ब्याह :कहानी -वंदना गुप्ता

ब्याह   नैन नक्श तो बडे कंटीले हैं साफ़ सुथरे दिल को चीरने वाले गर जुबान पर भी नियन्त्रण होता तो क्या ज...






ब्याह  

नैन नक्श तो बडे कंटीले हैं साफ़ सुथरे दिल को चीरने वाले गर जुबान पर भी नियन्त्रण होता तो क्या जरूरत थी फिर से सेज चढने की

हाय हाय ! जीजी ये क्या कह दिया ? जो कह रही हो सोचा कभी तुम भी वो ही कर रही हो वो ही जुबान बोल रही हो जीजी कोई औरत कब खुशी से दोबारा सेज सजाती है , जाने क्या मजबूरी रही होगी , कभी इस तरह भी सोचा करो औरत की तो बिछावन और जलावन दोनो ही कब किसी के काम आयी हैं , वो तो हमेशा निरीह पशु सी हाँकी गयी है , कभी इस देश कभी उस देश , एक साँस लेने के गुनाह की इतनी बडी सजा तो सिर्फ़ एक औरत को ही मिला करती है , दुनिया भला कब बर्तन में झाँका करती है बस कडछी के खडकने से अंदाज़े लगाती है कि बर्तन में तरकारी बची है या नहीं और आज तुम भी यही कर रही हो बिना सोचे समझे जाने आखिर क्यों ये नौबत आयी ? आखिर क्यों औरत के सिर्फ़ हाड माँस का ही हमेशा सौदा होता रहा बिना उसकी इजाज़त के बिना उसके मन के

मन , हा हा हा मन अरी औरत का भी कभी कोई मन हुआ करता है ? क्या हमारा तुम्हारा भी कभी मन हुआ किसी बात का ? क्या हम नही जीये , क्या हम खुश नहीं रहे , क्या कमी रही भला बता तो रज्जो

जीजी तुम क्यों जान कर भी अंजान बन रही हो , किसे भुलावे में रखना चाह रही हो मुझे या खुद को या इस समाज को बताना जरा कितनी बार तुमने अपने मन से ओढा पहना या कोई भी निर्णय लिया जो किया सब जीजाजी के लिए किया , बच्चों के लिए किया , घर परिवार के लिए किया

तो क्या गलत किया रज्जो यही तो ज़िन्दगी होती है और ऐसे ही चला करती है क्या हमारी माँ ऐसे नहीं जी या हमारी सखियाँ या आस पास की औरतें ऐसे नहीं जीतीं तो इसमें बुराई क्या है सबको सुख देते हुए जीना थोडा बहत त्याग कर देना तो उससे घर में जो वातावरण बनता है उसमें बहुत अपनत्व होता है और देख उसी के बल पर तो घर के मर्द बेफ़िक्री से काम धन्धे पर लगे रहते हैं जाने तुझे कब ये बात समझ आयेगी कि औरत का काम घर की चाहरदीवारी को सुरक्षित बनाए रखना है और मर्द का उसके बाहर अपने होने की तैनाती का आभास बनाए रखना और ज़िन्दगी गुजर जाती है आराम से इसी तरह भला क्या जरूरत थी इसे इतने ऊँचे शब्द बोलने की ? भला क्या जरूरत थी इसे अपने भर्तार को दुत्कारने की वो भी इस हद तक कि वो आत्महत्या कर ले भला ऐसी सुन्दरता किस काम की जो आदमी की जान ही ले ले , ऐसा क्या घमंड अपने रूप यौवन का जो एक बसे बसाए घर को ही उजाड दे और तुम कहती हो चुप रहो भई अपने से ये अनर्थ देख चुप नहीं रहा जाता

जीजी तुम नहीं जानती क्या हुआ है ? तुमने तो बस जो सुना उसी पर आँख मूँद विश्वास कर लिया अन्दर की बात तुम्हें नहीं पता यदि पता होती तो कभी ऐसा कहतीँ बल्कि सुनयना से तुम्हें सहानुभूति ही होती कभी कभी सच को सात परदों में छुपा दिया जाता है फिर भी वो किसी किसी झिर्री से बाहर ही जाता है बेशक सबको नहीं पता मगर मुझे पता चल गयी है लेकिन तुम्हें एक ही शर्त पर बताऊँगी तुम किसी से कहोगी नहीं

(अचरज से रज्जो को देखते हुए ) अरे रज्जो , ये क्या कह रही है तू , जो सारे में बात फ़ैली हुई है क्या वो सही नहीं है ? तो सच क्या है ? बता मुझे किसी से नहीं कहूँगी तेरी सौं

जीजी जाने क्या सोच ईश्वर ने औरत की रचना की और यदि की भी तो क्यों नहीं उसे इतना सख्तजान बनाया जो सारे संसार से लोहा ले सकती बेबसियों के सारे काँटे सिर्फ़ उसी की राह में बो दिए हैं और उस पर सितम ये कि चलना भी नंगे पाँव पडेगा वो भी बिना उफ़ किए बस ऐसा ही तो सुनयना के साथ हुआ है जो एक ऐसा सच है जिसके बारे में किसी को नहीं पता

मुझे आज भी याद है जब सुनयना डोली से उतरी थी जिसने देखा उसे ही लगा मानो चाँद धरती पर उतर आया है खुदा ने एक एक अंग को ऐसे तराशा मानो आज के बाद अब कोई कृति बनानी ही नहीं , जाने किस फ़ुर्सत में बैठकर गढा था कि जो देखता फिर वो स्त्री हो या पुरुष देखता रह जाता चाल ऐसी मोरनी को भी मात करे , बोली मानो कोयल कुहुक रही हो सबका मन मोह लेती , एक पल में दुख को सुख में बदल देती किसी के चेहरे पर उदासी देख ही नहीं सकती थी जैसे बासन्ती बयार ने खुद अविनाश के आँगन में दस्तक दी हो हर पल मानो सरसों ही महक रही हो आँगन यूँ गुलज़ार रहता आस पडोस दुआयें देता थकता जिसका जो काम होता ऐसे करती मानो जादू की छडी हाथ में हो और अपने घर का काम कब करती किसी को पता भी नहीं चलता क्या छोटा क्या बडा सब निहाल रहते क्योंकि बतियाने में उसका कोई सानी ही नहीं था अविनाश के पाँव जमीन पर नहीं पडते उसे भला और क्या चाहिए था ऐसी सुन्दर सुगढ पत्नी जिसे मिल जाए उसे और क्या चाहिए भला सास ससुर , देवर , जेठ जेठानी सबकी चहेती बनी हवा के पंखों पर एक तितली सी मानो उडती फ़िरती और अपने रंगों से सबको सराबोर रखती इसी सब में छह महीने कब निकले किसी को पता चला

अचानक एक दिन अविनाश के घर से रोने चीखने की आवाज़ें सुन सारे पडोसी भागे आखिर क्या हो गया ऐसा और जाकर देखा तो अविनाश की लाश बिस्तर पर पडी थी और सुनयना तो मानो पत्थर बनी खडी थी अचानक जैसे काले बादलों ने उसके सुख के आकाश को अपने आगोश में लपेट लिया था ऐसा क्या हुआ अचानक किसी को समझ नहीं आया हर कोई पूछ रहा था मगर सब चुप थे अविनाश की माँ दहाडें मार रो रही थी और जब उनसे पूछा तो जो सुना तो सबके पैर के नीचे से जमीन खिसक गयी

अरे इस कलमुँही से पूछो , मेरे अविनाश को इसी ने मरने को मजबूर किया है , अगर इसने उसका कहना माना होता तो आज मेरा बेटा ज़िन्दा होता सबके आगे अच्छे बनने का ढोंग किए घूमा करती है मगर आज तक अविनाश को छूने तक नहीं दिया खुद को आखिर वो भी इंसान है बस दो चार बातें उसने कह दीं कि नहीं मानेगी तो मैं आत्महत्या कर लूँगा देख ले तो बोली कर लो और देखो मेरा लाल मुझे छोड कर चला गया हमें तो पता भी चला अन्दर ही अन्दर क्या चल रहा है वो तो कल रात इनकी आवाज़ें बाहर रही थीं तो हमने सुन लीं वरना तो पता भी चलता आखिर हुआ क्या ?

सुनयना टुकुर टुकुर सास के मुख को देखती रही मगर जब सास का कोसना बँद नहीं हुआ और सब उसे ही दुत्कारने लगे तो घायल शेरनी सी बिफ़र पडी और जो उसने कहा वो सुनने के बाद शायद कुछ भी सुनने को बाकी नहीं बचा था ……

हाँ हाँ मुझे ही दोष दो क्योंकि तुम्हारा आखिरी हथियार मैं ही हूँ जानते हो सब बेबस है , लाचार है , स्त्री है तो कुछ कर नहीं सकती , कुछ कह नहीं सकती मगर इतनी भी बेबस लाचार नहीं जो सच और झूठ सामने ला सकूँ

इतने मे पुलिस गयी वो पोस्टमार्टम को ले जाने लगी क्योंकि मामला आत्महत्या का था तो सास घर के लोग रोकने लगे मगर सुनयना बोल उठी , क्यों नही ले जाने देते , किस बात का डर है , क्या इस बात का कि सच सामने जायेगा ? मैं तो खुद चाहती हूँ सारी दुनिया को तुम्हारे घर की असलियत पता चले ताकि फिर कोई लडकी मेरी तरह बर्बाद हो

चुप कर कलमुंही बेटे को खाकर चैन नहीं पडा जो अब हम सब को खाने पर तुली है आखिर चाहती क्या है , क्यों उसकी लाश की दुर्गति करवा रही है , अब उसकी मिट्टी को तो चैन से मिट्टी में मिलने दे

नहीं मैं तो सच को सामने लाना चाहती हूं ताकि सबको पता चले वरना तो तुम लोग मुझे दोषी सिद्ध कर दोगे और मैं इतनी कमज़ोर नहीं जो अपने लिए लड सकूँ ये एक स्त्री की अस्मिता का सवाल है इंस्पैक्टर साहेब लाश को ले जाइए मैं इंतज़ार करूँगी सच का

पोस्टमार्टम में पुष्टि हो गयी कि उसने ज़हर खाया है और पुलिस सबके कहने पर सुनयना को पकड कर ले गयी सभी को यही लगा कि सुनयना की वजह से अविनाश ने खुदकुशी की है । मगर कोई सुनयना ने तो ज़हर दिया नहीं था इसलिए पुलिस उसे हिरासत में ज्यादा दिन रख नहीं पायी । सुनयना के घरवाले उसे अपने घर ले गए और किसी तरह मामले को रफ़ा दफ़ा किया गया और सबको यही लगा सुनयना गुनहगार है जबकि असलियत सात पर्दों में कैद छटपटा रही थी बाहर आने को क्योंकि पोस्टमार्टम में एक तथ्य और उजागर हुआ था जिसे सबसे छुपा लिया गया था मगर सुनयना चुप बैठने वालों में से नहीं थी वहीं उसके घरवालों ने उसी बिनाह पर सुनयना को मुक्त करवा लिया था उन लोगों से वरना तो जाने वो बेगुनाह उस गुनाह की सजा भुगतती जो उसने किया नहीं था और बल्कि तब तक भुगत भी रही थी एक ऐसा जीवन जीकर जिसे शायद ही कोई लडकी स्वीकार कर पाये और इस तरह जी पाये जैसे उसने जीया था । इतने कम दिनों में सभी को अपना बना लेना क्या इतना आसान होता है ? हर किसी के दिल में जगह बना लेना जबकि आज के वक्त में लोग अपनों को नहीं जान पाते इतने से दिनों में उसने तो जैसे एक अलग संसार ही खडा कर लिया था अपने लिए । ये सब यूँ ही संभव नहीं हुआ था बल्कि सुनयना के त्याग और तपस्या का फ़ल था और अब वो उसे बेकार नहीं जाने देना चाहती थी इसलिए उसने अपने तरीके से सच्चाई सामने लाने की कोशिशें शुरु कर दीं ताकि कम से कम जिन लोगों के दिलों में उसने स्थान बनाया था वो तो कम से कम उसे नफ़रत से याद न करें ।

एक दिन मैं इस्कॉन मंदिर गयी थी वहीं अचानक सुनयना से मिलना हो गया तो गले लगकर भरभरा कर रो पडी और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसे क्या कहूँ क्योंकि तब तक मैं भी यही मानती थी कि इसके कारण एक हँसता खेलता परिवार बर्बादी के कगार पर पहुँच गया मगर उसने कसम देकर मुझे रोका और कहा , क्या मौसी आप जानना नहीं चाहेंगी सच क्या था ?
उसके शब्दों ने मेरे पाँव जकड लिए , दूसरी ओर उत्सुकता के पंछी भी कुलबुलाने लगे क्योंकि जिस दृढता से उस दिन वो सबके आगे बोल रही थी तो लगता था कि जो दिख रहा है उसके पीछे भी जरूर कोई ऐसी कहानी है जो सबसे छुपाई जा रही है इसलिए मैं रुक गयी जानने क्योंकि कभी भी एक पक्ष सुनने पर कोई फ़ैसला सही नहीं होता । दोनों पक्षों को मौका तो मिलना चाहिए अपनी सफ़ाई देने का और मैं बैठ गयी वहीँ मंदिर में एक कोने में उसके साथ जाकर ।

हाँ कहो , सुनयना , क्या कहना चाहती हो ? मैं भी जानना चाहती हूँ आखिर ऐसा हुआ क्या जो तुमने ये कदम उठाया ?

मौसी , आज सारी दुनिया के लिए मैं ही गुनहगार बना दी गयी मगर यदि आप सत्य जानतीं तो कभी ऐसा न कहतीं बल्कि उस पूरे परिवार से घृणा करतीं ऐसे लोग समाज पर बोझ हुआ करते हैं मगर जाने इनके झूठ कैसे परवान चढ जाया करते हैं और एक स्त्री के सच भी जाने किन कब्रों में दफ़न कर दिये जाते हैं कि वो सच कहना भी चाहे तो उसे झूठ का लिबास पहना दिया जाता है और कलंकित सिद्ध कर दिया जाता है ।

मौसी , जिस दिन मैने डोली से नीचे पाँव रखा उस दिन मुझे लग रहा था संसार की सबसे खुशनसीब स्त्री हूँ मैं मगर मुझे नहीं पता था कि ईश्वर ने मुझे रूप देकर मेरी नसीब से मेरा सबसे बडा सुख ही मुझसे छीन लिया है । जाने किस कलम से विधाता ने मेरा भाग्य लिखा था जब सुहागरात को मुझे पता चला कि अविनाश नपुंसक हैं । यूँ लगा जैसे आस्माँ में जितनी बिजली है वो सब एक साथ मुझ पर गिर पडी हो । मैने उनसे पूछा , आप जानते थे ये सत्य तो क्यों मेरा जीवन बर्बाद किया ? पको शादी करनी ही नहीं चाहिए थी ?

तुम सही कह रही हो मगर घरवालों के दबाव के कारण मुझे ऐसा करना पडा । उनका कहना था तुम ऐसे अकेले कैसे सारी ज़िन्दगी गुजारोगे ? कोई ऐसा भी तो हो जो हमारे बाद तुम्हारा साथ दे , तुम्हें समझे तुम्हारे दुख सुख में तुम्हारे काम आए और जहाँ तक वो बात है तो एक बार शादी हो जाए तो कौन स्त्री अपने मुख से ऐसी बातें कहती है । मैने उनसे कहा भी कि मैं किसी को धोखा नहीं देना चाहता बल्कि इस तरह तो मैं किसी का जीवन ही बर्बाद कर दूँगा बल्कि उसकी जगह किसी बेसहारा को जीवनसाथी बना लूँ जो मेरी तरह ही हो तो उनका कहना था कि ऐसा मिलना कहाँ संभव है और आज कोई इश्तिहार नहीं दिये जाते कि ‘एक नपुंसक के लिए दूसरे नपुंसक साथी की आवश्यकता है ताकि दोनो एक दूसरे का सहारा बन जीवन बिता सकें’ और फिर हम उसे सब सुख देंगे तो क्यों नहीं निर्वाह करेगी आजकल की लडकियों को और चाहिए ही क्या होता है जहाँ पैसा देखती हैं खिंची चली आती हैं क्योंकि उन्हें सब सुख सुविधायें चाहिये होती हैं और वो तुम उसे मुहैया करवाओगे ही तो वो इन बातों को इग्नोर कर देती हैं । मेरे मना करने पर मुझे अपनी कसम और प्यार का वास्ता देकर जबरदस्ती मेरी शादी तुमसे करवा दी है मगर मेरी तरफ़ से तुम स्वतंत्र हो सुनयना चाहो तो आज और अभी इसी वक्त मुझे छोडकर जा सकती हो ।

मौसी मैं एक - एक शब्द के साथ अंगारों पर लोटती रही , मुझे समझ नहीं आ रहा था इन हालात में मुझे क्या करना चाहिए ? मैं रोती रही सिसकती रही और सुबह का इंतज़ार करती रही । सुबह होते ही इनकी माँ मेरे पास आयीं और बोलीं , देख बहू , तू सारा सच तो जान ही गयी होगी , बेटी तुझे हम कोई तकलीफ़ नहीं होने देंगे , तुझे पूरी स्वतंत्रता होगी अपने मन मर्ज़ी से जीने की , जो चाहे करने की जैसे अपने घर में करती थी मगर ये सच किसी से मत कहना वरना समाज में हमारी कोई इज्जत नहीं रह जाएगी । हम ही जानते हैं हमने कैसे दिल पर पत्थर रखकर ये शादी की है ताकि अविनाश को हमारे बाद कोई तो हो जिसे वो अपना कह सके और हाथ जोडकर मेरे पैरों पर गिर गयीं और मैं भौंचक सी रह गयी । ये क्या कर रही हैं आप माँजी , ऐसा करके मुझे शर्मिन्दा मत करिए । मैं तो आपकी बेटी जैसी हूँ मेरे पैरों में मत गिरिए ।

न बेटी मुझे हो सके तो माफ़ कर दे । पुत्रमोह में मैने तेरे जीवन की आहुति दे दी है ईश्वर मुझे कभी माफ़ नहीं करेगा , ू एक माँ के दिल को यदि समझती है तो तू ये सच किसी से नहीं कहेगी।

मुझे असमंजस में छोड वो रोती बिलखती चली गयीं और मैं किंकर्तव्यविमूढ सी बैठी रही ये सोचते मुझे क्या करना चाहिए ?

यूँ तो मेरे परिवार में यदि ये बात किसी को पता चलती तो एक पल न छोडते बेशक बहुत ज्यादा पैसे वाले नहीं हैं मगर अपनी बेटी का जीवन बर्बाद होते तो नहीं देख सकते थे मगर मुझे उनके साथ अपनी छोटी बहनों की भी चिंता होने लगी । कल को मैं यदि वापस चली गयी तो लोग क्या कहेंगे ? कौन मेरी बहनों का कल को हाथ थामेगा ? जितनी जुबान होंगी उतनी ही बातें बनेंगी मगर कोई जल्दी से इस सच को नहीं स्वीकारेगा और आखिर कितना पैसा लगा है मेरी शादी में । अब पापा फिर से एक नए सिरे से मेरी ज़िन्दगी को आकार देना चाहेंगे और फिर इतना पैसा लगायेंगे तो कैसे संभव होगा बाकी दोनों बहनों का ब्याह ? मैं अपने परिवार और उसके भविष्य के लिए बेचैन हो गयी और उसी में मैने ये निर्णय लिया कि अगर मेरा जीवन बर्बाद हो गया है तो कम से कम अपनी बहनों और अपने परिवार को तो उस दोजख में न धकेलूँ इसलिए मैने अपनी किस्मत से समझौता करने की ठान ली और मुख पर जरा सा भी गिला शिकवा न लाते हुए ज़िन्दगी जीने लगी। अविनाश तो मेरे इस त्याग से जैसे बेमोल बिक गए । मैं जो कहती वो हर वक्त करने को तैयार रहते । मेरी छोटी से छोटी बात का ऐसे ख्याल रखते कि मुझे अहसास नहीं होता कि मेरे पास एक शरीर भी है जिसकी भी कोई जरूरतें होती हैं ।

ज़िन्दगी एक ढर्रे पर चलने लगी थी मैं अपनी किस्मत के लिखे को स्वीकार लिया था मगर मुझे नहीं पता था कि किस्मत अभी मेरे साथ और खेल खेलने वाली है जो मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी एक दिन वो हुआ ।

मैं सो रही थी तभी मुझे अपने शरीर पर किसी हाथ के रेंगने का अहसास हुआ तो देखा मेरी साडी पैरों से उघडी पडी है और मेरा श्वसुर मेरे पैरों पर हाथ फ़ेर रहा है , मैं उसे धकियाते हुए चीखती हुयी खडी हुयी तो सब लोग आ गए कमरे में और मैं रो पडी सब बतलाते हुए तो मेरी सास बोली , अरे तो क्या हुआ , तुझे भी तो जरूरत महसूस होती होगी किसी मर्द की । पिघले सीसे से उसके शब्द मेरे कानों में गिरे और मैं हैरान हो उसे देखने लगी भूल गयी कुछ पल को कि मेरे साथ अभी क्या घटा है । मैं हैरान थी देखकर कि एक औरत होकर वो इस तरह की बात कह रही थी , अपने आदमी को दूसरी औरत के पास बेझिझक भेज रही थी । मुझे उस दिन अपने निर्णय पर बेहद पछतावा हुआ जब सास ने कहा कि आस पास वाले पूछते हैं कब खुशखबरी सुना रही हो तो मुझे चुप रह जाना पडता है । सच किसी से कह नहीं सकती और जो सब चाहते हैं वो हो नहीं सकता इसलिए हमने सोचा घर की बात घर में ही रहेगी और सबकी जुबान भी बंद हो जाएगी । बस एक बार तू इनके साथ सम्बन्ध बना ले । ओह मौसी , मैं बता नहीं सकती उस एक पल में मैं कितनी मौत मर गयी , जिन्हें पिता तुल्य स्थान दिया हो उनके साथ ऐसा संबंध मैं सोच भी नहीं सकती थी । उस दिन अविनाश घर में नहीं थे , मैने उन्हें कहा कि यदि उन्हें ये सब पता चलेगा तो सोचिए कितने शर्मिन्दा होंगे आप सबके इस कृत्य पर ? क्या आपका यही प्रेम है अपने बेटे से कि उसकी ब्याहता पर कुदृष्टि रखो ?मैने आज तक कुछ नहीं कहा चुप रही इसका ये मतलब नहीं कि आप सबकी सही गलत हर बात में आपका साथ दूँगी । मैं ऐसा हर्गिज नहीं करूँगी । यदि ऐसी ही चाहत है तो कोई बच्चा गोद ले लो उसे एक घर दे दो कम से कम एक तो नेक काम होगा मगर उनका कहना था उन्हें तो अपना खून ही चाहिए । पराया तो पराया होता है और अपना अपना । ये कैसा अपनापन था जहाँ अपना जो था वो ही अपना न था । अभी हमारी ये जिरह चल ही रही थी कि अविनाश आ गये और जैसे ही उन्होने ये सब सुना तो उनकी तो जुबान पर ही जैसे लकवा मार गया और सबने समझा वो भी यही चाहते हैं इसलिए जबरदस्ती उन्होने श्वसुर के साथ मुझे कमरे में बंद कर दिया इधर जैसे ही ये संभले इन्होने प्रतिकार किया कि ये सब क्या कर रहे हो तुम लोग । उस पर क्यों इतना अन्याय कर रहे हो ? वैसे ही तुम ने अपने प्यार का वास्ता देकर उसका जीवन बर्बाद कर दिया अब फिर क्यों उसे ज़िन्दा ही चिता पर धकेल रहे हो । वो जैसे ही दरवाज़ा खोलने को आगे बढे मेरे देवर और जेठ ने उन्हें पकड लिया और दूसरे कमरे में बंद कर दिया इधर मैं अपने श्वसुर से बचने के प्रयास कर रही थी उधर उनकी आवाज़े आ रही थीं कि
माँ, खोलो कमरा , नही तो मैं आत्महत्या कर लूँगा । मैने ये तुम्हारे कमरे में रखी चूहे मारने की दवा खोज ली है ।

तो उनकी माँ बाहर से बोली , अविनाश हम जो कर रहे हैं सबके भले के लिए ही कर रहे हैं और तू बेकार की धमकी न दे ।

माँ मैं धमकी नहीं दे रहा सच कह रहा हूँ ।

न बेटा मेरी उम्र यूँ ही नहीं गुजरी , तेरी गीदड भभकियों में मैं नहीं आने वाली ।

और थोडी देर तक जब उनकी कोई आवाज़ नहीं आयी तो इन लोगों को लगा कि कहीं सच में तो ………?

और जैसे ही दरवाज़ा खोला उन्होने तो मेरा संसार लुट चुका था ।

क्योंकि ज़हर से शरीर नीला पडने लगा था इसलिए सुबह सारा दोष मेरे सिर मढ दिया गया ।

अब बताओ मौसी , इस सबमें मेरा क्या दोष था ? क्या इस सबके बाद कोई किसी पर उसके आँसुओं पर विश्वास कर सकेगा जैसा मेरी सास ने मेरे साथ किया ?

मौसी मैं अपने आंसुओं को पीती रही, सिसकती रही, मन में उठते अतृप्त ज्वार को अपने अश्रुओं की बूंदों से सींच-सींच कर आंच को धीमी करती रही, मेरे भीतर सुलगती हुई अतृप्त वासना मुझे हर क्षण झकझोरती रही, फिर भी बिना विचलित हुये एक गृहस्थ सन्यासन की तरह घर की मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा को ही अपनी धरोहर समझ किसी तरह जीती रही, लेकिन घर में भी क्या एक औरत सुरक्षित नहीं? क्या औरत आज भी एक वस्तु है, सिर्फ एक उपभोग की वस्तु ? इसके सिवा कुछ भी नहीं ?


या अपनी शारीरिक जरूरतों को नज़र अन्दाज़ करने के गुनाह की ये सज़ा मिली थी मुझे ?
या स्त्री का स्त्री पर विश्वास करना आज के कालखंड की सबसे बडी त्रासदी है ?
या प्रतिरोध न करने की यही सज़ा होती है कम से कम आज एक स्त्री के लिए ?

अंधेरे की ओट में भविष्य को दाँव पर लगा मुस्कुराना दोष था ?
अब तुम ही बताओ मौसी ………
क्या स्त्री होना दोष था या खूबसूरत होना या परिस्थितियों से समझौता करना ?

ये कह वो तो चली गयी मगर तब से आज तक उसके शब्द मेरे जेहन में हथौडों की तरह बज रहे हैं ……… स्त्री के भाग्य में लिखे शून्य का विस्तार खोज रही हूँ तब से अब तक जीजी …………क्या है कोई जवाब तुम्हारे पास ?

वंदना गुप्ता 










COMMENTS

BLOGGER: 2
Loading...
नाम

“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues children's day deepawali special E.book family&relatives father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
false
ltr
item
अटूट बंधन : ब्याह :कहानी -वंदना गुप्ता
ब्याह :कहानी -वंदना गुप्ता
https://2.bp.blogspot.com/-0Oe3oChgdLc/VgUarr5mylI/AAAAAAAACRg/B_B4MeQCp9A/s640/byah.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-0Oe3oChgdLc/VgUarr5mylI/AAAAAAAACRg/B_B4MeQCp9A/s72-c/byah.jpg
अटूट बंधन
http://www.atootbandhann.com/2015/09/blog-post_44.html
http://www.atootbandhann.com/
http://www.atootbandhann.com/
http://www.atootbandhann.com/2015/09/blog-post_44.html
true
1089704805750007414
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy