June 2017



पंकज प्रखर, 
सकारात्मक सोच व्यक्ति को उस लक्ष्य तक पहुंचा देती है जिसे वो वास्तव में प्राप्त करना चाहता है लेकिन उसके लिए एक दृण सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है| जब जीवन रुपी सागर में समस्यारूपी लहरें हमे डराने का प्रयत्न तोहमे सकारात्मकता का चप्पू दृण निश्चय के साथ उठाना चाहिए | यदि आप ऐसा करते है तो निश्चितरूप से मानकर चलिए आप की नैया किनारे लग ही जाएगी | लेकिन ये निर्भर करता है की उस समयसमस्या के प्रति आपका दृष्टिकोण क्या है ,आप उन परिस्थितियों पर हावी होते है या परिस्थितियाँ आप पर दोपंक्तियाँ याद आती है नज़रें बदली तो नज़ारे बदले,कश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदले|सोच का बदलना जीवन का बदलना है जी हाँ आप जब चाहे अपने जीवन को बदल सकते है|




प्रस्तुति - प्रदीप कुमार सिंह

अम्बेडकर नगर: महिलाओं व बच्चों के हित में कार्य करने के लिए रोल माॅडल के रूप में उभरी हैं अकबरपुर तहसील क्षेत्र के कुटियवा गांव निवासिनी पुष्पा पाल। 
पिता के निधन के बाद उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में काम करने की चुनौती न सिर्फ स्वीकार किया वरन उसे अभी तक भली-भांति आगे बढ़ाया भी है। उनके इसी जज्बे व योगदान को देखते हुए राज्य सरकार ने गत वर्ष उन्हें रानी लक्ष्मी बाई पुरस्कार से लखनऊ में सम्मानित भी किया था। बेवाना ब्लाॅक भवन के शिलान्यास मौके पर भी पुष्पा को सम्मानित किया गया था।


आईये हम लंठो को पास करते है ( व्यंग्य )



-रंगनाथ द्विवेदी अब इस देश मे वे दिन नही जब हम अन्य विज्ञापनो की भांति ही ये विज्ञापन भी अपने टेलीविजन या अखबारो मे लिखा हुआ देखेंगे कि "आईये हम अपनी शिक्षण संस्था से लंठो को पास करते है"। योग्यता बाधा नही परसेंटेज के हिसाब से सुविधाएँ उपलब्ध,हमारी विशेष उपलब्धि व आकर्षण है कि "हम अपना नाम न लिख पाने वाले छात्र को भी पूरे प्रदेश या राज्य मे टाप करवाते है"। इस तरह के तमाम पीड़ित व कमजोर छात्र मौके का लाभ उठा आज तमाम बड़ी नौकरियो में अपनी सफलता पूर्वक सेवाये दे रहे है। इन लोगो के जीवन कौशल व उपलब्धि की छटा अद्भूत है,कल हमारे ही कुछ सफल तथाकथित छात्रो को ये समाज नकारा और बेकार कहता था,आस-पास के लोग अपने बेटो को इनसे दूर रहने की सलाह देते थे। आज उन्हीं के वे तमाम उज्ज्वल बेटे स्याह से भी ज्यादा स्याह हो गये है"बेरोजगारी ने चेहरे का सारा लालित्य छिन लिया है"।

     राजस्थान के पाली मारवाड़ में जन्मी उम्मुल की मां बहुत बीमार रहती थीं। पापा उन्हें छोड़कर दिल्ली आ गए। मां ने कुछ दिन तो अकेले संघर्ष किया, पर सेहत ज्यादा बिगड़ी, तो बेटी को पापा के पास दिल्ली भेज दिया। तब उम्मूल पांच साल की थी। दिल्ली आकर पता चला कि पापा ने दूसरी शादी कर ली है। वह अपनी नई बीवी के साथ एक झुग्गी में रहते हैं। नई मां का व्यवहार शुरू से अच्छा नहीं रहा। पापा निजामुद्दीन स्टेशन के पास पटरी पर दुकान लगाते थे। मुश्किल से गुजारा चल पाता था। उम्मुल के आने के बाद खर्च बढ़ गया। यह बात नई मां को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी।

एक आम घर का दृश्य देखिये | पूरा परिवार खाने की मेज पर बैठा है | सब्जी रायता , चपाती , गाज़र का हलवा और टी .वी हाज़िर है | कौर तोड़ने ही जा रहे हैं कि टी वी पर ऐड आना शुरू होता है बिपाशा बसु नो शुगर कहती नज़र आती हैं | परिवार की १७ वर्षीय बेटी हलवा खाने से मना कर देती है | माँ के मनुहार पर झगड़ कर दूसरे कमरे में चल देती है | वहीँ बेटा विज्ञापन देख कर ६ पैक एब्स बनाने के लिए जिम कि तगड़ी फीस की जिद कर रहा है | सासू माँ अपने तमाम टेस्ट करवाने का फरमान जारी कर देती हैं|परिवार का एकमात्र कमाऊ सदस्य अपनी लाचारी जाहिर करता है तो एक अच्छा खासा माहौल तनाव ग्रस्त हो जाता है |




सीताराम गुप्ता
दिल्ली
दुखों से बचने के लिए जीवन के बायोडाटा में सिर्फ़ उसे शुमार करें जो आज आपके पास है
उर्दू शायर अमजद इस्लाम ‘अमजद’ की ग़ज़ल का मत्ला है :
कहाँ आ के रुकने थे रास्ते, कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,
वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा।
जीवन में हमारी बहुत-सी ख़्वाहिशें होती हैं। उनमें से कुछ पूरी हो जाती हैं तो कुछ नहीं। हमारी जो ख़्वाहिशें पूरी नहीं हो पातीं हमारा सारा ध्यान उन्हीं पर केंद्रित रहता है। हम बार-बार उन्हीं अभावों को लेकर दुखी होते रहते हैं। अभाव ही हमारी ज़िंदगी का चिंतन बन जाता है जो हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण है। यही अभाव का चिंतन कालांतर में हमारे जीवन की वास्तविकता में परिवर्तित हो जाता है क्योंकि हम जैसा सोचते हैं वही हमारे जीवन में घटित होता है। ख़्वाहिशों अथवा इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता लेकिन ये हक़ीक़त हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि अभावों के बावजूद हमें जीवन में बहुत कुछ मिला होता है। हमारी अनेक उपलब्धियाँ होती हैं। हमने अभावों के बावजूद हार नहीं मानी है और ईमानदारी से आगे बढ़ने का प्रयास करते रहे हैं। इन उपलब्धियों को कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है? लेकिन वास्तविकता यही है कि हम इन्हें नज़रअंदाज़ कर जो नहीं किया या जो नहीं मिला उसे सोच-सोचकर परेशान होते रहते हैं।


कितनी कवितायें  भाप बन  कर उड़ गयी थी 
उबलती चाय के साथ 
कितनी मिल गयी आपस में 
मसालदान में 
नमक मिर्च के साथ 
कितनी फटकार कर सुखा दी गयी 
गीले कपड़ों के साथ धूप में 
तुम पढ़ते हो 
 सिर्फ शब्दों की भाषा 
पर मैं रच रही थी कवितायें 
सब्जी छुकते हुए 
पालना झुलाते हुए 
नींद में बडबडाते हुए 
कभी सुनी , कभी पढ़ी नहीं गयी 
कितनी रचनाएँ 
जो रच रहीहै 
हर स्त्री 
हर रोज 
                             सृजन और स्त्री का गहरा नाता है | पहला रचियता वो ईश्वर है और दूसरी स्त्री स्वयं | ये जीवन ईश्वर की कल्पना तो है पर मूर्त रूप में स्त्री की कोख   में आकार ले पाया है | सृजन स्त्री का गुण है , धर्म है | वह हमेशा से कुछ रचती है | कभी उन्हीं मसालों से रसोई में कुछ नया बना देती है की परिवार में सब अंगुलियाँ चाटते रह जाएँ | कभी फंदे - फंदे जोड़ कर रच देती है स्वेटर | जिसके स्नेह की गर्माहट सर्द हवाओ से टकरा जाती है | कभी पुराने तौलिया से रच देती है नयी  दरी | जब वो इतना सब कुछ रच सकती है तो फिर साहित्य क्यों नहीं ? कभी - कभी तो मुझे लगता है की क्या हर स्त्री के अंदर कविता बहती है , किसी नदी की तरह या कविता स्वयं ही स्त्री है ? फिर भी भी लम्बे समय तक स्त्री रचनकार अँगुलियों पर गिने जाते रहे | क्या कारण हो सकता है इसका ... संयुक्त परिवारों में काम की अधिकता , स्त्री की अशिक्षा या अपनी खुद की ख़ुशी के लिए कुछ भी करने में अपराध बोध | या शायद तीनों |


            मुजून सीरिया के शहर डारा में पली-पढ़ीं। पापा स्कूल टीचर थे। उन्होंने अपने चारों बच्चों (दो बेटे और दो बेटियों) की पढ़ाई को सबसे ज्यादा तवज्जो दी। सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक देश में गृह युद्ध छिड़ गया। सरकार और कट्टर इस्लामी ताकतें एक-दूसरे पर हमले करने लगीं। देखते-देखते डारा शहर तबाही के कगार पर पहुंच गया। स्कूल और सरकारी इमारतों पर बम बरसने लगे। तमाम लोग मारे गए। हर पल खौफ में बीत रहा था। हजारों लोग घर छोड़कर चले गए। तब मजबूरन मुजून के परिवार ने सीरिया छोड़कर जाॅर्डन में शरण लेने का फैसला किया। यह वाकया फरवरी, 2013 का है।

          


  प्रियंका तब 14 साल की थीं। यह बात 2007 की है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक छोटे से गांव की रहने वाली यह बच्ची उन दिनों पांचवी कक्षा में पढ़ रही थी। गांव की बाकी लड़कियों की तरह उसकी भी शादी हो गई। मां और सहेलियों का साथ छूटने के ख्याल से वह खूब रोईं। मां ने समझाया, क्यों चिंता करती हो? अभी तो बस शादी हो रही है, गौना पांच साल बाद होगा। तब तक तुम हमारे साथ ही रहोगी। मन को तसल्ली मिली। शादी के दिन सुंदर साड़ी और गहने मिले पहनने को। बहुत अच्छा लगा प्रियंका को। दो दिन के जश्न के बाद बारात वापस चली गई। प्रियंका खुश थीं कि ससुराल नहीं जाना पड़ा।


सुशील यादव

122२  1222 १22
तुफानों का गजब मंजर नहीं है
इसीलिए खौफ में ये शहर नहीं है

तलाश आया हूँ मंजिलो के ठिकाने
कहीं मील का अजी पत्थर नहीं है
                   
ईद मुबारक ~हामिद का तोहफा




  पतिदेव को टूर पर जाना था | मैं सामान पैक  करने में जुटी थी और ये जनाब टी वी देखने में | मुझे लगता है दुनिया भर के  पुरुष इस मामले में एक से ही हैं  | कहीं जाना हो तो कुछ सामन भले ही छूट जाए पर खबर एक भी न छूटे | खाना - पीना,  ओढना -बिछाना जैसे सब कुछ खबरे  ही हैं | पर आज तो हद हो गयी समय भागता ही जा रहा रह और ये हैं की टीवी पर ही नज़रे गडाए बैठे हैं | सारी  दुनिया की ख़बरों का जिम्मा आप ने ही लिया है क्या ,"बडबडाते  हुए मैं टी वी बंद करने आई | पर श्रीमान जी मेरे इरादों को भांप कर मुझे रोकते हुए बोले अरे , रुको , रुको , इतनी महत्वपूर्ण बहस चल रही है | मैं टी वी की तरफ देखा | कुछ बड़े नामी गिरामी पत्रकार धर्म के मुद्दे पर बहस कर रहे थे | यूँ तो उन सब के कुछ नाम थे पर मुझे दिख  रहे थे कुछ ... जो सिर्फ मुसलमान थे , कुछ ... जो सिर्फ हिन्दू थे | पूरा मुकम्मल इंसान तो कोई था ही नहीं | 



लेखिका – स्मिता दात्ये
आग
“दीदी!”
हूँ ”
“तुमने आग देखी है?”
“क्या बात है छोटी अब तक सोई नहीीं? कैसी बातें कर रही है? सो जा”
“दीदी, आग बहुत जलाती है न? कैसा लगता होगा जलते समय?”
“छोटी, तेरी शादी हुए 28 साल होने को आए, पर है त अभी छोटी ही। इतने सालों में मैंने कितनी बार तुझे अपने घर बुलाया, रहने के लिए , पर तू कभी आई नहीीं। हमेशा महेशजी का बहाना करके बात टाल गई। इस बार तू ने खुद कहा की तुझे मुझसे मिलना है , मेरे घर रहने आना चाहती है। पता है मुझे कितनी खुशी हुई थी। तू ने कहा था की तू पूरा महीना भर रहना चाहती है। तुझे आए 7-8 दिन हुए हैं, पर त इतनी गुमसुम रहती है की क्या कह ूँ। कुछ बताती भी नहीीं। सच बता, क्या बात है?”
“कुछ नहीीं दीदी, मैं तो बस आग के बारे में सोच रही थी। क्या तुम्हें इस आग से भी भयंकर किसी ऐसी आग की जानकारी है, जो दिखाई नहीीं देती, पर तन-मन को जलाती है .. जलाती रहती है…?
“दीदी, तुम उठकर क्यों बैठ गई? दिन भर इतना काम करती रहती हो, थक जाती हो, रात को तो अच्छी नीींद मिलनी चाहिए । पर मेरे कारण तुम ठीक से सो भी नहीीं पा रही हो। ठीक है, अब मैं कुछ नहीीं कह ूँगी। तुम सो जाओ।“

क्या वक्त आया है, रिटायर जिला-शिक्षा अधिकारी को अब टीचर नहीं पहचानता है ! मैडम लता शर्मा, ने ये मैडम माथुर को नहीं कहा,पर मन ही मन सोच रही है |’ जब वो कैमेस्ट्री की टीचर माथुर के पास अपनी पोती रश्मि को कोचिंग क्लास में पढ़ाने की बात करने के लिए आई थी |’
क्या आप अपने तीन ग्रुप मे से किसी एक में भी और, लड़की को नहीं पढ़ा सकती !ये तो बड़ी हैरानी की बात है|…आपसे इस जवाब की अपेक्षा कतई नहीं थी |’मैडम शर्मा ने लगभग निराश होते हुए कहा |
‘अब आपसे क्या कहूँ मैडम, ,टाइम होता तो आपको निराश नहीं करती | स्कूल से आने के बाद घर की, बच्चो की जिम्मेदारी, पूरी करने के बाद इन तीन ग्रुप को मुश्किल से पढ़ा पाती हूँ | मै पैसो के लिए नही बस आत्म संतुष्टि के अपने ज्ञान को बच्चियों में बाँट देती हूँ, वो पूर्ण मेहनत के साथ ऐसे में और, एक लड़की की जिम्मेदारी नहीं ले सकती |’ मैडम माथुर ने अपनी सफाई दे दी और चुप हो गयी |
नेहा अग्रवाल
कहने को तो बहुत कुछ था आकाश के पास पर शायद धरा के पास ही वक्त की कमी थी।
आज तीन साल हो गये थे आकाश को पर धरा आज भी सबके सामने उसके प्यार का मजाक बना मुस्करा कर गुजर जाती हैं ।धरा रखती तो अपने कदम जमीन पर ही है पर आकाश को ऐसा लगता था ।
जैसे धरा का एक एक कदम उसके दिल की दहलीज को लहूलहान कर देता है।
आकाश की धुंधली आंखो मैं एक बार फिर तीन साल पुराने मंजर का साया लहरा गया था।


दोष 
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रात के दस बज रहे थे।हम खाना खा कर टहलने निकले थे कि बाहर पडोस मे कुछ शोर सा सुना,देखा तो पुलिस टीम आयी हुई थी,….पूछने पर पता चला मिसिज शर्मा के किरायेदार ने दारू जरा जयादा ही चढा ली थी,..उसका बहकना मिसिज शर्मा को सहन नही हुआ।पहले खुद डांटा फिर भी दिल ढंडा ना हुआ तो शकित प्रर्दशन के चलते पुलिस टीम को बुलवा लिया था।पुलिस व किरायेदार मे नौकझौक चालू थी,तभी हम घूमने हेतू आगे बढ गये थे।आध पौन घंटे बाद घूमकर जब हम लौटै तो पुलिस जा चुकी थी।किरायेदार अपने कमरे के बाहर बैठा सहचरी संग बातो मे लगा था,,कह रहा था…..मै पुलिस से नही डरता….अपने घर मे मै कुछ भी करू।आज कुछ जयादा हो गयी तो कया हुआ???उसकी इन बातो को सुन हमने अंदाजा लगा लिया था कि पुलिस भी समझा बुझा कर लौट गयी थी।





पूनम पाठक “पलक” इंदौर (म.प्र.)
मई की एक दोपहर और लखनऊ की उमस | भारी भीड़ के चलते वह बस में जैसे तैसे चढ़ तो गई परन्तु कहीं जगह न मिलने की वजह से बच्चे को गोदी में लिए चुपचाप एक सीट के सहारे खड़ी हो गयी | अत्यधिक गहमागहमी और गर्मी से बच्चे का बुरा हाल था | वो उसे चुप करने में तल्लीन थी कि,
“बहन जी आप यहाँ बैठ जाइये “ कहते हुए पास की सीट से एक व्यक्ति उठकर खड़ा हो गया |
“नहीं भाईसाहब आप बैठिये, मैं यहीं ठीक हूँ” विनम्रतापूर्वक निवेदन को अवीकर करते हुए उसने कहा |
“अरे आपके पास बच्चा है, आपको खड़े रहने में तकलीफ होगी, बैठ जाइये ना |” उन सज्जन के विशेष आग्रह पर वह सकुचाकर बैठ गई | सच ही तो था बच्चे को लेकर खड़े रहने में उसे वास्तव में बहुत परेशानी हो रही थी | वह बच्चे को पुचकारने लगी और पानी पिलाकर उसे चुप कराया |


हिजड़ा 
वह दैहिक सम्बन्धों से अनभिज्ञ एक युवक था । उसके मित्रजन उसे इन सम्बन्धों से मिलने वाली स्वार्गिक आनन्द की अनुभूति का अतिशयोक्तिपूर्ण बखान करते। उसका पुरुषसुलभ अहम् जहाँ उसे धिक्कारता, वहीं उसके संस्कार उसे इस ग़लत काम को करने से रोकते थे । इस पर हमेशा उसके अहम् और संस्कारों में युद्ध होता था । एक बार अपने अहम् से प्रेरित हो वह एक कोठे पर जा पहुँचा। वहाँ पर वह अपनी मर्दांनगी सिद्ध करने ही वाला था कि, उसके संस्कारों ने उसे रोक लिया। चँूकि वह संस्कारी था, सो वह वापस आने के लिये उद्यत हो गया, इस पर उस कोठेवाली ने बुरा सा मँुह बनाया, और लगभग थूकने के भाव से बोली-साला हिजड़ा।
बाहर निकलने पर उसके मित्रों ने उससे उसका अनुभव पूछा, इस पर उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। इस पर उसके मित्रों का भी वही कथन था-साला हिजड़ा।
...इतना होने पर भी वह आज संतुष्ट है, और सोचता है कि, वह हिजड़ा ही सही, है तो संस्कारी।

घर के सभी लोग तरह तरह से समझा रहे थे पर सलोनी की रुलाई थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। दादी अलग भगवान को कोसे जा रहीं थीं कि मेरी बच्ची ने तो कोई भी कसर नहीं रख छोड़ी थी। माघ पूस की कड़ाके की ठंड में भी बेचारी जल्दी जल्दी तैयार होकर सुबह 6 बजे की कोचिंग जाती फिर वापस आकर कालेज भागती थी। क्या जाता था मुरलीवाले का अगर अंगरेजी में भी उसके नंबर दूसरे विषयों की तरह अच्छे आ जाते तो। क्या कालेज के टीचर, कोचिंगवाले सर जी, घर तो घर पूरे मुहल्ले के लोग सलोनी की मेहनत, लगन देखकर दंग थे। सभी को उम्मीद थी कि अगर वह टाप नहीं कर सकी तो टाप टेन में जरूर आएगी। लेकिन अंगरेजी की बजह से 93 प्रतिशत पर अटक गई थी। सलोनी को यही डर खाये जा रहा था कि अब वह कैसे सब को फेस करेगी। पर सलोनी के पिता जी की चिंता अलग थी, उन्हें डर था कि कहीं उनकी बच्ची को सदमा न लग जाए। अचानक वे मोबाइल लिए सलोनी के पास आए और उसके कान से लगा दिया।
हैलो, सलोनी बधाई अच्छे नंबरों से पास होने की, पहचाना।





सीमा जो मात्र 14 साल की रही थी ,बैठ कर सील रही है अपनी इज्जत की चुन्नी को आशुओं की धागा और वेवसी की सुई से ।
कल ही लौटी है बुआ के घर से ।वहाँजाते वक्त सुरमयी सी कौमार्य को ओढ़ कर गयी थी ।पर आते वक्त सब कुछ बिखर गया था ।
बड़े मान से बुआ ने बुलाया था प्रसव के दिन नजदीक आ रहे थे ।बुआ फिर से माँ बनने बाली थी ,पहले से वह इक प्यारी सी तीन साल की बिटिया की माँ थी ।
वहाँ वह हँसती खिलखिलाती बुआ का सारा काम करती ,फूफा जी भी बात – बेबात उसे प्यार करते रहते ।
सीमा खुश हो जाती पिता तुल्य वात्सल्य से भरा प्यार।पर कभी कभी चौंक जाती पापा तो ऐसे प्यार नहीं करते ।ऐसे नहीं ‘छूते’, ।



                                                       प्रस्तुत है कुमार  गौरव की लघुकथाओ की ई -बुक ,
 नयी सोंच 
 इसमें आप पढेंगे आठ  लघुकथाएं 



जब दुआरी के कटहल पर कौए ने नीर बनाया तो धनेसरी खूब खुश हुई थी । अब तो बडका समदिया घर के पास ही आ गया । पीरितिया के बापू उहां आने का सोचेगा और कौआ इहां फटाक से उसको खबर कर देगा । केतना दिन हो गया मुंह देखे , पिरितया के जनम में भी नहीं आए थे खाली पैसा भेजवा दिए अब तो पिरितिया घुटन्ना भरने लगी है ।
रोज बरतन बासन के बहाने अंगना में मोरी के पास घंटों बैठी रहती । लेकिन निर्मोहिया एक्को बार भी कांव कांव नहीं करता उसकी तरफ देखकर ।



मॉल में रामायण का मंचन चल रहा था । चलते चलते सीता की राह में एक बडा पत्थर आ गया तो राम ने आगे बढकर लात मारकर पत्थर को रास्ते से हटा दिया । पत्थर पैर लगते ही औरत के रूप में बदल गया । औरत ने अंगडाई ली , कमर सीधी किया और रास्ता छोडकर जंगल की तरफ चल दी ।
लक्ष्मण को बहुत गुस्सा आया वो चिल्लाकर बोले ” एहसानफरामोश औरत तुम श्रीराम के कारण जड से चेतन अवस्था में आई क्या तुम्हें इसके लिए धन्यवाद कहना उचित नहीं लगा । ”



नेताजी ने क्षेत्र में कवि सम्मेलन रखवाया ।
कवि को खबर करवाया शाम को कवि सम्मेलन है अपनी बेहतरीन कविता लेकर पहुँच जाना ।
कवि फूला न समाया । अपने सबसे नये कुरते पाजामें को कलफ किया । संदूक ने निकाला अपनी सहयोग के आधार पर छपी ताजातरीन काव्य संग्रह की प्रकाशक द्वारा दी गई एक मात्र प्रति को और झोले में रख छल दिया सम्मेलन को ।
पत्नी ने आवाज दी ” रोटी तो खालो । ”
कवि गुर्राये तुझे रोटी की पडी है वहाँ मेरा सम्मान होना है , मंत्री जी का कार्यक्रम है भूखे थोडे आने देंगे।
सम्मेलन शुरु हुआ कवि को मंच पर दुशाला ओढाकर सम्मानित किया गया । मंत्री जी कार्यक्रम छोडकर अपने गुर्गौं के साथ गेस्ट हाउस चले गये । कवि ने मंत्री जी की प्रशंसा और अपनी कविताओं के साथ मंच संभाल लिया ।




धर्मपरायण परिवार में नई बहू के आगमन के उपलक्ष्य में रामचरितमानस का पाठ एवं विद्वजनों द्वारा व्याख्यान रखा गया । सारा परिवार बाहर व्याख्यान सुन रहा था वहीं सुनसान पाकर किसी ने बहू को दबोच लिया । पलटकर जो देखा तो दूर के रिश्ते का देवर था । नजर मिलते ही उसने कुत्सित ढंग से आंख दबाई ” भौजाई में तो आधा हिस्सा होता ही है । ”
बाहर प्रसंग चल रहा था लक्ष्मण ने सूर्पनखा की नाक काट दी थी और सूर्पनखा विलाप करती हुई लौट रही थी ।
बहू ने जोर का धक्का दिया और पास पडी फांसुल उठाकर आधा हिस्सा मांगनेवाले उस पुरूष से उसका पुरा पुरूषत्व छिन लिया ।



चैनल के लिए कहानियों की खोज में कोशी के कछार भटकते भटकते एक बुढिया को देखा जो रोटियां सुखा सुखाकर घर के आंगन में बने एक बडे से मचान पर रख रही थी । उसने बुढिया से इसका कारण पूछा तो मुस्कुरा खर वापस अपने काम में लग गई । स्टोरी न बन पाने के अफसोस के साथ कुछ फोटोज खींचे और मन में सोचा कम से कम ब्लॉग पर जरूर लिखूंगा इस पगली बुढिया के बारे में ।
फिर वो शाम होते ही लौट आया जिला मुख्यालय के अपने होटल पर । अभी खाना खाकर सोने की कोशिश कर ही रहा था कि एडिटर का फोन आया ” नेपाल ने बराज के चौबीसो गेट खोल दिये हैं ,भयंकर तबाही मचाएगी कोशी , काम पर लग जाओ । ”



बहेलिये ने कबूतर पकड़ा तो कबूतर चिल्ला उठे ” हमें छोड़ दो , हमें भी जीने का अधिकार है संविधान में भी लिखा है शायद । ”
बहेलिया हँसा और पिंजरे में रखकर दरवाजा बंद करते हुए बोला ” अबे आज मंदिर निर्माण समिति की बैठक है रात के खाने में जाएगा तू । भगवान के काम में लग रहा जीवन तेरा , सीधा स्वर्ग जाएगा । ”



मोहसिन सेना की वर्दी पहने लद्दाख के ग्लेशियर में कहीं दब गया ।
सरकार उसे मरा हुआ नहीं मानती । वो ड्यूटी पर नहीं आता उसकी सैलरी नहीं जाती खाते में । मोहसिन की बेबा रोज एटीएम लेकर जाती है टेलर की दुकान पर । अफजल दोस्त था मोहसिन का , पिन मालूम है उसे । रोज चेक करता है और कुछ रूपये जेब से निकालकर उसके हाथ में रख देता है अभी इतना ही आया है कहकर ।
आज अफजल की बीबी ने पैसे को लेकर हंगामा कर दिया तो अफजल ने कह दिया पैसे नहीं हैं एटीएम में ।
चक्की पर आटा लिए सर झुकाए खड़ी है मोहसिन की बेबा । चक्कीवाला पिसाई मांग रहा है छह किलो का पंद्रह रूपया ।




इलाके में लगातार तीसरे साल सूखा पडा है अब तो जमींदार के पास भी ब्याज पर देने के लिए रूपये नहीं रहे । जमींदार भी चिंतित है अगर बारिश न हुई तो रकम डूबनी तय है । अंतिम दांव समझकर जमींदार ने हरिद्वार से पंडित बुलवाकर बारिश हेतु हवन करवाया । दान दक्षिणा समेटते हुए पंडित ने टोटका बताया कोई गर्भवती स्त्री अगर नग्न होकर खेत में हल चलाये तो शर्तिया बारिश होगी ।
मुंशीजी को ऐसी स्त्री की तलाश का जिम्मा सौंपा गया । मुंशीजी ने गांव में घर घर घुमने के बदले सबको एकसाथ पंचायत बुलाकर समस्या और पंडित जी के द्वारा बताया निदान बताया और गुजारिश की सहयोग करने की ।
आरोप –प्रत्यारोप : बेवजह के विवादों में न खोये रिश्तों की खुशबू


कहते हैं जहाँ प्यार है वहां तकरार भी है | दोनों का चोली –दामन का साथ है | ऐसे में कोई अपना खफा हो जाए तो मन  का अशांत हो जाना स्वाभाविक ही है | वैसे तो रिश्तों में कई बार यह रूठना मनाना चलता रहता है | परन्तु कई बार आप का रिश्तेदार थोड़ी टेढ़ी खीर होता है | यहाँ  “ रूठा है तो मना  लेंगे “ कह कर आसानी से काम नहीं चलता |वो ज्यादा भावुक हो या   उसे गुस्सा ज्यादा आता है , जरा सी बात करते ही आरोप –प्रत्यारोप का लम्बा दौर चलता हो , जल्दी मानता ही नहीं हो तो फिर आप को उसको मनाने में पसीने तो जरूर छूट जाते होंगे | पर अगर रिश्ता कीमती है और आप उसे जरूर मानना चाहेंगे | पर सवाल खड़ा होता होगा ऐसे रिश्तेदार को मनाये तो मनाये कैसे | ऐसा  ही किस्सा रेशमा जी के साथ हुआ |

आरोप –प्रत्यारोप : बेवजह के विवादों में न खोये रिश्तों की खुशबू 





                        ऍफ़ बी  या फेस बुक  विधाता कि बनाई दुनियाँ के अन्दर एक और दुनियाँ ......... जीती जागती सजीव ...कहते है कभी भारतीय ऋषि परशुराम ने विधाता कि सृष्टि के के अन्दर एक और सृष्टि बनाने कि कोशिश कि थी .... नारियल  के रूप में |उन्होंने आखें ,मुंह बना कर चेहरे का आकार दे दिया था ....... पर किसी कारण वश उस काम को रोक दिया | पर युगों बाद मार्क जुकरबर्ग ने उसे पूरा कर दिखाया फेस बुक या मुख पुस्तिका के रूप में | बस एक अँगुली का ईशारा और प्रोफाइल पिक के साथ  पूरी जीती –जागती दुनियाँ आपके सामने हाज़िर हो जाती है |भारत ,अमरीका ,इंगलैंड या पकिस्तान सब एक साथ एक ही जगह पर आ जाते हैं और वो जगह होती है आप के घर में आपका कंप्यूटर ,लैपटॉप या मोबाइल | कितना आश्चर्य जनक कितना सुखद | इंसान का अकेलापन दूर करने वाली ,लोगों को लोगों से जोड़ने वाली साइट इतनी लोकप्रिय होगी इसकी कल्पना तो शायद मार्क जुकरबर्ग ने भी नहीं कि थी | आज फेस बुक दुनियाँ कि सेकंड नम्बर कि विजिट की  जाने वाली साइट है |पहली गूगल है | इसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि आज इसके लगभग एक बिलियन रजिस्टर्ड यूजर्स हैं | यानी कि दुनियाँ का हर सातवाँ आदमी ऍफ़ बी पर है ........... आप भी उन्हीं में से एक हैं ,हैं ना ? आज अगर आप किसी से मिलते हैं तो  औपचारिक बातों के बाद उसका पहला प्रश्न यही होता है “क्या आप ऍफ़ बी  पर हैं और अगर आप नहीं कहते हैं तो अगला आप को ऊपर से नीचे तक ऐसे देखता है “ जैसे आप सामान्य मनुष्य नहीं हैं बल्कि चिड़ियाघर से छूटे कोई जीव हों |
स्कूलों में बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के स्थान पर दी जाए ‘योग’ एवं ‘आध्यात्म’ की शिक्षा




27 सितंबर, 2014 को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ महासभा में प्रस्ताव पेश किया था कि संयुक्त राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत करनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पहले भाषण में मोदी ने कहा था कि ‘‘भारत के लिए प्रकृति का सम्मान अध्यात्म का अनिवार्य हिस्सा है। भारतीय प्रकृति को पवित्र मानते हैं।’’ उन्होंने कहा था कि ‘‘योग हमारी प्राचीन परंपरा का अमूल्य उपहार है।’’ यूएन में प्रस्ताव रखते वक्त मोदी ने योग की अहमियत बताते हुए कहा था, ‘‘योग मन और शरीर को, विचार और काम को, बाधा और सिद्धि को ठोस आकार देता है। यह व्यक्ति और प्रकृति के बीच तालमेल बनाता है। यह स्वास्थ्य को अखंड स्वरूप देता है। इसमें केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मनुष्य के बीच की कड़ी है। यह जलवायु परिवर्ततन से लड़ने में हमारी मदद करता है।’’

स्कूलों में बच्चों को ‘यौन शिक्षा’ के स्थान पर दी जाए ‘योग’ एवं ‘आध्यात्म’ की शिक्षा 


संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून, 2014 को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने को मंजूरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रस्ताव के मात्र तीन महीने के अंदर दे दी। इसी के साथ भारत की सेहत से भरपूर प्राचीन विद्या योग को वैश्विक मान्यता मिल गई थी। भारत में वैदिक काल से मौजूद योग विद्या एक जीवन शैली है जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने नया मुकाम दिलाया। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में इस आशय के प्रस्ताव को लगभग सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया था। भारत के साथ रिकार्ड 177 सदस्य देश न केवल इस प्रस्ताव के समर्थक बने बल्कि इसके सह-प्रस्तावक भी बने। इस मौके पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा था कि, ‘‘इस क्रिया से शांति और विकास में योगदान मिल सकता है। यह मनुष्य को तनाव से राहत दिलाता है।’’


 बान की मून ने सदस्य देशों से अपील की कि वे योग को प्रोत्साहित करने में मदद करें। यहाँ उल्लेखनीय है कि भारत में इससे पहले 2011 में हुए एक योग सम्मेलन में 21 जून को विश्व योग दिवस के तौर पर घोषित किया गया था। इस दिन को इसलिए चुना गया क्योंकि 21 जून साल का सबसे लंबा दिन होता है और समझा जाता है कि इस दिन सूरज, रोशनी और प्रकृति का धरती से विशेष संबंध होता है। इस दिन को किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में रख कर नहीं, बल्कि प्रकृति को ध्यान में रख कर चुना गया है।


 योग स्वास्थ्य के लिए जरूरी :-

वैश्विक स्वास्थ्य और विदेश नीति के एजेंडा के तहत स्वीकार किए गए इस प्रस्ताव में कहा गया है कि योग स्वास्थ्य के लिए आवश्यक सभी जरूरी ऊर्जा प्रदान करता है। श्री मोदी ने सितंबर 2014 में महासभा के सत्र में इसी आशय की बात कही थी। 21 जून को अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने के अलावा प्रस्ताव में कहा गया है कि योग के फायदे की जानकारियां फैलाना दुनिया भर में लोगों के स्वास्थ्य के हित में होगा। योग केवल आसान और मुद्राओं तक सीमित नहीं है। यह तो एक आदर्श जीवन शैली है, जो मानवीय उत्थान की ओर ले जाती है। आज के समय लोगों ने भौतिक जगत में बहुत ऊंचाई हासिल कर ली है, लेकिन अपने अंदर झांकने का मौका केवल भारतीय संस्कृति ही देती है। योग और ध्यान न केवल हमारा स्वास्थ्य संवर्धन करते हैं बल्कि हमें आंतरिक और मानसिक बल भी प्रदान करते हैं। काफी समय से ऋषि परंपरा और आध्यात्म को बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। वास्तव में योग एवं आध्यात्म की शिक्षा में पूरी मानवता को एकजुट करने की शक्ति है। योग में ज्ञान, कर्म और भक्ति का समागम है।


अदूरदर्शितापूर्ण निर्णय:-

एक दैनिक समाचार पत्र में ‘स्कूलों में यौन शिक्षा अनिवार्य बनाए जाने की सिफारिश’ शीर्षक से एक समाचार प्रकाशित किया गया था। इस समाचार के अनुसार गठित की गई समिति ने स्कूलों में नाबालिगों को दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न की घटनाओं से बचाने के लिए सुझाव पेश किए हैं। इसके तहत यौन शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाए जाने की सिफारिश की गई है, जो कि आने वाले समय में देश की बाल एवं युवा पीढ़ी को गलत दिशा में ही ले जाने का ही काम करेंगी। हमारा मानना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मनुष्य की ओर से अर्पित की जाने वाली समस्त सम्भव सेवाओं में से सर्वाधिक महान सेवा है - (अ) बच्चों की उद्देश्यपूर्ण शिक्षा, (ब) उनके चरित्र का निर्माण तथा (स) उनके हृदय में परमात्मा की शिक्षाओं को जानकर उन पर चलने का बचपन से अभ्यास कराना न कि स्कूलों में यौन शिक्षा देकर बच्चों को तन तथा मन का रोगी बनाना।


 यौन शिक्षा के अनिवार्य होने से विदेशों में बढ़ी हैं समस्यायें:-

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रान्स जैसे देशों से स्कूली बच्चों को यौन शिक्षा देने के परिणाम बुरे आ रहे हैं। इन देशों में अब यह स्पष्ट हो चुका है कि यौन शिक्षा से एच.आई.वी., एड्स आदि जैसे अनेक रोगों पर तो काबू नहीं पाया जा सका है अपितु इन देशों की बाल एवं युवा पीढ़ी पर इसका उल्टा असर हुआ है। इन देशों में यौन शिक्षा के कारण माता-पिता के जीवित रहते हुए भी लाखों बच्चे अनाथ होकर उन्मुक्त जीवन जीने को विवश हैं, जो कि एड्स जैसे महारोग को बढ़ाने का मुख्य कारण है। इसके अलावा इन देशों में विवाहित जोड़ों में दूसरी स्त्रियों तथा पुरूषों से अवैध संबंध बढ़ाने की प्रवृत्ति जोर पकड़ चुकी है। इन सभ्य कहे जाने वाले पश्चिमी देशों की नकल करने में भारत भी बिना सोचे-विचारे लगा है। उन्मुक्त सेक्स की तरफ बढ़ती प्रवृत्ति के कारण विवाह जैसी पवित्र संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता जा रहा है।


 आधुनिकता के नाम पर भारत में भी पांव पसार रही हैं समस्यायें:-


भारत में भी आज कल सभी टी.वी. चैनलों एवं समाचार पत्रों में आधुनिकता के नाम पर युवक-युवतियों द्वारा बिना विवाह के लिव-इन-रिलेशन में साथ रहने के कारण युवतियों के गर्भवती होने व भ्रण हत्या करवाने आदि की घटनायें लगातार सामने आती जा रहीं हैं। इसके बावजूद भी विद्यालयों में यौन शिक्षा देने की तैयारी की जा रही है। हमारा मानना है कि बच्चों की मनः स्थिति का आंकलन किये वगैर बाल एवं युवा पीढ़ी को यौन शिक्षा देकर उनके मन-मस्तिष्क एवं चरित्र को पूरी तरह से नष्ट करने की तैयारी की जा रही है।


 बच्चों को योग एवं आध्यात्म का ज्ञान दें:- 

परमात्मा ने मनुष्य और पशु में चार चीजें आहार, निद्रा भय व मैथुन तो समान रूप से दी है किन्तु उचित-अनुचित व गलत-सही का निर्णय करने की क्षमता केवल मनुष्य को ही दी है। यह क्षमता पशु में नही है। इसलिए बालक को आध्यात्मिक ज्ञान कराने से उसके मस्तिष्क में ईश्वरीय दिव्य प्रवृत्ति पैदा होती है। किन्तु यदि उसे आध्यात्मिक ज्ञान न हो तो उसके अंदर पशु प्रवृत्ति बढ़ जाती है और तब मनुष्य उचित-अनुचित व गलत-सही का निर्णय नहीं कर पाता है और मनुष्य का आचरण पशुवत हो जाता है। योग और आध्यात्म दोनों ही मनुष्य के तन और मन दोनों को सुन्दर एवं उपयोगी बनातें हैं। योग का मायने हैं जोड़ना। योग मनुष्य की आत्मा को परमात्मा की आत्मा से जोड़ता है। इसलिए हमारा मानना है कि प्रत्येक बच्चे को बचपन से ही योग एवं आध्यात्म की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए।


 यौन शिक्षा बच्चों को दिग्भ्रमित एवं पथभ्रष्ट करती हैः-

अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे विकसित देशों में विद्यालयों में यौन शिक्षा प्रदान करने से युवा पीढ़ी तन और मन सेे रोगी बनती जा रही है साथ ही उनका नैतिक तथा चारित्रिक पतन भी हुआ है। इस दुखदायी स्थिति से उबरने का योग तथा आध्यात्मिक शिक्षा ही एकमात्र समाधान है। हमारा मानना है कि यौन शिक्षा बच्चों को दिग्भ्रमित एवं पथभ्रष्ट करती है। यौन शिक्षा अनैतिक सम्बन्धों को बढ़ावा देती है। यौन शिक्षा में आत्मनियंत्रण की शिक्षा नहीं होती। यौन शिक्षा केवल यह बताती है कि यौन क्रिया करते हुए मां को गर्भवती होने से कैसे बचाया जा सकता है। इस तरह स्कूलों में यौन शिक्षा अनिवार्य बनाए जाने की तैयारी करना केवल अनैतिक आचरण को बढ़ावा देने वाला ही साबित हो सकता है। इस विषम सामाजिक स्थिति से अपने बच्चों को बचाने के लिए हमें स्कूलों में ‘यौन शिक्षा की जगह पर योग एवं आध्यात्मिक शिक्षा’ अनिवार्य रूप से देने की अविलम्ब आवश्यकता है।

प्रत्येक बच्चे को बचपन से ही योग एवं आध्यात्म की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए:-


हमारा यह सामाजिक उत्तरदायित्व है कि हम अभिभावकों के सहयोग से बच्चों को भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की संतुलित शिक्षा देकर उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करें क्योंकि ऐसे बालक आगे चलकर स्वस्थ व सभ्य समाज की आधारशिला रखेंगे। इसलिए मेरी भारत के सभी राज्य सरकारों के साथ ही भारत सरकार से भी अनुरोध है कि वे जगतगुरू कहे जाने वाले इस देश की संस्कृति एवं सभ्यता को ध्यान में रखते हुए अपने विद्यालयों में बच्चों को अनिवार्य रूप से यौन शिक्षा की जगह योग एवं आध्यात्म की शिक्षा दें। हमारा मानना है कि विद्यालय ऐसा हो, जिसमें हो चरित्र निर्माण। बच्चों के कोमल मन को दे, मानवता का ज्ञान। तब होगा उत्थान जगत का, तब होगा उत्थान। आध्यात्मिक चेतना जगाये सबको सही दिशा दिखलायें। बच्चे बने प्रकाश जगत का मन में ज्ञान की ज्योति जलायें, क्योंकि - विद्यालय से बढ़कर जग में कोई ना तीरथ धाम। वास्तव में बच्चों को केवल योग एवं आध्यात्म की शिक्षा देने से ही संयम, सुचिता, स्व-अनुशासन, नैतिकता, चारित्रिकता तथा आध्यात्मिकता के गुण विकसित होंगे अन्यथा मानव सभ्यता को विनाश के कगार पर जाने से रोका नहीं जा सकेगा।
’’’’’
-डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं
संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

संस्थापक , प्रबंधक , सिटी मांटेसरी स्कूल लखनऊ



साडे नाल रहोगे तो योगा करोगे

योग न हमारे राम न तुम्हारे रहीम का है


योग दिवस


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सिया राम  ( राम के आगे सीता )




प्रभु राम की पत्नी माता सीता को भक्त श्रद्धा के पूजते हैं | माता सीता एक आदर्श पुत्री , पत्नी , माँ व् नारी थीं | अभी तक माता सीता के बारे में ज्यादातर जो भी लिखा गया उसमें एक आदर्श पत्नी का रूप ही हावी रहा |   जिस कारण उनके तमाम गुण सामने नहीं आ पाए | 


माता सीता एक कुशल यौध भी थीं | परन्तु माता सीता का योद्धा रूप कभी सामने नहीं आया | जरा सोचिये जिस शिवजी के धनुष को रावण हिला भी नहीं पाया उसे सीता माँ यूँहीं खेल खेल में उठा लेती है | इतनी शक्तिशाली सीता इतनी लाचार नहीं थी की रावण उनका आसानी से अपहरण कर लेता |


 जरूर इस सुनियोजित योजना ( कूटनीति ) में श्री राम आश्वस्त थे की विपरीत परिस्तिथियों में वह स्वयं रावण का वध करने में सक्षम हैं | माता सीता ने स्वयं ही लव - कुश को शस्त्र चलाने की शिक्षा दी | और इतना पारंगत कर दिया की वो श्री राम की सेना को अकेले ही परास्त कर सके | कानपुर में बिठुर में बने वाल्मीकि आश्रम में इस बात के साक्ष्य हैं |


 त्याग और प्रेम की देवी सीता जो अपने पति के कहने पर अग्नि परीक्षा देना भी स्वीकार करती हैं वहीँ वो इतनी स्वाभिमानी भी हैं की पूरी प्रजा के सामने रोने गिडगिड़ाने के स्थान पर अपने प्राण त्याग देने का निर्णय लेती है | वास्तव में सीता माता के चरित्र में इतनी योग्यताएं हैं की प्रभु राम के आगे उनका नाम लिखने मात्र चलन नहीं उन गुणों का आदर है | 



बरसों पहले मैथिलीशरण गुप्त जी ने इतिहास के दो उपेक्षित किरदारों - उर्मिला व् यशोधरा के साथ न्याय किया था | उम्मीद है की माता सीता के भी तमाम गुणों के साथ कभी न्याय होगा और " सिया राम " ( राम के आगे सीता ) अपनी सार्थकता के साथ सिद्ध होगा | 
वंदना बाजपेयी 

            सेंट्रल पाॅल्यूशन कंट्रोल बोर्ड आॅफ इंडिया के फरवरी 2015 के आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रतिदिन 1.4 लाख टन कचरा उत्पन्न होता है। इस कचरे में बहुत सा हिस्सा बोतलों, गत्ते, डिब्बे, प्लास्टिक का सामान, विभिन्न उद्योगों से निकले कबाड़ का भी होता है। शहरों में इन सबके ढेर के ढेर लगे देखना कोई नई बात नहीं है। यह जानते हुए भी कि इस तरह हर दिन इकट्ठा होता कचरा एक दिन हमारे घर के सामने तक पहुंच जाएगा, हम इसमें बढ़ोतरी करते जाते हैं। पर, बनारस की शिखा शाह की परवरिश और शिक्षा कुछ ऐसी हुई कि उन्हें इस बढ़ती समस्या से अनजान बने रहना मंजूर ना हुआ और उन्होंने एक सार्थक पहल की।

स्क्रैपशाला की शुरूआत




डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
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कल
बहुत दिनों बाद
सुबह मिली 
खिली खिली
बोली उदास होकर
तुम्हारे पिता
मुझसे रोज़
मिला करते थे
गेट का
ताला खोल कर
इधर-उधर
देश-समाज
साहित्य, घर-संसार
और तुम्हारी
कितनी ही बातें करने के बाद


फादर्स डे पर  एक बेटी की अपने पापा की याद को समर्पित कविता।

अपने पापा की गुड़िया


दो चुटिया बांधे और फ्रॉक पहने, दरवाजे पे-खड़ी रहती थी--------- घंटो कभी अपने पापा की गुड़िया। फिर समय खिसकता गया, मै बड़ी होती गई! मेरे ब्याह को जाने लगे वे देखने लड़के, फिर ब्याह हुआ, मै विदा हुई पापा रोये नही, पर मैने उनके अंदर---------- के आँसूओ का गीलापन महसूस किया, पीछे छोड़ आई सब कुछ अपने पापा की गुड़िया।





कवि मनोज कुमार

रूठने पर झट से मना लेती थी
मां दवा से ज्यादा दुआ देती थी
कुछ बात थी उसके हाथों में जो
भूख ही पेट से वो चुरा लेती थी
चोट कितनी भी गहरी लगी क्यों हो
फूंक कर झट से वो भगा देती थी
मां पढ़ी कम थी मेरी मगर
हर मर्ज की वो दवा देती थी
आंख से आंसू निकलते नहीं थे