May 2016



कुमार गौरव
मौलिक एवं अप्रकाशित

एक छुट्टी के दिन कोई पत्रकार कुछ अलग करने के ख्याल से जुगाड़ लगाकर ताजमहल में घुस गया ।
बहुत अंदर जाने पर उसे एक बेहद खूबसूरत औरत अपने नाखून तराशती हुई मिली । पत्रकार को आश्चर्य हुआ दोनों की नजरें मिली तो उसने पूछा " कौन से चैनल से हो । "
उसने बिना चेहरे पर कोई भाव लाये कहा " मैं यहीं रहती हूं । "
लडकी कुछ दिलचस्प लगी सो उसने कैमरा ऑन कर लिया और बात शुरु करी " कब से रहती हो यहाँ । "
"बहुत पहले ये बनने के कुछ दिनों बाद से ही । "
"अच्छा ये बताओ शाहजहां को तुमने देखा था कैसे थे । "



atootbandhann.com के बारे में


अटूट बंधन ब्लॉग की नींव “सर्वजन हिताय , सर्वजन सुखाय” की भावना से प्रेरित हो कर रखी गयी है | इसके मुख्य उद्देश्य निम्न हैं ...
हमारे जीवन में रोटी कपडा और मकान के बाद जो चीज सबसे महत्वपूर्ण होती है ,वो है हमारे रिश्ते | जहाँ रोटी कपडा और मकान भैतिक आवश्कताओं के लिए जरूरी हैं ,वहीं रिश्ते भावनात्मक आवश्यकताओं के लिए जरूरी हैं | आज के समय में जब रिश्ते टूट और बिखर रहे हैं तब बहुत जरूरी है उन्हें संभालना , सहेजना ताकि हम भावनात्मक रूप से संतुष्ट रह सके | भावनात्मक संतुष्टि के बिना सारी खुशिया बेकार लगती है | हम अटूट बंधन ब्लॉग पर ऐसे जानकारीयुक्त लेख ले कर आयेगे जो आपके रिश्तों को सँभालने में आपकी सहायता करेंगे व्  आपको गलत रिश्तों से निकलने की समझ भी देंगें |

जीवन है तो समस्याएं हैं | जब समस्याएं आती हैं तो हमारा दिमाग काम नहीं करता | उस समय लगता है कोई रास्ता दिखा दे | हमारे ब्लॉग में अगला कदमवही हाथ है जो उस समय आपको सहारा देगा , रास्ता दिखाएगा जब आप समस्या से जूझ रहे हो और उसका हल खोज रहे हों | इसमें रिश्तों , कैरियर , स्वाथ्य , प्रियजन की मृत्यु , अतीत में जीने आदि बहुत सारी समस्याओं को उठाया है | ये योजना मेरे दिल के बहुत करीब है | आशा है सब को इससे लाभ होगा |

कौन है जो सफल नहीं होना चाहता | सफलता के लिए सभी प्रयास भी करते हैं | सफलता आशा और उत्साह देती है वहीँ असफलता मन को तोड़ देती है | हालांकि कोई भी असफलता अंतिम नहीं होती | पर निराशा के आलम में जरूरी होता है कोई ऐसा व्यक्ति जो उस निराशा से निकल दे और जीवन में फिर से जिजीविषा भर दे | “अटूट बंधन “ ब्लॉग का प्रयास है की वो सकारात्मक विचरों का प्रचार प्रसार  करेगा जिससे लोग निराशा से बाहर निकल कर लौकिक व् परलौकिक सफलता प्राप्त कर सकें | साथ ही स्वस्थ , संतुष्ट व् उर्जा से भरे आपके व्यक्तित्व विकास में भी सहायक होगा |

अटूट बंधन ब्लॉग प्रतिभाशाली लोगों को मंच देने की कोशिश है |हमारा प्रयास रहेगा की आप की रचनाओं को ज्यादा से ज्यादा पाठक पढ़ सके | जो लोग भी अटूट बंधन में अपनी रचनाएँ भेजना चाहते हैं वो editor.atootbandhan@gmail.com पर भेजें | रचना पसंद आने पर प्रकाशित की जायेगी |
        उम्मीद है अच्छी भावना से शुरू की गई ये कोशिश कामयाब होगी और पाठकों के साथ मेरा अटूट बंधन”                                               
        बना रहेगा |  
                                         वंदना बाजपेयी

                                       फाउंडर ऑफ़ अटूट बंधन .कॉम 

 



एक  बार एक आदमी अपने छोटे से बालक के साथ एक घने जंगल से जा रहा था!   तभी रास्ते मे उस बालक को प्यास लगी ,  और उसे पानी पिलाने उसका पिता उसे एक  नदी पर ले गया , नदी पर पानी पीते पीते अचानक वो बालक पानी मे गिर गया ,  और डूबने से उसके प्राण निकल गए!   वो आदमी बड़ा दुखी हुआ,  और उसने सोचा की इस घने जंगल मे इस बालक की अंतिम क्रिया किस प्रकार करूँ !   तभी उसका रोना सुनकर एक गिद्ध ,  सियार और नदी से एक कछुआ वहा आ गए ,  और उस आदमी से सहानुभूति व्यक्त करने लगे ,  आदमी की परेशानी जान कर सब अपनी अपनी सलाह  देने लगे!





“ माँ “ ... कहीं बस संबोधन बन कर ही न रह जाए
   डुग – डुग , डुग , डुग ... मेहरबान कद्रदान , आइये ,आइये  मदारी का खेल शुरू होता है | तो बोल जमूरे ...
 जी हजूर
सच –सच बताएगा
जी हजूर
आइना दिखाएगा
जी हजूर
दूध का दूध और पानी का पानी करेगा
जी हजूर
तो दिखा .... क्या लाया है अपने झोले में
हजूर , मैं अपने झोले में लाया हूँ मनुष्य को ईश्वर का दिया सबसे नायब तोहफा
सबसे नायब तोहफा ... वो क्या है जमूरे , जल्दी बता
हुजूर , ये वो तोहफा है , जिसका इंसान अपने स्वार्थ के लिए दोहन कर के फिर बड़ी बेकदरी करता है |
ईश्वर  के दिए नायब तोहफे की बेकद्री , ऐसा क्या तोहफा है जमूरे ?
हूजूर ..वो तोहफा  है ... माँ
माँ ???
जी हजूर , न  सिर्फ जन्म देने वाली बल्कि पालने और सँभालने वाली भी
वो कैसे जमूरे
बताता हूँ हजूर , खेल दिखता हूँ हजूर ......
               हाँ ! तो मेहरबान कद्रदान , जरा गौर से देखिये ... ये हैं एक माँ  ,चार  बच्चों की माँ ,  ९० साल की रामरती देवी |झुर्रियों से भरा चेहरा ,





कैंसर
बस एक ही शब्द 
काफी था सुनने के लिए 
अनसुनी ही रह गयी 
उसके बाद दी  गयी सारी  हिदायते 
पहली दूसरी या तीसरी स्टेज का वर्णन 
बस दिखाई देने लगी