मेरा लड़की होना

सुनील और माधवी आज फिर सेंट्रल पार्क में मिले थे। आज शहर के पार्क में एकांत क्षणों में सुनील माधवी के सिर पर हाथ फेरते हुए अत्यन्...





सुनील और माधवी आज फिर सेंट्रल पार्क में मिले थे। आज शहर के पार्क में एकांत क्षणों में सुनील माधवी के सिर पर हाथ फेरते हुए अत्यन्त भावुक हो उठा था। सुनील पहले ही दिन से माधवी के रूप-सौंदर्य और उसके व्यक्तित्व पर फिदा था। यही वजह थी कि अपनी एक महीने की मुलाकात में ही उसने उससे शादी करने का मन बना लिया था। सुनील व माधवी की पहली मुलाकात मुंबई में ही लोकल ट्रेन में हुई थी।
और इतने दिनों में ही वे अब-तक कई बार एक-दूसरे से मिल चुके थे। दरअसल दोनों का घर आसपास ही था और घर से जाते-आते उनकी मुलाकात लगभग रोज़ ही हो जाती थी। आज जब सुनील ने माधवी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह अचानक शांत हो गई। उसे उसके प्रस्ताव का जवाब देते नहीं बना। वह जानती थी कि सुनील को वह जो ऊपर से दिखाई देती है वह अंदर से वैसी एकदम नहीं है। निश्चय ही आज शादी का प्रस्ताव देने वाला सुनील उसकी ज़िंदगी के बारे में सब कुछ जानते ही उससे दूर चला जायेगा। फिर भी अंजाम की परवाह किये बगैर उसने सुनील को सब कुछ साफ साफ बताने का मन बना लिया था। और फिर सुनील की बाहों में अपना सर रखकर वह सुनील के प्रस्ताव के जवाब में अपने जीवन की एक-एक परतें खोलने बैठ गई।
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बात उन दिनों की है जब मैंने जवान होते हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को जीना शुरू किया था। मेरे माता-पिता जितने पुराने विचारों के थे, मैं उतनी ही आधुनिक विचारों की महत्वाकांक्षी लड़की थी। माता-पिता कहीं कोई ऊंच-नीच न हो जाये इस कारण हम सभी बहनों पर कड़ी नज़र रखते थे। मेरे पापा मुझे पढ़ाना चाहते थे परन्तु माँ कहती, ‘इसकी शादी कर दो, अपने सुसराल जाकर पढ़ लेगी।
इन सब बातों से कभी मेरी माँ से कुछ कहा-सुनी भी हो जाती। पापा से कभी कुछ कहने की मेरी हिम्मत नहीं होती थी। मुझे पेंटिंग का बहुत शौक था।        एक दिन मैंने अपनी माँ से कहा- ' मेरी छुट्टियां शुरू हो रही हैं, आप मुझे पेंटिंग या सिलाई आदि कुछ सिखा दीजिए।’ 
        इस पर माँ बोली, ‘शादी हो जाने दे फिर जो जी में आए करती रहना।
माँ की इस बात पर मुझे बहुत गुस्सा आया। 
       मैं उन पर कुछ नाराज़ होती हुई बोली- आपने मुझे थोड़ा बहुत भी आखिर क्यों पढ़ाया, आपको तो पैदा होते ही मेरी शादी कर देनी थी। मैं ससुराल में ही बड़ी होती और वहीं पढ़ती रहती।
मेरी बातों के जवाब में माँ बोली- ज़्यादा बड़-बड़ मत कर, पढ़ाई-लिखाई की बातें छोड़कर घर का सारा काम-काज सीख, यही सब तेरे काम आयेगा।
माँ की ऐसी बातें सुनकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। मैं भी जो जी में आया बोलती रही। मेरे ज्यादा बड़बड़ाने पर माँ गुस्से से लाल-पीली हो गयी। उसने शाम को पापा से शिकायत करने की चेतावनी देने के साथ ही मुझ पर दो-तीन हाथ भी जमा दिये। आज मुझे मेरी माँ किसी राक्षसिन से कम नज़र नहीं आ रही थी। मैं रोती-बिलखती अपने कमरे में जाकर पलंग पर पसर गई। मैं काफी देर तक उल्टा-पुल्टा कुछ न कुछ बड़बड़ाती रही। मेरे मन में अंतर्द्वन्द चल रहा था। चाहे मेरी माँ कितनों ही कष्ट मुझे देती परन्तु मैंने तो यह प्रण कर लिया था कि, पहले मन मुताबिक पढ़ाई करनी है और अपना मन पसन्द कैरियर चुनना है, तब कहीं जाकर शादी करनी है। मुझे लगा पापा के आने पर माँ बेवजह और हंगामा खड़ी करेगी इसलिए उनके आने से पहले मेरा इस घर से भाग निकलना बेहतर होगा। और फिर क्या था, शाम ढलते ही सबकी नज़रें बचाकर मैंने धीरे से दरवाजा खोला और घर से बाहर हो ली। इस बार मन में आया कि क्यों न लड़की की इस निरर्थक ज़िंदगी का त्याग कर दूं पर फिर अगले ही पल ऐसे कायरता पूर्ण कार्य के बारे में सोचने पर मैंने अपने आप को धिक्कारा। मैं अनवरत चली गई, चलती गई।
मेरे सामने न कोई राह थी और न कोई मंज़िल। कभी एकदम से मर जाना चाहती थी, तो कभी जी कर समाज को दिखा देना चाहती थी कि स्त्री केवल सबके इशारों पर नाचने वाली कोई कठपुतली नहीं है। उसमें भी दुनिया को नचाने की क्षमता है।
अंततः अंधेरे में आगे बढ़ते हुए मैं अचानक एक कार के सामने आ गई। मैं बाल-बाल बची थी। 
कार चालक एक अधेड़ युवक था। कार में उसके साथ उसकी पत्नी भी थी। वे दोनों मुझ पर बिगड़ते हुए बोले, ‘आपको देखकर चलते नहीं बनता, अभी कोई एक्सीडेंट हो जाता तो आप तो जाती ही साथ में हमें भी ले जातीं।प्रत्युत्तर में मैं अफसोस के अंदाज में बोली, ‘काश! मैं मर ही जाती तो अच्छा होता। भगवान भी कितना निर्दयी है जो मुझे इस हाल में भी जीवित रखना चाहता है।’  मेरी बातें सुनकर वे कुछ सोचने लगे। जब उन्होंने संक्षेप में मेरी कहानी सुनी तो वे मुझे जबरन अपने साथ अपने घर लिवा ले गये। उन्होंने मेरी महत्वाकांक्षा को मेरे चेहरे पर पढ़ लिया था। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा, ‘आपको इस तरह से घर छोड़कर नहीं भागना चाहिए था। आपको यदि पढ़ने-लिखने का इतना ही शौक था तो पहले आपको अपने माँ-बाप की मानसिकता को बदलना चाहिए था। आपका इस तरह से घर छोड़कर भागना समस्या का हल नहीं। अपनों को छोड़कर घर से भागने वाली युवतियों प्रायः ग़लत लोगों के हाथों में पढ़कर अपना सर्वस्व लुटा बैठती हैं।

उनके समझाने-बुझाने का मुझ पर काफी असर हुआ। मैं उनसे उनके बारे में जानना चाहा तो उन्होंने अपने बारे में न केवल खुलकर मुझे बताया बल्कि मुझे अपने बेटे से भी मिलवाया। उस व्यक्ति का नाम पवन था और उसकी पत्नी का नाम शिखा। उनका 12 वर्षीय बेटा अतुल बहुत प्यारा और होनहार बच्चा था। पवन ने मुझे बताया कि वह एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करता है। मुझे उस परिवार के लोगों से मिलकर काफी खुशी हुई। रात काफी हो चुकी थी और मेरा घर भी वहां से काफी दूर था अतः उस समय मेरा घर पहुंचना संभव नहीं था। उन्होंने मेरे घर पर कई बार फोन भी मिलाया पर लगातार इंगेज टोन आने के कारण वहां किसी से कोई बात नहीं हो सकी। अतः मजबूरी में मुझे वह रात उन्हीं के घर में बितानी पड़ी। रात भर मुझे अपने माता-पिता और भाई-बहनों की याद आती रही और मैं अपने किये पर आंसू बहाती हुई बिस्तर पर इधर-उधर करवटें बदलती रही। अचानक कुछ देर बाद मुझे किसी के अपने पास खड़े होने का अहसास हुआ। मैंने सोने का नाटक करते हुए जब कनखी से देखा तो मैं पवन जी को अपने ऊपर चादर उड़ाते देख हैरान रह गयी। मेरे मुंह से अचानक निकला, ‘भैया थैंक्स।इस पर उन्होंने इट्स ऑल राइटकहते हुए मुझसे कहा, ‘रात काफी हो गई है अब चुपचाप सो जाओ।
सुबह होते ही मैं मुंह-हाथ धोकर घर जाने के लिये तैयार हो गई। मैंने पवन जी को पुनः भैयाका संबोधन देते हुए उनसे घर छोड़ आने का अनुरोध किया। उनके घर से चलते समय मैंने जब पवन जी से यह पूछा कि, मेरा उनको बार-बार भैया कहना कहीं उन्हें बुरा तो नहीं लग रहा है, तो वह बोले, ‘अभी तो नहीं लग रहा है परन्तु जब कभी दुबारा तुमसे मुलाकात होगी और तुम पहचानने तक से इंकार कर दोगी तब अवश्य बुरा लगेगा।मैंने उनसे वादा किया कि, मैं कभी ऐसा नहीं करूंगी। जब मैं अपने उन नये बने धर्म भाई के साथ अपने घर के दरवाजे तक पहुंची तो मुझे अड़ोस-पड़ोस के लोगों ने ऐसे घेर लिया मानों मैंने कोई बहुत बड़ा क्राइम कर दिया हो। मेरे घर में कदम रखते ही कोहराम मच गया। मेरी माँ मुझ पर लगभग झपटते हुए चिल्लाई, ‘अब क्या करने घर में आई है, जहां गई वहीं क्यों नहीं डूब मरी। अब हम समाज को अपना कौन सा मुंह दिखायेंगे?’
इसके साथ ही माँ को दिल का दौरा पड़ा और वह चक्कर खाकर वहीं गिर पड़ी। मेरे काटो तो खून नहीं। अचानक मेरा सिर भी ज़ोर से चकराया और मैं भी वहीं पर बेहोश होकर गिर पड़ी। होश में आई तो पता चला माँ अस्पताल में एडमिट हैं मेरे धर्म भाई अपने घर जा चुके थे। मेरे होश में आने पर भी किसी ने मुझसे कोई खास बात नहीं की। मेरा दम घुटता रहा। शाम को जब मैंने माँ के स्वर्ग सिधार जाने का समाचार सुना तो मेरे पैरों तले से ज़मीन ही खिसक गई। मेरी माँ मेरे लिये जैसी भी थी पर थी तो आखिर एक माँ ही। हो सकता था मेरे प्रति उसका दृष्टिकोण ही सही रहा हो।
मैं प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अपनी माँ की मौत की ज़िम्मेदार बनी। पापा, बहन और भाई सभी की नज़र में मैं ही गुनहगार थी। माँ की मौत के बाद मैं जब भी घर से बाहर निकलती तो लोगों की नज़रें मुझे काटने को दौड़तीं।
माँ की मौत का ग़म रह रहकर मुझे सालता रहता। मैं अपराध बोध से ग्रस्त रहने लगी। एक दिन मौका पाकर मैं अपने धर्म भैया-भाभी के घर पहुंच गई उन्होंने मुझे देखा तो आश्चर्यचकित रह गये। भाभी ने तो मुझे अपनी बांहों में ही भर लिया। मुझसे मिलकर और मेरे हालात जानकर उनकी आंखें सजल हो आई थीं। 
उस दिन के बाद से मैं अक्सर भैया-भाभी के पास जाने लगी। उनसे मिलकर मुझे बहुत शुकून मिलता। भैया-भाभी मेरी समस्याओं का समाधान करने को सदैव तत्पर दिखलाई पड़ते। धीरे-धीरे मेरा मन अपने घर से भरने लगा। जब तक मैं अपने घर में रहती ऐसा लगता मानों घर मुझे काट रहा हो। घर में हर समय मातम छाया रहता। हर व्यक्ति मेरे सामने मुंह फुलाये ही बैठा रहता। कभी-कभी लगता मानों वे मेरे कहीं और चले जाने की इंतजारी कर रहे हों। किसी से मैं कभी कुछ बात करने की कोशिश भी करती तो वह अनमने ढंग से आधा-अधूरा जवाब देकर आगे बढ़ जाता।
एक दिन अचानक मुझे पवन भैया के मुंबई में तबादला हो जाने का समाचार मिला। मन ही मन मैंने भी उनके साथ मुंबई जाकर रहने का विचार बना लिया। मैं चाहती थी कि, बेशक उनके घर में न सही उनके आस-पास ही सही परन्तु रहूं मैं उनकी सानिध्य में ही। जब मैंने अपने मन की बात पवन भैया और भाभी से कहीं तो उन्होंने, छूटते ही मुझसे कहा, ‘पहले ही क्या तुमने कम बदनामी झेली है जो अब रही सही कसर मुंबई जाकर पूरा करना चाहती हो।मुझे भैया-भाभी के इस जवाब का पहले से ही पता था, अतः मैं इसका जवाब पहले से ही तैयार करके आई थी। मैंने उनकी बातों के जवाब में उन्हीं से पूछा कि, ‘क्या आप यही चाहते हैं कि, मेरे बारे में लोग जैसा सोचते हैं मैं सदैव वैसी ही बनी रह जाऊं। क्या मुझे यह सिद्ध करके नहीं दिखाना चाहिए कि, न तो मैं ग़लत थी और न ही माँ की मौत के पीछे मेरा कोई हाथ था। मैं वास्तव में कुछ करके दिखाना चाहती हूं। मैं समाज की इस परिपाटी को तोड़ना चाहती हूं, जिसमें एक औरत ज़िंदगी भर औरत ही बनी रह जाती है। वह एक  औरत के रूप में ही जन्म लेती है और एक औरत के रूप में मर जाती है।
अततः मेरे आगे भैया-भाभी को झुकना पड़ा और वह मुझे अपने साथ इस शर्त पर मुंबई ले जाने को तैयार हो गये कि, मैं उन्हीं के साथ उन्हीं के घर में रहूंगी। मैं उनके साथ मुंबई में 6-7 वर्ष रही। भैया ने मुझे एक जगह पार्ट टाइम जॉब दिला दिया था अतः उसी जॉब और भैया-भाभी के सहारे मैं अपने भविष्य का ताना-बाना बुनती रही। भैया-भाभी के अथक प्रयास और त्याग से मैं अपनी पढ़ाई पूरी करके एक डिग्री कॉलेज में लैक्चरार बनने में सफल रही। मेरे भैया-भाभी मेरा कैरियर बनाकर वापस अपने शहर चले गये। मैंने अपने छोटे भाई-बहनों और अपने बूढ़े पापा को बुलाकर अपने पास रखने की काफी कोशिशें की पर मेरी कोशिशें कामयाब नहीं हो सकीं। उनके अंदर मेरे प्रति नफ़रत का जो ज्वार भरा हुआ था वह कभी खत्म होने को नहीं आया।
अपनी कहानी खत्म करते-करते माधवी सुनील की बांहों में सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ी थी। रोते-रोते ही उसने सुनील से कहा, ‘सुनील मैं अपनी कहानी तुम्हें नहीं सुनाना चाहती थी। मैं जानती हूं कि, मेरी कहानी सुनकर तुम भी मुझसे मेरे घर वालों और अड़ोसियांे-पड़ोसियों की तरह नफ़रत करने लगोगे। बेशक मैं तुम्हारी जनम-जमन की साथी नहीं बन सकूं परन्तु मैं तुम्हारी नफ़रत का शिकार भी कभी नहीं बनना चाहूंगी।
अरे पगली तूने मेरे बारे में ऐसा-वैसा कैसे सोच लिया। सब कुछ सच-सच बताकर तो तूने मेरे दिल में और गहरे तक जगह बना ली है, भला मैं तुझसे क्यों कर नफ़रत करने लगा। मैं तो ईश्वर से बस यही प्रार्थना करूंगा कि तुम्हें, तुम्हारे घर-समाज में भी वही जगह मिले जिसकी तुम वास्तव में हक़दार हो। यदि इसमें मैं भी अपना कोई योगदान कर सका और फिर से तुम्हें तुम्हारे घर-समाज में जगह दिला पाया तो मैं अपने जीवन को धन्य समझूंगा।
सुनील के शब्द खत्म होते-होते उसका सीना और बाहें माधवी के आंसुओं से तर-बतर हो चुकी थीं। माधवी को लगा वह धीरे-धीरे अपराधबोध से मुक्त होती जा रही है।



लेखिका-शशि श्रीवास्तव
दिल्ली 
कहानी अटूट बंधन पत्रिका में प्रकाशित है 

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