August 2016








मेरा मशवरा है यही  की तोड़ दो उसे 
जिस आईने में ऐब अपने दिखाई न दें 



कहती है मेरे साथ कब्र में भी जायेगी 
इतना प्यार करती है मुझसे तन्हाई मेरी







सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,
पर,कदम अपने कभी डगमगाए नहीं।
बदचलन है जमाने की चलती हवा,
इसलिए दीप हमने जलाए नहीं









जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है
अंधेरों से भी दोस्ती होने लगी है 
चमकते उजालों से लगता है डर
हर शमां वेबफा सी लगने लगी है 






ओमकार मणि त्रिपाठी
प्रधान संपादक – अटूट बंधन एवं सच का हौसला
जिस हृदय में विवेक का, विचार का दीपक जलता है वह हृदय मंदिर तुल्य है। विचार शून्य व्यक्ति, उचित अनुचित, हित-अहित का निर्णय नहीं कर सकता। विचारांध को स्वयं बांह्माड भी सुखी नहीं कर सकते। मानव जीवन ही ऐसा जीवन है, जिसमें विचार करने की क्षमता है, विचार मनुष्य की संपत्ति है। विचार का अर्थ केवल सोचना भर नहीं है, सोचने के आगे की प्रक्रिया है। विचार से सत्य-असत्य, हित-अहित का विश्लेषण करने की प्रवृत्ति बढती है। विचार जब मन में बार-बार उठता है और मन व संस्कारों को प्रभावित करता है


कला

तुम्हारा क्या … दिन भर घर में रहती हो … कोई काम धंधा तो है नहीं … यहाँ बक बक वहां बक बक … आराम ही आराम है … बस पड़े पड़े समय काटो । एक हम हैं दिन भर गधे की तरह काम करते रहते हैं ।

ये कहते हुए श्रीनाथ जी ऑफिस के लिए निकल गए 

अनन्या आँखों में आंसू लिए खड़ी रही । ज्यादा पढ़ी लिखी वो है नहीं,  घर के कामों के अलावा उसके पास जो भी समय होता कभी टीवी चला लेती कभी किसी को फ़ोन मिला लेती … आखिर समय तो काटना ही था ।
पर पति पढ़ा लिखा पुरुष है …. ऊंची पदवी , नाम , उसके पास समय का सर्वथा अभाव रहता है । जो थोड़ा बहुत समय मिलता भी है वह आने जाने वाले खा जाते हैं ।



अरे! तुमने ब्रा ऐसे ही खुले में सूखने को डाल दी?’ तौलिये से ढंको इसे। ऐसा एक मां अपनी 13-14 साल की बेटी को उलाहने के अंदाज में कहती है।
‘तुम्हारी ब्रा का स्ट्रैप दिख रहा है’, कहते हुए एक लड़की अपनी सहेली के कुर्ते को आगे खींचकर ब्रा का स्ट्रैप ढंक देती है।
‘सुनो! किसी को बताना मत कि तुम्हें पीरियड्स शुरू हो गए हैं।’
‘ढंग से दुपट्टा लो, इसे गले में क्यों लपेट रखा है?’
‘लड़की की फोटो साड़ी में भेजिएगा।‘
‘हमें अपने बेटे के लिए सुशील, गोरी, खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, घरेलू लड़की चाहिए।‘
‘नकद कितना देंगे? बारातियों के स्वागत में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।‘
‘दिन भर घर में रहती हो। काम क्या करती हो तुम? बाहर जाकर कमाना पड़े तो पता चले।‘
‘मैं नौकरी कर रहा हूं ना, तुम्हें बाहर खटने की क्या जरूरत? अच्छा, चलो ठीक है, घर में ब्यूटी पार्लर खोल लेना।‘




मेरे भैया मेरे चंदा मरे अनमोल रतन
तेरे बदले मैं ज़माने की कोई चीज न लूँ
                              रेडियो पर बहुत ही भावनात्मक मधुर गीत बज रहा है | गीत को सुन कर बहुत सारी भावनाऐ   मन में उमड़ आई | वो बचपन का प्यार ,लड़ना –झगड़ना ,रूठना मानना | भाई –बहन का प्यार ऐसा ही होता है |इस  एक रिश्ते में न जाने कितने रिश्ते समाये हैं ,बहन ,बहन तो है ही ,माँ भी है और दोस्त भी | तभी तो खट्टी –मीठी कितनी सारी यादें लेकर बहने ससुराल विदा होते समय भाइयों से ये वादा लेना नहीं भूलती कि “भैया साल भर मौका मिले न मिले पर रक्षा बंधन के दिन मुझसे मिलने जरूर आना , और भाई भी अश्रुपूरित नेत्रों से हामी बहर कर बहन को विदा कर देता | दूर –दूर रहते हुए भी निश्छल प्रेम की एक सरस्वती दोनों के बीच बहती रहती ,और ये पावन  रिश्ता सदा हरा भरा रहता है |


रक्षा बंधन -भाई बहन के प्यार पर हावी बाज़ार


    अपने बचपन को याद करती हूँ तो माँ साल भर रक्षा बंधन का इंतज़ार किया करती थी | फिर खुद ही रेशमी धागों से कुछ  कपड़ों की कतरनों से काट –काटकर सुन्दर राखियाँ तैयार किया करती थी | हमें भी वो ये पकड़ा देती और हम भी ग्लेज़ पेपर , ग्रीटिंग कार्ड से निकाले गए सितारे व् धागों से राखियाँ बनाते | जब हम ये बनाते तो माँ अक्सर गुनगुनाया करती “ अबकी बरस भेज भैया को बाबुल सावन में लेजो बुलाय | “ राखी के महीने भर पहले से यानी सावन की शुरुआत से ही राखी के कपडे ,घर में तैयार करने वाली राखी ,और इस बार मामा के आने पर क्या बनेगा की चर्चा से बाहर सावन से धरती भीगती और अन्दर मन भाई के प्रेम से भीगता | मामा के आने पर लगता ठहाकों का दौर |  शगुन की मीठी  सेवईयों से रिश्ते की मिठास बढ़ जाती | एक –एक पकवान माँ हाथ से बनाती | हर राखी का धागा भाई बहन के  इस रिश्ते को और मजबूत कर देता |


समय बदला हर त्यौहार की तरह रक्षा बंधन को भी बाजारवाद ने अपनी गिरफ्त में ले लिया | जिस तरह से दीपावली पर  बल्बों की झालरों की बेतहाशा रौशनी भी दिये  की सात्विकता का मुकाबला नहीं कर सकती उसी तरह ये डिजायनर राखियाँ भी हाथ की बनायी राखियों के प्रेम भाव का मुकाबला नहीं कर पाती | सावन  की शुरुआत  से ही बाज़ार  चायनीज राखियों से सज जाते हैं | एक दूसरे की देखा –देखी अपने –अपने भाई को महंगी और महँगी राखी बंधने की होड़ लग जाती |  सलमा सितारे लगी राखी ,नोट लगी राखी , चांदी  के सिक्के लगी राखी , हीरे पन्ने की राखी हर तरह की राखियाँ  उपलब्ध हैं | एक मन में प्रश्न उपजता है ज्यादा महंगी राखी  या  ज्यादा प्रेम  का प्रदर्शन | या ये सात्विक  प्रेम भी अब बाज़ारों में बिकने लगा है ,उसकी भी कीमत होने लगी है जितना भुगतान उतना ऊंचा प्रेम का पायदान |

            बहन त्यौहार के दिन रसोई में न उलझी रहे बाज़ार ने इसकी पूरी व्यवस्था की है | तमाम  तरह के नमकीन मीठे ,बने बनाये डिब्बे अलग –अलग कम्पनियों ने अलग –अलग नामों से बाज़ार में उतार  दिए हैं | खोये की मिलावट के भय ने चॉकलेट  के सेलेब्रेशन के गिफ्ट पैकिटों पर चांदी बरसा दी है | बहन का हाथ से सेवैया बना कर भाई का इंतज़ार करना बेमानी सा लगता है | बाज़ार में बिकते खूबसूरत कार्ड अपनी तराशी हुई शब्दावली के कारण बहन द्वारा पोस्टकार्ड पर लिखे चार अनगढ़ से शब्दों और अंत में लिखी दो  लाइनों “ भैया थोड़े को कम समझना राखी पर जरूर आना को विजयी भाव से मुंह चिढाते हुए प्रतीत होते हैं |


        भाई भी कहाँ कम हैं .......... भले ही राखी बाँधने आई बहन को भाई २ मिनट का वक्त न दे “ जल्दी राखी बांधों मुझे तुम्हारी भाभी को ले कर ससुराल जाना है कहकर बहन का सारा उत्साह ठंडा कर दे पर एक बढ़िया सा गिफ्ट बहन के लिए जरूर तैयार होगा |दूसरे शहर में रहने वाली बहन बरसों भाई के आगमन की प्रतीक्षा करती रहे पर नौ की लकड़ी नब्बे खर्च के सिद्धांत पर चलते हुए भाई गिफ्ट आइटम भेजना खुद जाने से कहीं बेहतर समझने लगे हैं | सही भी है बहन को देने के लिए गिफ्ट पैक करे हुए आइटम्स भी बाज़ार में उपलब्ध  जो हैं | जाइए अपने बजट  के हिसाब  से खरीदिये और  गिफ्ट करिए  भले ही इन रगीन कागजों  के नीचे भाई बहन के प्रेम का दम घुट रहा हो |

             आजकल पैकेजिंग का जमाना है ......... ठीक वैसे ही जैसे मेक अप की बनावटी परतों  के नीचे असली  चेहरा छिप जाता है वैसे ही  इस गिफ्ट कल्चर में रिश्तों में भावनाओं की कमी छिप जाती है | आज सेलिब्रेशन का जमाना है हम बात –बात में सेलिब्रेट करते हैं , बर्थ डे ,होली ,दिवाली ,ईद ,दशहरा कोई त्यौहार इनसे छूटा  नहीं है| उस पर व्यक्ति गत सेलिब्रेशन “ यार तेरी नयी गाडी , नया पर्स , बेटे का सेलेक्शन , बेटी का स्टेज पर गायन चल सेलिब्रेट करते हैं “| सेलिब्रेशन के नाम पर वही खाना –पीना मौज मस्ती  रंगीन –कागजों में लिपटे गिफ्ट का लेंन –देन | पाश्चात्य सभ्यता ने जहाँ हमें जिंदादिल रहने के लिए सेलिब्रेट करना सिखाया है वही बात बात पर सेलिब्रेट करने के कारण  ये सारा सेलिब्रेशन मशीनी लगने लगा है | हंसी –मजाक गिफ्ट्स का लेंन  देन  सब सब में मोनोटोनी (एक रूपकता )  लगने लगी  है |

       ये सच है कि भारत पर्वों का देश है पर हर पर्व को मनाने के तरीके , उसमें बनाये जाने वाले व्यंजन ,उसमें होने वाली पूजा भिन्न होती थी | इसलिए हर त्यौहार का सभी को साल भर इंतज़ार रहता था | अब हर त्यौहार में  महिलाओ का ब्यूटी पार्लर में एक तरीके से सजना ........ सावन की हरी व् करवा चौथ की लाल चूड़ियों का मजा फीका कर देता  है | हर त्यौहार में चॉकलेट  ,केक महंगे गिफ्ट्स जैसे कुछ अंतर रह ही नहीं गया है | मेरा अपना मानना है कि हमारे  देश में कई त्यौहार इसलिए बनाए  गए कि उस रिश्ते को और उससे जुडी भावनाओं को हम सम्मान दे सके चाहे वो पति –पत्नी  के प्रेम का प्रतीक   करवा चौथ हो या  माता और पुत्र के  प्रेम का प्रतीक  अहोई अष्टमी या भाई बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षा बंधन हो | ये त्यौहार रिश्तों में प्यार को बढाते हैं | इनको मनाने की अपनी सात्विक परंपरा है |जिसका एक अलग आनंद  भी है |

              भाई –बहन के बीच प्यार सदा से था है और रहेगा |ये भी सच है कि जमाना बदला है और हमें नए ज़माने के साथ चलना भी होगा  पर कहीं ऐसा न हो कि गिफ्ट की कीमत आंकलन  , बाज़ार की मिठाइयाँ , शानोशौकत का दिखावा प्रेम भरे रिश्तों पर भारी न पड  जाए | बाज़ार की चमक को घर लाते समय हमें यह ध्यान रखना होगा कि यह हमारे रिश्तों की चमक को फीका न कर दे |

वंदना  बाजपेयी 




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राधा आटा गूंधते गूंधते बडबडा रही थी " पता नहीं क्या ज्योतिष पढ रखी है इस आदमी ने हर बात झट से मान जाता है । उसका भी मन करता है रूठने का , और फिर थोडी नानुकुर के बाद मान जाने का । अभी कल कहा सर में दर्द है तो फौरन से झाडू पौंछा बरतन सब करके बैठ गया सर दबाने आराम पाकर थोड़ा आंखें क्या बंद की लगा पैर दबाने । पता नहीं इस आदमी में स्वाभिमान नाम की कोई चीज है कि नहीं । पिताजी ने न जाने किस लल्लू को पल्लू में बांध दिया । " 
तभी आहट हुई तो देखा विनोद बेसिन पर हाथ धो रहे थे । उसने पूछा " सब्जी नहीं लाये क्या । "
विनोद झुंझलाकर बाहर की तरफ जाते हुए बोला " जोरू का गुलाम समझ रखा है क्या , सामने सडक पर तो मिलती है खुद क्यों नहीं ले आती । " 

कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,


मन के दबे से दर्द जगाने
फिर से बैरी सावन आया।
सूना आँगन सूनी बगिया
माना नहीं है कोई घर में
यादें कहती मुझे बुलाकर
हम भी तो रहती हैं घर में


मीना कुमारी -एक दर्द भरी ग़ज़ल

चिंदी चिंदी दिन मिला , तन्हाँ तनहा रात मिली
जितना जिसका आँचल था , उतनी उसको सौगात मिली 


मीना कुमारी के ये शब्द महज़ शब्द नहीं हैं |ये उनके जीवन की दर्द भरी दास्ताँ है | हर दिल अजीज ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी का जीवन सच्चे प्यार के लिए तरसती एक ऐसे ग़ज़ल बन कर रह गया जिसको गा सकना उनके लिए भी संभव नहीं रह सका | तभी तो उसकी अदाकारी के तमाम चाहने वालों के होते हुए भी नाम और शोहरत के आसमान पर बैठी एक उदास और वीरान जिंदगी अपने मन के आकाश की रिक्तता को समेटे महज ४० वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह कर चली गयी |जब भी मैं मीना कुमारी के बारे में सोंचती हूँ तो मुझे याद आती है दिल एक मंदिर में पति और प्रेमी के बीच झूलती मासूम स्त्री , कभी औलाद और पति के प्रेम के लिए तडपती ” साहब बीबी और गुलाम की छोटी बहू तो कभी दूसरे की संतान पर ममता लुटाती ” चिराग कहाँ , रौशनी कहाँ की नायिका | पर मेरी सुई अटक जाती है उस पाकीजा पर जो गाती है , ” ये चिराग बुझ रहे हैं , मेरे साथ जलते -जलते ……….. बुझते हुए चिरागों के साथ बुझती हुई मीना कुमारी की हर अदाकारी बेहतरीन है | क्योंकि कहीं न कहीं ये सारे पात्र उनकी जिंदगी का हिस्सा हैं |चलो दिलदार चलो , चाँद के पार चलो गाने वाली मीना कुमारी न जाने कौन सा चाँद पाने की आरज़ू लिए चाँद के पार चली गयी | इसके लिए मीना के इर्दगिर्द कुछ रिश्तेदार, कुछ चाहने वाले और कुछ उनकी दौलत पर नजर गढ़ाए वे लोग हैं, जिन्हें ट्रेजेडी क्वीन की अकाल मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है