जब मोटिवेशन ,डीमोटिवेट करें – मुझे डिफेंसिव पेसिमिज्म से सफलता मिली

जो आशावादी  था उसने हवाई जहाज बनाया , जो डिफेंसिव पेसिमिस्ट था उसने पैराशूट बनाया | दोनों ही सफल हैं व् समाज के लिए जरूरी भी | ...



जो आशावादी  था उसने हवाई जहाज बनाया , जो डिफेंसिव पेसिमिस्ट था उसने पैराशूट बनाया | दोनों ही सफल हैं व् समाज के लिए जरूरी भी |

                     मैं मालविका वर्मा , मेडिकल फोर्थ इयर स्टूडेंट हूँ | आज जब मैं सफलता के नए अध्याय  लिख रही हूँ तो पीछे पलट कर देखने पर मुझे अपने वो तीन ड्राप ईयर’स और उनमें की गयी गलतियां याद आती हैं | जब मैं लगातार असफल हो रही थी | मेरा सपना डॉक्टर बनने का था और मैं  किसी भी प्रकार उसका इंट्रेंस क्लीयर करना चाहती थी | मैंने भी ठान ली थी चाहें कुछ भी हो जाए मुझे ये इंट्रेंस एग्जाम क्लीयर करना ही है | फिर भी मैं असफल हो रही थी | दरसल मेरी गलती मेहनत में नहीं मेरी स्ट्रेटजी में थी | जो की अपने मूल स्वाभाव को न समझ पाने के कारण हुई |
                            शुरू से ही मेरे घर में पढाई का बहुत अच्छा  वातावरण था  | मेरे पिता आई आई एम अहमदाबाद से गोल्ड मेडीलिस्ट व् माँ एक नामी स्कूल में प्रिंसिपल है | बचपन से ही मेरे ऊपर दवाब था |दो जीनियस लोगों की बेटी को अच्छा तो करना ही चाहिए | आखिर कार जींस जो मिले हैं |  और था भी सही | शुरू से ही मेरे माता – पिता ने मेरी पढाई का बहुत ध्यान रखा | माँ मुझे घर आने के बाद  नियम से पढ़ाई कराती  और पिताजी न सिर्फ मुझे एक से बढ़कर एक बुक्स मुहैया कराते बल्कि यूँ खेलते – खेलते न जाने कितनी जानका रियाँ दे देते | इस तरह से कह सकते हैं की बचपन से ही मेरा आई क्यू बहुत स्ट्रांग हो गया
| साथ ही मेरे सपने भी | मैं भी अपने माता – पिता के पदचिन्हों पर चलकर कुछ बेहतर करना चाहती थी | जिससे वो मुझ पर फक्र कर सकें | मेरे ऊपर दवाब भी था और मेरे अनवरत प्रयास भी जारी थे | मैं खेल के समय में कटौती करके पढ़ाई करती मुझे मेडिकल एंट्रेंस जो क्लीयर करना था | माँ और पिता भी मुझे असफल जीवन से डराते भी थे | या यूँ कहिये की मुझे असफलता बहुत भयभीत करती |इसलिए मैं असफल; होने का हर कारण सोंच कर पहले से ही उस द्वार को बंद कर देती | मैं लगातार सफल होती जा रही थी | इस कारण मुझ पर दवाब बढ़ रहा था | १२ th तक सब अच्छा चला | पर मेडिकल में मैं कुछ नंबर  से रह गयी | मैंने ड्राप करके दुबारा एग्जाम देने का मन बनाया |



                  इसी समय बहुत से लोगों ने मुझे राय देना शुरू किया | तुम पॉजिटिव सोंचा करो | पॉजिटिव सोंचने से रिजल्ट अच्छे आते हैं | मुझे बात सही लगी | मैं बाज़ार से ढेर सारी  किताबें पॉजिटिव थिंकिंग की ले आई | अच्छा सोंचो , ऊँचे सपने देखो , अच्छे एंड रिजल्ट की कल्पना करो , अपने आत्मविश्वास को बढाओ ... और छू लो आसमान | मुझे सब कुछ बहुत आसान लगा | मैं खुद को डॉक्टर के रूपमें देखती , मैं कल्पना करती की मैं सारे exam बहुत अच्छे दे रही हूँ , मैं आत्म विश्वास से भरी हुई हूँ | पर खुश होने के  स्थान पर रिलैक्स होने से  मेरा तनाव बढ़ जाता |यहाँ मैं बता दूं मैंने सपनों और कल्पनाओं को जीया तो जरूर पर मेहनत में कोई कमी नहीं की | फिर भी रिजल्ट सही नहीं  आया | यहाँ तक की इस बार मेरे पिछली  बार से भी कम नंबर आये | मेरा आत्मविश्वास डगमया पर मैंने फिर प्रयास करने की ठानी | अब की मैंने मेहनत और बढा दी , साथ ही साथ खुद को सफल रूपमें देखने व् सोंचने की सीमा भी | अब मैं ज्यादातर यही सोंचती की मुझे सफलता मिल गयी है , मैं डॉक्टर बन गयी हूँ | पर अफ़सोस मेरे नंबर और कम आये | अब मैं सफलता से थोडा और दूर थी | अब मैंने अपने कारणों की एनालिसिस करना शुरू किया | मेरी मेहनत में तो कोई कमी नहीं थी | फिर क्यों मैं असफल हुई |




          यही वो समय था | जब मेरे पिता अपना जॉब स्विच ओवर कर रहे थे | उनका इंटरव्यू था | जैसा की मैंने पहले ही लिखा था की वो  जीनियस हैं | पर इंटरव्यू से पहले वो बहुत नर्वस थे | वो तमाम फ़ालतू कल्पनाएँ कर रहे थे | मसलन अगर घबराहट में उनके हाथ से कॉफ़ी का कप गिर गया , या वो कुर्सी पर ठीक से बैठ नहीं पाए , या गैस की वजह से उन्हें तेज डकार आ गयी | उनकी कल्पनाओं को सुन – सुन कर मुझे हंसी आ रही थी | मुझे लगा इतने कमजोर आत्मविश्वास में वो इंटरव्यू देंगे तो क्या ख़ाक सफल होंगे | पर शाम को जब वो मिठाई का डिब्बा क्ले कर आये तो मेरे आश्चर्य की सीमा न रही | उन्होंने इंटरव्यू क्रैक कर लिया था | उनकी सैलिरी १० % बढ़ गयी थी | मैंने याद किया की अपने हर इंटरव्यू से पहले पिताजी ऐसे अजीबो गरीब कल्पनाएँ करते हैं | फिर भी वो इंटरव्यू क्रैक करते हैं | फिर खुद ही सोंचा ,” शायद वो जीनियस हैं इसलिए | “ तभी ध्यान आया की पिताजी अपने जीवन की हर समस्या में बुरे से बुरे की कल्पना करते हैं और फिर उस समस्या से बाहर निकल जाते हैं | फिर मैंने  अपने ऊपर ध्यान दिया | मैं भी तो पहले असफल हो जाउंगी का भय पाले रहती थी तब तक लगातार सफल हो रही थी | जब अपने को सफल होने की कल्पना करने लगी तो असफल होने लगी | ओह ! मेरे हाथ में सूत्र लग गया | मैंने एक बार फिर ड्राप करने का निर्णय लिया | पहले मेरे माता – पिता ने मेरा विरोध किया फिर मान गए | इस बार मैंने कोई गलती नहीं की | रिजल्ट मेरी इच्छा के अनुसार आया | मेरा चयन हो गया था | न सिर्फ मेरा चयन हुआ था बल्कि मेरे अपने जिले में सबसे ज्यादा नंबर थे | मुझे पढने के लिए नामी मेडिकल कॉलेज मिला |जानिये कैसे ....


मानव स्वाभाव की भिन्नता

              आप सोंच रहे होंगे आखिर मुझे क्या सूत्र मिला | जी हां ! मुझे सूत्र मिला मनुष्य  के मूलभूत स्वाभाव का | जो भिन्न होता है | एक ही रुल से पूरी मानव जाति को नहीं चलाया जा सकता | अगर दार्शनिक अंदाज में कहे तो ये ईश्वर ने ये दुनिया बनायीं | क्योंकि ईश्वर ने बनायीं है इसलिए ये दुनिया बहुत खूबसूरत है | पर यहाँ शैतान का भी अस्तित्व है क्यों ?क्यों की जगह आप कहेंगे क्यों नहीं ? क्योंकि ईश्वर ने हर चीज का ठीक उल्टा भी बनाया है | |  दिन बनाया तो रात भी है | फूल बनाये तो कांटे भी है | मैटर है तो एंटी मैटर भी है | विष है तो उसका एंटीडोट भी है | सफलता बनायीं तो विफलता भी है | मानव स्वाभाव में भी बहुत विचित्रता है | एक ही घर के दो बच्चे एक बिलकुल शांत तो दूसरा गुस्सैल | उसी तरह से बुरे से बुरा देखने वाले निराशा वादी और अच्छे से अच्छा सोंचने वाले आशावादी बनाये | आपको ये जानकार आश्चर्य होगा की डिफेंसिव पेसिमिस्ट  और स्ट्रेटिजिक ऑप्टीमिस्ट में सफलता का आंकड़ा ५० – ५०है |
                         आज सेल्फ हेल्प बुक्स से बाजार भरा पड़ा है | ज्यादातर सब पॉजिटिव थिंकिंग पर | जिस ने  सफलता के लिए पॉजिटिव सोंचने , ऊँची से ऊँची कल्पनाएँ करने व् अपने को पहले से ही उस स्थान पर देखने के ऊपर जोर दिया गया | ज्यादातर लोग आज यही कर रहे हैं | फिर भी सफल नहीं होते | उनमें से कई मेहनती व् इंटेलिजेंट भी होते हैं | फिर क्यों असफल होते हैं | इसकी वजह किसी नए काम , विपरीत परिस्तिथियों में मानव के रिएक्ट करने के मूलभूत स्वाभाव में अंतर है | कुछ लोग सामरिक आशावादी व् कुछ डिफेंसिव निराशावादी होते हैं | बाकी इनके बीच में किसी एक तरफ थोडा ज्यादा झुके हुए होते हैं | यहाँ मैं स्पष्ट करना चाहूँगी की निराशावादी और सतर्क निराशावादी में अंतर है | सतर्क निराशवादी वो है जो पहले से ही हर परिस्तिथि की बुरी से बुरी कल्पना कर लेता है और सबका हल भी सोंच लेता हैं फिर कहीं असफल न हो जाऊं इस भय से बहुत मेहनत भी करता है |

क्या आप जानते हैं आशावादी दृष्टिकोण पक्षपाती होता है

                                   दरसल मानव का मूल स्वाभाव ही आशावादी होता है और ये आशा वाद अपने पक्ष में झुका हुआ होता है | हममें से हर किसी को दिल के कोने में लगता है की हम दूसरों से बेहतर हैं या हम दूसरों से ज्यादा अच्छा काम करते हैं /कर सकते हैं | इसका सीधा सा उदहारण है की कोई चेन  स्मोकर ये नहीं सोंचता की उसे कैंसर हो जाएगा | वो सिगरेट के पैकेट पर लिखी गयी चेतावनी को पढने के बाद भी आशा करता है की उसे कैंसर नहीं होगा | या यूँ कह सकते हैं की एक तरह  से हमारा दिमाग भी पक्षपाती होता है | वैग ज्ञानिक टैली शेरोट के अनुसार स्वभावत : हमारा दिमाग  हमेशा ऊपर की तरफ देखता है |अर्थात चीजों का सकारात्मक पक्ष ही देखता है |  कुछ हद तक  ये जरूरी भी है , तभी इंसान असंभव से लगने वाले कामों को करता है , खतरे उठाता है , व् अनजान दिशा में छलांग लगाता है | कुछ असंभव करने के लिए या लाइफ में जिंग बनाये रखने के लिए ये जरूरी भी है पर ये हमेशा सही हो ये जरूरी नहीं | ये जरूरी नहीं की आप ढेर सारा फ़ास्ट फ़ूड खाए और निश्चिन्त रहे की आपकी धमनियों में तो कोलेस्ट्रोल जमेगा ही नहीं | ये वो समय है जब आशावादी दृष्टिकोण नकारात्मक रूपमें सामने आता है |




अपने मूलभूत स्वाभाव को पहचानिए
                 सफलता के लिए आपको अपने मूलभूत स्वाभाव को पहचानना होगा | अगर आप इसके विपरीत चलेंगे तो आप को विपरीत परिणाम मिलेंगे | जैसा की मैंने पहले बताया की कुछ लोग सामरिक आशावादी व् कुछ डिफेंसिव निराशावादी होते हैं | बाकी इनके बीच में किसी एक तरफ थोडा ज्यादा झुके हुए होते हैं | जो लोग बीच में है वो जिस तरफ ज्यादा झुके हुए हैं उसी तरह से सोंचने से उन्हें सही परिणाम मिलेंगे | परिणाम सिर्फ अच्छा सोंचने से नहीं मिलेंगे |


जानिये क्या है आशावादी vs बुरे से बुरा सोंचने वाला निराशा वादी

                                 हममे से ज्यादातर लोग ये सोंचते हैं की आशावादी  ही सफल होते हैं | क्योंकि उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ होता है व् वो बड़ीउम्मीदें  पाले रखते है |
पर बुरे से बुरा सोंचने वाले निराशावादी भी सफल  होते देखे गए हैं | क्योंकि वो चिंतित होते हैं इसलिए वो अपने लिए कम उम्मीदें पालते हैं | जिस कारण वो सफल होने का कम  दवाब महसूस करते  हैं | वैज्ञानिक नोरेम के अनुसार डिफेंसिव पेसिमिस्ट बुरे से बुरा सोंचने की वजह से तनाव में रहते हैं | तनाव को कम करने के लिए वो क्रिया ( अपना काम) का सहारा लेते हैं |  बुरे से बुरा सोंचने के कारण वो अपने को मोटिवेट करने व् कठोर परिश्रम पर ज्यादा ध्यान देते हैं | हर परिस्तिथि को पहले से ही सोंच कर उसकी तैयारी कर लेते हैं | यानी कहीं लूप होल  नहीं छोड़ते |  मोटे तौर पर आशावादी और सतर्क निराशावादी अलग – अलग परिस्तिथियों में सफल होते हैं | अगर आप को आशावादी या सतर्क निराशावादी दोनों को मोटिवेट करना हो तो दोनों के लिए  एक दूसरे से बिलकुल विपरीत तरीके इस्तेमाल करने होंगे |

उल्टा – पुल्टा का नियम

              ज्यादातर लोग खुद के बारे में ये बात नहीं जानते व् पेरेंट्स भी गलती  कर जातें है | एक आशावादी  बच्चा  थोडा सॉफ्ट म्यूजिक चलाएगा और पढ़ेगा और अच्छा रिजल्ट देगा | जबकि एक सतर्क निराशा वादी बच्चा यही करेगा तो उसका रिजल्ट   बुरा जाएगा | निष्कर्ष यह है की एक आशावादी व्यक्ति रिलैक्स होने पर अच्छा परफॉर्म करेगा व् एक सतर्क निराशा वादी स्ट्रेस में होने पर अच्छा परफॉर्म करेगा | नियम इतना उल्टा है की एक बच्चा हां ! मैं करूँगा में अच्छा परफॉर्म करेगा और दूसरा क्या मैं कर पाऊंगा ? में अच्छा परफॉर्म करेगा | एक प्रयोग में एक क्लास टीचर ने बच्चों से कहा की  थर्ड पीरियड में आपका मैथ्स का test होगा | पर पहले दो पीरियड उन्हें कुछ हल्का फुल्का पढ़ाया | इसमें सतर्क निराशावादी बच्चों ने बहुत अच्छा परफॉर्म किया | कुछ दिन बाद भी अध्यापिका ने यही बात फिर दोहराई परन्तु पहले दो पीरियड उन्हें विज्ञानं के कठिन चैप्टर पढाये | सतर्क निराशावादी बच्चो का परफोर्मेंस गिर गया | क्यों ? क्योंकि उन्हें मैथ्स test से पहले वो समय ही नहीं मिला जिसमें वो उस स्ट्रेस लेवल पर जा सकते जिस स्ट्रेस लेवल की जरूरत थी जिसमें उसका दिमाग बेस्ट परफॉर्म करता |  




जब मोटिवेशन डीमोटिवेट करें
एक प्रयोग कर के देखा गया |एक क्लास में आर्ट के test के बाद जिन् बच्चों  ने अच्छा किया था उनको सेलेक्ट कर लिया गया | अब अगले test से पहले उन बच्चों को मोटिवेट किया गया की तुमने तो पहला ही test इतना अच्छा किया है अब तो तुम बड़ी आसानी से दूसरा टेस्ट भी अच्छा कर लोगे |  इनमें से जो बच्चे सतर्क निराशा वादी थे उन पर इसका उल्टा  असर हुआ | उनकी परफोर्मेंस ३२ % कम हुई | एक साल बाद यही प्रयोग कम परफोर्मेंस वाले बच्चों पर पुन : दोहराया गया | अबकी बार उनसे कहा गया | लेवल वन में अच्छा कर लेना कुछ ख़ास नहीं है , लेवल २ बहुत कठिन है | उसको करने के लिए बहुत तैयारी की जरूरत है | आशा के विपरीत इस बार बच्चों का परिणाम बहुत अच्छा आया |
               इस प्रयोग से ये निष्कर्ष निकला की जो बच्चे सतर्क निराशावादी थे | उन्हें जब सकारात्मक तरीके से मोटिवेट किया गया | तो उनका स्ट्रेस लेवल घट गया | जिस कारण वो रिलैक्स हो गए | और परिस्तिथियों  के लिए ठीक से तैयार नहीं हुए | क्योंकि जब उनका स्ट्रेस लेवल  बढ़ा हुआ होता है तब वो स्ट्रेस कम करने के लिए काम और – और ज्यादा काम करते हैं हर बात का तोड़ सोंच कर रखते हैं | इस कारण उनका कांफिडेंस बढ़ जाता है | रिलैक्स होना उनके ऊपर उल्टा असर करता है | इसलिए मोटिवेशन कहीं न कहीं डी मोटिवेट करता है |

अलग – अलग जॉब के लिए दोनों जरूरी हैं

                            एस लेख को लिखने का  उद्देश्य यह नहीं है की एक के ऊपर दूसरे की श्रेष्ठता सिद्ध की जाए बल्कि यह है की यह है की सफल होने के लिए अपनी प्रकृति का ध्यान अवश्य रखे | जहाँ तक जॉब की बात है वो दोनों के लिए हैं |  क्योंकि दोनों ही हर तरह के जॉब में जाते हैं | पर देखा गया है की पब्लिक डीलिंग वाले काम जैसे की बीमा ऐजेंट , सेल्स मैंन , एक्टर , स्पीकर आदि  आशावादी होने पर अधिक सफल होते हैं | क्योंकि अपनी हार को पर्सनली नहीं लेते | मूवी फ्लॉप होने पर सोंचते हैं की समझ नहीं आई लोगों को | फिर अगली बार पूरे जोश से तैयारी करते हैं |  जबकि सतर्क निराशवादी इंजीनियर , डॉक्टर ,वैज्ञानिक  जॉब के लिए ज्यादा बेहतर साबित होते हैं | जहाँ वो गलती करने से घबराए रहते हैं इसलिए पहले से ही एक – एक चीज की बारीकी जाँच कर फैसले लेते हैं |




                          बेहतर तो यही है की हम जीवन में ऊँचे आसमान तक पहुँचने के सपने भी देखे , मार्ग के झंझट भी देखे और सफ़र से पहले अपने पैरों की क्षमता का आकलन भी कर लें | परन्तु हम सब इतने परफेक्ट नहीं होते | पर हम सब जीवन में सफल होना चाहते हैं | सफलता के लिए जरूरी है की हम अपने मूल स्वाभाव को पहचाने |


सोंचने की बात यह नहीं की हम गिलास आधा भरा देखते हैं या आधा खाली , सोंचने की बात ये है की क्या हम उसी हिसाब  से अपनी स्ट्रेटजी बनाते हैं या नहीं |

रियल स्टोरी -मालविका वर्मा , दिल्ली 
लेखिका - वंदना बाजपेयी 

                        


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#अगला_कदम के बारे में 
हमारा जीवन अनेकों प्रकार की तकलीफों से भरा हुआ है | जब कोई तकलीफ अचानक से आती है तो लगता है काश कोई हमें इस मुसीबत से उबार ले , काश कोई रास्ता दिखा दे | परिस्तिथियों से लड़ते हुए कुछ टूट जाते हैं और कुछ अपनी समस्याओं पर कुछ हद तक काबू पा लेते हैं और दूसरों के लिए पथ प्रदर्शक भी साबित होते हैं |
जीवन की रातों से गुज़र कर ही जाना जा सकता है की एक दिया जलना ही काफी होता है , जो रास्ता दिखाता है | बाकी सबको स्वयं परिस्तिथियों से लड़ना पड़ता है | बहुत समय से इसी दिशा में कुछ करने की योजना बन रही थी | उसी का मूर्त रूप लेकर आ रहा है
" अगला कदम "
जिसके अंतर्गत हमने कैरियर , रिश्ते , स्वास्थ्य , प्रियजन की मृत्यु , पैशन , अतीत में जीने आदि विभिन्न मुद्दों को उठाने का प्रयास कर रहे हैं | हर मंगलवार और शुक्रवार को इसकी कड़ी आप अटूट बंधन ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं | हमें ख़ुशी है की इस फोरम में हमारे साथ अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ व् कॉपी राइटर जुड़े हैं |आशा है हमेशा की तरह आप का स्नेह व् आशीर्वाद हमें मिलेगा व् हम समस्याग्रस्त जीवन में दिया जला कर कुछ हद अँधेरा मिटाने के प्रयास में सफल होंगे

" बदलें विचार ,बदलें दुनिया "

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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को : जब मोटिवेशन ,डीमोटिवेट करें – मुझे डिफेंसिव पेसिमिज्म से सफलता मिली
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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को
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