ की लयताल में सुर मिलाता हुआ सुदूर शहरों में या विदेशों में जाएगा तो उसकी तरक्की पर गर्व करने वाले मातापिता जीवन संध्या में अकेलेपन व् असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होंगे | कई बार वो अपने परिवेश में इतना रमे हुए होते हैं है कि इस उम्र में दूसरे स्थान पर बेटे के पास जा कर  नए सिरे से अनुकूलन उनके लिए संभव नहीं होता | वो निराश एकाकी जीवन काटने के लिए अभिशप्त होते हैं | वहीँ बच्चे भी स्नेह की छांव से वंचित आधेअधूरे अपने मातापिता के एकाकीपन  के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए अपराध  बोध से गस्त रहते हैं |क्योंकि मनुष्य केवल शरीर नहीं है वो मन भी है और स्नेह मन की खुराक हैं जैसे भोजन तन की |पर  विधि की कैसी विडम्बना है कि एक ओर जहाँ ये बच्चे अपने मातापिता की विवशता व् अकेलेपन की पीड़ा को महसूस करते  हैं वही अपने घर के बगल में अकेले रहने वाले किसी बुजुर्ग दंपती की पीड़ा को अनदेखा करते हैं |
   सच में आज आँगन बड़ा हो गया है पर क्या केवल कहने के लिए या  सिर्फ भौतिक अर्थों में |ज्यादा तेज रफ़्तार से चलने वाले वाहनों की वजह से घंटों की दूरियां मिनटों में तय हो रही है| आँगन बड़ा हो गया है पर विचार संकुचित | सब अपने –अपने घेरों में बंद , अपने दर्द अपनी तकलीफ में कैद .... अपना अपना अकेलापन, अपनी –अपनी रिक्तता | पर क्या इस आँगन को वास्तविक रूप में बड़ा नहीं किया जा सकता | दिल के अर्थों में भावनाओं के अर्थों में आपसी सहयोग के अर्थों में  | क्यों न घर से दूर रहते बच्चे  अपने आस –पास रह रहे किसी अकेले  बुजुर्ग परिवार को अपना ले ,उनका सहारा बन जाए ,उनके सुख –दुःख बांटे | इससे  उन्हें भी स्नेह की वो छाया मिलेगी जो वो गाँव में छोड़ आये हैं | जीवन संध्या में अकेलेपन से जूझ रहे बुजुर्गों को भी बेटे बहु  का प्यार ,नाती –पोतों का लाड –दुलार और देखभाल करने वाला परिवार मिलेगा | इस वसुधैव कुटुम्बकम की भावना अपनाने के बाद ही हम कह पायेंगे .... आज पूरा विश्व एक परिवार हो गया है | सच में हमारा आँगन बड़ा हो गया है |
एक कोशिश है ............. करके देखते हैं | 

वंदना बाजपेयी  

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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues children's day deepawali special E.book family&relatives father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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