चार साधुओं ने सिर्फ शहर के अलग -अलग स्थानों पर बैठ कर ऐसा सांकेतिक प्रवचन दिया कि जिंदगी के रहस्य अपने -आप खुल गए |


चार साधुओं का प्रवचन


एक बार की बात है चार साधू जो आपस में मित्र थे तीर्थ यात्रा कर के लौटे | वो लोगों के साथ अपने ज्ञान बांटना चाहते थे ,लेकिन जानते थे की लोग सहजता से बात नहीं सुनते | इसलिए उन्होंने एक उपाय  निकाला कि शहर में खबर फैला दी की शहर में चार साधू आये हैं वो ७ दिन बाद शाम को जनता को संबोधित करेंगे | 

लोगों में जिज्ञासा जगी | उसके बाद वो चरों साधू चार अलग अलग स्थानों पर बैठ गए|

एक साधू घंटाघर पर बैठ गया| लोगों ने उनसे वहाँ  बैठने का कारण पूंछा , तो साधू ने कहा ," घंटाघर की सुइयां लगतार  चलती है| ये जीवन के गतिमान होने का संकेत हैं| पर 12 बजे वो अपने दोनों हाथ जोड़ लेती हैं कि अब बस , मेरी इतनी ही शक्ति थी| इससे ज्यादा मैं एक घंटे में नहीं दे सकता| तभी घंटे की आवाज़ आती है, जैसे कह रहा हो, तुम्हारी जिंदगी का एक घंटा कम हो गया अगर एक घंटा और मिला है तो चलो , लगातार चलो , पूरे करो वो काम जो करने आये हो|" मुझे यही जगह सबसे अच्छी लगी इसलिए मैं यहाँ आकर बैठ गया | 

एक साधू चौराहे पर बैठ गया| लोगों ने पुछा , " साधू महाराज आप यहाँ क्यों बैठे हैं? साधू ने कहा, " यहाँ बैठ कर मैं देख रहा हूँ की हर कोई दौड़ रहा है| सबको जाने की जल्दी है| कौन किस रास्ते जायेगा पता ही नहीं चलता ,जब तक वो किसी एक मोड़ पर मुड़  न जाए | यही तो जिंदगी है हम सब भाग रहे हैं अनजान , अपरिचित दिशा में , अचानक से किसी चौराहे पर मुड़ जाते हैं | हर चौराहे से एक नया मोड़ मुड़ने का अवसर होता है और जिन्दगी को एक नया आकर देने का भी| जिन्दगी को समझने के लिए मुझे यही जगह सबसे अच्छी लगी| इसलिए मैं यहाँ आकार बैठ गया | 

एक साधू कचहरी के आगे जा कर बैठ गया| लोगों के पूंछने पर उसने बताया , " यहाँ वो आते हैं जिन्होंने कोई गुनाह किया होता है| गुनाह करते समय भले ही आनंद आता हो पर सजा भोगते समय दुःख होता है, तभी तो उससे बचने की कोशिश करते हैं , जिरह करते हैं और कुछ नहीं तो क्षमा की याचना करते हैं| फिर भी दंड मिलता  है| गुनाह हम अपने मन से करते हैं, उस समय मन को रोक सकते हैं , परन्तु सजा दूसरे के मन से मिलती है , उसे रोक नहीं सकते , भोगनी ही पड़ती है|  जिंदगी को समझने के लिए यही जगह सबसे सही लगी , इसलिए मैं यहाँ आकर बैठ गया| 


चौथा साधु शमशान में जाकर बैठ गया| लोगों के पूंछने पर बोला,  " सारे रास्ते यहीं आते हैं , सारा समय यहीं खत्म होता है , कर्मों के दंड यहीं से शुरू होते हैं | यहाँ आने से कोई नहीं बच सकता| जब सबको यहीं आना है तो किस बात की मारा मारी, मुझे यही जगह सबसे मुफीद लगी इसलिए मैं यहाँ आकर बैठ गया| 


                            सात दिन बाद जब लोग उनका प्रवचन सुनने के लिए इकट्ठे हुए तो साडू मुस्कुरा कर बोले , " प्रवचन तो आप को मिल गया ...

हमारे पास समय कम है, उसकी कद्र करो |

हर चौराहा आपको सही राह चुनने का अवसर देता है , भागते हुए नहीं थोडा ठहरों , सोंचों , फिर चुनो ... अगर गलत भी चुन लिया तो कोई दुःख न करों , क्यों अगला चौराहा फिर एक अवसर है| 

जब भी आप कोई गलत काम करते हैं तो आप को सजा दूसरे के मुताबिक़ मिलती हैं| कर्म -दंड से बचने के लिए अपने कर्मों पर ध्यान दो| 

सबको एक दिन शमशान में आना है इसलिए हर दिन ये सोंच कर जियो कि आज का दिन ही आखिरी है ...इसलिए समय की कीमत करनी है , सही राह चुननी  है और बेवजह दौड़ने  के स्थान पर कर्म दंड को ध्यान रखते हुए कर्म करना है|

साधुओं का प्रवचन सुन कर , लोग उनके ज्ञान के आगे नतमस्तक हो गए |



टीम ABC







आपको आपको  लेख "चार साधुओं का प्रवचन    " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें 

Share To:

atoot bandhan

Post A Comment:

0 comments so far,add yours