November 2015



* बच्चे वो जीवित सन्देश हैं जो हम इस दुनिया को देते हैं जब हम नहीं होंगे ........ नील पोस्टमैंन

*बच्चे जब भी कुछ नया सीखते हैं तो वो नाचते हैं यह बताता है की संसार में कुछ भी संगीत के बिना नहीं है ....विलियम स्टैफोर्ड
* किसी टूटे हुए आदमी को दुबारा जोड़ने से बेहतर है  बज्बूत बच्चों को बनाना ...........फेडरिक डौगलेस

* बच्चों की आँखों के आगे ७ वंडर नहीं ७ अरब वंडर होते हैं |
पढ़ो,
बढ़ो,
जीवन के
दुर्गम पर्वत चढ़ो।
मिलें
बाधाएँ
रौंद उन्हें
नव पथ गढ़ो।

दादी! ओ दादी!
कौन ? कौन है,
जो दादी पुकार रहा है ?
अरे दादी! मैं, "हामिद"
अरे हामिद!
(ख़ुशी से स्वर भरते हुए )
तू कहाँ चला गया था बेटा ?
देख न.……
कैसे तेरी बाट में ये आँखें 


जपानी विधा *हाइकु (5/7/5) ; कविता लेखन का जिस तरह एक विधा है
1.
दीया व बाती
दम्पति का जीवन
धागा व मोती।
2




दीपावली के दिन लक्ष्मी ,गणेश के साथ कुबेर की भी पूजा की जाती है । विघ्न विनाशक ,मंगलकर्ता ,ऐश्वर्य ,भोतिक सुखों ,धन -धान्य ,शांति प्रदान करने के साथ साथ विपत्तियों को हरने वाले लक्ष्मी ,गणेश ,कुबेर का महापूजन अतिफलदायी होता है । 

प्राचीन ग्रंथों में लक्ष्मी जी के साथ अलक्ष्मी जी का भी उल्लेख मिलता है । अलक्ष्मी जी को "नृति "नाम से भी जाना जाता है तथा दरिद्रा के नाम से पुकारा जाता है । लक्ष्मी जी के प्रभाव का मार्ग धन -संपत्ति ,प्रगति का होता है वही अलक्ष्मीजी दरिद्रता ,पतन,अंधकार,का प्रतीक होती है । लक्ष्मी जी और अलक्ष्मी जी (दरिद्रा )में संवाद हुआ । दोनों एक दूसरे का विरोध करते हुए कहने लगी -"में बड़ी हूँ । " लक्ष्मीजी ने कहा कि देहधारियों का कुल शील और जीवन में ही हूँ । मेरे बिना वे जीते हुए भी मृतक के समान है । 

समय की सीख


समय कोई घाव नहीं भरता
बस वो यह सिखा देता है कि
दर्द के साथ कैसे जीते हैं 



      अटूट बंधन के दीप महोत्सव " आओ जलायें साहित्य दीप के अंतर्गत आज पढ़िए रोचिका शर्मा की तीन कवितायें बलात्कार : एक सवाल , बाल श्रम व् आओ नयी एक पौध लगायें
बलात्कार  ! एक सवाल


आज फिर अख़बार था चीखता , हो गया बलात्कार कहीं कोई
ओढ़ कर चादर बेहयाई की , अपनी हवस बुझा गया फिर कोई
नारेबाज़ी शुरू हो गयी , बैठे संगठन अनशन पे
लगे उछालने कीचड़ नेता , विपक्ष दलों के दामन पे
कहीं हो रही कानाफूसी , क्यूँ लड़की को दी थी छूट इतनी
कर रहे टिप्पणी पहनावे परवह पहनती  थी स्कर्ट मिनी
सबने अपने मन की गाई , बिन जाने हालात हादसे के
नुची देह मीडिया ने दिखाई , न दिखे चिथड़ेउसकी  रूह के
घिनौने सवाल अदालत ने पूछे , दिल का दर्द न पूछे कोई
थक कर मात-पिता  भी कोसें , तू पैदा इस घर क्यूँ होई

क्यूँ लगती न झड़ी इन प्रश्नों की , न उठती उंगली उस वहशी पर
क्यूँ अदालत रहे उसे बचातीझूठे वकीलों की दलीलों पर
ये कैसा अँधा क़ानून है , जो पैरवी उसकी करता है
आँखों पे पट्टी बाँध के वोबलात्कार दूसरा करता है
क्या एसी कोई पुस्तक हैजो जंगल राज को न माने
मानवता का पाठ पढ़ा दे , नारी को इंसान सा जाने
फिर कैसे किसी विक्षिप्त मस्तिष्क में , बलात्कार के भाव उठें
बहिन-बेटियों पर बुरी नज़र सेरोम-रोम भी काँप उठे
 ! न्याय के रखवालों जागो ,साहित्यकार तुम कलम उठाओ
लिख दो क़ानून  किताबें एसी , बलात्कार पर सवाल उठाओ 


बाल-श्रम

आसमान में टूटा तारा,देख-देख सब ने कुछ माँगा
मेरी आस का तारा  टूटा ,ग्रहण  मेरे जीवन में लागा
                                                 
साया पिता कारहा न सर पेकरे न दया दौलत का समाज
रोटी,कपड़ा,मकान को तरसा,बचपन ,उदास गीतों का साज़

एक ग़रीब की दुखियारी माँ,लगी काम बच्चों को छोड़
छूटी पढ़ाई ,रोटी न मिलती,महँगाई बढ़ रही दम तोड़

सुन रुदन छोटी बहना कारहा गया न मुझसे आज
सोचूँ घुट-घुट अँधियारे में ,क्यूँ न करूँ मैं भी कुछ काज

निकल पड़ा हूँ खोज में मैं ,हो जाए गर कुछ जुगाड़
रोटी मिले दो वक़्त की मुझको,छोटी का जीवन उद्धार

फिरता हूँ मैं मारा-मारासड़कोंचौराहों ,दुकानों में आज
तड़प रहा हूँ भूख ,प्यास से,हे ईश्वर क्या तू नाराज़ ?

भूखे-नंगों का न कोई सहाराकटे पंख,न चढ़े परवाज़
बाल-मजूरी बहुत बुरी है,फिर भी मुझको प्यारी आज

अरमानों का गला घोंट लूँबुझती ज्यूँ दीपक से ज्योति
जूते पोंछूँ या बोझ उठाऊं ,चिंता सुबहो-शाम सताती

आओ मिल जाएँ हम सब,करें जहाँ का नव-निर्माण
कोई बच्चा न भूखा जग में,शिक्षा ग़रीब-अमीर समान

पढ़ा-लिखा बढ़ाएँ आगेदेश का ऊँचा नाम उठाएँ

इक-इक बूँद भर जाए सागर,बाल श्रमिक कानाम मिटाएँ
                           


 चलो इक पौध नयी लगायें 
                                             



 सत्यअहिंसा के बीज से रोपित
सदाचार की धार से सिंचित
मानवता की खाद से पोषित
प्रेम भाव के पुष्पों से शोभित

चलो इक पौध नयी लगाएँ

विभिन्न जाति की कलमों का संगम
दया-धर्म के संस्कार का बंधन
बैर-भाव के काँटों की न चुभन
अपने-परायों की शाख का खंडन

चलो इक पौध नयी लगाएँ

भारत भूमि में जड़ें फैलाती
हिमालय तक शाख पहुँचती
शांति की छाँव जो देती
बापू के स्वपनों की खेती

चलो इक पौध नयी लगाएँ


स्वदेशी  की फसल लहलहाए
ईमानदारी की खुश्बू मह्काये
भाईचारेकी कोंपल फूटे
अमन-चैन के फल बरसाए

चलो इक पौध नयी लगाएँ

रोचिका शर्मा                                   






 दीपावली पर मिटाए भीतरी अन्धकार 


हम हर वर्ष दीपावली मनाते हैं | हर घर ,हर आंगन,हर गाँव ,हर बस्ती एक जगमग रौशनी से नहा उठती है | यूँ लगता है जैसे सारा संसार एक अलग ही पोशाक धारण कर लिया है | इस दिन मिट्टी के दिये में दीप जलाने की मान्यता है | क्योंकि मिट्टी के दिये में हमारी मिट्टी की खुश्बू है,मिट्टी का दिया हमारा आदर्श है,हमारे जीवन की दिशा है,संस्कारों की सीख है,संकल्प की प्रेरणा है और लक्ष्य तक पहुँचने का सबसे अच्छा माध्यम है | दीपावली अपने आप में बेहद ही रौशनी से परिपूर्ण आस्था का त्यौहार है पर इसकी सार्थकता तभी पूर्ण है जब हमारे मन के भीतर का अंधकार भी दूर हो | यह त्यौहार भले ही सांस्कृतिक त्यौहार है पर ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रसंग से भी इस पर्व की महता जुडी है | दीपावली लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भी अनूठा पर्व है | 'अंधकार से प्रकाश की ओर प्रशस्त' ही  इस पर्व का मूल मतलब है 




पना देश हो या विदेश , सुबह की जगमगाहट में कमी नहीं आती । चिड़ियाँ अपने नियत समय पर रोजगार के लिए जाना नहीं भूलतीं । पवन हौले-हौले वीणा की धुन सी अपने प्रियतम बावरे से लिपटना नहीं भूलती , कलियाँ मुस्कुराना और तितलियाँ मटकना नहीं भूलती । ठीक उसी तरह कम्जर्फ़ इंसान अपनी ईर्ष्या , दरिंदगी और वाहियात स्वभाव को नहीं भूलते । कोई नई सुबह उनको सुकूं नहीं देती और कोई रात प्यार से उनके पहलू में नहीं सोती । रिहाना का भी कुछ ऐसा ही हाल था । जब से मोहम्मद ने आंध्रा से आई लक्ष्मी को घर में रख लिया था उसकी रगों का खूं वहशी हो गया था । हालांकि रिहाना के लिए ये कोई नई बात नहीं थी, अलग-अलग औरतों की अलग-अलग खूबी उसे हमेशा बेचैन कर देती हैं लेकिन इस बार........लक्ष्मी के लम्बे बाल, ऊँचा कद , पर्वत सी उठी सीने की गोलाइयां , केसरी रंग , पलकों के बोझ से दबी आँखे और आवाज़ उसे कई-कई मौत मार रहे थे । दिन और रात बस एक ही ख़्वाब उसे डस रहा था की मोहम्मद लक्ष्मी की ओर झुके जा रहे हैं ।



न जाने क्यों आज उसका चेहरा आँखों के आगे से हट नहीं रहा हैचाहे  कितना भी मन बटाने के लिए, अपने को अन्य कामों में व्यस्त कर लू, या टी वी ऑन करके अपना मनपसंद कार्यक्रम देख कर उसे भूलने की कोशिश करू, -बार बार उसका मासूम चेहरा, खिलखिलाती हँसी  और हाँ खनकती चूड़ियाँ मेरा ध्यान अपनी ऒर वैसे ही खीच ले जाती है जैसे तेज हवा का झोंका किसी तिनके को उड़ा  ले जाये। आज कितने वर्षो बाद मिली थी वो, आह! वो भी इस रूप में..... इस हालत में।  बचपन से जानती थी उसे, हमारे  घर से दो घर छोड़ कर रहने वाले शर्मा  अंकल के यहाँ किरायेदार बनकर आये थे वो लोग।
सफलता का सूत्र

अपने ह्रदय , विचार और आत्मा को
काम में पूरी तरह लगा दो
यह सफलता का सूत्र है | 

प्रिय अटूट बंधन
              आज तुम एक वर्ष के हुए और इसी के साथ हमारी मित्रता भी एक वर्ष की हुई। एक वर्ष की इस यात्रा में विभिन्न, पर नित नए कलेवर में नए-नए साहित्यिक पुष्प लिए तुम जब-जब हमारे सम्मुख आए....हमें सम्मोहित करते गए, अपने आकर्षण में बांधते गए। एक-एक कड़ी के रूप में सदस्य जुड़ते रहे कि आज अटूट बंधन परिवार के रूप में हम तुम्हें अपने संग लिए औरों के सम्मुख थोड़ा गर्व से, थोड़ा प्यार से इठलाते हुए, इतरा कर चलते हैं मानो कह रहे हों कि देखा हमारी एक वर्ष की यात्रा का यह मनोरम रूप कि अब इस यात्रा के दूसरे अध्याय को लिखने की और बढ़े जा रहे हैं।



आज आपकी प्रिय पत्रिका " अटूट बंधन" एकवर्ष पूरा कर दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रही हैं| जिस तरह आप सब ने स्नेह व् आशीर्वाद देकर पत्रिका को प्रथम वर्ष में ही देश की लोकप्रिय पत्रिकाओ में शामिल कर दिया है | उसके लिए पूरा " अटूट बंधन ग्रुप " आप सब का आभारी है| आशा है आगे भी आपका साथ हमें इसी प्रकार मिलता रहेगा |




सुनील और माधवी आज फिर सेंट्रल पार्क में मिले थे। आज शहर के पार्क में एकांत क्षणों में सुनील माधवी के सिर पर हाथ फेरते हुए अत्यन्त भावुक हो उठा था। सुनील पहले ही दिन से माधवी के रूप-सौंदर्य और उसके व्यक्तित्व पर फिदा था। यही वजह थी कि अपनी एक महीने की मुलाकात में ही उसने उससे शादी करने का मन बना लिया था। सुनील व माधवी की पहली मुलाकात मुंबई में ही लोकल ट्रेन में हुई थी।

                                   


`दीपावली' हाइकु एवं हाइगा

 प्रस्तुत हैं वरिष्ठ  साहित्यकार डॉ . रमा द्विवेदी  जी के हायकू .एवं हाइगा ........