अपनों की पहचान बुरे समय में नहीं अच्छे समय में भी होती है

आम तौर पर यही माना जाता है कि जो बुरे वक्त में विपदा के समय साथ दे,वही सच्चा मित्र या हितैषी होता है.यह बात कुछ हद तक सही भी है,लेकिन ...


आम तौर पर यही माना जाता है कि जो बुरे वक्त में विपदा के समय साथ दे,वही सच्चा मित्र या हितैषी होता है.यह बात कुछ हद तक सही भी है,लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है.कई बार ऐसा भी होता है कि जब आप परेशान या दुखी होते हैं,तो लोग सहानुभूतिवश भी आपके साथ खड़े हो जाते हैं.कई बार तो ऐसा भी होता है कि आपको सख्त रूप से नापसंद करने वाले लोग भी बुरे समय में आपके साथ सहानुभूति जताने लगते हैं,लेकिन जैसे ही आपका बुरा समय दूर हुआ और अच्छा समय आने लगा ,तो वही लोग फिर विरोध का झंडा उठा लेते हैं.

आपने अक्सर देखा होगा कि राह चलते किसी के साथ कोई दुर्घटना हो जाये,तो कुछेक लोगो को छोड़कर उस रास्ते से गुजर रहे लगभग सभी लोगो उसकी सहायता के लिए आगे आ जाते हैं और जिससे जितना संभव हो पाता है,वह उतनी मदद बिना कहे करता है.कोई बीमार हो जाये,कोई दुर्घटनाग्रस्त हो जाये,कोई किसी आपदा का शिकार हो जाये या किसी के घर पर मौत का मातम हो,तो उसके साथ सहानुभूति जताने वालो की कमी नहीं होती.लोग कुछ मदद करे या न करें,सहानुभूति तो जता ही देते हैं.सिर्फ परिचित ही नहीं ,अपरिचित लोग भी पुण्य या यश कमाने के लिए दुखी लोगो की मदद के लिए आगे आ जाते हैं
अब जरा तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये.कोई प्रगति की राह पर चलने लगा,किसी ने कोई सफलता हासिल कर ली,किसी पर सुखो की बरसात होने लगी,तो अपने होने का दावा करने वाले ज्यादातर लोग उससे दूर होने लगते हैं.कुछ तो मन ही मन और कुछ सार्वजनिक तौर पर उसकी निंदा या आलोचना शुरू कर देते हैं.ऐसे में सहयोग की बात तो दूर है,ज्यादातर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से असहयोग करना शुरू कर देते हैं.इसका मुख्य कारण ईर्ष्या होती है,जिसका मूल आधार यह भाव होता है कि जो हम नहीं कर सके,वह इसने कैसे कर लिया या जिसके लिए हम रात दिन प्रयास करते रहे,जिसके सपने देखते रहे,वह इसे कैसे मिल गया.इर्ष्य एक मानसिक विकार है। यह विकार इतना तीव्र और खतरनाक होता है कि व्यक्ति अपना विवेक भी खो लेता है।
यह एक ऐसा रोग है जो दूसरों के लिये तो हानिकारक है ही, स्वयं के लिये भी खतरनाक है। ईर्ष्याभाव एक विष है जो तन और मन दोनों को नष्ट कर देता है। ईर्ष्यालु व्यक्ति को पर निन्दा में सुख की अनुमति होने लगती है.हिन्दू जीवन दृष्टि में ईर्ष्या और द्वेष जैसे तत्त्वों को राक्षसी दोषों में रखा गया है।
इसीलिए कभी –कभी सफलता मिलने के बाद आप अपने को बिलकुल अकेले खड़ा पाते है आप को लगता है की आपने सफलता के लिए अपनों का प्यार खो कर भारी कीमत चुकाई है और अपनी सफलता की ख़ुशी नहीं मना पाते |यह सच है की चोटी पर आदमी अकेला होता है पर उसे अपनों के प्यार और सहारे की सदैव आवश्यकता होती है और सफलता मिलने के पश्चात अचानक से उन लोगों का साथ छोड़ देना जो आपके सपने देखने के समय उसके भागीदार थे मन को अजीब निराशा से भर देता है |
मानव मन की इस गुत्थी को समझने के लिए आप को मन कड़ा कर के अपनी सफलता व् खुशियों को अपनों के सच्चे स्नेह के एक लिटमस टेस्ट की तरह समझना चाहिए अच्छे समय में ही अपनों की सही पहचान होती है.दुःख के समय दुखी होने वाले ,सहानुभूति जताने वाले तो आसानी से मिल जाते हैं ,लेकिन आपके सुख से सुखी होने वाले,आपकी खुशिओ से खुश होने वाले बहुत मुश्किल से मिलते हैं और यही लोग आपके सच्चे हितैषी होते हैं. आपकी खुशियों में खुश होने वाले ही वास्तव में आप से निस्वार्थ प्रेम करते हैं जो दुःख –सुख में एक सामान हैं एक कहावत है कि हर पिता अपने बेटे से हारना चाहता है क्योंकि पिता का अपने पुत्र के प्रति निस्वार्थ प्रेम होता है |जो वास्तव में सच्चा प्रेम रखते हैं वह हर सफलता व् ख़ुशी में ख़ुशी व् संतोष का अनुभव करते हैं ,और लिटमस परीक्षा में पास हो जाते हैं |जो निकट सम्बन्धी इस परिक्षण में पास नहीं हो पाते उनके लिए आप को समझ लेना चाहिए की वो केवल निराशा की अवस्था में सहानभूति दिखा कर हीरो बनना चाहते थे |ऐसे रिश्तों के खोने पर दुःख नहीं करना चाहिए अपितु ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि आप को सफलता मिलने पर अपने निकट के रिश्तों के भावों के सही उद्देश्य की पहचान हो गयी
तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि सफलता के साथ बहुत से ऐसे लोग भी जुड़ जाते हैं,जिनका किसी न किसी तरह का स्वार्थ होता है , इस दशा में आपको अपने को अचानक से अकेलापन महसूस कर उन लोगों से भावनात्मक रिश्ते नहीं बना लेने चाहिए अन्यथा बार –बार पछताना पड़ता है|यह सही है कि रिश्ते दिल से बनते हैं पर अगर विवेक से काम लेंगे तो निराशा में नहीं डूबना पड़ेगा | अपने सफलता के पथ पर आगे बढे तो आप देखेंगे देर सवेर सिर्फ और सिर्फ वही साथ रह जाते हैं ,जो आपको सच्चे मन से चाहते थे और आपको सफल और खुश देंखना चाहते थे. जिनके लिए आपकी हँसी से मिलने वाली ख़ुशी बेशक़ीमती होती है,अनमोल सी लगती है. जो आपकी ख़ुशी में अपनी ख़ुशी देखते और तलाशते हैं,जिनके पास आपकी ख़ुशी को समेटने वाला मन और दामन होता है.जिनका प्यार, अपनापन, परवाह और मासूमियत अपने आप दस्तक देती है. कुछ लम्हों के लिए ठहरती है. बातें करती है.
हाल-चाल पूछती है. ख़ामोशी से अपनी बात कहती है. सामने वाले को उसकी आवाज़ में सुनती है और अपनी राह चल देती है. वही आपके सच्चे हितैषी होते हैं.ये लोग दुःख में सहानुभूति जताने के आकांक्षी नहीं होते,क्योंकि ये वो लोग होते हैं,जो आपको दुखी देखना ही नहीं चाहते,बल्कि हर समय आपकी सफलता और आपके चेहरे पर खिली हुई मुस्कराहट की कामना करते हैं.ऐसे रिश्ते अनमोल होते हैं इन्हें हर हालत में बचा कर रखिये

ओमकार मणि त्रिपाठी – प्रधान संपादक अटूट बंधन एवं सच का हौसला

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अटूट बंधन : अपनों की पहचान बुरे समय में नहीं अच्छे समय में भी होती है
अपनों की पहचान बुरे समय में नहीं अच्छे समय में भी होती है
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