21वीं सदी की चुनौतियाँ और बाल-साहित्य

नन्हें, भोले बाल-मन को कहानियाँ और कविताएं एक नए स्वप्नलोक में ले जाती हैं जहाँ परियाँ, जादूगर, राजा-रानी, चंदा-तारे हैं तो दूसरी ओर पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फूल-झरने हैं, और सब उनके साथ बोलते-बतियाते हैं। बाल-साहित्य एक ओर बच्चे की जिज्ञासा शांत करता है तो दूसरी ओर उसमें जिज्ञासा उत्पन्न भी करता है। यह बालक में संवेदनशीलता और सरसता का संचार करता है और चंाद जैसे उपग्रह को जो आकाशीय पिण्ड है बच्चों का प्यारा चंदा मामा बना देता है। बाल मन पर, बचपन की कविताओं और कहानियों की स्मृति कभी धूमिल नहीं होती क्योंकि प्रत्येक कविता-कहानी इतनी बार दोहराई जाती है कि उसके विस्मृत होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मैं स्वयं के अनुभव से यह कह सकती हूँ कि बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियाँ या ’नंदन’ ’पराग’ में पढ़ी कहानियाँ आज भी मैं अपने बच्चों को सुनाती हूँ। इन पत्रिकाओं में पढ़ी अनगिनत कविताएँ मुझे आज भी याद हैं।
बाल-साहित्य, बचपन को बु़िद्धमानी का भोजन प्रदान करता है, ’पंचतंत्र’ इसका उदाहरण है। विष्णु शर्मा ने राजनीति और राजनय जैसे गूढ़ विषयों को, पशु-पक्षी की छोटी-छोटी कथाओं के द्वारा कितना सरल और सरस बना दिया। रामायण और महाभारत की कहानियां हजारों वर्षो से न केवल धर्म और इतिहास का ज्ञान देती रही हैं, वरन् नैतिक शिक्षा और चरित्र निर्माण के महत्वपूर्ण दायित्व का निर्वाह भी करती रही हैं। जब कहानी के किसी पात्र को झूठ बोलने, चोरी करने पर दण्ड मिलता है, बच्चे की चेतना और आत्मा पर भी इसका अमिट प्रभाव होता है। इस प्रकार बाल-साहित्य, जीवन का अभिन्न अंग बन जाता है, जिसका चरित्र-निर्माण में अमूल्य योगदान होता है। साहित्य के माध्यम से पशु-पक्षी एवं संपूर्ण प्रकृति के साथ बच्चा तादात्म्य स्थापित करता है। जब वह इन कथाओं में चिडि़या, तितली, बिल्ली, चूहा यहाँ तक कि चींटी के प्रति भी प्रेम, मैत्री, करूणा, क्षमा अनुभव करता है तो बडे़ होने पर भी वह इनके क्या किसी के प्रति हिंसक या कठोर नहीं हो सकता। बच्चों की कहानियों में कुत्ता-बिल्ली, बंदर-हिरन सभी मनुष्य की तरह और मनुष्य की तरह और मनुष्य की भाषा में ही बात करते हैं और उनमें सभी मानवीय-गुण और दोष होते है,                                                                      इसलिए कभी कभी तो मासूम बच्चे यथार्थ में फूलों और पक्षियों से बात करने का प्रयास भी करते हैं। उनके लिए कथाओं और जगत में कोई अंतर ही नहीं होता।
21वीं शताब्दी में भारत में भी संयुक्त परिवारों का स्थान, एकल परिवार लेते जा रहे हैं, अपने वृद्धों को भी आधुनिक नगरीय सभ्यता बाहर का (वृद्धाश्रम का) रास्ता दिखा रही है, इसलिए उनके ज्ञान और अनुभव के निचोड़ से नई पीढ़ी पूरी तरह वंचित है। आज जहाँ ’माँ’ भी बाहर जाकर कार्य करने लगी है, वह भी बच्चों को अधिक समय नहीं दे सकती, ऐसी स्थिति में बच्चों के हिस्से में आया है ’अकेलापन’। हर घर में एक ’बुद्धू बक्सा’ (टी.वी.) और कम्प्यूटर ही उनका दोस्त बन गया है। तकनीक का यह प्रहार, बचपन को असमय ही बड़ा कर रहा है और बाजार की, बच्चों की दुनिया में घुसपैठ हो गई है। आज बच्चों की पसंद-नापसंद बाजार निर्धारित कर रहा है और बच्चों को विज्ञापन का प्रमुख अंग बना कर, उनसे उनका बचपन छीन रहा है। इन सब कारणों से जितना ’जैनरेशन गैप’ अब दिखाई दे रहा है, उतना अतीत मे कभी नहीं रहा। तकनीक ने धीरे-धीरे संस्कृति का स्थान लेना शुरू कर दिया है।
ऐसे परिवर्तित परिदृश्य में बाल-साहित्य की भूमिका और अधिक बढ़ जाती है। आज जब प्रत्येक नगर और गाँव में अंग्रेजी स्कूल,कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं, इन स्कूलों में अग्रेंजी की ’नर्सरी राइम्स’ रटाई जाती हैं, जिनकी विषय-वस्तु भी विदेशी हीे होती है (लंदन ब्रिज इज फाॅलिग डाउन)। हमें बचपन के लिए संस्कार और भारतीय संस्कृति में रची-बसी, रोचक और बाल-मनोविज्ञान के अनुरूप छोटी-छोटी कविताओं की आवश्यकता है। जो अंग्रेजी की नर्सरी राइम का स्थान ले सकें। साहित्य के अन्य क्षेत्रो की तुलना में बाल-साहित्य कम ही लिखा गया है और हम दोष देते हैं आज के बच्चों को। आरोप लगाते हैं कि वे किताबें पढ़ने के स्थान पर, टी.वी. पर कार्टून ही देखते रहते है।यह तो निश्चित ही है कि जैसी श्वेत-श्याम, पुस्तकें हम अपने बचपन में बड़े चाव से पढ़ा करते थे, आज के बच्चों से हम अपेक्षा कर ही नहीं सकते। आज की चमकदार और सतरंगी दुनिया के अनुरूप बाल-साहित्य को भी अपना स्वरूप बदलना होगा।
आज का बच्चा विदेशी चैनलो पर ’डोरेमाॅन’, ’कितरेत्सु’, ’शिनचैन’ देखकर बड़ा हो रहा है, जहाँ न उसका अपने अतीत से साक्षात्कार होता है और न ही अपनी संस्कृति और नैतिक मूल्यों से। आज अगर हिन्दी की बाल-पत्रिकाओं की बात की जाए तो उनकी संख्या अंगुलियों पर गिनने लायक हैं। बाल् साहित्य के क्षेत्र में इस रिक्तता को भरने का प्रयास करना भविष्य के लिए मूल्यवान कार्य होगा। बालपत्रिकाएं, बच्चों को नियमित पाठक बनाती है। साहित्य की समस्त विधाओं से उनका साक्षात्कार होता है। इनके माध्यम से बच्चे न केवल अच्छे पाठक बनते हैं बल्कि ये भविष्य के अच्छे लेखक भी तैयार करती हैं। अभिभावक, शिक्षक और स्कूलों में वाचनालय इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं।
गीली मिट्टी पर निशान स्थायी होते हैं, इसी प्रकार बाल-मन को भी साहित्य के माध्यम से अपेक्षित दिशा में विकसित किया जा सकता है। बाल-साहित्य ज्ञान के साथ, सृजनात्मकता का भी विकास करता है, बच्चे को सकारात्मक सोच प्रदान करता है और कलात्मक और रचनाधर्मी मन को नए आयाम प्रदान करता है। बहुत छोटे बच्चों को चित्र अधिक आकर्षित करते हैं, बच्चा कविता या कहानी के साथ बार-बार चित्र देखना चाहता हैं और उसका चेहरा हर बार संतोष और प्रसन्नता से चमकने लगता है। साहित्य के पात्र जैसे उसकी आंखो के सामने साकार हो जाते है उसके साथी बन जाते हं। वह उससे गपियाता है व उसके अकेलेपन को बांट लेते हैं।
बाल-साहित्य की प्रत्येक विधा में नई दृष्टि से कलम चलाने की जरूरत है। कथा-कहानी, कविता, पद्य-कहानी, नाटक, संस्मरण, उपन्यास- प्रत्येक विधा में इस तरह के साहित्य-सृजन की जरूरत है जो 21वीं शताब्दी में वैश्वीकरण, उपभोक्तावादी और बाजारवाद की आंधी एवं विदेशी चैनलों व इंटरनेट का सामना कर बच्चों के दिल में जगह बना ले। उन्हें संवेदनशील पाठक बनाए और बढ़ती हुई मूल्यहीनता के युग में, उनके मन को नैतिक मूल्यों से सुशोभित कर सके। उनकी आत्मा की सज्जा कर सके और उन्हें आत्म-केंद्रित स्वार्थ के संसार से निकालकर उन्हें समाज और राष्ट्र के प्रति दायित्व बोध करा सके। जो उनकी आँखों को सपने तो दे ही, साथ ही उन सपनों को पूरा करने का संकल्प भी दे सके, जीवन में कभी भी डगमगाने पर, जो उन्हें दिशाबोध दे सके, लेकिन जो धीरे-धीरे सहज ही उन्हें अपने पाश में बांध ले क्योंकि आज का बच्चा प्रवचन पसंद नहीं करता। 21वीं सदी के दूसरे दशक को ऐसे साहित्य की प्रतीक्षा रहेगी।


डाॅ॰ अलका अग्रवाल
भरतपुर ( राज)

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