व्यंग - हमने भी करी डाई-ईटिंग

लेख का शीर्षक देख कर ही आप हमरी सेहत और उससे उत्पन्न परेशानियों के बारे में अंदाजा लगा सकते हैं |आज के ज़माने में मोटा होना न बाबा न ,ये तो करीना कपूर ब्रांड जीरो फीगर का युग है ,यहाँ मोटे लोगों को आलसी लोगों की कतार में बिठाते देर नहीं लगती|यह सब आधुनिक संस्कृति का दोष है हमें आज भी याद है कि हमारी दादी अपने ८० किलो वज़न के साथ पूरे शान से चलती थी और लोग उन्हें खाते –पीते घर वाली कह कर बात –बात पर भारत रत्न से सम्मानित किया करते थे |पर आज के जामने में पतला होना स्टेटस सिम्बल बन गया है ,आज जो महिला जितने खाते –पीते घर की होती है वो उतनी ही कम वजन की होती है ,क्योकि उसी के पास ट्रेड मिल पर दौड़ने हेतु जिम की महंगी फीस चुकाने की औकात होती है या उसके पास ही ब्रेकफास्ट और सुबह के नाश्ते की जिम्मेदारी नौकरों पर छोड़ कर मोर्निग वाक पर जाने का समय होता है ….. बड़े शहरों में तो महिला का वजन देख कर उसके पति की तनख्वाह का अंदाजा लगाया जाता है,कई ब्यूटी पार्लर में महिलाओं का वजन देख कर पति की तनख्वाह बताने वाला चार्ट लगा रहता है,इसी आधार पर उनके सिंपल ,गोल्डन या डाएमंड फेसियल किया जाता है
…..
१ )महिला का वजन ६० किलो से ऊपर …. पति की तनख्वाह ५० ,००० से एक लाख …. सिंपल फेसियल
२ ) महिला का वजन ५० किलो से कम … पति की तनख्वाह लाख से डेढ़ लाख रूपये … गोल्ड फेसियल
३ )महिला का वजन ४० किलो से कम … पति करोडपति … डाएमंड फेसिअल


खैर ये तो हो गयी ज़माने की बात अब अपनी बात पर आते हैं |ऐसा नहीं है की हम शुरू से ही टुनटुन केटेगिरी को बिलोंग करते हो एक समय ऐसा भी था जब हमारी २२ इंची कमर को देख कर सखियाँ –सहेलियां रश्क किया करती थी अक्सर उलाहने मिलते “पतली कमर है,तिरछी नजर है श्रीमती बनने में थोड़ी कसर है ….. शादी भी हुई ,श्रीमती भी बने पर हमने अपने आप को अब तक मेन्टेन रखा |बढती उम्र इस कदर धोखा देगी ये हमने सोचा नहीं था …. ४० पार जब तन थक जाता है ,मन करता है जिंदगी की भाग –दौड़ के बीच अब कुछ पल आराम से गुज़ार लिए जाए , भाग –दौड़ को विराम देते हुए मन कहता है हर पल काम में लगे रहने से अच्छा है थोड़ी देर पॉपकॉर्न खाते हुए सास बहु के सीरीयल देखे जाए | पर विधि की कितनी विडम्बना है जब जब शरीर बार –बार सीढियां चढ़ने –उतरने से कतराने लगता है तो हारमोन नीचे ऊपर ,ऊपर –नीचे चढ़ना उतरना शुरू कर देते हैं और २४ इंची कमर को ३६ इंची बनते देर नहीं लगती |दुर्भाग्य से हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ |हमें अपनी सेहत की चिंता सताती इससे पहले पति को अपने स्टेटस सिम्बल की चिंता सताने लगी दोस्तों की नज़र में वो सीधे फेसियल की तीसरी श्रेणी से पहली में पहुच गए |उन्होंने हमे ईशारों में समझाने की बहुत कोशिश की पर हमने भी नज़र अंदाज़ किया “अब भला ये भी कोई उम्र है ईशारा समझने की , पति ने दिव्यास्त्र छोड़ते हुए करीना कपूर का बड़ा सा पोस्टर अपनी स्टडी टेबल के सामने लगा लिया ,हमने तब भी उदारवादी दृष्टिकोण अपनाया वैसे भी कौन सी करीना कपूर हमारे घर आई जा रही थी |पति ने फिर ब्रहमास्त्र छोड़ा ऑफिस से घर देर से आने लगे , हमारे लिए खरीदी जाने वाली साड़ियों ,बिंदी ,चूड़ी आदि में बिलकुल दिलचस्पी नहीं लेने लगे ,और तो और मोबाइल के बिल बेतहाशा बढ़ने लगे तो हमे खतरे की घंटी सुनाई देने लगी … हमने अपनी समस्या अपनी सखियों को सुनाई |हमारी सखियों ने इस समस्या का श्रेय हमारी कमर के घरे को देते हुए सर्वसम्मति से हमारे लिए डाईटिंग का प्रस्ताव पारित कर दिया |हमने भी आज्ञा का पालन करते हुए अगले दिन से डाईटिंग की शुरुआत की घोषणा कर दी | भोजन के चार्ट बनाये जाने लगे ….हमें अपने प्रिय चावल आलूको सबसे पहले टा –टा बाय बाय करना पड़ा , भोजन में तेल ,घी रिफाइंड दाल में नमक के बराबर रह गए , यहाँ तक तो गनीमत थी पर भोजन में शक्कर के चले जाने के कारण सब कुछ फीका व् बेरौनक लगने लगा |खैर हमने डाइटिंग की शुरुआत की …. सुबह –सुबह बिना शक्कर की चाय जैसे तैसे हलक से उतारी , नाश्ते में मुरमुरे से काम चलाया ,सारी दोपहर एक रोटी और दही पर कुर्बान कर दी …. पर कहते हैं न जिस चीज के बारे में न सोचना चाहो उसी के ख़याल आते हैं हमें भी सारे दिन खाने के ही ख़याल आते रहे कभी राज़ –कचौड़ी ,कभी रसगुल्ला कभी ईमरती ,हमारे दिवा स्वप्नों में आ –आ कर हमे सताने लगी |शाम तक हालत बहुत बिगड़ गयी और मन हल्का करने के लिए हम पड़ोस की रीता के घर चले गए |

समोसे और रसगुल्ले की खशबू ने हमारे नथुने फाड़ दिए |रीता ने चाय के साथ परोसते हुए कहा “इतने से कुछ नहीं होता वैसे भी अब तो तुम्हे रोज ही डाईटिंग करनी है ,एक दिन खाने से भी क्या फर्क पड़ता है “हमें भी बात सही लगी ,डाई टिंग तो रोज़ करनी है ,फिर हमने प्लेट भर चावल ,चाय की शक्कर,गेंहू की रोटी का तो त्याग किया ही है ये नन्हे –मुन्ने रसगुल्ले , समोसे हमारा क्या बिगाड़ लेंगे …. सच में इतने से कुछ नहीं होता ,सोच कर हमने सारे तकल्लुफ छोड़ दिए |अब तो हमारा रोज़ का नियम हो गया ,दिन भर खाने का त्याग और शाम को किसी सहेली के घर जा कर “इतने से कुछ नहीं होता के नियम पर चलना |करते –करते दो महीने बीत गए |हम बड़ी ख़ुशी –ख़ुशी वजन लेने वाली मशीन पर चढ़े …. अच्छे परिणाम की उम्मीद थी …पर ये क्या वज़न तो सीधे ६० से ७० पर पहुच गया |हमारी चीख निकल गयी |शाम को पतिदेव को रो रो कर सारा किस्सा सुनाया कि किस तरह हमारा सारा त्याग बेकार गया |लोग झूठ ही कहते हैं कि डाइटिंग से वजन घटता है ,हमारा तो उलटे बढ़ गया |पति हमारी तरफ देख कर गुस्से से बोलो ये डाईटिंग का नहीं डाई –ईटिंग का कमाल है दो दो बार खाओगी तो वज़न तो बढेगा ही | पति का स्टेटस न. एक फेसिअल से भी कम हो गया है ………….. फिलहाल पति किसी छोटे शहर में नौकरी ढूढ़ रहे हैं वहां जहाँ पत्नी का बढे वज़न से पति की सलेरी को नहीं आंका जाता और हम कैलोरी चार्ट बनाने में लगे हैं शायद अबकी बार ओनली डाईटिंग …. नो डाई –ईटिंग

वंदना बाजपेयी
कार्यकारी संपादक – अटूट बंधन
Share To:

atoot bandhan

Post A Comment:

0 comments so far,add yours