आखिरी भूल

लाख कोशिशों के बाद भी माधवी स्वयं को संयत नहीं कर पा रही थी, मन की उद्विग्नता चरम पर थी l जाते हुए जेठ की प्रचण्ड तपन लहुलुहान मन की पीड़...




लाख कोशिशों के बाद भी माधवी स्वयं को संयत नहीं कर पा रही थी, मन की उद्विग्नता चरम पर थी l जाते हुए जेठ की प्रचण्ड तपन लहुलुहान मन की पीड़ा से एकाकार होकर जैसे आज जीते जी उसे जला देना चाहते थे l शाम के सात बजने वाले थे पर बाहर दिशाओं में हलकी उजास अब तक कायम थी, यह उजास जैसे माधवी की आँखों में, बदन में शोलों की तरह चुभने लगा l वह छुप जाना चाहती थी, अँधेरे में कहीं गुम हो जाना चाहती थी, घर परिवार समाज सबकी नज़रों से दूर, यहाँ तक कि अपने आप से भी दूर … ओझल हो जाना चाहती थी l
दोनों बच्चे पढ़ रहे थे, सास-ससुर ड्राइंग रूम में टीवी देख रहे थे, वह किचेन में खाना बना रही थी पर हाथों के कम्पन से आज सारे काम हीं गलत हुए जा रहे थे l माँ का चेहरा और बातें ज़ेहन से हट हीं नहीं रही थी … विचारों के कश्मकश और रसोईघर के धुएँ में उसका दम घुटने लगा … पसीने में तरबतर हुई वह हाँफती हुई किचन से निकलकर आँगन में आ गयी l ग्रीष्म का ताप पूरे आँगन में पसरा हुआ था … कुछ देर आँगन में ठहरकर जीने की ओर बढ़ी और काँपते पैरों को बमुश्किल सीढ़ियों पर ज़माते हुए वह ऊपर छत पर आ गई l उत्तर की आकाश से सुरमई बादलों का झुंड घनीभूत होते हुए आगे बढ़ रहा था, मतवाले सांवले बादलों की यह सघनता कभी उसे सम्मोहित कर लिया करती थी पर आज इन्होंने मन की बेचैनी और बढ़ा दी माधवी रेलिंग से सटकर खड़ी हो गई … निगाहें अपने आप हरे रंग के दोमंज़िले मकान की ओर मुड़ गई, कलात्मक ढंग से बनी बाल्कनी में गहराते धुँधलके के बीच भी नर्म सी परछाईं को अपनी तरफ ताकते हुए उसने महसूस किया … माधवी ने आँखें फेर ली l अँधेरा धीरे-धीरे साम्राज्य बढ़ाने लगा था … उसका खुद का जीवन भी तो एक गहराते अँधेरे का अकथ दुःस्वप्न हीं बन कर रह गया था .. दीर्घ निःश्वास के संग अतीत की स्मृतियों में माधवी भटकने लगी l पिता का प्रभावशाली चेहरा, शान्त स्निग्ध आँखों से बेटी के लिए निरन्तर झरता स्नेह, माँ की लाड-भरी बोली, भाईयों संग नोंक झोंक …. सब चलचित्र की भांति विचारों में जीवन्त हो उठे l दो भाईयों की इकलौती बहन पूरे दिन घर में चिड़िया की तरह चहचहाती रहती l पिता के प्राण बसते थे बेटी में … बचा खुचा स्नेह हीं दोनों भाईयों को मिल पाता था l दोनों भाई जहाँ गेहुएँ रंग और सामान्य शक्ल सूरत के थे वहीँ माधवी के ऊपर विधाता ने जैसे दोनों हाथों से खुलकर सौन्दर्य का पारितोषिक लुटाया था … स्वच्छ धुले स्वर्णचम्पा-सा गौर वर्ण, तीखे नयन नक्श और सबसे गज़ब तिलस्मी बादामी आँखें जो हर किसी की निगाहों को बाँध लेते थे … अनुपम सौन्दर्यशालिनी , नटखट बिटिया की एक-एक चपलता पर पिता सौ-सौ लाड़ जताते … जब बेटी को स्कूल भेजने की बात आई तो पिता ने शहर के मंहगें कॉन्वेंटो के फीस पता करने शुरू किए, काफी दौड़ धूप के बाद आखिरकार शहर के एक ढ़ेरों चोंचले वाले मंहगें कॉन्वेंट में माधवी को दाखिल कराया गया जबकि दोनों भाई सामान्य स्कूलों में पढाई के लिए भेजे गए l बढे हुए खर्च को पूरा करने के लिए माधवी के पिता को अब दिन-रात मेहनत करनी पड़ती थी l खेती के काम के अलावा अब वह ठेकेदारी के काम भी देखने लगा था l काम की व्यस्तता के बीच भी सुबह 4.30 पर बेटी को स्कूल की बस तक छोड़ने के बाद दोपहर को बाईक से लेने आता … घर से स्कूल की बस तक पहुँचने में आधे घन्टे लग जाते थे l 9वीं कक्षा तक आते-आते माधवी खुद भी कभी-कभी घर आ जाती l
वायु में एक अमंगल-सी सनसनाहट थी उस दिन जब ऐसे हीं अकेली माधवी अपनी धुन में स्कूल से घर की ओर जा रही थी, एकाएक एक बाईक सर्राटे से उसकी बगल से गुज़रा … बाईक इतने करीब से गुज़रा था कि माधवी गिरते-गिरते बची … सहमकर वह सड़क के किनारे से होकर जल्दी-जल्दी चलने लगी, तभी पीछे से कुछ आवाजें आने पर उसने मुड़कर देखा … बाईक नीचे गिरी हुई थी और उस अभद्र बाईक सवार को कॉलर से पकड़ कर कोई धकिया रहा था … यह नीलेश था जो पहले माधवी के स्कूल में हीं पढ़ता था पर पिता के अकस्मात् अस्वस्थता के कारण उसे अपने स्कूल की पढाई बीच में हीं छोड़कर पिता के कारोबार का काम संभालना पड़ा था l इस घटना के बाद से माधवी ने गौर किया कि अब वह जब भी अकेली घर जा रही होती तो नीलेश बाईक से चक्कर लगाते हुए उसके पीछे-पीछे आता और जब वह घर पहुँच जाती तो वापस लौट जाता l दो-एक महीने बाद माधवी ने महसूस किया कि सामने वाले घर की खिड़कियों से दो आँखें निरन्तर उसे हीं देख रहीं हैं … पता नहीं कब और क्यों नीलेश ने सामने वाले घर में एक कमरा ले लिया था l माधवी के मन में एक अज़ीब असुविधा की सी स्थिति उत्पन्न हुई l नीलेश अच्छी कद काठी का एक आकर्षक युवक था, गिटार बजाने के अलावा वह शब्दों की बाज़ीगरी में भी माहिर था l दिलकश शब्दों को पुर्जों पर लिखकर मौका देखकर माधवी को समर्पित किए जाते … धीरे-धीरे मासूम सुनयना को भी यह सब अच्छा लगने लगा l माधवी का ध्यान अब पढने लिखने में कम लगता, निगाहें नीलेश को हीं ढूँढती … इधर चार-पाँच दिनों से नीलेश का कहीं अता-पता नहीं था, माधवी को चिन्ता हुई … छठे दिन नीलेश दिखा उसका चेहरा उतरा हुआ था, उसने जो कुछ बताया उसे सुनकर माधवी परेशान हो उठी l माधवी के दोनों भाईयों ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर हॉकी स्टिक से नीलेश की पिटाई की थी, साथ हीं उसे उस कमरे भी निकलवा दिया था जिसे कितने जुगाड़ लगाकर छः महीने के एडवांस पैसे जमा कराने के बाद वह हासिल कर पाया था l घर में माता-पिता नीलेश की हालत देख कर बहुत परेशान हैं, यह सब कहते हुए नीलेश की आँखों में आँसू आ गए l उसने माधवी को अपने चोटों के निशान दिखाए और कहा कि उन्होंने मुझे धमकी दी है कि अगर मैं आईन्दा तुम्हारे आस-पास भी फटका तो वे मुझे जान से मार देंगे l माधवी भाइयों की करतूत सुनकर लज्जित हो गयी … नीलेश क्षणभर के लिए चुप रहा फिर सर झुका कर बोला – तुम्हें देखने के बाद से मैंने दिन-रात बस एक हीं सपना देखा था कि तुमसे ब्याह करके तुम्हें जीवन के सारे सुख दूँगा पर मैं यह भूल गया था कि कहाँ तुम ब्राह्मणों की बेटी और मैं छोटी जातियों का लड़का .. आह ! मेरी जाति मेरे प्रेम के लिए बेड़ी बन गई … पर अगर मैं दलित का लड़का हूँ तो इसमें मेरा क्या कुसूर है मधु .. लाचार आँखों से माधवी की तरफ ताक कर वह बोला – अब शायद जीवन में कभी मुलाक़ात न हो और लंगड़ाते हुए मुड़कर जाने लगा, माधवी तड़प उठी … नीलेश वापस मुड़ा, तुम्हारे बगैर जीने से तो मौत बेहतर है, पर मैं जीना चाहता हूँ … अगर तुम चाहो तो इस मृतप्राय इंसान को जीवनदान दे सकती हो .. क्या तुम मेरे साथ चलोगी मधु ? मैं वादा करता हूँ उस घर में तुम्हें कभी कोई तकलीफ नहीं होगी … अपनी जान से भी ज्यादा हिफाज़त से तुम्हें रखूँगा l आँखों में भृत्य की सी याचना लिए वह माधवी की ओर देखने लगा … हम आज हीं शादी कर लेंगे … पता नहीं क्या हुआ माधवी एक पल में पिता का प्यार माँ की ममता और भाईयों का दुलार भूल गई … जन्म के सारे हीं बन्धनों को तोड़ कर वह उसी क्षण नीलेश के साथ चल पड़ीं l माधवी के इस कृत्य से घर पर जो कोहराम मचा वह विवरण से परे है l मैया सर पकड़कर बैठ गईं, दोनों भाईयों ने कहा – हम अभी जाकर उस दुर्जन लड़के के हाथ-पैर तोड़कर और माधवी को खींचकर लेकर आते हैं पर आघात से पीले पड़े पिता ने हाथ ऊपर कर लड़कों को जाने से रोक दिया, कहा – इस घर का कोई भी सदस्य कभी भी उस लड़की से मिलने नहीं जाएगा l उस लड़की ने मेरे भरोसे को छला है आज से वह हमारे लिए मर गई … मैंने उसका श्राद्ध कर दिया कहकर आहत ब्राह्मण पिता ने अपना जनेऊ तोड़कर फेंक दिया l घर की प्रेम-सींची दीवारें थर्रा कर कराह उठी, माँ के गले में एक सिसकी टूट कर रह गई … उस दिन के बाद से दुबारा किसी ने उस घर में माधवी का नाम नहीं लिया l
समय साल दर साल गुज़रता चला गया, माधवी एक बेटी और एक बेटे की माँ बन गई l परिवार बढ़ा तो आमदनी बढ़ाने के लिए नीलेश ने कारोबार बढ़ाना शुरू किया … बिजनेस बढ़ने के बाद अब उसे काम के सिलसिले में दूसरे शहरों में भी जाना पड़ता और कभीकभार दो-चार दिन उधर हीं रुकना भी पड़ता था l दूसरी तरफ बेटे के जन्म के बाद से माधवी का स्वास्थ्य ख़राब चल रहा था और उसे नीलेश की बहुत ज़रूरत महसूस होती थी l उसने कितनी बार लगभग गिड़गिड़ाते हुए नीलेश से कहा कि, कुछ दिन की छुट्टी कर लो, दो-चार दिन साथ में रहो, किसी अच्छे डॉक्टर से दिखवा दो l लेकिन नीलेश यह सब सुनकर चिढ़ जाता l नीलेश के बदलते व्यवहार से माधवी क्षुब्ध थी l माधवी ने गौर किया कि वह बदल गया है … पैसे कमाकर ला देने भर को हीं अपने कर्तव्य की इतिश्री समझने लगा है l उसका चिढ़ा हुआ रुख़ और रूखा व्यवहार देखकर माधवी अपना-सा मुँह लेकर रह जाती l इधर से माधवी का मन बहुत घबड़ाने लगा था पर कहती किससे … माँ बाप ने पहले हीं सारे सम्बन्ध तोड़ लिए थे, सास-ससुर को केवल उस से कामभर मतलब था, अड़ोस-पड़ोस में किसी से भी सुख दुःख साझा करने का रिश्ता नहीं बन सका था l अड़ोस-पड़ोस के पुरुष उसकी ओर अर्थपूर्ण दबी मुस्कान से देखते तो स्त्रियाँ उसके रूप से ईष्या करती और चरित्र पर संदेह l छोटे शहर के सारे मोहल्ले वाले उसके घर से भाग कर विजातीय लड़के के साथ शादी करने की बात जानते थे और माधवी के चाल-चलन को अच्छा नहीं समझते थे l शुरुआत में तो सास ने बेटे की ख़ुशी के लिए कुछ दिन बहू से लाड़ जताया था पर बाद में बीमार और अपाहिज ससुर की सेवा-टहल समेत गृहस्थी के सारे हीं कामकाज माधवी के कमजोर कन्धों पर डालकर वह भी हुक्म चलाने और टीवी देखने तक हीं अपना कर्तव्य समझने लगी थी l सभी अपनी-अपनी दुनिया में मग्न थे, धीरे-धीरे करके अब तो नीलेश पूरे महीने घर नहीं आता l उसे माधवी की शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक ज़रूरतों की जैसे कोई परवाह हीं नहीं बची थी l काम के अत्यधिक बोझ, बीमारी और निरन्तर चलते अन्तर्द्वंद की वजह से माधवी का परियों-सा रूप कुम्भलाकर ढल गया था तो उधर नीलेश जो कि देखने में शुरू से हीं अच्छा था अब बढ़ती कमाई से उसके चेहरे पर लालिमा भी बढ़ने लगी थी l घर पर माधवी के हाथों का बना शाकाहारी खाना अब एक दिन के लिए भी उसके गले के नीचे नहीं उतरता था l पहले पीने का केवल शौक था पर अब आदत हो गई थी … यहाँ तक भी गनीमत थी पर इस दूसरे शहर में नीलेश जब काम पर निकलता उसी वक़्त पड़ोस की लड़की भी ऑफिस के लिए निकलती थी, धीरे-धीरे औपचारिक दुआ-सलाम के बाद एक दिन नीलेश ने उसे अपनी कार में ऑफिस तक छोड़ने का प्रस्ताव रखा जिसे थोड़े ना-नुकुर के बाद लड़की ने स्वीकार कर लिया l लड़की का नाम सुषमा था और उसके परिवार में माँ के अतिरिक्त कोई नहीं था l सुषमा की कमाई और माँ के रिटायर्मेंट के पैसों से हीं घर चलता था l पता नहीं कब पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर सुषमा को ऑफिस ले जाना और फिर ऑफिस से घर लाना नीलेश की पहली प्राथमिकता बन गई l उसने एक बार फिर से वही दांव खेला और अपने लफ्फाजीभरे शब्दों के अभेद्य वाण चलाकर सुषमा का ह्रदय भी कब्ज़े में कर लिया l एक दिन माँ और एक अन्य परिजन की उपस्थिति में सुषमा और नीलेश ने मंदिर में विवाह कर लिया l
घर के कामों में कोल्हू के बैल-सी पिसती माधवी को इन सब बातों की भनक तक न पड़ी पर माधवी की माँ तक कहीं से उड़ते-उड़ते इस बात की खबर जा पहुँची l बेटी के कृत्य ने माँ के ह्रदय को गहरी पीड़ा ज़रूर पहुँचाई थी पर इस खबर को जानकार मंजू का मन व्याकुल हो उठा l माधवी के पिता और भाई उसका नाम तक सुनना नहीं चाहते थे सो माँ ने चुपचाप अकेले हीं बेटी से मिलने का फैसला किया l किसी तरह नीलेश के घर का पता करके वह बेटी से मिलने पहुँची l दरवाज़ा माधवी ने हीं खोला, इतने बरसों में जीवन के इतने उतार-चढ़ाव गिनने के बाद अब वह वो माधवी नहीं रह गयी थी l मुरझाया मलिन-सा रूप और डार्क सर्कल से घिरी बुझी हुई बादामी आँखें तन-मन की अतृप्त व्यथा कथा को अपनी मूक भाषा में बयान कर रहे थे l माँ का कलेज़ा तड़प उठा, बेटी का हाथ पकड़कर बगल के मंदिर पर ले गई … निरन्तर बहते आँसुओं की धाराओं के बीच बातचीत होती रही, सबकुछ कह सुनकर मंजू के होंठ घृणा और वितृष्णा से उस दुराचारी को श्राप देने के लिए खुले पर कुछ अस्फुट सा मुँह में हीं घुटकर रह गया l आह ! उसकी पुत्री ने कच्ची उम्र की भावनाओं में बहकर स्वयं हीं अपने लिए कुपात्र का चयन करके अपना और अपने निर्दोष बच्चों का जीवन भी बरबाद कर लिया था l मंजू को याद आया पहले जब नन्हीं-सी माधवी को लेकर मायके जाती तो साथ की सहेलियाँ कहती, आहा ! कितनी सुन्दर है री मंजू तुम्हारी बिटिया इसे मैं अभी हीं अपने बिटवा के लिए छेक ले रही हूँ, बाद में मुकर मत जाना और मंजू गर्व से बेटी की ओर देखकर हँस देती … इसका ब्याह ऐसे थोड़े न करेंगे, इसका बाबा इसे पढ़ा-लिखा कर डॉक्टर बनाना चाहता है … एक गहरी निःश्वास गले से निकली … माँ के जाने के बाद मंदिर से लौटकर घर आई तो पैर सौ-सौ मन के हो रहे थे, किसी तरह आधा-अधूरा खाना बनाकर रख दिया और छत पर चली आई … आँखों के आँसुओं के संग बादल भी बून्द-बून्द बरसने लगे थे l अभी सास खाना मांगेगी, देरी के लिए ताने मारेंगी … माधवी नीचे आ गई हमेशा की तरह सास-ससुर और बच्चों के लिए खाना निकाला और अपने लिए प्लेट नहीं लगाई न जाने कब से उसने रात में खाना हीं छोड़ दिया था l जूठे बर्तन एक तरफ रखते हुए माँ का चेहरा याद आया वह बात याद आई – ये क्या हाल कर लिया है तूने अपना … अपनी गलतियों की सजा इन बच्चों को दोगी ? जीवन में जो कुछ घट जाता है उसे पलटा नहीं जा सकता बेटी पर उन गलतियों से आगे के जीवन के लिए सीख ज़रूर ली जा सकती है l हमें ठोकरों से टूटना नहीं चाहिए बस उनका सबक बनाकर पहाड़े की तरह रट लेना चाहिए l माधवी ने गहरी साँस ली और स्वतः संवाद किया – तुमने सही कहा माँ, मुझसे जो गलती हो गयी वह अब वापस सुधर तो नहीं सकती पर उस गलती की आँच में इन मासूमों का जीवन मैं नहीं झुलसने दूँगी l अगर कहीं मैं मर गई तो इन बच्चों का क्या होगा … नहीं अपनी रक्त-मज्जा से बने इन अबोधों को अनाथ करने का उसे कोई हक़ नहीं … उसके अन्दर की शक्तिनी को जागना होगा … जाग पगली … संभल … माधवी ने अपने लिए भी खाने का प्लेट लगाया पर कौर गले से न उतरा किसी तरह पानी के साथ कौर निगलकर सोने चली गयी l
अब हर हफ्ते माँ चुपचाप आकर माधवी से मिल लेती, कभी-कभी ज़िद करके कुछ पैसे भी दे जाती l माँ से दुःख-दर्द साझा करके ह्रदय का बोझ कुछ हल्का हो जाता … ऐसे हीं दिन बीतते रहे एक दिन मंजू बेटी से मिलकर जब घर जाने के लिए उठी तो चक्कर-सा आ गया माधवी ने लपककर माँ को सम्भाला और थोड़ी देर घर चलकर आराम करने को कहा पर मंजू ने टाल दिया – नहीं बेटी थोड़ी देर में शाम हो जायेगी … तुम्हारे पापा और भाई घर लौट आएँगे … माँ ने लाचार आँखों से बेटी की तरफ देखा और आगे बढ़ गई l माधवी ने अपने भीतर एक गहरी तड़प महसूस की, केवल एक भूल ने कितना पराया बना दिया था उसे … कि अपनी बीमार माँ को अपने हीं घर तक पहुँचाने नहीं जा सकती l माँ के साथ चलते हुए माधवी ने जैसे खुशामद करते हुए कहा – मैं घर के बाहर से हीं लौट आऊँगी … मुझे कोई नहीं देख पाएगा, अगर किसी की नज़र पड़ती भी है तो पहचान न सकेगा मैं अपने इस लांछित चेहरे को पल्लू से ढक कर रखूँगी माँ … प्लीज ! और माँ-बेटी की निगाहों की मूक भाषा के संवाद हुए … जैसे गाय अपनी बछिया को देखती है … माँ को सहमति देनी पड़ी, माधवी पल्लू से चेहरा ढँककर ऑटो में माँ के साथ बैठ गई … ऑटो चला, बगैर कोई संवाद के दोनों बैठी रही … थोड़ी देर बाद ऑटो मुड़ा और माधवी जैसे एक करख्त युग के बाद अपनी भीगी-भीगी सुकूनदेह जड़ों में लौट आई थी … सड़क के किनारे चारदीवारियों में खड़े आम, लीची और नारियल के पेड़, चाय वाली छोटी-सी दुकान, जहाँ वह छुटपन में बाबा से चॉकलेट दिलवाने के जिद करती थी, कुछ और आगे बरगद और उससे थोड़ी हीं दूरी पर खड़ा अश्वस्थ का विशालकाय पेड़ लाल गुलाबी साड़ियों और चटख ओढ़नी में सजी औरतें हाथों में प्रसाद और फूलों की डलिया लिए हुए … एक छोटे से झुण्ड में बैठी कुछ औरतें गीत गा रही हैं …
मोर प्रियतम सखी गईल दूर देस, जीवन दs गेल साल सनेस
मास आषाढ़ उनत नव मेघ, पिया बिसलेखे रहओ निरधेघ
कौन पुरबख कउनोन से देस, धारब तहाँ मएँ जोगिनी भेष …
मोराssss प्रियतम …..
घने सायादार वृक्षों में पति के से सुरक्षा भाव को तलाशकर स्त्रियाँ कच्चे धागे से सात गाँठें लगाकर उसे मन हीं मन सात जन्मों के बन्धन में बाँध लेती हैं … पुरानी पहचान वाले पेड़-पौधों, मकानों को पीछे छोड़ते जनम-जनम के परिचित रास्ते पर आगे बढ़ते हुए अब ऑटो रूक गया था … घर आ गया … पापा ने नया गेट लगवा लिया है माधवी उतरकर खड़ी हो गई … एक अजीब विह्वल से अहसास के साथ … आम का पेड़ कितना बड़ा हो गया है, घना भी … माधवी को पहचान कर जैसे पेड़ के पत्तों ने हाथ हिलाए … हवा से फड़फड़ाकर मानो हौले-हौले हँसकर कुछ कह रहा था पेड़ …. कुछ सूखे पत्ते उसके पैरों के पास गिर पड़े … माधवी ने उन्हें झुक कर उठा लिया और आगे बढ़कर पेड़ के तने से लिपट गई पलकें खुद-बा-खुद मुंद गईं, हवा में पत्ते एक बार ज़ोर से फड़फड़ाकर शान्त हो गए … माँ का कलेज़ा फटने को हुआ .. खुद को संभालकर बोली – अब लौट जा बेटी बच्चे घबड़ा रहे होंगे … माधवी ने अपने बचपन के आशियाने को एक बार भर आँख देखा और वापस ऑटो में बैठ गई l कब की मर चुकी माधवी के अन्दर जिन्दा होने की लालसा सर उठाने लगी … दिलो दिमाग में प्रश्नावलियों की झड़ी लग गई .. वह जो फ़क़त एक भूल उसके जीवन का नासूर बन गया … उसके सम्पूर्ण अस्तित्व पर भारी पड़ गया … अगर यही भूल मेरे भईयों से हो गई होती तो क्या तब भी समाज़ ने उसका यूँ हीं बहिष्कार कर दिया होता .. क्या तब भी पापा ने उनसे अपने सारे सम्बन्ध तोड़ लिए होते … क्या तब उनकी भी ऐसे हीं कोई खोज़-ख़बर नहीं ली जाती कि वे जिन्दा हैं अथवा मर गए … अगर वह एक स्त्री न होकर पुरुष होती क्या तब भी उसका अपराध अक्षम्य हीं होता या तब का सामाजिक न्याय-गणित कुछ और होता … इस बीच घर में कितने उत्सव हुए, भाईयों की शादियाँ हुईं पर उसे कभी किसी समारोह में नहीं बुलाया गया … घर, परिजनों और समाज के लिए वह मर चुकी थी … हाँ भूल की सजा देनी चाहिए थी .. दी भी गई पर नादानी में की गई भूल के लिए अगर कुछ समय की नाराज़गी के बाद परिजनों ने उसे स्वीकार कर लिया होता तो उस नीच पुरुष की भी आज इतनी हिम्मत न होती कि वह उसे और उसके बच्चों को यूँ लावारिस छोड़कर खुद मौज़ करता फिरे … नारी को नाँथ कर नियंत्रण में रखने के लिए कैसे-कैसे पाखण्ड पलते हैं इस पितृसत्तात्मक सामाजिक नियमों की आड़ में … माधवी का दम घुटने लगा आह ! गहरा कुआँ … जहाँ से निकलने का कोई मार्ग नहीं … अँधेरा हीं अँधेरा .. चेतना जैसे डूबने लगी … नारी के गले में परम्परा की भारी गठरी जन्म से हीं बाँध दी जाती है, वह उसे ढोती चले तो भी मरती है उतार कर फेंक दे तो भी मरती है l
पर वह जिएगी .. उसे जीना हीं होगा … अन्तरिक्ष के तारे मुस्कुराकर इशारों में ढाढस बँधाते रहे … रात करवटों में हीं गुज़री पर अगली सुबह साफ़ और बहुत हद तक स्पष्ट भी थी l सवेरे का नाश्ता पाँच लोगों के लिए बना, दूध फल और सूखे मेवों के भी उसने पाँच हिस्से लगाये l बच्चों को स्कूल पहुँचाकर सीधा डॉक्टर की क्लिनिक पर पहुँची, पुर्जे कटवाए, चेकअप्स करवाए l दो दिन में सारे रिपोर्ट्स आ गए, सब कुछ सामान्य था … बस हीमोग्लोबिन लो था, इसी की वजह से सारे कॉम्प्लीकेशन्स, कमजोरी और चक्कर आते थे l मेडिकल स्टोर से दवाइयाँ और टॉनिक लेकर घर वापस जाते हुए माधवी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया और खुद से एक वादा किया – अपने आप को हमेशा स्वस्थ और खुश रखने का l दोपहर में मंदिर पर पहुँची माँ अपने साथ एक आदमी को लेकर आई थी l उसने बताया पहली पत्नी के जीवित रहते अगर कोई आदमी दूसरा विवाह करता है तो यह गैरकानूनी है l हिन्दू लॉ में ऐसे विवाह की मान्यता खुद-ब-खुद शून्य हो जाती है l उस घर में माधवी और उसके बच्चों के सारे अधिकार यथावत रहेंगे कानून इनकी तरफ है l माधवी ने चैन की साँस ली … घर आकर सीधा सास-ससुर के कमरे में जा बैठी और बिना किसी हिचकिचाहट के पूरे आत्मविश्वास से अपनी बात कहनी शुरू की – माँ से मिलने गयी थी … अपने और अपने बच्चों की जान की हिफाज़त से सम्बन्धित पत्र लिखकर माँ को दे दिया है, वह थाने में जमा करवा देंगी l मैं सब कुछ जान चुकी हूँ, अब मुझे अपने और अपने बच्चों का हक चाहिए l आगे क्या करना है, इस बात का फैसला आपलोग और समाज वाले कर लें l बात घर से निकल कर समाज और थाने तक पहुँचती देख बुजुर्गों के चेहरे फ़क पड़ गए l ससुर ने गम्भीर आवाज में कहा – तुम हमारे घर की बहू हो और ये बच्चे इस घर के चिराग, तुम यह थाने वाने का चक्कर छोड़ दे मधु, इससे बात बढ़ जायेगी और हो सकता है इन सबसे भड़ककर लड़का कोई और गलत कदम उठा ले … बदनामी होगी सो अलग … हम पर भरोसा रखो बेटी हम कुछ न कुछ करते हैं l रात तक नीलेश भी घर आ चुका था … फोन पर उसे सारी इत्तला कर दी गयी थी, तमककर माधवी के कमरे में पहुँचा पर नज़र मिलते हीं ठंडा पड़ गया … यह तो वही पुरानी वाली माधवी थी साक्षात् चंडी रूप में l उन नज़रों से नज़र मिलाने की त़ाब न ला सका l कुछ देर सोचकर, ज़ेब से नोटों की मोटी गड्डी निकाली और धीरे से मेज़ पर रख दिया – घर खर्च के पैसे … फिर आवाज में नरमाई घोलकर धीमे स्वर में बोला – कुछ और पैसे रख लो अपने लिए अलग से कुछ दूध और सूखे मेवे खरीद लेना, कितनी कमज़ोर हो गई हो … माधवी का मन घृणा से भर उठा, इधर कुछेक महीनों से माँ से मिलने के बाद से तो उसने रात को भी खाना खाना शुरू कर दिया था l दवाइयाँ और दूध-फल लेकर अब तो उसकी सेहत पहले से काफी हद तक दुरुस्त हो चुकी थी l जब सचमुच उसका स्वास्थ्य बेहद हीं बुरे हाल में पहुँच चुका था चेहरा मृतकों-सा निर्जीव हो चुका था तब तो इस स्वार्थी आदमी ने कभी उसे अलग से पैसे देकर अपना ध्यान रखने के लिए नहीं कहा ! आता और माँ बाप से मिलकर बाहर-बाहर से हीं निकल जाया करता l नीलेश ने गौर से माधवी के चेहरे पर आते जाते भावों को देखा और एक कदम आगे लेकर धीरे-से अपना हाथ बढाया पर माधवी ठंढी आँखों से उसे घूरकर दो कदम पीछे हट गई l नीलेश ने कुछ सोचकर सर झुका लिया, पीछे मुड़ा और तेज़-तेज़ क़दमों से बाहर निकल गया l माधवी लड़खड़ा कर बिस्तर पर बैठ गई दोनों हाथों से चेहरा ढांककर फफ़क पड़ी पर फिर झटके से उठी बेसिन पर जाकर चेहरा धोया, किचन में जाकर अपने लिए कॉफ़ी बनायीं और कॉफ़ी पीते-पीते एक फैसला किया l एक महीने पहले जब बच्चों को स्कूल पहुँचा कर लौट रही थी तो सामने किंशुक मिल गया था … सस्ती मानसिकताओं के बीच एक सभ्य और सुलझा व्यक्तित्व .. औपचारिक अभिवादन के बाद उसने कहा कि, बच्चों के लिए एक छोटा-सा स्कूल शुरू करने जा रहा है, माधवी अगर चाहे तो वहाँ पढ़ाने आ सकती है l कहकर वह प्रतिउत्तर की प्रतीक्षा में माधवी की ओर देखने लगा .. बड़ी-बड़ी स्निग्ध बुद्धिदीप्त आँखों में सहानुभूति थी, माधवी ने चेहरा झुका लिया l विषाद भरे होंठो से फुसफुसाहट-सी निकली … घर के कामों से फुर्सत हीं नहीं मिलती … नर्म और गम्भीर आवाज माधवी के कानों से टकराई किंशुक ने इतना हीं कहा – बच्चों में व्यस्त रहोगी तो दिल भी लगा रहेगा और कुछ पैसे भी आ जायेंगे .. खैर आप सोच समझ कर निर्णय लीजिये कोई जल्दी नहीं है l माधवी ने फैसला कर लिया था, उसने बाल सँवारे, पर्स उठाया और सास से जाकर कहा – आज से मैं एक स्कूल में पढ़ाने जा रही हूँ l खाना बनाकर रख दिया है, आपलोग दोपहर का खाना खुद से निकालकर खा लीजियेगा और उसने एक नवीन संकल्प के साथ अपने पाँव घर से बाहर की ओर बढ़ा दिए l
कंचन पाठक
कवियित्री, लेखिका



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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तर करवड़े अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा परवीन कुमार अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमरान रिजवी इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपवास उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत छठ जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम डोंगरा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बाल मनो विज्ञान बाल-मन बिल गेट्स बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता माता -पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वृद्धजन विमर्श वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार हेल्थ होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues clingy behaviour deepawali special E.book family and relationship issues father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories hindi story id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire senior citizen issues short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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अटूट बंधन : आखिरी भूल
आखिरी भूल
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अटूट बंधन
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