प्रेम के रंग हज़ार -डूबे सो हो पार

बड़ा ही विचित्र है ये प्रेम जो इसमें डूबता जाता है वही पार उतरता है | ढाई आखर प्रेम के समझने वाला इसे जान लेता है और ज्ञानी इसे पुस्तकों में ढूंढता रह जाता है |


प्रेम के रंग हज़ार -डूबे सो हो  पार

प्रेम जीवन के विविध रंगों और ढंगों में समाई सघन अनुभूति है…माँ का वात्सल्य से परिपूर्ण प्रेम ,पिता का अव्यक्त कर्म में परिलक्षित प्रेम , बहिन का अनुराग से ओत प्रोत प्रेम , भाई का अनुरक्ति में भीगा प्रेम ,मित्र का अपनत्व भाव में रचा बसा प्रेम और एक स्त्री व पुरुष के बीच प्रस्फुटित होता , पल्लवित होता ,मन को मुक्त करता , हर स्पंदन में खुद को भरता नैसर्गिक प्रेम जो रचता है जीवन को और देता है उसे नये तर्जुमान.
प्रेम महज कन्टेंट्स ( विषय वस्तु ) नही है बल्कि यह एक सतत प्रवाहमयी प्रक्रिया है जो निरंतर एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तित होती रहती है और जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूता हुआ निरंतर गतिमान रहता है.प्रेम समय की धुरी पे घूमता हुआ नए नए कलेवर धारण करता है .
सृष्टि के सृजन में समाता रहा है खुद को प्रेम
प्रेम एक अछूता सा विषय पर हर जीवन को छूता हुआ.जीवन्त करता हुआ सदियों से अनेकानेक प्रतिमानों को,आदर्शों को , काव्यों को श्रृंगारित करता हुआ जीवों के हर रूप को ,ध्वनित करता हुआ हर पुकार को ..निश्छल वात्सल्य से लेकर झुर्रियों के अनुभवों के अनुराग में पलता है प्रेम.

प्रेम निर्मल कामना सा , पावन प्रार्थना सा ,उत्कठ भावना सा अंकुरित होता है अंतर्घट की चेतना की जमी से और पल्लवित पुष्पित होता वटवृक्ष सरीखा समाधिस्थ महायोगी सा बन जाने कितने ही पथिकों को अपनी ठंडी छांव देता है.
प्रेम ने शिव से गौरी का ,राम से सिया का , कृष्ण से राधा का , गिरधर से मीरा का से लेकर वर्तमान तक ना जाने कितने ही रूपों में खुद को गढ़ा और हर बार एक नया स्वरूप दिया, नया साकार दिया, नये प्रतिमान दिए, नये नाम दिए पर खुद प्रेम बना रहा ज्यूँ का त्यूँ बिना परिवर्तित हुए .
प्रेम जब अंतर्मन में जागता है तो सीमान्तो तक अपने बीज रोंप देता है .सघन शाश्वत अनुभूति सा उमड़ता है अंतस के गर्भ से और सतत हिलोरे लेता अनवरत बहता है दरिया सा . सौंदर्य और माधुर्य का अनुपम संगम प्रेम निरंतरता को पुष्ट करता अनादि काल से सृष्टि के सृजन में समाता रहा है खुद को. प्रेम जो जीवन के हर पल में साँस की तरह पलता हुआ हिय की धडकनों को राग रागिनियों से भर देता है ..मानस पटल की चेतना पे जीवन नित नूतन परिभाषाओं को गढ़ देता है , आँखों में पलता है नाज़ुक कमलदल सा, पलकों के तट पे समन्दर खड़े कर देता है. सीपी सा चुनता है स्वाति की बूंद और बन मोती अपनी आभा से हर और उजियारा कर देता है. मन के कोरे केनवास पे इन्द्रधनुषी छटा बन नीर की बूंद और रवि रश्मियों के प्रणय को साक्षात् रच देता है प्रेम.

प्रेम जीवन की उर्जा है

प्रेम जीवन की उर्जा है जो रोज़मर्रा की यांत्रिकता से हमे बाहर लाकर पुनर्जीवन देता है और पल प्रति पल नव नूतन आयामों के द्वार खोलता चला जाता है जो जीवन को नैसर्गिक आनंद के आह्लाद से भर देता है और रस भीनी अभिव्यक्ति की तरह जीवन में मुखरित होता है.
अनाम रहस्मयी दिव्यता से भरा प्रेम जब जागृत और क्रियाशील होता मानव में तो देह से निर्लिप्त पर देह को साकार करता हुआ प्रकृति और सृष्टि के नज़दीक ले जाता हुआ सारे छदम आवरणों को विलोपित कर देता है क्योकि प्रेम देह से देहातीत हो जाता है और शरीर सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होता हुआ अदृश्य हो जाता है तब रह जाती है आलौकिक प्रेम भावना और उसकी अभिव्यक्ति का संसार– प्रेम,
प्रेम जो आत्मा को थपथपाता है और यही स्थाई होता है ,शाश्वत होता है, चेतन होता है, सत्य होता है क्योकि प्रेम लौकिक स्थूलता को भेदता हुआ आत्मा की ज़द तक पहुँचता है और दो सम्पूर्णताओं के मिलन को पुष्ट करता है.
शरीर से
आत्मा तक आते आते
स्थूलता से सूक्ष्मता का
बोध हो गया
अंतर्मन का मौन
मुखरित हो
अनकहा सा
सब कह गया

तन की
लकीरों को
उकेरते
बनाते ,सवांरते,पढ़ते
मन व भावों की
मूकभाषा को
एक दूजे में
एकाकार कर गया
भरपूर तृप्ति का
अहसास
सैलाब की
प्रलयता को
स्व में समो
नूतन आयामों के साथ
अबोध
आपगा में
रच बस गया
तृप्ति और प्यास का
संतुलन
नव सृजन का
प्रणेता बन
कल कल निर्झर सा
बहता
जीवन की जीवन्तता को
पुष्ट कर गया
प्रेम गूंगे का गुड है
प्रेम पाने या प्रेम में होने की पहली शर्त है अहम का मिट जाना अर्थात अविभज्यता के भाव का उदय होना ही प्रेम है क्योकि प्रेम ही प्रेम को बाँधता है .
अकथ कहानी प्रेम की कुछ कही न जाये
गूंगे केरी सरकरा खाय और मुस्काए
प्रेम गूंगे का गुड है जिसके स्वाद को फ़क़त महसूस किया जा सकता है बयान नही किया जा सकता है . इसे गूंगे की आँखों और चेहरे पे उमगते भावों से जाना व समझा जा सकता है. प्रेम गुणातीत है अर्थात गुणों के दायरे से परे है .इसे रूप, रंग, रस, गंध के प्रतिमानों में नही पिरोया जा सकता . इसे इन सब रूपों में महसूस किया जा सकता है पर उसका मात्रात्मक आकलन नही किया जा सकता.
खलील ज़िब्रान प्रेम के बारे में कहते हैं– प्रेम बंधन मुक्त होता है इसलिए वो सृष्टि के कण कण में धड़कता है और अपने आप को प्रकट करता है. फिर चाहे चट्टान के सीने पे उगता दूब का नवांकुर हो या तपते रेगिस्तान में रोहिड़े की डाली पे तपती हवाओं के बीच खिलता फूल हो.

ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होए


ये ढाई आखर की ‘प्रेम गठरी’ समेटे हुए है अपने में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिसमें ग्रह, नक्षत्र, तारे सभी अपनी अपनी धुरी पे एक दूसरे के चारों और नर्तन कर रहे हैं . इस गठरी में रखी हुई है सम्भाल कर खुशबुएँ जो हवाओ पे सवार हुई एक दिशा को दूसरी दिशा का पैगाम देती हैं , इस में रखे हैं संजो के बिरवे जो उगते हुए हरी हरी चादर से कर जाते है उर्वर धरा के अंतस को, इसमें धरी है कुछ निश्छल मुस्काने जो जब जब अधरों पे सजती हैं ईश्वर उतर आता है उन मुस्कानों में , इसमें रखी है चकमक में छुपा के दबी सी आंच जो अपनी गरमी से पकाती है मन की रोटियां धीमे धीमे .और भी न जाने कितने ही अनंत रूप, रस, रंग को समाये हुए है स्व में .
हर युग में इस गठरी को खोल इसके रहस्यों को जानने, समझने व परखने की अनेकानेक बार कोशिशे की गई है किन्तु कोई भी इसकी तह तक आज तक नही पहुँच पाया है . जो जहाँ तक पहुंचा उसका प्रेम भी उतना ही विस्तार पा सका.
न रंग, न रूप ,न सौन्दर्य बस अंतर्मन से आती सुमधुर कशिश भरी आवाज़—हाँ यही है वो बस यही है . प्रेम का अर्थ है मुक्ति अर्थात प्रेम हमे बांधता है पर बंधन नही बनता है . यह अंतस के तमाम बंद दरवाज़ों ,खिडकियों और झरोखों को खोल देता है जीवन की संभावनाओं को टटोलता है और उन्हें वास्तविक जामा पहनाने को तत्पर हो जाता है. प्रेम सर्वस्व समर्पण के साथ साथ जीवन जीने की चेतना को जन्म देता है, सशक्त बनाता है और जीवन का सामर्थ्य बनता है . प्रेम भावना में निबद्ध विवेक है जो संबंधो की गहनता में निहित होता है व जीवन की जीवन्तता व सशक्तता से पोषित होता है .एक दूसरे का हाथ पकड़ पूरी धरती को अपने कदमो से नाप लेने के ख्वाब को जन्म देता है प्रेम. इसके गहराते रंग जीवन को इन्द्रधनुषी बना देते हैं. प्रेम का असीम आनंद तर्क से परे है और इसकी अनुभूति स्वर्गिक उच्चतम स्थिति है . प्रेम की कोई एक परिभाषा नही.. कोई एक मायना नही . ढाई आखर से बना प्रेम जितना सरल शब्द है उतना ही मुश्किल है इसे समझ पाना.

जब प्रेम आता है चुपके से

प्रेम चुपके से आता है और इतना चुपके से कि शरीर क्या आत्मा तक को भी इसका अहसास नही हो पाता है इसके आने का और पल भर में जब सब कुछ उसका हो कर रह जाता तब आता है समझ कि ‘अरे ये तो प्रेम है सिर्फ प्रेम’.
प्रेम जो हमारा हाथ थाम दूर सुदूर जंगलो के पार, पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपर , आसमान में उड़ते बादलों के बीच, कल कल बहती नदिया के कूलों पे तो गर्जन तर्जन करते सागर की असीम ,अतल गहराइयों तक ले जाता है.
उदात्त प्रेम एक दूसरे में खुद को बो देने के अहसास से भरा होता है जिसमें बीजों से निकलते नवांकुर धीरे धीरे खिलते चले जाते हैं और जीवन पात , शाख , फूलों व फलों से लदा फदा दरख्त बन जाता है , प्रकृति की सारी मनोहारी सुन्दरता, चेतनता, सृजनता जीवन में समा जाती है , चारों ओर प्रेमोत्सव छा जाता है और बहती बयार के साथ प्रेम सुगंधियों सा चंहु ओर बहता है देश, काल, परिस्थिति सब को परे छोड़ता हुआ व सर्वोपरि हो जाता है चेहरे में उगता है एक नया आह्लाद भरा चेहरा , धडकनों से फूट पड़ता है अप्रतिम संगीत का झरना , सांसों में बहती है सुवासित बयार , आँखों में बसने लगते हैं सुनहरे, सजीले ख्वाबों के दरीचे , अधरों पे खिल उठते हैं अनेकानेक मधुबन कुछ इस तरह की आईने में खुद का अक्स ही पहचानने में नही आता है जब प्रेम हो जाता है
प्रेम एक ऐसी पवित्र अनुभूति है जिससे शायद ही कोई अछूता रहा हो , क्या धरती और क्या आकाश , क्या सागर ,क्या दरिया , क्या चंदा और क्या सूरज , क्या वृक्ष लताएँ, क्या भँवरे तितलियाँ क्या परिंदे व जीव ,क्या स्त्री क्या पुरुष. कोई तो ऐसा नही सृष्टि में जिसे छूकर प्रेम न निकला हो , जिसने इस रस का पान न किया हो ,जिसने इस भाव को न जिया हो क्योकि प्रेम हमे चुनता है हम प्रेम को नही चुनते हैं फिर चाहे स्टुअर्ट मिल व हैरिएट हो ,जॉन कीट्स व फेनी हो , नेपोलियन व डिजायरी हो या अमृता ,इमरोज़ व साहिर हो , एक दूसरे में

जीने का समर्पण भाव है प्रेम.

प्रेम ऐसा है जैसे कि श्वास लेना, जैसे प्राणों का शरीर में बसना. प्रेम बिना जीवन रुखा सूखा, प्रेम में भीगा जीवन तृप्त एक अबूझ सी प्यास अंतर्घट में लिए . प्रेम के शिखर पर पहुँच कर अभय प्राप्त होता है . प्रेम की लगन मदमस्त बना देती है सब कुछ भुला देती है जान अजान का भेद मिटा देती है , लोकलाज को तज देती है और प्रेमिल ह्रदय दीवानावार हुआ अपनी सुध बुध खो बैठता है—–
प्रेम
तितली के कोमल परों पे सवार होकर आता है
और हौले से गुल की पांखुरियों में उतर जाता है
गुल का मन हर्षाता है
अपने यौवन पे वो मंद मंद मुस्काता है
देख स्मित उसके रुख पे
बुलबुल का दिल खिल जाता है
जीवन का मीठा राग उसके स्वरों में
कहीं गहरे पैठ जाता है
स्वर लहरियों पे थिरकता चाँद
फेनिल चांदनी चहुँ ओर बरसाता है
टिमटिमाते तारों की चुनर
रात को ओढ़ा जाता है
चाँद की बढ़ती कलाओं संग
मन सागर का अकुलाता है
उत्ताल लहरों की ताल पे वो
झूम झूम लहराता है
उसकी गर्जन तर्जन पे
मन नदिया का डूबा जाता है
करने उसके प्रलाप को कम
नीर उमड़ा आता है
नदिया की
कल कल मृदंग पे
समीर ले ले हिलोरें
प्राणों का गीत सुनाता है
गीत की मधुर तान पे
एक बीज
धीरे से खोल आँखे
नव पल्ल्व खिलाता है
नव पल्ल्व के हरेपन में खुद को भरने
सूरज दौड़ा आता है
बढ़ते उसके ताप पे नीर
बदली बन नील गगन पे छाता है
बदली के घने केशों में
पर्वत का शिखर अटक जाता है
तप्त धरा की प्यास बुझाने
बारिश का नेह लुटाता है
बरसते नेह में मौन मेरा
कागज पे उतर जाता है
फैली स्याही भीगा आँचल
बस तुझको लिखता जाता है
प्रेम स्वयं में एक पूरी जीवन पद्धति है

प्रेम स्वयं में एक पूरी जीवन पद्धति है जो मानव में जब जागृत और क्रियाशील होती है तो शरीर होकर भी विलोपित होजाता है और रह जाती है बस एक भावना और उसकी अभिव्यक्ति का संसार तब प्रश्न उठ खड़ा होता है प्रेम में देह की उपस्थिति या अनिवार्यता कितनी ?यह सीमा रेखा तय कैसे हो ? क्योकि ये तो सुनिश्चित है कि प्रेम को देह से गुजरना ही पड़ता है और उसको पार भी करना पड़ता है क्योकि तब ये देह को भेदता हुआ आत्मा की ज़द तक पंहुच जाता है व देह ही इसको आत्मा की रोशन राह तक पंहुचने का एकमात्र पुल है किन्तु प्रेम अगर केवल देह में रुक जाये या डूब जाये तो फिर ये प्रेम नही रह पाता, संतुष्टि बन जाता है . प्रेम वस्तुतः देह को भोगता हुआ जब देहातीत हो जाता है तब ये शरीर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता हुआ अदृश्य हो जाता है और शेष रह जाता है प्रेम जो आत्मा को आह्लाद से भर देता है और लौकिक स्थूलता से सूक्ष्म चेतनता तक पंहुचता है जहाँ कोई अनुबंध नही, कोई थकन नही ,कोई बंधन नही ,कोई लिप्तता नही .
प्रेम किसी रिश्ते में बंधा हुआ नही है इसका विस्तार प्राणी निमित्त से प्रकृति के हर कण तक फैला हुआ है .यह फलीभूत होता हुआ तब दिखाई देता है जब सहज भरोसा व आत्मिक अनिभूतियां परस्पर प्रतिबद्धताओं के साथ प्रकट होने लगती हैं

सर्वकालिक सर्वव्यापी है प्रेम

प्रेम की उपस्थिति अनादिकाल से निर्विवाद रही है . कोई सदी हो, कोई युग हो या कोई काल खंड रहा हो प्रेम शाश्वत सत्य के रूप में बना रहा है और इसे ईश्वर के समकक्ष दर्ज़ा मिला है क्योकि प्रेम की अनुभूति सदैव ही सघन, सहज, परिपूर्ण व बेजोड़ रही है . सृष्टि का जन्म प्रेम की ही परिणिति है . प्रेम तन मन व आत्मिक अनुभूतियों का अनुपम संसार है जिसके छू जाने मात्र से चारों ओर फूलों के गुंचे खिल जाते हैं , तपते मरुस्थल में सरस रसधार बह निकलती है , चाँद सितारे जमीन पे उतर आते है , चंहु ओर शहनाई बजने लगती है आँखों में मृदल हास उग आते हैं अधरों पे मुस्काने थिरक जाती हैं ओर इसकी महक जब फैलने लगती है तो इन्ही मुस्कानों पे पहरे बैठा दिए जाते हैं , खुशबुओं पे बंदिशे लगा दी जाती हैं ओर जीवन सांसो पे निषेध लिख दिया जाता है मानो प्रेम न होकर कोई साजिश हो दुनिया को तहस नहस करने की, तबाह करने की जो व्यवस्था की चूले हिला कर सारी दुनिया को ध्वस्त कर देगा और सारी दुनिया इसकी बैरी हो जाती है , इसे जलाया जाता है, कुचला जाता है ,रौंदा जाता है और सूली चढ़ा दिया जाता है पर फिर भी इसके नवांकुर आज भी वैसे ही प्रस्फुटित होते हैं और प्रेम की कोंपले वैसे ही खिलती हैं . जिगर मुरादाबादी ने कहा है —-
इक लफ्जे मोहब्बत का अदना ये फसाना है
सिमटे तो दिले आशियाँ फैले तो जमाना है
ये इश्क नही आसां इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रेम की संकल्पना

वर्तमान में प्रेम के बदलते स्वरूप पे दृष्टि डाले तो प्रेम में तर्क ,विवेक , परस्पर सम्मान और स्वतंत्रता का भाव सर्वोपरी हो गया है . आज का प्रेम सक्रियता की मांग करता है जिसमे केवल शब्दों से नही वरन अपने कार्य से सामने वाले की जिन्दगी में अपने होने के औचित्य को साबित करना जरुरी होता है
ग्लोबलाइजेशन के वर्तमान परिपेक्ष्य में प्रेम की संकल्पना को जन्म दिया जिसमें नई व्यावसायिक व आर्थिक व्यवस्थाओं के तहत लड़के और लड़कियां को घर से बाहर निकलना पड़ रहा हैं. इससे इनकी परस्पर अंतर्निर्भरताएँ बढ़ रही हैं फलतः इनके मध्य की वर्जनाएं टूट रही हैं, दूरियां मिट रही हैं और प्रेम में भावना से अधिक समझ का स्तर विकसित हो रहा है व दोस्ती, सेक्स, लिव इन रिलेशनशिप जैसे नए कंसेप्ट इसमें प्रवेश कर रहे है . ग्लोबल दुनिया में प्रेम अब लोजिकल ( तार्किक ), लौकिक व फिजिकल हो गया है इस प्रेम में अब विरह वियोग का क्लासिकल तत्व नज़र नही आता और न ही मासूमियत . इन सब का स्थान समझ ने ले लिया है. प्रेम अब एक स्थाई मूल्य के बजाये तदर्थ मूल्य हो गया है जहाँ सब कुछ खुल्लम खुल्ला है और इसमें प्रेम कितना है और सेक्स कितना है कह पाना मुश्किल होता जा रहा है.
प्रेम की आदर्शवादी स्थिति विलोपित होने लगी है. इंटरनेट व सोशल नेटवर्किंग ने प्रेम में अनेक आभासी आयाम जोड़ दिए हैं और ये अधिक वस्तुपरक हो गया है . इस से प्रेम का नैसर्गिक सौंदर्य कहीं गुम गया है और यह अपनी मौलिक अभिव्यक्ति खोने लगा है . आज प्रेम की विषयवस्तु मैं केंद्रित हो गई है. चकचोँध से भरे नए भौतिक वादी युग में प्रेम खुलेपन की राह पे चलता हुआ गोपनीयता को और अधिक उघाड़ने पर आमादा सा लगता है
फिर भी प्रेम शाश्वत है और सनातन है जो आज भी अँधेरे के कुहासों को चीर जुगनू की मानिंद चमकता दिखाई देता है
प्रेम अपने सूक्ष्मतम रूप से स्थूल रूप से हमारी आँखों के आगे प्रकट होने लगा और हम इसे अपनी अपनी समझ के अनुसार परिभाषित करने लगे और धीरे धीरे प्रेम का सर्वकालिक सर्वव्यापी स्वरूप संकुचित होता हुआ आत्मिक से भौतिक हो गया जबकि अनादिकाल से प्रेम सर्वशक्तिमान व निर्णायक भूमिका में रहा है किन्तु वर्तमान युग में पूंजी से मिली नै चुनौतियों से जूझ रहा है प्रेम . धर्म, जाति, गरीबी जैसे सम्प्रत्य प्रेम की राह में सदा ही रहे हैं किन्तु वर्तमान अर्थ युग में असंतुलित सामाजिक व सांस्कृतिक विकास में भाव शून्य जीवन में मानव प्रेम रहित होता जा रहा है जबकि प्रेम जीवन के अस्तित्व का मूल स्त्रोत है.
रजनी भारद्धाज
जयपुर ( राजस्थान )


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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को : प्रेम के रंग हज़ार -डूबे सो हो पार
प्रेम के रंग हज़ार -डूबे सो हो पार
बड़ा ही विचित्र है ये प्रेम जो इसमें डूबता जाता है वही पार उतरता है | ढाई आखर प्रेम के समझने वाला इसे जान लेता है और ज्ञानी इसे पुस्तकों में ढूंढता रह जाता है |
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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को
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