अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस (10 दिसम्बर) पर विशेष लेख

विश्व के प्रत्येक बालक के मानवाधिकारों का संरक्षण होना चाहिए! (1) युद्ध के माहौल में बच्चों का बीता हुआ कल ही नहीं बल्कि उनका भविष्य भी...



विश्व के प्रत्येक बालक के मानवाधिकारों का संरक्षण होना चाहिए!

(1) युद्ध के माहौल में बच्चों का बीता हुआ कल ही नहीं बल्कि उनका भविष्य भी प्रभावित हो रहा है:-
आज सम्पूर्ण विश्व का प्रत्येक नागरिक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद, परमाणु बमों का जखीरा, हिंसा, बीमारी, भुखमरी, पर्यावरण असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदा, तृतीय विश्व युद्ध की आशंका, राष्ट्रों व नागरिकों के बीच होने वाले मतभेदों जैसी अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है। जिसके कारण विश्व भर के 2.5 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढि़यों का भविष्य असुरक्षित होता चला जा रहा है। अभी हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की बच्चों के लिए काम करने वाली एजेंसी यूनिसेफ ने बताया है कि पूरे मध्य पूर्व इलाके में करीब डेढ़ करोड़ बच्चे सीरिया और इराक के कई हिस्सों में चल रही जंग के बुरे नतीजे भुगत रहे हैं। पिछले दिनों टर्की के समुद्र किनारे सीरिया के तीन साल के बच्चे आयलन कुर्दी का शव औंधे मुंह पड़ा मिला था, जिसने सारे विश्व को झकझोर कर रख दिया था। यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि मध्यपूर्व के इन इलाकों के बच्चे शांति का माहौल भूल से गए हैं। बीते चार सालों से युद्ध के माहौल में जीने के कारण उन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी
बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव झेलना पड़ रहा है। यूनिसेफ के निदेशक एंथनी लेक के अनुसार बहुत छोटे बच्चों ने तो केवल संकट ही देखा है. महत्वपूर्ण उम्र में प्रवेश करते हुए किशोरों ने हिंसा और तकलीफ झेली है, जिससे सिर्फ उनका बीता हुआ कल ही नहीं बल्कि भविष्य भी प्रभावित हो रहा है।
(2) संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा:-
संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के अनुसार सारे विश्व में 10 दिसम्बर को अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से विचलित होकर तथा वर्ष 1945 में हुई हिरोशिमा व नागासाकी जैसी घटनायें दुबारा न हो, इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकारों के प्रति एक विश्वव्यापी घोषणा पत्र 10 दिसम्बर 1948 में स्वीकृत किया गया था। इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही जनरल एसेम्बली ने सभी सदस्य देशों से अपील की कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और विभिन्न देशों व प्रदेशों की राजनैतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना, विशेषतः स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थाओं में इसके प्रचार, पीस मार्च, पठन और व्याख्या का प्रबन्ध करें। यह घोषणा पत्र विश्व की 360 भाषाओं में अनुवादित हुआ था। विश्व का प्रत्येक बालक स्वतंत्र तथा एक समान अधिकार को लेकर जन्म लेता है। धर्म, जाति, लिंग, रंग, वर्ण, देश आदि को लेकर किया जाना वाला भेदभाव मानवता पर एक कलंक है।
(3) एमनेस्टी इंटरनेशनल संस्था द्वारा मानवाधिकारों के मामले में प्रतिवर्ष प्रकाशित रिपोर्ट चिंताजनक:-
विश्व के प्रत्येक बालक को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, सुरक्षा तथा स्वास्थ्य की सुविधा उपलब्ध कराना प्रत्येक देश का मौलिक कर्तव्य है। विश्व की एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था बनाकर विश्व के प्रत्येक बालक तथा प्रत्येक नागरिक के मानवाधिकारों की रक्षा की जा सकती है। एमनेस्टी इंटरनेशनल संस्था मानवाधिकारों के मामले में प्रतिवर्ष अपनी रिपोर्ट प्रकाशित करती है। इसकी आलोचनाओं का कुछ तो असर होता ही है। लेकिन जब हमारी आलोचना हो, तभी हम मानवाधिकारों के प्रति सजग हों, यह धारणा उचित नहीं है। विश्व के विभिन्न राष्ट्रों को स्वयं अपने यहाँ की मानवाधिकारों की स्थिति की निरंतर समीक्षा करनी चाहिए तथा सुधारों के लिए तत्परता दिखानी चाहिए। हमें व्यक्तिगत स्तर पर अपनी जवाबदेही स्वीकार करनी ही होगी।
(4) दुनिया भर में बढ़ते आपसी संघर्ष से शर्मसार होती मानवता:-
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्लै ने सीरिया संघर्ष में मरने वालों के आंकड़े जारी करते हुए इस पर दुख जताया कि दुनिया भर में संघर्ष की विभिन्न वारदातों के कारण सीरिया की तरफ कम ध्यान दिया गया। पिछले दिनों जब अमेरिकी पत्रकार जेम्स राइट फॉले की मौत की खबर आई तो सीरिया फिर से चर्चा में आ गया। जेम्स सीरिया के हालातों को कवर करने आए थे और वर्ष 2012 से ही गायब थे। सीरिया में मार्च 2011 में शुरू हुए संघर्ष के बाद अप्रैल 2014 के बीच एक लाख 91 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई हंै। यह मानवतावादियों के लिए इस सदी की अत्यन्त ही दुखदायी तथा सोचनीय घटना है। विश्व में परस्पर अनेक युद्ध हुए, इतिहास युद्ध की घटनाओं का बड़ा भारी पुलिंदा बन गया, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद आदि सिद्धांत दम तोड़ने लगे दो विश्व युद्धों के दौरान जो कुछ घटा, इन सभी बातों ने मिलकर मानवाधिकारों को एक बड़ा मुद्दा बना दिया।
(5) दुनिया में तीन करोड़ बच्चे युद्ध या अन्य कारणों से पैदा संकटों की वजह से शिक्षा नहीं ले पाते:-
अन्तर्राष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (यूनिसेफ) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में तीन करोड़ बच्चे युद्ध या अन्य कारणों से पैदा संकटों की वजह से शिक्षा नहीं ले पाते हैं। हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार मध्य अफ्रीकी गणराज्य में लगभग एक तिहाई स्कूलों को या तो गोलियों से छलनी किया गया था या आग लगाई गई अथवा लूटा या सशस्त्र समूहों द्वारा कब्जा कर लिया। यूनिसेफ के वैश्विक शिक्षा कार्यक्रम के प्रमुख जोसफिन बॉर्न,  ने कहा-”आपात स्थिति के माध्यम से रहने वाले बच्चों के लिए, शिक्षा एक जीवन रेखा है।” पिछले दो-तीन सौ वर्षों में दुनिया में बड़ी संख्या में बु्द्धिजीवियों, चिंतकों, समाजसुधारकों तथा विचारशील लोगों ने जन्म लिया। शिक्षा का दायरा बढ़ा और इसकी परिधि में आम लोग बड़ी संख्या में आने लगे जिसने सामाजिक जागृति फैलाने का काम किया। विश्व के अनेक देशों में लोकतांत्रिक सरकारों के गठन से इस मार्ग के अवरोध दूर होने लगे क्योंकि सभी को न्याय मिल सके, लोगों को उन्नति के समान अवसर प्राप्त हों, यही लोकतंत्र का मूलमंत्र है।
(6) विश्व के दो अरब से अधिक बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने का हमारा संकल्प है:-
गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्ड में एक ही शहर में सबसे अधिक (वर्तमान में लगभग 50,000) बच्चों वाले स्कूल के रूप दर्ज एवं वर्ष 2002 में ‘यूनेस्को प्राइज फाॅर पीस एजुकेशन’ से सम्मानित संसार के एकमात्र विद्यालय का संस्थापक होने के नाते संसार के दो अरब से अधिक बच्चों तथा भविष्य में जन्म लेने वाली पीढि़यों के सुरक्षित भविष्य के लिए स्वयं घोषित अभिभावक के रूप में मैंने संसार के बालकों तथा आगे जन्म लेने वाली भावी पीढि़यों के सुरक्षित भविष्य के लिए दुनियाँ से परमाणु खतरे को कम करने तथा दुनियाँ की अन्य समस्याओं के समाधान हेतु मैंने वर्ष 1999 में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव डा. कोफी अन्नान को संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रजातंत्रीय बनाने के साथ ही उसे और अधिक शक्तिशाली बनाने की पहल के अनुरोध के साथ कई पत्र लिखे। इन पत्रों के जवाब में अपने दिनाँक 11 अक्टूबर, 1999 को भेजे गये पत्र में डा. कोफी अन्नान ने संयुक्त राष्ट्र संघ की विवशता को व्यक्त करते हुए लिखा कि ‘‘..वास्तव में संयुक्त राष्ट्र संघ की ताकत उसके सदस्य देशों की आम सहमति है, जो संयुक्त राष्ट्र संघ को किसी अच्छे कार्य को करने की शक्ति प्रदान करती है।’’
(7) संयुक्त विश्व न्यायपालिका ही मानवता की रक्षा के लिए आखिरी उम्मीद है:-
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डा. कोफी अन्नान द्वारा भेजे गये पत्र में दिये गये सुझाव को ध्यान में रखते हुए मैंने विश्व भर के बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों एवं राष्ट्र प्रमुखों को पत्र लिखें। लेकिन जब राजनीतिक नेतृत्व ने मेरे अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया तो मैंने अपना रूख विश्व न्यायपालिका की ओर किया क्योंकि हमारा विश्वास है कि संयुक्त विश्व न्यायपालिका ही मानवता की रक्षा के लिए आखिरी उम्मीद है। न्याय के प्रति समर्पण, निष्पक्षता और सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों एवं कानून के प्रति अत्यधिक सम्मान के कारण न्यायाधीशों को अत्यधिक सम्मान प्राप्त है। इसलिए, सिटी मोन्टेसरी स्कूल ने वर्ष 2001 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 के प्राविधानों के अनुरूप अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा विषय पर विश्व के न्यायाधीशों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के आयोजन का निर्णय लिया।
(8) सी.एम.एस. पिछले 13 वर्षों के दौरान लखनऊ में विश्व न्यायाधीशों के 14 अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर चुका है तथा इस वर्ष दिसम्बर 2014 में 15वां सम्मेलन आयोजित करने जा रहा हैः-
हमें यह बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 की भावना के अनुरूप सारे विश्व में एकता एवं शांति की स्थापना के लिए सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ द्वारा पिछले 13 वर्षों से आयोजित किये जा रहे विश्व के न्यायाधीशों के 14 अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में अब तक 109 देशों के 688 मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीश प्रतिभाग कर चुके हैं। वर्ष 2001 से आयोजित 14 अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में विश्व के मुख्य न्यायाधीशों द्वारा पारित विभिन्न प्रस्तावों से स्पष्ट हैं कि सभी न्यायाधीशों ने विश्व संसद, विश्व सरकार व विश्व न्यायालय के गठन के प्रस्ताव को बहुत ही दृढ़ता के साथ पास किये हंै।
(9) विश्व के न्यायाधीशों के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 2013 में पारित प्रस्ताव का निष्कर्षः-
अब, इसलिए, हम, भारत में सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ द्वारा 13 से 16 दिसम्बर 2013 तक आयोजित भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 पर आधारित ‘14वें अन्तर्राष्ट्रीय मुख्य न्यायाधीश सम्मेलन’ के प्रतिभागी 43 देशों के मुख्य न्यायाधीश व न्यायाधीश संकल्प लेते हैं किः-
(अ) सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष एवं सरकार के प्रमुख अतिशीघ्र एक बैठक आयोजित कर मानवता के लिए, विशेष रूप से बच्चे एवं आने वाली पीढि़यों के लिए एक सुरक्षित भविष्य के मुद्दे पर विचार करें।
(ब) इस बैठक में विश्व संसद बनाने के विषय पर, जिसमें सभी देशों के प्रतिनिधि शामिल हों, विचार करें जिससे प्रभावशाली विश्व कानून की स्थापना हो सके, एक विश्व सरकार की स्थापना हो सके जो प्रभावशाली विश्व कानून का पालन करवा सके तथा एक विश्व न्यायालय की स्थापना हो, जो सभी विवादों का निपटाराएवं न्याय कर सकें।
(स) शान्ति की शिक्षा एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति की शिक्षा अवश्यंभावी रूप से विश्व के सभी स्कूलों में बचपन से ही बच्चों को दी जा सके, जिससे प्रत्येक बच्चा कानून का पालन करने वाला, व्यवस्थित एवं न्यायप्रिय बन सके तथा बच्चों में भविष्य के विश्व नागरिक - प्यार की भावना, सहनशक्ति, समझदारी तथा विनम्रता की भावनाओं का समावेश कर सके।
(द) हालिया युद्धों में प्रयुक्त संसाधन तथा नरसंहार के लिए प्रयुक्त हथियारों के निर्माण एवं रखरखाव को बंद कर इसका उपयोग विकास के कार्यो, गरीबी उन्मूलन, पर्यावरण संरक्षण तथा मानवजाति के विकास के लिए तथा विशेष रूप से बच्चों के हित के लिए किया जाए।
(10) मानवाधिकार के संरक्षण के प्रति सभी देशों के नागरिकों को सक्रियता दिखानी चाहिए:-
आधुनिक समाज से नैतिक भावनाओं का शनैः-शनैः लोप होना भी मानवाधिकारों के हनन के लिए जिम्मेदार तत्व बन गया है। धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद जैसे कारक भी इसके लिए जिम्मेदार हैंै। विश्व मानवाधिकार दिवस हमें इन बातों पर चिंतन करने का एक अवसर प्रदान करता है। मानवाधिकारों के प्रति सम्मान केवल संयुक्त राष्ट्र संघ की चिंता का विषय नहीं है, सदस्य देशों की सरकारों, गैर-सरकारी संस्थानों, शिक्षा संस्थानों एवं वहाँ की आम जनता को भी इस संबंध में अपनी सक्रियता दिखानी होगी। हमारा पूर्ण विश्वाास है कि मानव जाति जिस समय का युगों से प्रतीक्षा कर रही थी वह समय शीघ्र आयेगा जब कि सारी दुनियाँ एक विश्व परिवार का स्वरूप धारण कर लेगी। वास्तव में यह वही समय होगा जब भारतीय संस्कृति के आदर्श ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा भारतीय संविधान के ‘‘अनुच्छेद 51’’ के प्रावधानों के आधार पर एक न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की स्थापना होगी। इसलिए विश्व के सभी देशों को मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ को शक्ति प्रदान कर विश्व संसद का स्वरूप प्रदान करने हेतु आम सहमति शीघ्र बनानी चाहिए तभी हम भारत के साथ ही साथ सारे विश्व के 2.4 करोड़ बच्चों तथा आगे जन्म लेने वाली पीढि़यों के भविष्य को सुरक्षित कर सकेंगे।

’’’’’
 - - डा0 जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
 

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