May 2017

हजारों किलोमीटर की यात्रा  की शुरुआत बस एक कदम से होती है



मुहल्ले के अंकल जी वॉकर ले कर ८० की उम्र दोबारा चलना सीख रहे थे | अभी कुछ दिन पहले गिरने से उनके पैर की हड्डी टूट गयी थी | प्लास्टर खुलने  के बाद भी मांस पेशियाँ अकड गयी थी , जिन्होंने चलने तो क्या खड़े होने में मदद देने से इनकार कर दिया था | इक इंसान जो जिंदगी भर चलता हैं , भागता है दौड़ता है | किसी दुर्घटना के बाद डेढ़ – दो महीने में ही चलना भूल जाता है | एक – एक कदम अजनबी सा लगता है | हिम्मत जबाब दे जाती है | लगता है नहीं चला जाएगा | फिर एक अंत : प्रेरणा जागती है ,अरे ! , चलेंगे नहीं तो जिंदगी कैसे चलेगी |तब जरूरत  होती है अपनों के प्यार की , वाकर के सहारे की और द्रण इच्छा शक्ति की |  और शुरू हो जाती है कोशिश फिर से सीखने की |चल पड़ते हैं कदम |

 साधना सिंह


कतरा कतरा पिघल रहा है  
दिल नही मेरा संभल रहा है  || 

हवा भी ऐसे सुलग रही है 
और ये सावन भी जल रहा है ||

कि एक तेरे जाने से देखो, 
कैसे सबकुछ बदल रहा है || 






बचपन में एक गाना  अक्सर सुनते थे  "लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हज़ारों रंग के सितारे बन गए " | गाना हमें बहुत पसंद था पर हमारा बाल मन सदा ये जानने की कोशिश करता ये खत सितारे कैसे  बन जाते हैं।. खैर बचपन गया हम बड़े हुए और अपनी सहेलियों को  बेसब्री मिश्रित ख़ुशी के साथ उनके पति के खत पढ़ते देख हमें जरा -जरा अंदाज़ा होने लगा कि खत सितारे ऐसे बनते हैं।  और हम भी एक अदद पति और एक अदद खत के सपने सजाने लगे।  खैर दिन बीते हमारी शादी हुई और शादी के तुरंत बाद हमें इम्तहान देने के लिए मायके   आना पड़ा।  हम बहुत खुश थे की अब पति हमें खत लिखेंगे और हम भी उन खुशनसीब सहेलियों की सूची में आ जाएंगे जिन के पास उनके पति के खत आते हैं।





लेखक:- पंकज प्रखर
कोटा(राज.)

स्त्रीऔर नदी दोनों ही समाज में वन्दनीय है तब तक जब तक कि वो अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन नही करती | स्त्री का व्यक्तित्व स्वच्छ निर्मल नदी की तरह है जिस प्रकार नदी का प्रवाह पवित्रऔर आनन्दकारकहोता है उसी प्रकार सीमा रेखा में बंधी नारी आदरणीय और वन्दनीय शक्ति के रूप में परिवार और समाज में  रहती है| लेकिन इतिहास साक्षी है की जब –जब भी नदियों ने अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन किया है समाज बढ़े –बढे संकटों से जूझता नजर आया है| तथाकथित कुछ महिलाओं ने आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर जब से स्वच्छंद विचरणकरते हुए  सीमाओं का उल्लंघन करना शुरू किया है तब से महिलाओं की  स्थिति दयनीय और हेय होती चली गयी है |




सुशील यादव


पिता ,
बस दो दिन पहले
आपकी चिता का
अग्नि-संस्कार कर
लौटा था घर ....
माँ की नजर में
खुद अपराधी होने का दंश
सालता रहा ...
पैने रस्म-रिवाजों का
आघात
जगह जगह ,बार बार
सम्हालता रहा ....
सोनू की मिठाई


                   जीवन में  अक्सर हमें दो चीजों में से एक का चयन करना होता है| पर कई बार हम सही चीज का चयन नहीं कर पाते हैं| इसके अतिरिक्त कई बार ऐसा भी होता है कि हम अपनी चयनित चीजों को सही priority में नहीं रख पाते हैं | जिसके कारण बाद में बहुत नुक्सान उठाना पड़ता है|ऐसा ही किस्सा दीपू और सोनू का था|


motivational Hindi story-sonu ki mithai


दीपू और सोनू  दो दोस्त थे | दोनों बेहद गरीब थे| खाने को मुश्किल से ही मिलता था| मिठाई तो बिलकुल ही नहीं मिल पाती थी| दोनों मिठाई खाने के लिए तरसते रहते| 


ऐसे में जब किसी फंक्शन में दोनों जाते तो भरपेट खाना और मिठाई देख कर दोनों के मुंह में पानी आ जाता| 

 दीपू पहले  मिठाइयाँ खा लेता फिर भूंख बची रहने पर खाना खाता और सोनू सोचता पहले खाना खा लूँ फिर जी भर के  मिठाई खाऊंगा |

 अब खाना खा कर उसका पेट इतना भर जाता की वो मिठाई खा ही नहीं पाता | और अगर जबरदस्ती खा भी ली तो उल्टियां शुरू हो जाती | 


अब ऐसा फंक्शन तो साल , ६ महीने में कहीं देखने को मिलता था| फिर अगले ६ महीने तक सोनू तरसता ही रहता और सोंचता,  " काश उसने पहले मिठाई खायी होती तो?"

                              मित्रों हम में से अधिकतर लोग अपने जीवन की प्राथमिकताएं नहीं तय कर पाते इस कारण न सफल हो पाते हैं न खुश| जीवन में ख़ुशी व् सफलता के लिए यह देखना जरूरी है की हम पहले कौन सा काम करें और बाद में कौन सा | क्योंकि अगर किये जाने वाले कामों का कर्म बिगाड़ दिया तो सफलता संदिग्ध हो जाती है| 

टीम ABC
जब स्वामी विवेकानंद जी ने डायरी में लिखा , " मैं हार गया हूँ "


सफलता का हीरा

पापा ये वाला लो


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कल से जिस संख्या में नन्हे से गुलाबी दिल देखने को मिल रहे हैं उसके हिसाब से तो आज बहुत सारी  महिलाएं अस्पतालों में जा कर अपना चेकअप शुरू करा देंगी | पर अफ़सोस की ऐसा कुछ नहीं होगा | अव्वल तो बहुत से लोग इस प्रतीकात्मक कैम्पेन का मतलब ही नहीं समझ पाए | जो समझ भी गए उन्होंने इसे गंभीरता के स्थान पर हलके में ही लिया होगा | क्यों न हो ? जिस देश में महिलाएं अपनी छोटी – बड़ी हर तकलीफ को नज़रअंदाज करती है | जहाँ छोटे शहरों  गाँव देहात में शिक्षा की कमी है वहाँ प्रतीकत्मक प्रचार से कुछ नहीं होगा | जरूरत है इस गंभीर मुद्दे पर खुल कर बोलने की |
लाइलाज नहीं है स्तन कैंसर
कैंसर शब्द दिमाग में आते ही बात आती है की अब पीड़ादायक मृत्यु होगी और इसी कारण कैंसर होने के समाचार मात्र से ही रोगी को जीवन के प्रति निराशा हो जाती है। लेकिन स्तन या ब्रेस्ट कैंसर के क्षेत्र में एक अच्छी बात यह है कि  इसके ठीक होने की संभावना ज़्यादा होती है। स्तन कैंसर होने का पता साधारणतः पहले या दूसरे चरण में ही चल जाता है। इसलिए इसका इलाज सही समय पर हो पाता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है हर किसी को इस बारे में सही जानकरी हो और वे सचेत हो। स्तन कैंसर से बचने का सबसे पहला कदम है जागरूकता। उसके बाद आता है इस रोग से बचने के उपाय। जीवनशैली में बदलाव और सचेतता ही आपको कष्टदायक स्तन कैंसर से बचा सकता है।


ये महज कविता नही वरन रोंगटे खड़े करता एक भयावह यथार्थ है।

रंगनाथ द्विवेदी

कुछ भिड़ झुरमुट की तरफ देख, अचानक मै भी रुक गया-------- और जैसे ही मेरी नज़र उस झुरमुट पे पड़ी, उफ!मेरे रोंगटे खड़े हो गये, एक पैत्तीस साल की औरत का----------- विभत्स बलात्कार मेरे सामने था,


जो आशावादी  था उसने हवाई जहाज बनाया , जो डिफेंसिव पेसिमिस्ट था उसने पैराशूट बनाया | दोनों ही सफल हैं व् समाज के लिए जरूरी भी |

                     मैं मालविका वर्मा , मेडिकल फोर्थ इयर स्टूडेंट हूँ | आज जब मैं सफलता के नए अध्याय  लिख रही हूँ तो पीछे पलट कर देखने पर मुझे अपने वो तीन ड्राप ईयर’स और उनमें की गयी गलतियां याद आती हैं | जब मैं लगातार असफल हो रही थी | मेरा सपना डॉक्टर बनने का था और मैं  किसी भी प्रकार उसका इंट्रेंस क्लीयर करना चाहती थी | मैंने भी ठान ली थी चाहें कुछ भी हो जाए मुझे ये इंट्रेंस एग्जाम क्लीयर करना ही है | फिर भी मैं असफल हो रही थी | दरसल मेरी गलती मेहनत में नहीं मेरी स्ट्रेटजी में थी | जो की अपने मूल स्वाभाव को न समझ पाने के कारण हुई |
                            शुरू से ही मेरे घर में पढाई का बहुत अच्छा  वातावरण था  | मेरे पिता आई आई एम अहमदाबाद से गोल्ड मेडीलिस्ट व् माँ एक नामी स्कूल में प्रिंसिपल है | बचपन से ही मेरे ऊपर दवाब था |दो जीनियस लोगों की बेटी को अच्छा तो करना ही चाहिए | आखिर कार जींस जो मिले हैं |  और था भी सही | शुरू से ही मेरे माता – पिता ने मेरी पढाई का बहुत ध्यान रखा | माँ मुझे घर आने के बाद  नियम से पढ़ाई कराती  और पिताजी न सिर्फ मुझे एक से बढ़कर एक बुक्स मुहैया कराते बल्कि यूँ खेलते – खेलते न जाने कितनी जानका रियाँ दे देते | इस तरह से कह सकते हैं की बचपन से ही मेरा आई क्यू बहुत स्ट्रांग हो गया





अंजू शर्मा  


"छह बजने में आधा घंटा बाक़ी है और अभी तक तुम तैयार नहीं हुई!  पिक्चर निकल जाएगी, जानेमन!!!"

मानव ने एकाएक पीछे से आकर मुझे बाँहों में भरते हुए ज़ोर से हिला दिया!  बचपन से उसकी आदत थी, मैं जब-जब क्षितिज को देखते हुए अपने ही ख्यालों में डूबी कहीं खो जाती, वह ऐसे ही मुझे अपनी दुनिया में लौटा लाता!  उसका मुझे 'जानेमन' कहना या बाँहों में भरकर मेरा गाल चूम लेना किसी के मन में भी भ्रम उत्पन्न कर सकता था कि वो मेरा प्रेमी है!  मेरी अपनी एक काल्पनिक दुनिया थी जिसमें खो जाने के लिए मैं हरपल बेताब रहती!  ढलते सूरज की सुनहरी किरणों में जब पेड़ों की परछाइयाँ लंबी होने लगती, शाम दबे पाँव उस प्रेमिका की तरह मेरी बालकनी के मनी-प्लांट्स को सहलाने लगती जो अपने प्रेमी की प्रतीक्षा करते हुए हर सजीव-निर्जीव शय को अपनी प्रतीक्षा में शामिल करना चाहती है!  ऐसी शामों के धुंधलकों में मुझे खो जाने देने से बचाने की कवायद में, तमाम बचकानी हरकतें करता, वह मेरे आँचल का एक सिरा थामे हुए ठीक मेरे पीछे रहता!  ऐसा नहीं था कि यह उसकी अनधिकार चेष्टा मात्र थी, कभी मैं भी उसकी हंसी में शामिल हो मुस्कुराती तो कभी कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए उसकी पीठ पर धौल जमाते हुए ऐतराज़ जताती!




वो बेटी ही थी | और शादी के बाद बहू बन गयी |
सर पर पल्ला रखो ~ अब तुम बेटी नहीं बहू हो
• कुछ तो लिहाज करो , पिता सामान ही सही पर ससुर से बात मत करो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो
• माँ ने सिखाया नहीं , पैताने बैठो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो
• घर से बाहर अकेली मत निकलो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो
• अपनी राय मत दो , जो बड़े कहे वही मानो ~ तुम बेटी नहीं बहू हो

                                 गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं ?
एक बार की बात है एक संत अपने शिष्यों के साथ बाग़ में पुष्प चुनने गए | बाग़ का वातावरण बहुत शांत था |ठंडी -ठंडी हवा चल रही थी | सुन्दर फूल खिले  हुए थे | हवा भी उन पुष्पों को छू कर सुवासित हो रही थी | कुछ लोग टहल रहे थे , कुछ व्यायाम कर रहे थे और कुछ घास पर बैठ कर ग्रुप बना कर बातें कर रहे थे | शिष्यों को बहुत अच्छा लगा , वे भी राम नाम लेते हुए पुष्प चुनने लगे |

                      तभी एक ग्रुप में बैठे दो व्यक्ति  किसी बात पर भिड  गए | वो जोर - जोर से चिल्ला कर अपनी बात सही सिद्ध करने लगे | शिष्यों व् गुरूजी को उनका चिल्लाना अच्छा नहीं लगा |

संत ने शिष्यों से पूंछा क्या तुम में से कोई बता सकता है कि गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं ?

सभी शिष्यों ने अपने हिसाब से उत्तर दिया, जैसे लोग आपा  खो बैठते हैं , यही तरीका उनके संस्कार में है , क्रोध में स्वर पर ध्यान नहीं जाता आदि - आदि | गुरूजी किसी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए , तब शिष्यों ने कहा ,  " गुरुदेव आप ही बता दीजिये | कि गुस्से में चिल्लाते क्यों हैं ?


गुरूजी बोले , " जब कोई व्यक्ति हमारे पास होता है तो हम सामान्य आवाज़ में ही बात करते हैं पर जब वह व्यक्ति दूर चला जाता है तो हमें जोर से बोलना पड़ता है , कोई व्यक्ति बहुत दूर हो और उसे बुलाना हो तो चिल्ला कर उसका नाम पुकारना पड़ता है |गुस्से में भी यही बात होती है | जब दो व्यक्ति आपस में गुस्सा कर रहे होते हैं तो उनके दिल बहुत दूर होते हैं | भले ही वो शारीरिक दृष्टि से नज़दीक हों पर दिलों की यह दूरी उन्हें चिल्ला कर बोलने पर विवश करती है क्योंकि सामान्य आवाज़ तो वो सुन ही नहीं सकते | 


     इसके विपरीत प्रेम जैसे - जैसे गहराता जाता है दो व्यक्ति आपस में धीमे - धीमे बात करने लगते हैं , फिर फुसफुसा कर बात करने लगते हैं और अंत में उन्हें शब्दों की आवश्यकता ही नहीं रहती वो मौन पढने लगते हैं | 

संसार में हम सब को दिलों के बीच की ये दूरी मिटाने का प्रयास करना चाहिए ताकि चिल्लना न पड़े बल्कि सब एक दूसरे के मन की बात खुद ही समझ सके | 

टीम ABC

प्रेरक कथाओं से 




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कई बार तब हम भोजन में अपनी समस्याओं का समाधान ढूँढने लगते हैं जब भावनाएं हमें  खा रही होती हैं – अज्ञात 


“देखिये आप बिंज ईटिंग डिसऑर्डर से बुलुमिया नेर्वोसा की तरफ बढ़ रही हैं अब अगर आप खाने से दूर नहीं रहीं तो ये खाना आपको खा जाएगा “कहते हुए डॉक्टर ने मुझे दवाइयों और देखभाल की लंबी – चौड़ी  फेहरिशत  पकड़ा | मैं निराशा से भरी डॉक्टर के केबिन से बाहर निकली | मुझे देख कर बाहर बैठी दो लडकियां मुस्कुरा दी | एक ने चुटकी ली ,” अगर ये अपना खाना कम कर दे तो देश की खाने की समस्या काफी हद तक खत्म हो जायेगी | उसके बाद हंसी के ठहाके  काफी देर तक मेरा पीछा करते रहे और मैं साडी के पल्लू से अपने भीमकाय शरीर को ढकने का असंभव  प्रयास करती रही | आप की जानकारी के लिए बता दूं की मेरी उम्र ३६ साल कद पांच फुट दो इंच और वजन पूरे ९० किलो | यानी 100 से बस १० कम | मेरा स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर का इलाज़ चल रहा है | क्योंकि मैं खाने से दूर नहीं रह पाती | अच्छा बुरा मैं कुछ भी खाती हूँ |यहाँ  तक की कुछ न मिलने पर मैं कच्चा आलू भी कहा लेती हूँ |  मैं तनाव में खाती हूँ और खाने की वजह से उपजे तनाव में और खाती हूँ | खाने  से मेरा ऐसा लगाव पहले नहीं था | माँ कहती हैं  ,” मैं बचपन में कुछ नहीं खाती थी , वो बुलाती रह जाती थीं और मैं खेल में इतनी मगन की सुनती ही नहीं | खाना ठंडा हो जाता तो एक दो कौर खा कर माँ अच्छा नहीं लग रहा है कह कर भाग जाती | कई बार माँ के डर लंच में दिया खाना सहेलियों को खिला देती या स्कूल के  डस्टबिन में फेंक आती , ताकि वो मुझे डांट न सके | फिर कब कैसे मैं इतना ज्यादा खाने लगी और खाना मुझे खाने लगा ? यादों के झरोखों से देखती हूँ तो वो दिन याद आता  है  जब रितेश से मेरी शादी हुई थी , न जाने कितने अरमान ले कर मैं इस घर में आई थी |


दुनिया एक खूबसूरत जगह होती अगर हम
किसी का आकलन करने के स्थान पर उसकी परिस्थिति को समझने की कोशिश करते
गुस्से में बेकाबू होने के स्थान पर
बोलने से पहले थोडा रुकते
किसी की गलती पर बुरे से बुरा सोंचने के स्थान पर
उसे संदेह का लाभ देते 





लेखिका -राधा शर्मा ( मुंबई -महाराष्ट्र )
कल रास्ते में निधि मिली | निधि उम्र ३२ साल एक घरेलू महिला व् दो बच्चों की माँ है | सामान्य रूप से शिक्षित निधि जब १० साल पूर्व गाजे –बाजे के साथ ससुराल में आई थी तब अक्सर उसे अपने पिता द्वारा दहेज़ कम देने के ताने सुनने पड़ते थे | निधि सोचती कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा ,वह सबकी की सेवा से सबका दिल जीतने का प्रयास करती रही |पर जब दहेज़ के ताने बर्दाश्त से बाहर हो गए तो उसने छोटे बच्चो को ट्यूशन पढ़ना शुरू किया | अपने ममतामयी व्यवहार के कारण धीरे –धीरे कई बच्चे उससे ट्यूशन पढने आने लगे |निधि खुश रहने लगी पर उसका मन तब टूट गया जब उसने अपनी सास को पड़ोसन से कहते सुना “ बहू के पिता ने तो कुछ दिया नहीं,लड़का सेत में चला गया . पर अब ये कुछ कमाने लगी है ,चलो हम यही मान लेंगे यही दहेज़ है |
हमारे समाज का कोढ़ दहेज़ न जाने कितनी लड़कियों को लील चुका है | कहीं न कहीं लड़की जन्म के समय निम्न और माध्यम वर्गीय माता –पिता के माथे पर आई चिंता की लकीरों का कारण भी यही है कि उन्हें लगता है “ बेटी हो गयी अब तो उन्हें जोड़ना ही जोड़ना है उसके लिए |



क्यों न जी कर मरें

एक बगीचे में एक घास का फूल था वह अपने अन्य  साथी घास के फूलों के साथ ईंटों की आड़ में दबा हुआ था | जब तेज हवा चलती उस पर कोई असर न होता क्योंकि वह इंटों की आड़ में था |  जब तेज सूरज चमकता तो उस पर कोई असर नहीं होता | जब बारिश आती तो भी वो इंटों की आड़ में दंबा होने के कारण बचा रहता |
इतना सुरक्षित होते हुए भी जाने क्यों उसका मन बेचैन रहता |


एक दिन उसने रात में भगवान् से प्रार्थना करी ,” हे प्रभू मुझे गुलाब का फूल बना दो | ये जीवन भी कोई जीवन है |

भगवान् उसके सपने में आकर बोले ,” एक बार फिर सोंच लो | गुलाब के फूल की जिन्दगी आसान नहीं है | जरा सी हवा चलती है तो हिलने लगता है , तूफान आते ही पत्तियाँ झड जाती है | बड़ा भी नहीं हो पाता की कोई न कोई तोड़ लेता है |

घास का फूल अपने निर्णय पर अडिग था |


सुबह घास का फूल , गुलाब का फूल बन चुका था |अलसाए से घास के फूलों ने उसे देखा तो आपस में कहा , “निरा मूर्ख था | यहाँ आराम से सुरक्षित था | क्या जरूरत थी गुलाब का फूल बनने की |

पर गुलाब का फूल ऊपर डाली  पर बैठ दुनिया देख बहुत खुश हो रहा था | इंटों में दबे होने के कारण तो उसे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं देता था | अब कभी हवा लग रही थी कभी धूप , तो कभी भौरे गुनगुना रहे थे | बड़ा मजा आ रहा था |

तभी हवा का तेज झोंका आया | गुलाब का पौधा बुरी तरह से हिला | उसकी रूह काँप गयी | थोड़ी देर बाद सामने बच्चे खेल रहे थे जो उसे तोड़ने के लिए दौड़े | गुलाब मन ही मन राम – राम करने लगा | ये तो अच्छा हुआ बाग़ के माली ने उन्हें डांट कर भगा दिया | पर दोपहर की धूप ... उफ़ लग रहा था जैसे सूरज सर पर ही बैठा है | फिर भी किसी तरह से धुप झेल ही ली, पर शाम को तो इतनी जोर का तूफ़ान आया की गुलाब का पौधा ही जमीन  पर आ गिरा |

अंतिम साँसे लेता हुआ गुलाब का फूल अब  घास के फूलों के करीब आ गया था | घास के फूल हमदर्दी दिखाने लगे ... च्च्च ... कहा था ,मत बनो गुलाब के फूल , क्या फायदा हुआ ? हम जैसे भी हैं , भले हैं | हाँ , कुछ दुःख हैं पर सुविधायें कितनी हैं | अगर तुमने हमारी बात मान ली होती तो आज यूँ न मरते |

गुलाब के फूल ने उखड्ती  हुई साँसों से कहा ,  “ मुझ पर अफ़सोस जताना बंद करो | एक दिन ही सही पर मैं आज जी भर के जिया | वहां से दुनिया देखी , भवरों का गीत सुना |तेज धूप की तपिश झेली , तेज हवा में जोर से हिला और तूफ़ान से भी बहुत देर संघर्ष किया | मैं अपने फैसले पर खुश हूँ | क्योंकि मैं जी कर मर रहा हूँ और तुम सब मरे हुए जी रहे हो |


अंजू गुप्ता 
प्रेरक कथाओं से 
अन्य ..........


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प्रेम वो नहीं है जो आप कहते हैं प्रेम वह है जो आप करते हैं

                      इस विषय को पढना आपके लिए जितना मुश्किल है उस पर लिखना मेरे लिये उससे कहीं अधिक मुश्किल है | पर सुधा के जीवन की त्रासदी  ने मुझे इस विषय पर लिखने पर विवश किया | 

             सुधा , ३२ वर्ष की विधवा | जिस   के   जीवन का अमृत सूख गया है | वही कमरा था , वही बिस्तर था ,वही अधखाई दवाई की शीशियाँ , नहीं है  तो सुरेश | १० दिन पहले जीवनसाथी को खो चुकी सुधा की आँखें भले ही पथरा गयी हों | पर अचानक से वो चीख पड़ती है | इतनी जोर से की शायद सुरेश  सुन ले व्  लौट आये | अपनी सुधा के आँसूं पोछने और कहने की “ चिंता क्यों करती हैं पगली | मैं हूँ न | सुधा जानती है की ऐसा कुछ नहीं होगा | फिर भी वो सुरेश के संकेत तलाशती है , सपनों में सुरेश को तलाशती हैं , अगले जन्म का सोंच , किसी नन्हे शिशु में  सुरेश को तलाशती है | उसे विश्वास है , सुरेश लौटेगा | यह विश्वास उसे इतनी दर्द व् तकलीफ के बाद भी  जिन्दा रखता है | मृत्यु की ये गाज उस पर १० दिन पहले नहीं गिरी थी |  दो महीने पहले यह उस दिन गिरी थी जब डॉक्टर ने सुरेश के मामूली सिरदर्द को कैंसर की आखिरी स्टेज बताया था | और बताया था की महीने भर से ज्यादा  की आयु शेष नहीं है | बिज़ली सी दौड़ गयी थी उसके शरीर में | ऐसा कैसे ? पहली , दूसरी , तीसरी कोई स्टेज नहीं , सीधे चौथी  ... ये सच नहीं हो सकता | ये झूठ है | रिपोर्ट गलत होगी | डॉक्टर समझ नहीं पाए | मामूली बिमारी को इतना बड़ा बता दिया | अगले चार दिन में १० डॉक्टर  से कंसल्ट किया | परिणाम वही | सुरेश तो एकदम मौन हो गए थे | आंसुओं पोंछ कर सुधा ने ही हिम्मत करी | मंदिर के आगे दीपक जला दिया और विश्वास किया की ईश्वर  रक्षा करेंगे चमत्कार होगा , अवश्य होगा |
सुधा , स्तिथि की जटिलता समझ तो रही थी पर मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रही थी





- डा0 जगदीश गाँधी, संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) परमात्मा तथा उसके सेवक छुट्टी कर लें तो संसार तथा ब्रह्ममाण्ड में हाहाकार मच जाये:- 
            परमात्मा ने जब से यह सृष्टि बनायी तभी से अपने सेवकों सूर्य, वायु, चन्द्रमा, ग्रह, पर्यावरण, प्रकृति आदि को अपने द्वारा रचित मानव जाति की सेवा के लिए नियुक्त किया। सृष्टि का गतिचक्र एक सुनियोजित विधि व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। ब्रह्ममाण्ड में अवस्थित विभिन्न नीहारिकाएं ग्रह-नक्षत्रादि परस्पर सहकार-संतुलन के सहारे निरन्तर परिभ्रमण विचरण करते रहते हैं। अपना भू-लोक सौर मंडल के वृहत परिवार का एक सदस्य है। सारे परिजन एक सूत्र में आबद्ध हैं। वे अपनी-अपनी कक्षाओं में घूमते तथा सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सूर्य स्वयं अपने परिवार के ग्रह उपग्रह के साथ महासूर्य की परिक्रमा करता है। इतने सब कुछ जटिल क्रम होते हुए भी सौर, ग्रह, नक्षत्र एक दूसरे के साथ न केवल बंधे हुए हैं वरन् परस्पर अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान भी करते हैं। इस सृष्टि का रचनाकार परमात्मा कभी अवकाश नहीं लेता है तथा उसके सेवक सूर्य अपनी किरणों





नेहा नाहटा,जैन
दिल्ली


माला फेरकर जैसी ही प्रेरणा ने आँखे खोली,सामने खड़ी बेटी और पतिदेव ठहाके मारने लगे
मान्या तो पेट पकड़ पकड़ कर हंसी से दोहरी हुयी जा रही थी ।
प्रेरणा आँखे फाडे अचंभे से उन्हें देखते हुए बोली,"अरे क्या हुआ,ऐसे क्यों हँस् रहे हो तुम दोनों "
पर दोनों की हंसी तो रुकने का नाम ही नही ले रही थी।
प्रेरणा ने निखिल का मुँह अपने हाथ से टाइट दबाकर उनकी हंसी रोकते हुए बेटी से पूछा,
" बाबू प्लीज़ बताना ,क्या हुआ ऐसा,जो तुम हँस रहे हो,
क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा हुआ है ।"




                                      आज इन दो पत्रों को पढ़ते हुए फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम का एक डायलाग याद आ गया | पिता भले ही अपने स्नेह को व्यक्त करे न करे  बच्चों के साथ खुल कर बात करे न करें पर माँ कहती रहती है , कहती  रहती है , भले ही बच्चा सुने न सुने | पर ये कहना सिर्फ कहना नहीं होता इसमें माँ का स्नेह होता है आशीर्वाद होता है और विभिन्न परिस्तिथियों में अपने बच्चे को समन्वय करा सकने की कला का उपदेश भी | पर जब बच्चे दूर चले जाते हैं तब भी फोन कॉल्स या पत्र के माद्यम से माँ अपने बच्चे का संरक्षण करती रहती है | वैसे तो आजकल लड़का , लड़की की परवरिश में में कोई भेद नहीं पर एक माँ ही जानती है की दोनों को थोड़ी सी शिक्षा अलग - अलग देनी है | जहाँ बेटी को पराये घर में रमने के गुर सिखाने हैं वहीँ बेटे के मन में स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना भरनी है | ऐसे ही एक माँ ( डॉ >  भारती वर्मा ) के अपने बच्चों ( बेटे व् बेटी ) के लिए लिए गए भाव भरे खत हम अपने पाठकों के लिए लाये है | ये खत भले ही ही निजी हों पर उसमें दी गयी शिक्षा हर बच्चे के लिए है | पढ़िए और लाभ उठाइये .........

मेरी प्यारी बेटी
कैसी हो?कितने दिन हो गए तुम्हें अपने गले से लगाए हुए। कहाँ तो एक दिन भी तुम्हें याद किए बिना बीतता नहीं था मेरा। पर अब कितनी विवश हूँ मैं। याद रोज़ करती हूँ, रोज़ अपनी अश्रुपूर्ण आँखों से तुम्हारे पापा के साथ उन रूपों के बीच निहारती हूँ तुम्हें, जिनमेँ जब-तब हमें याद कर आँसू बहाते हुए ढूँढती हो तुम। पर मैं तुम्हारे आँसू पोंछ नहीं सकती, तुम्हें सांत्वना नहीं दे दे सकती, तुम्हें अपनी छाती से लगा कर चुप नहीं करा सकती, क्योंकि अब मैं तुम्हारे पापा के साथ उस संसार में हूँ जहाँ से , लोग कहते हैं कोई लौट कर नहीं आता। बस दूर से अपनों को देख सकता है। अब यही हमारे बस में है बेटी




कहते है हर चीज परिवर्तनशील है समय बदलता है तो सब कुछ बदल जाता है | पर सृष्टि का पहला रिश्ता माँ और संतानं का आज भी यथावत है………. आज भी माँ का अपनी संतान के प्रति वही स्नेह है वही कोमल भावनाएं हैं |फिर भी समय के साथ माँ की सोंच में उसके दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है | अगर एक एक पीढ़ी पहले तक कि माँ की बात करे तो माँ की धुरी केवल बच्चे हुआ करते थे | उसका पूरा समय बच्चो में जाया करता था |उसके ईतर वो अपने लिए कुछ भी नहीं सोचती थी |बच्चे बड़े होते थे …. अपने अपने घर बसाते थे और माँ एकाकी महसूस करती थी,अपने को छला हुआ महसूस करती थी | वहीं आज माओं में परिवर्तन आया है |माँ और बच्चे का ममता का रिश्ता यथावत है पर वो अपने बारे में भी सोंचती है ,कुछ समय अपने लिए भी निकालती है,उसके कुछ शौक हैं जिन्हें वो पूरा करना चाहती है कुछ सपने है जिन्हें वो पाना चाहती है ऐसे में कई बार वो अपने बच्चो को उतना समय नहीं दे पाती जितना वो चाहते हैं ,पर जीवन के विविध पहलुओ पर राय ज्यादा बेहतर दे पाती है |तो फिर बेहतर कौन है “माँ या मॉम “अटूट बंधन टीम नें इस विषय पर विचार आमंत्रित किये …… यह एक बहुत रोचक प्रयोग रहा हर आयु वर्ग के लोगों ने बढ़ –चढ़ कर हिस्सा लिया | उनमें से कुछ के विचार हम यहाँ आप सब के लिए लाये हैं |


दिल का दर्द 
मंगलवार को हरिद्धार जाना हुआ और अभी तक मन वही अटका है ! वो बूढ़ी सी आँखे अभी भी दिख रही सवाल भरी |
गंगा स्नान के वक्त वो वहा बेठी थी ! कुछ पोलोथिन लेकर , आते जाते गीले कपड़ो को रखने के लिए कोई ले ले तो |
कमजोर और बुजुर्ग इतनी तेज धूप | मासूम सी चेहरे की चमक बता रही थी की काफी अच्छी ज़िन्दगी जी होगी उन्होंने | तभी आते जाते कोई कुछ देता तो आँखे झुका लेती थी कोई पहचान ना ले शायद |
जब में गयी तो बहुत अभिमान से — लेकिन उनसे मिल कर बहुत बेबस सा महसूस किया | मैंने कुछ बिस्किट के पैकेट दिए — और कुछ कपडे जो देने के लिए ले गयी थी उसमे से एक। साड़ी मैंने उन्हें दी | आँखे छलछला गयी उनकी और बोली बेटा ये साड़ी उस कोने में बेठी लड़की को दे दो | इस फटी साड़ी में ठीक हु पर आते जाते लोग उसको नहीं उसके जिस्म को घूरते है तो रोना आता है | उस लड़की को देख मन परेशान हुआ ! अम्मा। क्या वो आपकी ? पैदा नहीं किया मैंने — मुझे मेरे बुढ़ापे का बोझ समझ और उसको अपाहिज समझ छोड़ गए यहाँ हमारे अपने ! जब तक मेरी साँस है में उसको सम्भालूंगी बाद में ये गंगा मैया ||
आह्ह्ह्ह समझ नहीं पायी क्या करू ! अपने कपडे उस लड़की को पहनाए तो बोली ऐ जीजी ये पेट भरता क्यों नहीं | उसने मुझे ऐसी ज़िन्दगी दी तो पेट क्यों दे दिया | भारी मन से कुछ खाना दिलाया खा कर संतोष से बोली अब कब आओगी ||
चली आई – मन वही |
                              



  वो माँ भी है और बेटी भी |इस अनमोल रिश्ते में अनमोल प्रेम तो है ही पर जहाँ एक और उसके ह्रदय में अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता का भाव है वहीँ अपने बच्चों के प्रति कर्तव्य  का बोध | कैसे संभाल पाती है एक स्त्री  स्नेह के इन दो सागरों को एक साथ | तभी तो छलक जाती हैं बार बार आँखें , और लोग कहतें हैं की औरतें रोती बहुत हैं | आज मदर्स डे के अवसर पर हम लाये हैं एक साथ सात स्त्री स्वर , देखिये कहीं आप की आँखें भी न छलक पड़ें | इसमें आप पढेंगें वंदना गुप्ता , संगीता सिंह " भावना ", डॉ . किरण मिश्रा , आभा खरे , सरस दरबारी , डॉ . रमा द्विवेदी और अलका रानी की कवितायें 


जहाँ एक तरफ माँ का प्यार अनमोल है वही हर संतान अपनी माँ के प्रति भावनाओं का समुद्र सीने में छुपाये रखती है | हमने एक आदत सी बना रखी है " माँ से कुछ न कहने की " खासकर पुरुष एक उम्र के बाद " माँ मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ " कह ही नहीं पाते | मदर्स डे उन भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अवसर देता है | इसी अवसर का लाभ उठाते हुए रंगनाथ द्विवेदी जी ने माँ के प्रति कुछ भाव पुष्प अर्पित किये हैं | जिनकी सुगंध हर माँ और बच्चे को सुवासित कर देगी |




माँ की दुआ आती है मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से, मुझे एैसा लगता है कि जैसे------- इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है। नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत, कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,