अटूट बंधन अंक -११ सम्पादकीय ....बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ

बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ .... कलरव करते हैं,पंक्षी रंभाती हैं गाय दहाड़ते है शेर मिमियाते हैं मेमने और प्...




बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ ....

कलरव करते हैं,पंक्षी
रंभाती हैं गाय
दहाड़ते है शेर
मिमियाते हैं मेमने
और
प्रकृति का मन –मयूर भी नृत्य करते हुए
करने लगता है
ओमकार का शाब्दिक नाद
कि दिश दिगंत में व्याप्त है कोलाहल
हर तरफ गूँज रही हैं
स्वर लहरियाँ

सब कहना चाहते है कुछ
फिर क्यों 
चौरासी लाख योनियों में
भटकने के बाद
वाणी का अनुपम वरदान लेकर जन्मी
सरस्वती की संतानों के
शब्दों पर लगा होता है पहरा
समाज के भय का
परनियंत्रित अभिव्यक्तियाँ
चीखती हैं अंतस के मौन में
  ये सिसकती रूहे
बन कर रह जाती हैं बेजुबाँ





              कुछ लिखने की कोशिश में बार –बार कल रात का सपना याद आ रहा है | भरी अदालत में कठघरे में मुद्दई खड़ा हुआ है | सभी लोगों की निगाहे उस पर हैं | न्यायाधीश ...आर्डर –आर्डर कह कर अपना हथौड़ा से मेज को थपथपाते हैं | फिर मुद्दई की तरफ देखते हुए कहते हैं , आप को अपनी सफाई में कुछ कहना है ?  मुद्दई कुछ कहना चाहता है ,पर आवाज़ उसके गले में घुट कर रह जाती है ..... कुछ अस्फुट से स्वर निकलते हैं ,एक भी शब्द ठीक से सुनाई नहीं देता | बिना कहे बिना सुने सजा हो जाती है | उसके हाथ में हथकड़ियाँ पहना दी जाती हैं | मैं चीखती हूँ “ठहरिये जज साहब उसे यूँ सजा मत सुनाइए ,उसे सफाई का मौका दीजिये ,वो बेजुबाँ है | जज साहब मुझे देखकर विद्रूप सी हँसी हँसते हैं | जैसे कह रहे “ किस किस को बचाओगी ,कब तक बचाओगी ..........ये दुनियाँ बेजुबानों से भरी पड़ी है | अपने आस –पास इधर –उधर कहीं भी देखो बेजुबाँ ही बेजुबाँ नजर आयेंगे | और ध्यान  से देखो वहाँ जज भी मैं नहीं हूँ | ये समाज है ,उसका भय है जो न जाने कितने मासूमों की जुबान खींच लेता है ....उन्हें बेजुबाँ बना देता है | मैं सच्चाई से  लज्जित सी मुद्दई को पहचानने की कोशिश करती हूँ | कौन हैं ? यह कौन है ? चेहरा अस्पष्ट हैं | न जाने कौन है ......स्त्री ,पुरुष या पशु ? पर है बेजुबाँ |
               मेरा सपना टूट जाता  है और मेरा ध्यान  बेजुबाँ शब्द की गहन विवेचना में फँस जाता है| बेजुबाँ ......... शायद ये शब्द मैंने  पहली बार अपनी माँ के मुँह से तब सुना था जब सड़क  पर एक पिल्ला कार से कुचल कर मर गया था | पहले उसकी माँ उस कार  के पीछे बहुत देर तक दौड़ती रही | फिर  अपने बच्चे के शव के पास आकर कुछ देर हर आने –जाने वाले पर भौंकती रही| फिर थोड़ी देर वहीँ बैठने  के बाद  कुछ आगे बढ़ गयी निराश सी, हताश सी  | पर शायद दिल नहीं मानता होगा |तभी तो ,बार – बार अपने बच्चे के पास जाकर उसे सूँघती ,फिर दूर चली जाती ...फिर आती सूँघती |  मैंने  उसकी वेदना को अन्दर तक महसूस किया था | माँ से बार –बार उसी के बारे में बात कर रही थी | फिर माँ ने समझाया “ दर्द उसे भी बहुत होगा पर बेजुबाँ है कह नहीं सकती | पीड़ा बाँट नहीं सकती |  अकेली सहेगी चुपचाप | बेजुबाँ होने का दर्द मुझे अंतस तक हिला गया |पशु कितना झेलते हैं|  न कह सकने की पीड़ा | पर क्या सिर्फ पशु ?
                         पर जल्द  ही मेरा भ्रम टूटा जब अक्सर इस शब्द से मेरा पाला पड़ने लगा | हमारी काम वाली रामरती की ६ साल की बिटिया लाडो अपनी माँ से जिद कर रही थी ,अपने भाई के साथ स्कूल जाने की और भाई की तरह ही हलवा पूरी खाने की | रामरती चिल्ला  कर बोली “ बहुत बोलने लगी है |जुबान खींच लूंगी | भाई पढ़ेगा ,वंश चलेगा | तेरे तो ब्याह में ही इतना खर्चा होगा | कहाँ से लायेंगे | तू काम कर ,झाड़ू कटका कर | उसके बाद लाडो  ने कोई प्रश्न नहीं पूँछा  | तब भी जब १३ साल की उम्र में उसे ब्याह दिया गया ,तब भी जब शराबी पति उसे घर आकर पीटता था | तब भी जब वह अपने पति द्वारा उपहार में दिए गए एड्स से असमय  काल-कवलित हो गयी | लाडो बेजुबाँ थी क्योंकि वो गरीब तबके से आती थी | आर्थिक रूप से असुरक्षित थी | पर क्या सिर्फ लाडो ?
             सुबह हो गयी है | मैं अभी भी अपनी उधेड़बुन में लगी हूँ | मेरी पहचान की रश्मि  अपने आँचल में प्रेम की सौगात लेकर ससुराल आती है | माँ ने विदा करते समय गाँठ में बाँध दिया था की पति की ख़ुशी ही उसकी ख़ुशी है| आँचल की वो गाँठ कब की खुल गयी है, पर जुबान पर गहरी गाँठ है | जहाँ अपनी पसंद का बोलना गुनाह है | आज पढ़ी लिखी रश्मि एक रबर स्टैम्प है, जिसे बस परिवार के हर सही गलत फैसले पर मुहर लगानी है |  रमेश भट्टी में बाल मजदूर है | दिन रात शारीरिक और मानसिक शोषण झेलता है |कुछ ऐसा भी जिसको कह पाने में असमर्थ है | सब सह कर भी वो चुप है ,क्योंकि वो जानता है कि अगर उसने कुछ बोला तो उसके परिवार का पालन –पोषण कैसे होगा | पिछले १० साल से रीढ़ की हड्डी टूट जाने से बिस्तर पर पड़े रमेश जी  एक पशु से भी बद्तर  जिंदगी जी रहे हैं | ढेर सारे ताने उलाहने सुनने को विवश रमेश जी  के पास कहने को लाचार दृष्टि व् धन्यवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं |  कार्तिक घर के बाहर अफसर है ,घर के अन्दर मौन ही रहते हैं  |वो बोलते हैं ,पर वो नहीं जो वो बोलना चाहते हैं | लोक –लाज उन्हें  बहुत से समझौते करने पर विवश कर उनकी जुबान बंद कर  देती है | बेजुबानों की फेहरिश्त लम्बी है |  
        आज इसी विषय पर बात करते हुए मेरी सहेली ने पूँछ दिया .... आखिर पहचाने कैसे अपने बीच छुपे बेजुबानों को ? प्रतिक्रया से  ,इस संक्षिप्त उत्तर के बाद मेरे मानस में उभर आई बहुत पहले की  एक फिल्म अनुपमा की स्मृतियाँ  | जिसमें नायिका के जन्म लेते ही उसकी माँ की मृत्यु हो जाती है | पिता उसे अशुभ मान कर नफरत करता है | माता –पिता ( ?) विहीन यह बच्ची जीवन को यथावत स्वीकार कर लेती है | कभी किसी बात में कोई प्रतिक्रिया नहीं | न सुख में न दुःख में | एक गहन वेदना के साथ जिया जाने लगता है  जीवन, मात्र जिया जाने के लिए | अक्सर  पढ़ा सुना है ... जब कोई व्यक्ति डूब रहा होता है तो पूरा जोर लगाता है ,बहुत हाथ पैर चलाता है | फिर पस्त पड  जाता है , हाथ पैर शिथिल पड़ जाते हैं | डूब जाता है ,गहरे पानी में .......... अचानक हल्का होकर ऊपर पानी में तैरने लगता है |तब  कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है डूबने से बचने के लिए | स्वत : ही तैरता है प्रतिक्रया विहीन शरीर | पर एक लाश के रूप में | ऐसे ही शायद बहुत चेष्टा की होगी ,बहुत मशक्कत की होगी ,हाथ पैर चलाये होंगे | फिर शांत ... एकदम शांत , डूबने की सहज स्वीकार्यता के साथ ये बेजुबाँ ,सुख –दुःख में प्रतिक्रया विहीन घसीटते हैं जीवन ........या लाश |
         एक और फिल्म मेरे जेहन में आ रही है | आनंद .... आनंद एक पात्र का नाम है ,जो कैंसर ग्रस्त है | जिसके जीवन का थोडा सा समय बचा है | पर वो मर –मर के नहीं जीना चाहता | वो इस अल्प समय में वो सब कुछ करता है ,जो वो करना चाहता है | वो सब कुछ बोलता है ,जो वो बोलना चाहता है | दिन –रात लगातार बकबक कर के उसके दिल में जो कुछ भी है वो कह देना चाहता है | उसकी ये जिजीविषा, ये बेरोकटोक अभिव्यक्ति  का निराला अंदाज़ उसके सदा धीर –गंभीर रहने वाले डॉ को स्नेह के गहरे पाश में बांध लेता है | कालांतर में यही डॉ उसके ऊपर उपन्यास लिखता है , और उसके  जज्बे को सलाम कर कहता है , ”आनंद कभी नहीं मरते “| मैं पुन: पलट कर अपने विषय पर आती हूँ | मेरे मन में गूँजता है “ आंनद कभी नहीं मरते “  साथ में याद आता हैं बेन जॉनसन की प्रसिद्द कविता “ ईट इज  नॉट ग्रोइंग लाइक ए  ट्री के सारांश में लिखी गयी  पंक्तियाँ “ ए  लिली ऑफ़ ए  डे इज  फार बैटर देन एन  ओक ऑफ़ थ्री हंड्रेड ईयर्स | छोटी सी उम्र  भी अगर अपनी पूरी सजीवता के साथ जी ली जाए तो वो सार्थक है | हाँ ! “आनंद कभी नहीं मरते” क्योंकि वह अपने जीवन का एक –एक पल भरपूर जी लेना चाहते हैं | पर जो जुबान होते हुए भी विवश हो कुछ न कह पाने के लिए ,उनके अन्दर के कितने आनंद पल –पल मरते रहते हैं | कौन गिन सकता है ?
             हम अक्सर कहते हैं , “ऊफ ! कितना बोलते हैं लोग ,सुबह से रात तक ,बकबक –बकबक “| धरती से अम्बर तक कितनी आवाजे हैं ,कितना शोर है | इसी  बीच में कुछ लोग कुछ न कह पाने की त्रासदी को झेल रहे होते है | पर बेजुबाँ महज एक शब्द नहीं है जो शारीरिक तौर से किसी विकलांग व्यक्ति को दिया जा सके | न ही ये किसी एक या दो बात को न कह पाने की पीड़ा है | जहाँ हमें किसी कारणवश मौन धारण करना पड़ता है या दूसरे की हाँ में हां मिलानी पड़ती है | यहाँ बेजुबां  शब्द उन के लिए है जो  जुबान होते हुए भी अपनी जुबान नहीं खोल सकते | लम्बे समय तक एक पीड़ा ,एक निराशा , एक भय को ढोते रहते हैं | एक तरफ तसलीमा नसरीन , रश्दी , आदि कितने लेखक ,विचारक   अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं  | एक ही नारा है हम जो कहना चाहे कह सके | अपने विचारों को सामने ला सके  | आप सहमत ,असहमत  हो सकते हैं पर कहने से नहीं रोक सकते | पर यहीं विरोधाभास है ,हम उस समाज से अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी माँग  रहे हैं | जिसने अपनों की अभिव्यक्ति की आज़ादी छीन ली हैं | वो बाहरी दुनिया का सच है और ये रिश्तों की दुनिया का सच |
             मेरी सहेली फिर प्रश्न पूछती है ,” आखिर लोग क्यों इतने दवाब में आ जाते हैं , कि अपने  विद्रोह की आवाज़ उठाने का अधिकार , बोलने का अधिकार भी दूसरे के चरणों में अर्पित  कर देते हैं ? भय ... मेरे शाब्दिक उत्तर पर वो फिर पूँछती  है , भय ! इतना ,इस कदर ,आखिर क्यों ? उसके प्रश्न से  उलझती हुई मैं जूझती हूँ “ वैज्ञानिक पावलोव के प्रयोग से “ जो हमने  विज्ञान की शिक्षा के दौरान पढ़ा था | शिक्षिका अक्सर  बताती थी | रिफ्लेक्स एक्शन के उदाहरण में वैज्ञानिक पावलोव का प्रयोग – जो कुत्तों को भोजन  देते समय  घंटी बजा देते थे | भोजन देखते ही कुत्तों के मुंह से लार निकलने लगती थी | कुछ समय बाद भोजन न देने पर मात्र घंटी बजा देने पर भी कुत्तों के मुंह से लार निकलने लगती थी | अवचेतन मन में घंटी और भोजन का संबध स्थापित हो चुका था | इसी प्रकार लगातार बाहरी दवाब की परिस्तिथि में  यह भय अवचेतन मन पर इतना स्थापित हो जाता है की भय उत्पन्न  करने वाले कारक की अनुपस्तिथि  में भी जुबान खुल नहीं पाती हैं |  इंसान अपने अन्दर अपने दायरे में कैद हो जाता है | यह शोषण किसी बहुत अपने ,किसी ख़ास द्वारा होता है | जहाँ भावनात्मक शोषण में व्यक्ति को अपनी समझ से स्वयं बाहर निकलना होता है ,वही इस प्रकार के मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है |
            अभी कुछ वर्ष पहले  सन २००९ में अखबार के पन्नों मे छपी एक खबर मुझे याद आ रही है | जिसमें मुंबई निवासी फ्रांसिस गोम्स ( उम्र -६० वर्ष ) एक पिता,एक पति  .... अपनी पत्नी और तीन बेटियों को एक फ्लैट में वर्षों कैद रखता है | घर की खिड़कियाँ ,सील रहती हैं व् उन पर मोटे परदे पड़े रहते हैं | चारों औरतों को किसी प्रकार से किसी दूसरे से संपर्क करने की अनुमति नहीं है | गोम्स को भय है , की घर के बाहर निकलने से उसकी पत्नी व् पुत्रियों की पवित्रता (?) खतरे में पड़ जायेगी |घर के अंदर न्यूनतम सुविधाओ में ,हवा ,पानी ,धूप को तरसती किसी तरह से जीवन काटती ये स्त्रियाँ जब आवाज उठाने की कोशिश करती तो शारीरिक हिंसा की त्रासदी झेलनी पड़ती | चार बेजुबाँ सिसकियाँ एक घर के अन्दर तैरती हैं | न जाने कितने देवी देवता पूजती हैं | और फिर ये उम्मीद भी मरने लगती की शायद कोई पडोसी सुन लेगा उनकी अनकही आवाज़ | पड़ोसी भी इसे निजी मसला करार दे कर नज़र अंदाज कर देते हैं | और यह अकेला मसला भी नहीं है | ऐसे हज़ारों मसले हैं | पर हम सभ्य समाज के लोग हैं | हम चौराहों पर भाषण देते हैं , मीटिंगों में बोलते हैं , पान की दुकान पर बोलते हैं | स्वतंत्रता के लिए बोलते है ,  सामान हक़ के लिए बोलते हैं , सामान अधिकार के लिए बोलते हैं | पर जब हमारी नाक के ठीक नीचे , हमारे  घर के आस –पास कोई अत्याचार हो रहा होता हैं तो हम इसे निजी मसला करार दे कर घुट –घुट कर जिंदगी जीने वाले बेजुबानों से भी बद्तर  बेजुबाँ सिद्ध होते हैं |
        बहुत पहले एक विज्ञापन आता था “ बेल बजाइए “ | यदि आपको अपने घर के आस –पास कहीं लड़ाई –झगडे या चीखने –चिल्लाने की , घरेलू  हिंसा की आवाज़ आ रही हो ,तो बेल बजाइए | जिससे झगड़ने वाला कुछ पल ठहर कर सोचेगा , शर्मिंदगी महसूस करेगा कि उसकी आवाज़ बाहर जा रही है | सामाजिक अपमान का भय उसके अन्दर भी उत्पन्न होगा | ठीक वही यहाँ करने की जरूरत है | किसी व्यक्ति का शोषण किसी का निजी पारिवारिक मसला नहीं हो सकता है | ये एक सामजिक अपराध है | अपने आस –पास हो रहे  शोषण को रोकना  व् बेजुबानों की मदद करना हमारा कर्तव्य है | कितना बोलते होंगे आप , पर  जहाँ जरूरत है वहाँ  भी बोलिए | जरूरत हैं शोषित बेजुबानों को मुख्य धारा  में लाने की ,उनकी जुबान बनने की |

एक कोशिश है .......कर के देखते हैं ..........
वंदना बाजपेयी     


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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues children's day deepawali special E.book family&relatives father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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अटूट बंधन : अटूट बंधन अंक -११ सम्पादकीय ....बहुत कुछ है दिल में मगर बेजुबाँ हूँ
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