अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -५ सम्पादकीय : किसी का जाना ...कभी जाना नहीं होता

किसी का जाना ....कभी जाना नहीं होता लाल –पीले हरे नीले रंगों से इतर कुछ अलग ही होते हैं रिश्तों के रंग जहाँ चलतें हैं सापे...



किसी का जाना ....कभी जाना नहीं होता
लाल –पीले हरे नीले
रंगों से इतर
कुछ अलग ही होते हैं
रिश्तों के रंग
जहाँ चलतें हैं सापेक्षता के सिद्धांत
की पल पल बनते बिगड़ते
त्रिकोंड़ो में
साथ –साथ आगे बढ़ी हुई रेखायें
नहीं ले पाती हैं कोई आकर
की दृश्य –अदृश्य रूप में

मौजूद रहता है तीसरा कोण
ध्वस्त हो जातें हैं कल्पना के बिम्ब
शेष रहता है क्रूर यथार्थ
रोक सको तो रोक लो
उसको
जो नहीं हो कर भी
तैरता है
किसी न किसी रूप में ,
किसी न किसी आकार में
दो रेखाओं के मध्य
क्योंकि
किसी का जाना ...कभी जाना नहीं होता
                   रंगों का त्यौहार होली आने वाला   है | पत्रिका के इस अंक में हर रंग को समेटने का प्रयास किया है |अब अंतिम प्रस्तुति मेरा पाठकों के साथ संवाद | जब –जब यह संवाद स्थापित करती हूँ अतीत की न जाने कितनी स्मृतियाँ मन के आँगन में पुकारने लगती हैं | और क्यों न हो ये अनुभव , ये स्मृतियाँ , ये मनोभावों का विश्लेषण किसी लेखक की धरोहर होती हैं | परन्तु एक विरोधाभास भी है | जीवन की अनेक घटनाएं जो महत्वहीन होती हैं | जिनका होना या न होना बराबर होता है | स्मृतियों में बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती हैं | मैं अपने विचारों लीं थी की  भतीजे का फोन आ गया | हँसते हुए कहा “ मौसी कल तो कॉलेज में बेवजह की डांट  पड़ गयी | दरसल सभी बच्चे सामूहिक बंक ( एक साथ क्लास न अटेंड करना ) चाहते थे | पर हम तीन –चार बच्चे यह सोच कर क्लास में गए की अध्यापिका जब पढ़ाने आएगी तो सारी  क्लास अनुपस्तिथ देख कर उन्हें  अपमानित महसूस होगा | वैसे भी कुछ न कुछ तो पढायेंगी  ही | क्लास में जाने का कुछ तो लाभ मिलेगा  ही | परन्तु हुआ उल्टा | केवल कुछ बच्चों को देख कर अध्यापिका क्रोधित हो गयीं | वह हम लोगों को डाँटने लगीं की आप लोग पढ़ाई पर ध्यान नहीं देतें हैं क्लास बंक करतें हैं | ये एक बेहद गैर जिम्मेदाराना हरकत है | हम सब बच्चे हैरान थे | हम सब जो कक्षा में उपस्तिथ थे उनके हिस्से की डांट खा रहे थे जो अनुपस्तिथ थे | जो अनुपस्तिथ थे वो बाहर मजे ले रहे थे | कुल मिलाकर जो क्लास में नहीं थे वो थे और जो थे वो नहीं थे | बात सामान्य थी पर उसकी बात का आखिरी वाक्य मुझे कहीं गहरे प्रभावित कर गया | किसी  का न हो कर भी होना और किसी का होकर भी नहीं होना |
                  पहले भी मुझे कुछ पुरानी फिल्में सोचने पर विवश करती रहीं हैं | जिन में प्रेम त्रिकोण होता है | दो नायक एक नायिका या एक नायक दो नायिका | ज्यादातर फिल्मों में कथाकार सहूलियत की दृष्टि से  इस त्रिकोण में से एक व्यक्ति ( नायक या नायिका ) की मृत्यु दिखा देता है | और दो लोग जीवन के पथ पर आगे बढ़ जातें हैं | हैप्पी एनडिंग हिंदी फिल्मों का अपना अंदाज़ है | पर क्या वास्तविक जिंदगी में ऐसा होता है | क्या दो व्यक्ति तीसरे की छाया से पूर्णतया  मुक्त हो कर जीवन पथ पर आगे बढ़ पाते हैं | सच्चाई ये है की जीवत हो या मृत ,वह तीसरा व्यक्ति उनके मध्य हमेशा रहता है | कभी तानों के रूप में , कभी उलाहनों के रूप में , कभी  दर्द के रूप में | वो जा कर के भी नहीं जाता |   
          भले ही ये किस्सा फ़िल्मी हो , नायक नायिका का हो | पर जीवन में ऐसे हजारों प्रेम त्रिकोण बनते हैं | जिसमें एक केंद्र होता है और दो परिधि पर | ये त्रिकोण दो बहुओं और सास के बीच में बनता है | पुरुष और उसकी माँ पत्नी के मध्य  बनता है | दो बहनों और भाई के मध्य बनता है | विवाद की स्थिति में जहाँ एक जाता दिखता है , हटता  दिखता है और दो लोग साथ में आगे बढ़ते दिखतें हैं | पर जाने वाला कभी नहीं जाता वो उनके मध्य तैरता  है जीवन पर्यंत | किसी न किसी रूप में किसी न किसी आकार में , चाहे –अनचाहे |  मुझे याद आ रहीं है एक बुजुर्ग महिला ‘राधा जी ‘ | राधा जी अपनी दो बहुओं के मध्य संतुलन बनाने में असमर्थ रहीं | रोज़ –रोज़ की किच –किच का परिणाम यह हुआ की उन्होंने दोनों बहुओं को अलग –अलग रहने का आदेश दे दिया | एक बहु ख़ुशी –खुशी  अलग रहने लगी | दूसरी नें  राधा जी के साथ उनकी सेवा करते हुए रहने का निर्णय  लिया | उस समय वो राधा जी को प्रिय लगी किन्तु दिन बीतने के साथ वो अलग –अलग कारणों से दोनों बहुओं  की तुलना करने लगीं | उन दोनों के बीच में वो ( पहली बहु ) सदा  रही | आश्चर्य जो बहु त्याग , सेवा और समर्पण के साथ राधा जी के साथ  थी | वो ह्रदय में नहीं थी | जो नहीं थी , वो ह्रदय में थी |
        अभी ज्यादा समय नहीं हुआ एक व्यक्ति ने मुझे मेसेज किया ,” वंदना जी आपकी कहानी पढ़ी | आप  मानवीय भावनाओं को कागज़ पर पूरे अहसासों के साथ उकेर देती हैं | क्या आप एक ऐसे बेटे की कहानी लिखेंगी जिसने अपने माता –पिता के लिए अपने सब सुख त्याग दिए , यहाँ तक की पत्नी और परिवार भी | पर माता –पिता हमेशा उस बड़े भाई की प्रशंसा करते है ,  जो अपने परिवार के साथ अलग रहता है | क्या आप उस लड़के की टीस को , दर्द को उकेरेंगी | जाहिर सी बात है यह उसका अपना दर्द होगा | मैंने अभी कहानी नहीं लिखी पर इससे मेरी बात को बल मिला | जो पास नहीं है वो है और जो है वो नहीं है |  नेहा का दर्द भी कुछ अलग नहीं है | मुक्ता  जी ने नेहा जी व् कुछ अन्य महिलाओंको लेकर सामाजिक संस्था बनायीं | धीरे –धीरे सदस्यों में मतभेद हुए | एक –एक करके सब मुक्ता की संस्था  को छोड़ कर चल गयीं | नेहा संस्था के कार्यों में पूर्ववत लगी रही पर नेहा और मुक्ता का रिश्ता प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका | उन दोनों के बीच में वो सब उपस्तिथ रही जो जा चुकी थी | तानो , उलाहनों और दर्द के रूप में |
                            आपको याद हो कुछ समय पहले  एक फिल्म आई थी “ तारे जमीं पर “ |उसका एक दृश्य मेरे आँखों के सामने तैर गया | जब हिंदी की कक्षा में कविता का अर्थ पूंछने पर ईशान कुछ अटकते हुए सा जबाब देता है ,” जो है वो नहीं है और जो नहीं है वो है | ईशान  का उत्तर खारिज हो जाता है | उसी के मित्र का उत्तर अध्यापक की नज़र में सही है ,” कवि  बिम्ब बनाता है और मिटाता है | ईशान  सच्चाई का प्रतिनिधित्व करता है और उसका मित्र सधे  सुन्दर शब्दों में कल्पना का | हम सब कल्पना में जीते हैं | बिम्ब बनाते हैं और मिटाते हैं | हर बिम्ब बनने  और मिटने के बीच एक आवरण होता है | उस आवरण के अन्दर कैद होता है ईशान का सच | जो है वो नहीं है और जो नहीं  है वो हैं | एक कडवा सच | एक जीवन दर्शन | एक फिलौस्फी  |
                   एक ऐसी  फिलास्फी  जो हमारे मुहावरों में पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाई जा रही है | दूर के ढोल सुहाने होते हैं | जब दूर से ढोल की आवाज़ सुनाई देती है तो मन मधुर कल्पनाओं में खो जाता  है | घूंघट  में सजी खूबसूरत दुल्हन के | विवाह के समय गाये जाने वाले सुरीले गीतों के | मधुर पकवानों की खुशबू के | एक उल्लासित  उमंग  भरे वातावरण के | मन  एक बिम्ब गढ़ता है | पर यह आदर्श व्यवस्था कहाँ है ?हकीकत  कवि  का बिम्ब नहीं , ईशान का यथार्थ है | जहाँ ढोल की कानफाडू आवाज़ है |ढेरों अव्यवस्थाएं है | दहेज के लिए झगड़ते वर पक्ष के लोग है |और घूँघट के नीचे आँखों में आँसू भरे दुल्हन है जो आज स्त्री नहीं दान की जाने वाली वस्तु है | यथार्थ ईशान का सच है जो है वो नहीं है जो नहीं है वो है | जिसे परे धकेल कर हम बिम्ब गढ़ते है | बिम्ब सुखद होते है | आनंद दायक होते हैं | इसलिए स्वीकार्य होते हैं |
     बचपन  में पिता  जी जब कहा करते थे की हम सब जो अभी कर रहे | वो सब एक फिल्म में कैद हो रहा है | वो फिल्म आकाश की तरफ बढ़ रही है |धीरे –धीरे  सुदूर अन्तरिक्ष में फैले सितारों तक जा रही है | एक न एक दिन वो सब यह देखेंगे | मेरी आँखें आश्चर्य से फ़ैल जाती जब पिता  जी बताते अभी तो सितारों पर बैठे लोग महाभारत के दृश्य देख रहे होंगे | धनुष बाण पकडे अर्जुन , गीता का ज्ञान देते श्री कृष्ण व् चालाक शकुनी | बाद में जब विज्ञान की पढाई  की और प्रकाश की गति और अन्तरिक्ष में तारों की दूरी के बारे में अनुमान लगाया तो सहज ही वो बाल सुलभ आश्चर्य कपोल कल्पना नहीं रह गया | होने और नहीं होने की बात समझ आने लगी | जो यहाँ पर है वो सुदूर ग्रहों के लिए नहीं है और जो नहीं है वो है | सापेक्षता का सिद्धांत समझ आने लगा |अंग्रेजी में इसके लिए दो बड़े ही खूबसूरत शब्द हैं | एब्सोल्यूट व् क्म्पेरिटिव | रिश्तों की दुनिया में सब कुछ काम्पेरिटिव होता है , एब्सोल्यूट नहीं |
                    होली आने वाली है |  एक बार पुन :  अपने बचपन की स्मृतियों  में वापस लौटती हूँ | जब होली पर बैठक की मेज विभिन्न रंग –बिरंगी पत्र –पत्रिकाओं से सज जाती थी | पढने –लिखने के शौक़ीन हम बच्चों  के लिए इम्तहान समाप्त होने के बाद पिताजी द्वारा त्यौहार के मौके पर दिया गया यह एक विशेष उपहार होता था |पर  उनमें से कई पत्रिकायें ऐसी थी | जिनकी कहानियों की शुरुआत किसी रिश्ते की अनबन से होती थी व् अंत होली रंग  व् अबीर –गुलाल से रिश्तों की कलुषता समाप्त हो गयी , जीवन खिल उठा से  होता था  | मैं सोचती , क्या ऐसा संभव है ? हर बार अबीर –गुलाल से रिश्ते कैसे प्रेम के रंगों  में रंग जाते हैं | पर आज समझती हूँ की ये पूर्णतया सत्य भले ही न हो पर अंशत : सत्य है | ये त्यौहार हमें एक अवसर देते है | रिश्तों को सुधारने का | होली सिर्फ रंगों का त्यौहार नहीं है यह रिश्तों का त्यौहार भी है |  जहाँ हंसी खुशी और उल्लास के रंगों में रिश्ते रंग जाते है | द्रण हो जातें होते है |  करीब सप्ताह भर चलने वाला होली मिलन कार्यक्रम जिसमें हर छोटे –बड़े रिश्तेदार से मिलने की परंपरा रही है | यह हमारे पूर्वजों द्वारा अपने अनुभव के आधार पर की गयी एक व्यवस्था है जो रिश्तों को सँभालने सहेजने के लिए बनायी गयी हैं |  यही रिश्तों  की सापेक्षता का सिद्धांत है | एब्सोल्यूट कुछ भी नहीं सब कुछ क्म्पेरिटिव | इसलिए मन  –मुटाव भुलाकर साथ चलने की वृत्ति अपनानी है | क्योंकि जाने वाला कहीं नहीं जाता वह रहता है दो के मध्य में किसी न किसी रूप में किसी न किसी आकार में , चाहे –अनचाहे | मन कल्पना के चाहे जितने बिम्ब बना  ले | पर सच्चाई ईशान के शब्दों में है ... जो नहीं है वो होता है और जो है वो नहीं होता है | अगर आप की भी अपने किसी रिश्तेदार से अनबन हो गयी हो या आप  भी किसी त्रिकोण में एक के साथ आगे बढ़ने  में प्रयासरत हों ,  तो होली के रंगों से उस मन –मुटाव धो डालिए |अपने सभी रिश्तों को प्रेम आशा और उल्लास के रंगों में रंग डालिए |
          आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं
                                                   वंदना बाजपेयी 







            

    

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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तर करवड़े अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा परवीन कुमार अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमरान रिजवी इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपवास उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत छठ जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम डोंगरा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बाल मनो विज्ञान बाल-मन बिल गेट्स बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता माता -पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वृद्धजन विमर्श वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार हेल्थ होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues clingy behaviour deepawali special E.book family and relationship issues father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories hindi story id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire senior citizen issues short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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अटूट बंधन : अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -५ सम्पादकीय : किसी का जाना ...कभी जाना नहीं होता
अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -५ सम्पादकीय : किसी का जाना ...कभी जाना नहीं होता
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