मातृ दिवस पर- एक माँ के अपने बच्चों ( बेटे और बेटी ) के नाम पत्र

                                      आज इन दो पत्रों को पढ़ते हुए फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम का एक डायलाग याद आ गया | पिता भले ही अपन...





                                      आज इन दो पत्रों को पढ़ते हुए फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम का एक डायलाग याद आ गया | पिता भले ही अपने स्नेह को व्यक्त करे न करे  बच्चों के साथ खुल कर बात करे न करें पर माँ कहती रहती है , कहती  रहती है , भले ही बच्चा सुने न सुने | पर ये कहना सिर्फ कहना नहीं होता इसमें माँ का स्नेह होता है आशीर्वाद होता है और विभिन्न परिस्तिथियों में अपने बच्चे को समन्वय करा सकने की कला का उपदेश भी | पर जब बच्चे दूर चले जाते हैं तब भी फोन कॉल्स या पत्र के माद्यम से माँ अपने बच्चे का संरक्षण करती रहती है | वैसे तो आजकल लड़का , लड़की की परवरिश में में कोई भेद नहीं पर एक माँ ही जानती है की दोनों को थोड़ी सी शिक्षा अलग - अलग देनी है | जहाँ बेटी को पराये घर में रमने के गुर सिखाने हैं वहीँ बेटे के मन में स्त्रियों के प्रति सम्मान की भावना भरनी है | ऐसे ही एक माँ ( डॉ >  भारती वर्मा ) के अपने बच्चों ( बेटे व् बेटी ) के लिए लिए गए भाव भरे खत हम अपने पाठकों के लिए लाये है | ये खत भले ही ही निजी हों पर उसमें दी गयी शिक्षा हर बच्चे के लिए है | पढ़िए और लाभ उठाइये .........



मातृ दिवस पर ...बेटी के नाम पत्र
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प्यारी बेटी उर्वशी

         आज तुमसे बहुत सारी बातें करने का मन है। हो भी क्यों न....माँ-बेटी का रिश्ता है ही ऐसा...जहाँ कितना भी कहो, कितना भी सुनो...फिर भी बहुत कुछ अनकहा-अनसुना रह जाता है।
           मैं अपने जीवन के उस स्वर्णिम पल को सर्वश्रेष्ठ मानती हूँ जब तुम्हें जन्म देकर मैंने तुम्हारी माँ होने का गौरवपूर्ण पद प्राप्त किया। जन्म से लेकर तुम्हें बड़ा करने तक, शिक्षा-दीक्षा, विवाह से लेकर विदाई तक के हर उस सुख-दुख, त्याग का अनुभव किया जिसे मेरी माँ ने मेरे साथ अनुभव किया होगा। हर माँ की तरह मैंने भी तुम्हारे बचपन के साथ अपना बचपन जिया। तुम्हारे सपनों में अपने सपने मिला कर तुम्हारे सपनों को जिया। मैं जो नहीं कर सकी वो तुमने किया। इसमें छिपी माँ की प्रसन्नता शब्दों में तो वर्णित नहीं ही हो सकती, केवल अनुभव की जा सकती है।
              मैंने अपने जीवन में वही किया जो मुझे सही लगा। अपने लिए किसी भी निर्णय पर कभी पश्चाताप नही हुआ। मेरे आत्मविश्वास ने ऐसा करने में मेरी सहायता की। यह आत्मविश्वास अपने माता-पिता से मिले संस्कारों पर चलते हुए तथा जीवन में मिलने वाले कड़वे-मीठे अनुभवों से मिला। समयानुसार उसमें कुछ नया जोड़ते हुए हमने तुम्हारा लालन-पालन किया और प्रयत्न किया कि तुम वो आत्मविश्वास प्राप्त कर सको जो जीवन में आने वाली कठिनाइयों के समय सही निर्णय लेने में सहायक बने। हम अपने प्रयत्न में कहाँ तक सफल हुए हैं....यह तो आने वाला समय ही बताएगा।
              सही पर अडिग रहना और गलत होने पर क्षमा माँगना... ये दो बातें जीवन में बहुत महत्वपूर्ण हैं। जीवन में ऐसा समय भी आएगा जब तुम्हें कठिन फैसले लेने पड़ेंगे। तब अपना आत्मविश्वास बनाए रखना। अच्छी और बुरी दोनों स्तिथियों में अपने को संभालते हुए अपनों को संभाल कर रखना।
          जीवन में सदा अपने मन का नहीं होता। हमें सबके मनों को समझ कर , उनका ध्यान रखते हुए चलना होता है। ऐसा करते हुए जो आत्मसंतुष्टि, सुख और प्रसन्नता मिलती है...उसे तुमने स्वयं भी अनुभव किया होगा।
               जीवन का एक ही मूल मंत्र है....जो सही लगे वही करो, अपनी राह स्वयं चुनो, अपने सपने स्वयं बुनो, पर उस राह पर अपने सपनों को पूरा करने के लिए अपनों को साथ लेकर चलो। अपनों का साथ सपनों को पूरा करने की यात्रा में आशीर्वाद बन कर साथ चलता है।
              जीवन में कोई भी परफ़ेक्ट नहीं होता। एक-दूसरे की कमियों को स्वीकार करते हुए अपने जीवनसाथी के साथ अपने लक्ष्य, सपनों को पूरा करने के लिए सकारात्मक सोच रखते हुए ईमानदारी के साथ जीवन जीना। अपने नाना की तरह कठिन परिश्रम को जीवन का अंग बनाना। तब देखना जीवन कितना सुंदर, सुंदरतम होता जाएगा और कितने इंद्रधनुष खुशियों के चमकते हुए दिखाई देंगे।
          तुम्हारा आत्मविश्वास और समझदारी देख कर मेरा विश्वास मजबूत हो चला है कि तुम सही राह पर चलते हुए सही निर्णय लेने में समर्थ बनोगी और सबकी आँख का तारा रहोगी।
           मुझे गर्व है कि तुम मेरी बेटी हो और मैं तुम्हारी माँ हूँ।
                  तुम्हारी मम्मी
                     भारती
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डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई, देहरादून,(उत्तराखंड)
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मातृ दिवस पर..... बेटे के नाम पत्र
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प्रिय अभिषेक
           
          बहुत सी बातें हैं जिन्हें एक लंबे अरसे से कहना चाह रही थी, पर अपने-अपने कामों की व्यस्तता के चलते कहने का समय नहीं मिल पाया। जीवन का क्या.....आज है कल नहीं। तो क्यों न जो कहना है आज ही कह दिया जाए।
            तुम वो कड़ी हो जिसने हमारे जीवन में जुड़ कर हमारे परिवार को संपूर्णता प्रदान की। बहन को भाई मिला। हम सौभाग्यशाली हैं बेटी-बेटे की माँ बनने के साथ जामाता ओर पुत्रवधु के रिश्तों को भी जीने का भरपूर सुख प्राप्त होगा। 
        पुरुष प्रधान समाज होते हुए भी हमने बेटी-बेटे में कोई भेदभाव न करते हुए तुम दोनों को एक समान परिस्थितियों में एक जैसी सुख-सुविधाएँ देते हुए बड़ा किया। हमारे अनुसार बच्चों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ था....हमारे बच्चे अपनी रुचियों के अनुसार अपना लक्ष्य निर्धारित करें, अपने सपने स्वयं देखें और जिएं। अपनी इच्छाओं का दबाव बच्चों पर डालना कभी हमारे परिवार की परंपरा नहीं रही । जो स्वतंत्रता हमने अपने माता-पिता से पाई, वैसी ही तुम्हें देने का सफल प्रयास किया।
             आज जब तुम अपने चुने सपने को पूरा करने की राह पर अपने भगीरथ प्रयास से आगे बढ़ रहे हो...तो मुझे तुम पर गर्व हो रहा है। मैं जानती हूँ कि एक असाधारण प्रतिभा तुम्हारे भीतर है। रिस्क लेकर सपनों में रंग भरने का गुण तुम्हें औरों से अलग करता है।
            अपने सपनों को पूरा करने की यात्रा के क्रम में तुमने पथरीली धरा पर अपने पग रख दिये हैं। अब यात्रा भी तुम्हारी और निर्णय भी तुम्हारे। ऐसे में कुछ बातें हैं जो तुम्हें कहना चाहती हूँ।
            तुम्हारा लक्ष्य बड़ा है तो उसे प्राप्त करने के लिए परिश्रम उससे भी बड़ा होना चाहिए। लक्ष्य साधने के लिए स्वस्थ रहना पहली शर्त है। जब माँ साथ न हो तो ये जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि जंक फूड से दूरी बनाते हुए संतुलित और पौष्टिक भोजन लेना अपनी दिनचर्या का अंग बनाओ।
            कहते हैं....यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता। अतः याद रखना जिस घर, समाज और देश में नारी का सम्मान नही होता वहाँ देवता भी निवास नहीं करते। नारी के सम्मान का संस्कार अपने घर की नारियों का सम्मान करके प्राप्त होता है। संस्कार व्यक्ति के जीवन में मिलने वाली सफलताओं में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं।
          एक और महत्वपूर्ण बात है...नर सेवा नारायण सेवा। मनुष्य ईश्वर द्वारा सृजित अनुपम रचना है। मनुष्य की सेवा करके ही हम ईश्वर को पा सकते हैं। हम पूजा, तीर्थ करें न करें, पर यदि सेवा करते हैं तो वह किसी तीर्थ से कम नहीं है। तन-मन-धन से सेवा को अपने कार्य के साथ अपने जीवन का अंग बनाना।
               जीवन में विश्वास तो करना, पर अंधा विश्वास मत करना। विश्वास जब टूटता है तो अपने साथ बहुत कुछ ले जाता है। बुद्धि-विवेक के बल पर अपने ज्ञान-चक्षु खुले रखना।
           अभिमान और स्वाभिमान के बीच बहुत ही महीन विभाजन रेखा है....इसे समझना। स्वाभिमान व्यक्ति को ऊंचाइयों की ओर ले जाता है और अभिमान रावण की तरह उसके पतन का कारण बनता है। इसे समझ कर ही जीवन में आगे बढ़ना होगा।
            तुम्हारा आत्मविश्वास और विवेक तुम्हें जीवन में सफलता के शीर्ष पर पहुँचाने में सदा सहायक होंगे। इन सब के साथ , बल्कि इन सबसे पहले तुम एक अच्छा इंसान अवश्य बनना और सदा ईमानदारी के मार्ग पर चलना। यह कठिन अवश्य है पर असंभव नहीं।
            जीवन बहुत छोटा है, इसे मुक्त होकर जीना। सपने देखना, उनमें रंग भरना और अपनों के साथ-साथ अपनी कर्मयात्रा प्रवहमान रखना।
                    तुम्हारी मम्मी
                        भारती
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डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई, देहरादून (उत्तराखंड)


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अटूट बंधन : मातृ दिवस पर- एक माँ के अपने बच्चों ( बेटे और बेटी ) के नाम पत्र
मातृ दिवस पर- एक माँ के अपने बच्चों ( बेटे और बेटी ) के नाम पत्र
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