April 2016





इन्तजार 
कोई भी करे 
किसी का भी करे 
पीड़ादायी और कष्टदायी ही होता है 
लेकिन बदनसीब होते हैं वो लोग 
जिनकी जिन्दगी में किसी के इन्तजार
का अधिकार नहीं होता
क्योंकि इन्तजार 


कुछ हाइकू.......पृथ्वी दिवस पर




(1) धरा दिवस
      लगें वृक्ष असंख्य
      करें प्रतिज्ञा।

(२) माता धरती
      करें चिंता इसकी
      शिशु समान।

(3) कहे समय
      रहेगी न धरती
      करोगे क्या?

चार साधुओं का प्रवचन


एक बार की बात है चार साधू जो आपस में मित्र थे तीर्थ यात्रा कर के लौटे | वो लोगों के साथ अपने ज्ञान बांटना चाहते थे ,लेकिन जानते थे की लोग सहजता से बात नहीं सुनते | इसलिए उन्होंने एक उपाय  निकाला कि शहर में खबर फैला दी की शहर में चार साधू आये हैं वो ७ दिन बाद शाम को जनता को संबोधित करेंगे | 

लोगों में जिज्ञासा जगी | उसके बाद वो चरों साधू चार अलग अलग स्थानों पर बैठ गए|

एक साधू घंटाघर पर बैठ गया| लोगों ने उनसे वहाँ  बैठने का कारण पूंछा , तो साधू ने कहा ," घंटाघर की सुइयां लगतार  चलती है| ये जीवन के गतिमान होने का संकेत हैं| पर 12 बजे वो अपने दोनों हाथ जोड़ लेती हैं कि अब बस , मेरी इतनी ही शक्ति थी| इससे ज्यादा मैं एक घंटे में नहीं दे सकता| तभी घंटे की आवाज़ आती है, जैसे कह रहा हो, तुम्हारी जिंदगी का एक घंटा कम हो गया अगर एक घंटा और मिला है तो चलो , लगातार चलो , पूरे करो वो काम जो करने आये हो|" मुझे यही जगह सबसे अच्छी लगी इसलिए मैं यहाँ आकर बैठ गया | 

एक साधू चौराहे पर बैठ गया| लोगों ने पुछा , " साधू महाराज आप यहाँ क्यों बैठे हैं? साधू ने कहा, " यहाँ बैठ कर मैं देख रहा हूँ की हर कोई दौड़ रहा है| सबको जाने की जल्दी है| कौन किस रास्ते जायेगा पता ही नहीं चलता ,जब तक वो किसी एक मोड़ पर मुड़  न जाए | यही तो जिंदगी है हम सब भाग रहे हैं अनजान , अपरिचित दिशा में , अचानक से किसी चौराहे पर मुड़ जाते हैं | हर चौराहे से एक नया मोड़ मुड़ने का अवसर होता है और जिन्दगी को एक नया आकर देने का भी| जिन्दगी को समझने के लिए मुझे यही जगह सबसे अच्छी लगी| इसलिए मैं यहाँ आकार बैठ गया | 

एक साधू कचहरी के आगे जा कर बैठ गया| लोगों के पूंछने पर उसने बताया , " यहाँ वो आते हैं जिन्होंने कोई गुनाह किया होता है| गुनाह करते समय भले ही आनंद आता हो पर सजा भोगते समय दुःख होता है, तभी तो उससे बचने की कोशिश करते हैं , जिरह करते हैं और कुछ नहीं तो क्षमा की याचना करते हैं| फिर भी दंड मिलता  है| गुनाह हम अपने मन से करते हैं, उस समय मन को रोक सकते हैं , परन्तु सजा दूसरे के मन से मिलती है , उसे रोक नहीं सकते , भोगनी ही पड़ती है|  जिंदगी को समझने के लिए यही जगह सबसे सही लगी , इसलिए मैं यहाँ आकर बैठ गया| 


चौथा साधु शमशान में जाकर बैठ गया| लोगों के पूंछने पर बोला,  " सारे रास्ते यहीं आते हैं , सारा समय यहीं खत्म होता है , कर्मों के दंड यहीं से शुरू होते हैं | यहाँ आने से कोई नहीं बच सकता| जब सबको यहीं आना है तो किस बात की मारा मारी, मुझे यही जगह सबसे मुफीद लगी इसलिए मैं यहाँ आकर बैठ गया| 


                            सात दिन बाद जब लोग उनका प्रवचन सुनने के लिए इकट्ठे हुए तो साडू मुस्कुरा कर बोले , " प्रवचन तो आप को मिल गया ...

हमारे पास समय कम है, उसकी कद्र करो |

हर चौराहा आपको सही राह चुनने का अवसर देता है , भागते हुए नहीं थोडा ठहरों , सोंचों , फिर चुनो ... अगर गलत भी चुन लिया तो कोई दुःख न करों , क्यों अगला चौराहा फिर एक अवसर है| 

जब भी आप कोई गलत काम करते हैं तो आप को सजा दूसरे के मुताबिक़ मिलती हैं| कर्म -दंड से बचने के लिए अपने कर्मों पर ध्यान दो| 

सबको एक दिन शमशान में आना है इसलिए हर दिन ये सोंच कर जियो कि आज का दिन ही आखिरी है ...इसलिए समय की कीमत करनी है , सही राह चुननी  है और बेवजह दौड़ने  के स्थान पर कर्म दंड को ध्यान रखते हुए कर्म करना है|

साधुओं का प्रवचन सुन कर , लोग उनके ज्ञान के आगे नतमस्तक हो गए |



टीम ABC







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बाहें


माता और पिता दोनों का हमारे जीवन में बहुत महत्व है | जहाँ माँ धरती है जोजीवन की डोर थाम लेती है वही पिता आकाश जो बाहर आने वाली हर मुसीबत पर एक साया बन के छा जाते हैं | तभी तो नन्हीं बाहें हमेशा सहारे के लिए पिता की बाहें खोजती हैं | पर अगर ...

पढ़िए मार्मिक कहानी - बाहें 

चालीसवां सावन चल रहा था तृप्ति का, पर ज़िन्दगी चार दिन के सुकून के लिए तरस गयी थी आजकल. एक के बाद एक कहर बरपा हो रहा था तृप्ति की ज़िन्दगी में. दो बच्चों को अकेले पालने की ज़िम्मेवारी छोटी बात होती, फिर भी तृप्ति ने कभी उन्हें पिता की कमी महसूस नहीं होने दी. उनकी हर ज़रुरत को अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस तरह पूरा किया कि अच्छे-भले सब साधनों से संपन्न व् सुखी कहे जाने वाले दम्पत्तियों के बच्चे भी उसके बच्चों - मन्नत और मनस्वी से जलते थे. हर क़दम पर नित-नई परेशानियां आई पर हर परेशानी उसे और भी मज़बूत करती चली गयी.

दुनिया की तो रीत है कि सामाजिक दृष्टि से 'बेचारा' कहा जाने वाला यदि सर उठा कर स्वाभिमान से यानि बिना दुनिया कि मदद के आगे बढ़ने की जुर्रत करे तो उसे सुहाता नहीं है, और यदि वो कामयाब भी होता नज़र आये तो इस क़दर सबकी नज़रों में खटकता  है कि वही दुनिया जो कुछ समय पहले उसके पहाड़ से दुःख को देखकर सहानुभूति प्रकट करते हुए उस 'बेचारे' को हर संभव सहायता का वचन देते नहीं थकती थी, वही दुनिया उसकी राहों में हरदम- हरक़दम पर रोड़ा अटकाने से बाज़ नहीं आती. दुनिया ने अपनी रीत बखूबी निभायी.

अभी दो महीने पहले ही मन्नत ने ग्यारहवीं में प्रवेश लिया.

  तृप्ति को आजकल के प्रतियोगितावादी युग के रिवाज़ के मुताबिक़ उसकी विज्ञान और गणित कि ट्यूशन्स लगानी पड़ी. और क्योंकि मन्नत पढ़ाई में बहुत होशियार थी उसे ऊंचे स्तर कि ट्यूशन्स दिलवाई तृप्ति ने - उस सेंटर में जो शहर से थोड़ा बाहर पड़ता था. नज़दीक ऐसे स्तर का कोई भी सेंटर था. बेटी को आने जाने में किसी पर आश्रित रहना पड़े, इसलिए उसे स्कूटी भी लेकर दी. सर्दियों में तो पांच बजे ही सूरज छिप जाता है, अतः जब बजे कि ट्यूशन ख़त्म कर के साढ़े छह बजे घर पहुँचती थी मन्नत तो अन्धेरा हो चुका होता था. छोटे शहर की निवासी बेचारी तृप्ति बेटी के घर पहुंचने तक किसी तरह दिल की धड़कनों को समेटती घडी-घडी दरवाज़े को निहारती रहती और उसके घर आने पर ही चैन की सांस लेती. पर तृप्ति का चैन, मोहल्ले वालों की बेचैनी का कारण था. आखिर बच्ची जवान जो होने लगी थी

सो  देर-सवेर उसके देर से घर आने पर लगी बातें बनने - 'आज तो पीछे कोई बैठा था...', 'आज पूरे दस मिनट देरी से आई...', 'हद्द है इसकी माँ की... अरे हम तो सब होते हुए भी कभी इजाज़त दें बेटी को इत्ती देर से अँधेरे में घर आने की', 'बाप नहीं रहता साथ में तभी...', ‘अपनी ज़िन्दगी का किया सो किया, इस अच्छी खासी छोरी को बिगड़ैल बनाकर ही छोड़ेगी ये औरत'.

 ओह... ! चीखें मार मार कर रोने को जी चाहता था तृप्ति का. अभी तक तो उस पर ही अकेले रहने की बाबत ताने दिए जाते थे - 'जाने क्या क्या करना पड़ता होगा बिचारी को इतनी सुख सुविधाएं जुटाने के लिए, अब एक नौकरी में तो इत्ती ऐश से कोई रह सके...', ' अरे भाई, इन तलाकशुदा औरतों को ऐश के बगैर नहीं सरता जभी तो अलग होती हैं...', ' कल तो वो ... हाँ-हाँ वही ऑफिस वाला, लम्बा सा, पूरा एक घंटे के क़रीब अंदर ही था...' 'खैर... हमें क्या, उसकी ज़िन्दगी है - वो जाने...' आदि. अब उसकी बच्ची को भी निशाना बना लिया इन्होने... हे भगवान! रूह काँप जाती थी तृप्ति की अपनी चार साल की शादीशुदा ज़िन्दगी के बारे में सोच कर. अपने बच्चों के बाप के बारे में तो सोच कर भी ग्लानि हो आती थी उसे. अगर आज वो साथ होता तो शायद अपनी मन्नत पर ही बुरी नज़र... ??? और मंन ही मंन अपने तलाक़शुदा होने पर गर्व होने लगा उसे और अपने मंन को पत्थर सा ठोस इरादों को पहले से भी कहीं अधिक मज़बूत कर अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य के बारे में सोचने लगी.

जागती आँखों से कुछ अच्छा होने का सोचा भर था कि मनस्वी की दुर्घटना की खबर ले कर उसके दोस्त गए.

  उसका दोस्त आर्यन अपने पापा की नई मोटर बाइक उनसे बिना इजाज़त चला रहा था और मनस्वी को उसने अपने साथ ले लिया था. कच्ची उम्र में ही पक्की स्पीड का मज़ा ले रहे थे दोनों कि रिक्शा से टक्कर हो गयी. अब दोनों बच्चे अस्पताल में थे. राम राम करते अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि मनस्वी कि दायीं टांग में फ्रैक्चर है. तीन महीने लगेंगे मनस्वी के प्लास्टर को उतरने में.

 हिम्मत - बहुत हिम्मत से काम ले रही है तृप्ति. नौकरी की जिम्मेवारियां निबाहती है, घर की ज़रूरतों को पूरा करती है, अपनी जवान होती मन्नत को (जो करियर बनाने के लिए सजग हैप्रेरणा ही नहीं देती, डगमगाने पर संभालती भी है. किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े घायल मनस्वी की सेवा सुश्रुषा से ले कर उसके मनोबल को बढ़ाने तक का सारा ज़िम्मा संभालती है. और सबसे बढ़कर दोनों बच्चों को जब-तब अपनी बाहों में भरकर जो सुरक्षा का भाव वह उनके अंतरमन तक उनमे भर देती है वह अतुलनीय है. किन्तु स्वयं को उस सुरक्षित कर देने वाले भाव से सदा अछूता  ही पाया उसने. उस भाव के लिए स्वयं क्या उसके जीवन में तरसना ही लिखा है? हर तन-मन की टूटन-थकन पर उसका भी मन होता है कि वो स्वयं को किसी आगोश में छिपा कर कुछ देर सिसक ले, कुछ अपना दर्द स्थानांतरित कर दे और कुछ सुकून आत्मसात कर नई शक्ति अर्जित कर फिर कूद पड़े दुनिया के रणक्षेत्र में.


बचपन में तो हर छोटी-बड़ी मुसीबत पर पापा अपनी बाहें पसारे सदैव यूं खड़े नज़र आते थे जैसे अल्लादीन का जिन्न अपने आका के याद करते ही 'हुकुम मेरे आका' कहता प्रकट हो जाता था और पापा की वो बाहें चुटकी में हर दर्द छू-मंतर कर देती थी.

  पापा आज नहीं हैं. ... कहाँ से लाये तृप्ति वो बाहें जो तृप्त कर दें उसे?


डेज़ी नेहरा

लेखिका



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