अटूट बंधन अंक -१० सम्पादकीय ...भावनात्मक गुलामी भी गुलामी ही है

कुछ खौफनाक जंजीरे जो दिखती नहीं हैं  पहना दी जाती हैं अपनों द्वारा इस चतुराई से कि मासूम कैदी स्वयं ही स्वीकार कर लेत...





कुछ खौफनाक जंजीरे
जो दिखती नहीं हैं 
पहना दी जाती हैं
अपनों द्वारा इस चतुराई से
कि मासूम कैदी
स्वयं ही स्वीकार कर लेता है बंधन
अंगीकार कर  लेता है पराजय
यहाँ तक  
कि  उसकी
सिसकियाँ ,घुटन ,मौन चीखे

नहीं लांघ पाती
कभी घर की देहरी
न ही उठती है
कभी मुक्ति कामना की आवाज़
हत भाग्य !किसी स्वतंत्र देश में भी
 नहीं की जा सकती गिनती
इन भावनात्मक  परतंत्र लोगो की




                १५ अगस्त सन १९४७ को हमारे देश भारतवर्ष को  ब्रिटिश  हुकूमत से स्वतंत्रता मिली | यह दिन हम सब के लिए अत्यंत प्रसन्नता का दिन है | आज स्वतंत्रता पर कुछ लिखने से पूर्व मेरा मन मनुष्य की एक खतरनाक वृत्ति पर जा रहा है | वो है दूसरे को परतंत्र बनाने की इक्षा | आज से अरबों –खरबों साल पहले जब पृथ्वी पर जीवन का पहला अंकुर  फूटा था तब कौन जानता था कि विकास के क्रम में शीर्ष पर आने वाला मानव अहंकार से इतना अधिक ग्रस्त हो जाएगा कि वो समस्त प्राणियों को ईश्वर द्वारा प्रदत्त स्वतंत्र अस्तित्व के नैसर्गिक अधिकार की अवहेलना करते हुए उनकी स्वतंत्रता  छीन कर उन्हें गुलाम बनाने में लग जाएगा | जिसका आरंभ  हुआ  प्रकृति को गुलाम बनाने की प्रवत्ति से , फिर पुशु –पक्षी , फिर एक कबीले द्वारा दूसरे कबीले को , एक सम्प्रदाय द्वारा दूसरे सम्प्रदाय को, एक रंग द्वारा दूसरे रंग वाले समूह को ,  एक देश द्वारा दूसरे देश को | सर्वश्रेष्ठ होने का अभिमान ,सत्ता का मद या  अधिपत्य की भावना  कितने सिकंदर ,गौरी ,गजनी या अंग्रेज़ हुक्मरानों  को फतह के छलावे से संतुष्ट करती रही | हमने उन्हें एक उपनाम से सुशोभित कर दिया ...... तानाशाह ,जो दूसरों को उनके अनुसार जीने न दे | पर आज मैं किसी और प्रकार के तानाशाह और गुलामों के बारे में कुछ कहना  चाहती हूँ |  
           समय के रथ पर सवार होकर जरा पीछे लौटती हूँ तो याद आता है कि जब मैं छोटी थी तब मेरे मन में गुलाम शब्द पढ़ या सुन  कर एक ऐसे निरीह व्यक्ति की तस्वीर खिचती थी , जिसके सामने  बहुत भयानक शक्ल वाला व्यक्ति (तानाशाह ) होता ,जिसके हाथ में हंटर होता और जुबान पर गालियाँ .......... जो बात –बात पर जोर –जोर से चिल्लाते हुए हंटर चलाता  और बेचारा गुलाम  हाथ जोड़ कर उसकी गलत सही हर बात मानने को तैयार रहता | किसी व्यक्ति का दूसरे व्यति से चाबुक के दम पर गुलामी करवाना निहायत निंदनीय है| हर व्यक्ति को स्वतंत्रता से जीने का अधिकार है | ऐसे में गुलाम के प्रति सहानुभूति होना स्वाभाविक है | पर इससे इतर भी एक गुलामी होती है जिसकी कल्पना भी मेरा बाल मष्तिष्क नहीं कर पाया था | जहाँ तानाशाह के हाथ में चाबुक नहीं दूसरे को रुल बुक के अनुसार उसका कर्तव्य याद दिलाने  की अदृश्य किताब होती है |आँखों में दहकते अंगारे नहीं वरन  आँसू होते हैं , जुबान पर गालियाँ नहीं अपितु तुम्हारी वजह से ,या मुझे समझो के जुमले होते हैं | दूसरों को गुलाम बना कर रखने की प्रवत्ति की इनकी जंजीरे इतनी रहस्यमयी होती हैं कि स्वयं गुलाम बने व्यक्ति को भी  बहुत देर में अपनी दासता  के बारे में समझ आता है | यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतने नाज़ुक जंजीरों से कोई कैसे गुलाम बन सकता है ? वस्तुतः कोई गुलाम नहीं बनना चाहता पर चाहे -अनचाहे  हममें  से बहुत से  संवेदनशील लोग भावनात्मक  रूप से गुलाम बन जाते हैं | अफ़सोस उन्हें गुलाम बनाने  वाला कोई तानाशाह नहीं वरन उनके  अपने ही जानने वाले ,मित्र ,नाते रिश्तेदार ,जीवनसाथी ,बच्चे यहाँ तक कि कभी –कभी पेरेंट्स भी होते हैं | कैसे ? जरा इन उदाहरणों पर गौर करिए |
१ ) पढ़ी  –लिखी सुरुचि जब आँखों में ढेर सारे सपने भर कर  सुशिक्षित पति के साथ ससुराल में आई थी तो उसे इस बात का जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि उसका पति उसे घर से बाहर निकलने का अवसर भी नहीं देगा | जब भी वो घर के बाहर जा कर कुछ काम करने की बात करती उसका पति आँखों में आंसूं भर कर कहता “जब तुम घर के बाहर जा कर काम करोगी कोई तुम्हे देखे  ,बात करे मैं बर्दाश्त नहीं कर पाउँगा |  क्योंकि मैं तुम्हे इतना प्यार करता हूँ जो पूरी दुनियाँ से अलग है अलहदा है | सुरुचि कभी –कभी विरोध करती पर पति के दुनियाँ से इतर प्यार व् आँसू उसे स्वयं ही घर में कैद रहने को विवश कर देते | सुरुचि गुलाम है प्रेम खोने के भय की |
२ )कॉलेज के हॉस्टल में प्रिया  के साथ रहने वाली कृति अक्सर उसे अपने बॉय फ्रेंड से ब्रेक अप के किस्से सुनाती | प्रिया उसके साथ सहानुभूति रखती ,समझाती पर वही बात रोज़ –रोज़ सुनने से प्रिया  की पढाई का नुक्सान होने लगा | एक दिन उसने कृति से मना  कर दिया | कृति ने तुरंत उसे “इनह्यूमन “ करार  दे दिया | साथ ही यह भी याद दिलाया कि वो एक अच्छी मित्र नहीं है ,क्योंकि जब प्रिया  के पिता बीमार थे तब तो उसने सुना था | प्रिया  के अन्दर कर्तव्य बोध  पैदा होगया उसने अपनी किताब एक तरफ रख कर कृति का हाथ पकड़ कर कहा ‘ सॉरी , बता क्या कहना चाहती है | प्रिया  गुलाम है कृति द्वारा सिद्ध किये गए कर्तव्य की |
३ )श्रीमती सावित्री देवी के पिता बचपन में ही भगवान् को प्यारे हो गए | गरीबी असफल विवाह की त्रासदी झेलने वाली सावित्री देवी अक्सर अपने बच्चो से रिश्ते –नातेदारों से व्  मिलने वालों से  कहती “ कम से कम तुम तो मेरी बात मानो ,मुझे तो पहले ही ईश्वर ने इतने दुःख दे रखे हैं | धीरे –धीरे  .... घर आई बहुओ और नाती –पोतो पर भी वह अपने पिछले दुखद जीवन का वास्ता   देकर गलत –सही बात मनवाने का दवाब डालने लगी | सावित्री देवी का यह कहना “जाओ तुम सब सुखी रहो ,हमें तो भगवान् नें पहले से ही दुःख दे रखे हैं ....... परिवार में सबके अन्दर अपराध बोध भर देता और वे सब उनकी हर जायज़ ,नाजायज बात मानने को तैयार हो जाते | यहाँ पूरा परिवार गुलाम है अपराध बोध का

        अलग –अलग दिखने वाले  इन सारे उदाहरणों में एक साम्यता है बिना हंटर बिना चाबुक बिना अपशब्द के दूसरे से अपनी बात मनवा लेना | यहाँ गुलाम बने लोग अपनी इक्षाओं ,भावनाओं ,सपनों को त्याग कर दूसरे के अनुसार जीवन जीने को विवश हो जाते है और अंततः खाली हाथ रह जाते हैं | यहाँ भावनात्मक रूप से गुलाम बने व्यक्तियों को समझ ही नहीं आता कि , अपनी बात मनवाने के लिए तमाशा ,रोने का नाटक ,या इमोशनल ब्लैक मेलिंग करने वाले व्यक्ति तानाशाह होते हैं | भावनात्मक रूप से तानाशाही करने  वाले व्यक्ति वास्तव में  पर्सनालिटी डिसऑर्डर से ग्रस्त होते हैं | ये शारीरिक रूप से भले ही कमजोर हों पर  इनकी प्रवत्ति गुलाम बनाने की होती है | शारिरिकं न सही मानसिक ही सही |बात जब तक समझ आती है तब तक गुलामों की हालत  बहुत दयनीय हो चुकी होती है | ये गुलामी बहुत ही पीड़ा दायक होती है क्योंकि ये अपनों के द्वारा होती है| अंग्रेजी में भावनात्मक गुलामों  की मानसिक अवस्था के लिए लिए  एक बहुत ही सटीक शब्द का इस्तेमाल किया जाता है ....FOG ( फी यर(भय ) ,ओबलीगेशन सामाजिक कर्तव्यबोध ), गिल्ट(अपराधबोध  ) |
               बड़ा ही विरोधाभास है कि ये तीनो गुण एक अच्छे नागरिक के लिए अत्यंत आवश्यक हैं | डर वो शब्द है जिसे बच्चा जन्म लेते ही सीख जाता है | किसी हद तक यह जरूरी भी है क्योंकि भय के कारण विपरीत परिस्तिथि आने पर “करो या मरो’ कि भावना उत्त्पन्न होती है | पूरा हार्मोनल सिस्टम उसी के अनुरूप काम करता है | वहीँ समाज में रहने के लिए सामाजिक कर्तव्यबोध बहुत आवश्यक है | जो हमें समाज में एक अच्छे इंसान के रूप  में स्थापित करता है | हर कोई चाहता है कि लोग उसे अच्छा समझे उसकी सराहना करे | इसीलिए वह उन सब नियमावलियों का पालन करता है जो समाज द्वारा बनाये गए हैं | कहीं न कहीं अपराध बोध कर्तव्यबोध से जुडा  हुआ है |  मनुष्य को लगता है अगर वो घोषित कर्तव्यों को भली - भांति नहीं कर पा रहा है तो उससे गलती हो रही है | अपराध बोध उत्त्पन्न होता है |विडम्बना है कि दूसरों का भावनात्मक शोषण करने वाले भावनात्मक तानाशाह इन तीन नैसर्गिक गुणों का प्रयोग तीन मुंह वाले राक्षस  की तरह  इस प्रकार करते हैं कि गुलामों की स्वंतंत्र व्यक्तित्व की कामना को  धीरे से चबा ही डालते हैं| 
        पहेली ही है कि कोई क्यों अपनी चाभी दूसरे को पकड़ा कर भावनात्मक गुलाम बन जाता है |शायद इसके पीछे पुरानी कहावत है “अति सर्वत्र वर्जयेत “काम करती है  | जब भय इतना बढ़ जाए की “करो या मरो “में सिर्फ मरो ही रह जाए | इंसान परिस्तिथियों से इतना भयभीत हो जाए की फाईट करना ही न चाहे | यहाँ भावनात्मक तानाशाह दोषरोपण करके गुलाम बनाते हैं......... “तुम अगर काम पर जाओगी  तो मैं चैन से जी नहीं पाउँगा (उदहारण -१ )| जब  कर्तव्यबोध या  यूँ कहे कि समाजके सामने अच्छा दिखने की चाह इतना बढ़ जाए कि कोई इसका फायदा उठा कर अपनी अंगुली पर नचाये(उदाहरण -२ ) | और अपराधबोध इतना बढ़ जाए कि लगे अब अपनी जान देकर भी मुक्त नहीं हुआ जा सकता है | (उदाहरण -३ ) यहीं पर फाग की अवस्था शुरू होती है |          
          अधिकतर भावनात्मक  गुलाम इसी फाग में जीते हैं | निर्दोष सुरुचि ,प्रिया और सावित्री देवी के परिवार वाले इसी फाग में जी रहे हैं | या तो उन्हें खोने का भय होता है चाहे वो  व्यक्ति विशेष का प्रेम हो ,समाज में सम्मान हो, बच्चों या परिवार की सुरक्षा हो , या  उनके ऊपर कर्तव्यबोध का नैतिक उत्तरदायित्व जरूरत से ज्यादा होता है   ,यहाँ ख़ास बात यह है कि शोषक चाहे खुद कैसा भी जीवन जिए पर वो गुलाम पर दवाब डालता है कि वो रुल बुक के हिसाब से ही जीवन जिए ,तीसरे तरह के  गुलाम व्यक्ति अपराध बोध में जीते हैं कि उनकी वजह से दूसरे का जीवन बर्बाद हुआ है |  जिस तरह से फाग या धुंध  में कुछ भी दिखाई नहीं देता उसी तरह से अपनों द्वारा भावनात्मक रूप से गुलाम बनाये गए लोगों को बाहर  निकलने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता |वह समाज से कटने लगते हैं इस तरह से वो ज्यादा से ज्यादा उस व्यक्ति के संपर्क में होते चले जाते हैं जिसने उन्हें गुलाम बनाया होता है | उन का  मन नकारात्मक विचारों से भर जाता है |तसदी है कि  उन्हें पता होता है कि वो एक ट्रैप में फंस गए हैं | फिर भी भावनात्मक रूप से गुलाम बने व्यक्ति वो सब करने लग जाते हैं जो करने का उनका दिल गवाही नहीं देता | ये निराशा से ग्रस्त व्यक्ति साल दर साल झगडे से भरे घर , असफल विवाह और अन्य रिश्तों को ढोते हुए  , शारीरिक और मानसिक वेदना को सहन करते हैं ,घायल  पशु की तरह असहाय ,शक्तिहीन ,असंतुष्ट जीवन को घसीटते हैं | निराशा से घिरे इनमें से कितने लोग बाहर से सुखद लगने वाले इस दयनीय जीवन का स्वयं ही अंत कर देते हैं |  
         दुखद है कि जहाँ किसी को शारीरिक रूप से गुलाम बनाने के खिलाफ क़ानून हैं वहीँ  भावनात्मक् गुलाम बनाने के विरुद्ध कोई कानून नहीं है | और इस गुलामी से निकलने का रास्ता इंसान को खुद ही खोजना पड़ता है | और क्योंकि यह  लड़ाई अपनों से होती है इसलिए यह लड़ाई आसान नहीं होती हैं | बिरले ही खुद कृष्ण बन कर खुद को गीता का ज्ञान देते हुए बाहर निकल पाते हैं | ज्यादातर भावनात्मक गुलाम वही व्यक्ति बनते हैं जो संवेदनशील होते हैं और जो दूसरों के दुःख में समानुभूति (इ म्पैथी)की भावना  रखते हैं | जब कोई इन्हें अपना दुःख दर्द बताता है तो यह उस व्यक्ति की जगह खुद को रख कर सोचने लगते हैं | जिसका फायदा दूसरा व्यक्ति झूठ –सच बोल कर उठा लेता है | दूसरे को पीड़ा न पहुंचे इसके लिए यह पीड़ा उठाते जाते हैं | शायद इसीलिए कहा जाता है “बहुत  अच्छा होना भी बुरी बात है “| फिर भी स्वस्थ समाज यह मानने को तैयार नहीं होता कि किसे भावुक ह्रदय को भावनात्मक गुलाम बना कर उसे ऐसे पिंजरे में कैद किया जा सकता है जो दिखाई ही नहीं देता |
          अपने आस पास जरा गौर से देखिये भावनात्मक तानाशाहों को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है |कभी न ,ना सुनना,सदैव अपनी मर्जी ही चलाना , रोने या दुखी होने का नाटक  करके अपनी बात मनवा लेना   भावनात्मक तानाशाहों  के लक्षण  हैं जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है | जरूरत है समय रहते ही झूठे लोगों और रिश्तों को पहचाना जाए | सच्चे रिश्ते व्यक्ति की स्वतंत्रता का ख्याल करते हैं व् उसके गुणों को विकसित  करने में सहायता करते हैं | जब  सच्चे रिश्ते जीवन में आते हैं वो मुस्कराहट और ख़ुशी  के साथ आते हैं न कि रोने –धोने  चीखने –चिल्लाने या दूसरे के रिश्तेदारों की अवहेलना के नाटक के साथ | यहाँ यह भी मान लेना चाहिए कि कोई भी रिश्ता परिकथा की तरह परफेक्ट नहीं होता है पर सच्चे रिश्तों में ख़ुशी और मुस्कान का प्रतिशत रोने और दर्द से ज्यादा  होता है |   
         गुलामी कोई भी हो प्रकृति के  विरुद्ध है | उससे  मुक्त होना  आवश्यक है |अगर आप भी ऐसे किसी ट्रैप में फंस गए हैं तो स्वतंत्र होने का प्रयास करिए |  टूटे हुए कांच को जितनी बार जोड़ने का प्रयास करेंगे उतनी बार घायल होंगे | यहाँ यह भी ध्यान  देने योग्य बात है कि आपका भावनात्मक व् झट से पिघल जाने वाला  स्वभाव उनका हथियार है | आप जितनी बार उनको खुश करने के लिए उनकी बात मानते जायेंगे वो अपनी सीमाएं और बढाते जायेंगे और ज्यादा उग्र होते जायेंगे | जंजीरे कोई भी हो दर्दनाक ही होती हैं | याद रखिये अपने अस्तित्व का सम्मान और व्यक्तित्व की स्वतंत्रता आप का जन्मसिद्ध अधिकार है | और उसे प्राप्त करना आप का कर्तव्य भी |


सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 

वंदना बाजपेयी 

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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपावली special दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues children's day deepawali special E.book family&relatives father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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अटूट बंधन : अटूट बंधन अंक -१० सम्पादकीय ...भावनात्मक गुलामी भी गुलामी ही है
अटूट बंधन अंक -१० सम्पादकीय ...भावनात्मक गुलामी भी गुलामी ही है
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