गुरु पूर्णिमा : गुरूजी हम बादल तुम चन्द्र

गुरु पूर्णिमा एक ऐसा त्यौहार है | जब हम अपना स्नेह गुरु के प्रति व्यक्त कर सकते हैं | गुरु और शिष्य का अनोखा संबंध है | गुरु शिष्य को ...


गुरु पूर्णिमा एक ऐसा त्यौहार है | जब हम अपना स्नेह गुरु के प्रति व्यक्त कर सकते हैं | गुरु और शिष्य का अनोखा संबंध है | गुरु शिष्य को मांजता है , निखारता है और परमात्मा की ओर उन्मुख करता है | कई बार हम गुरु और शिक्षक में भ्रमित होते हैं | वास्तव में शिक्षक वो है जो हमें लौकिक जीवन में अग्रसर होने के लिए शिखा देता है और गुरु वो है हमारा आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त करता है | आज का दिन उसी गुरु के प्रति आभार व्यक्त करने का दिन है |  यूँ पूर्णिमा तो साल में बारह होती है | सब सुंदर , सब पवित्र फिर आसाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा के रूप में क्यों मनाते हैं ? जबकि आसाढ़ में तो अक्सर बादल होने की वजह से चाँद पूरा दिखता भी नहीं हैं | ये प्रश्न हम सब के मन में उठता होगा | पौराणिक मान्यताओं के अनुसार क्योंकि आसाढ़ पूर्णिमा के दिन ही व्यास ऋषि का जन्म हुआ था  इसलिए | आसाढ़ पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा मनाते हैं |

आखिर आसाढ़ पूर्णिमा को ही क्यों मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा 
                   
                           यही प्रश्न  एक बार एक शिष्य ने आध्यात्मिक गुरु ओशो से किया | ओशो ने जवाब दिया जो मान्यताओं से इतर है | आज मैं वही जवाब आप सब के सामने रख रही हूँ | ओशो के सारी पूर्णिमाओं में शरद पूर्णिमा सबसे सुन्दर होती है | पर उसके स्थान पर आसाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में इसलिए मनाया जाता है क्योंकि तब आसमान में बादल होते हैं | ओशो बादलों की तुलना शिष्यों से करते हैं | और गुरु की चंद्रमा से |अब  गुरु चंद्रमा क्यों है | क्योंकि ये प्रकाश  या ज्ञान उसका अपना नहीं है | ये उसने सूर्य से लिया है | और इसे वो वितरित कर रहा है | शिष्य सीधे सूर्य तक नहीं जा सकते | क्योंकि वो उस तेज को सहन नहीं कर सकते | तब उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा | ऐसे में उन्हें गुरु की आवश्यकता होती है | जब शिष्य भी चंद्रमा के सामान चमकने लगता है तब उसे परमात्मा प्राप्त होता है | इसी लिए गुरु का महत्व है | इसीलिए कहा गया है .... 


“ गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लगो पाय
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय “


आसाढ़ पूर्णिमा से शरद पूर्णिमा तक की यात्रा 

          अब  तुलनात्मक दृष्टि से देखे तो  शरद पूर्णिमा में बादल होते ही नहीं | जब शिष्य नहीं तो गुरु कैसा | गुरु का वजूद ही शिष्य से है | आसाढ़ पूर्णिमा में शिष्य है | बादल की तरह , जिसका मन यहाँ – वहाँ  भटकता रहता है |  वो श्याम रंग का है क्योंकि अज्ञान के अन्धकार से भरा हुआ है | अभी ही गुरु की आवश्यकता है शरद पूर्णिमा या किसी अन्य में नहीं |गुरु इस अज्ञान को दूर कर शिष्य को निर्मल और पवित्र कर देता है |आसाढ़ पूर्णिमा से शरद पूर्णिमा तक की यात्रा ही शिष्य का अध्यन काल है जब वो गुरु से हरी तक पहुँच जाता है | 

कैसे हो सच्चे गुरु गुरु की पहचान 
                                    अब प्रश्न  ये उठता है की सच्चे गुरु की पहचान कैसे हो | दुनियावी गुरु तो बहुत हैं | जो मार्ग दिखाने ने के स्थान पर भटका भी सकते हैं | इसके लिए एक छोटी सी कहानी है | एक बार एक व्यक्ति किसी  आध्यात्मिक गुरु से अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर चाहता था | पर वो चाहता था की गुरु योग्य हो | वह अपने गाँव में पीपल के पेड़ के नीचे बैठे बाबा से मिला | उसने कहा मुझे ऐसा गुरु चाहिए जो मेरे सब प्रश्नों का उत्तर दे सके | क्या ऐसा कोई गुरु है , काया कभी मुझे वो मिलेगा , क्या आप उस तक मुझे पहुंचा सकते हैं ? बाबा बोले ," बेटा वो गुरु तुम्हें जरूर मिलेगा | पर इसके लिए जरूरी है सच्ची अलख जगना | पर फिलहाल मैं उसकी पहचान तुम्हें बता देता हूँ | बाबा ने उस गुरु  के कद , काठी , आँखों के रंग आदि की पहचान बता दी | वो जहाँ मिलेगा यह भी बता दिया | उसके पास के दृश्य भी बता दिए | वो व्यक्ति बहुत खुश हो गया | उसने तुरंत बाबा के पैर छुए और कहा ," आपका बहुत उपकार है बाबा , आपने मेरे गुरु का इतना विस्तृत वर्णन दे दिया | मैं उन गुरु महाराज को चुटकियों में ढूंढ लूँगा | अब मुझे जाने की आज्ञा  दें | मैं यूँ गया और यूँ आया | फिर आपको भी उन्प्रश्नों के उत्तर बताऊंगा | 
                           व्यक्ति चला गया | गाँव , गाँव ढूंढता रहा | ढूंढते - ढूंढते २० वर्ष बीत गए | पर वैसा गुरु न मिला | वो निराश हो गया | लगता है उसके प्रश्नों का उत्तर कभी नहीं मिलेगा | उसने सोंचा चलो अपने गाँव वापस चलूँ , लगता है गुरु का मिलना मेरे भाग्य में नहीं है | उत्तर न मिलने पर उसे बहुत बेचैनी थी | जब वो गाँव पहुंचा तो वही बाबा उसे पीपल के पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए | उसने सोंचा उन्हें बताता चलूँ की मुझे उनके द्वारा बताया गया गुरु कहीं नहीं मिला | जब ऐसा गुरु था ही नहीं तो उन्होंने मुझे भटकाया ही क्यों | वो बाबा भी अब वृद्ध हो चुके थे | व्यक्ति जब बाबा के सामने पहुंचा तो देख कर दांग रह गया की ये तो वही गुरु हैं जिन्हें वो पिछले २० साल से ढूंढ रहा था | वो तुरंत बाबा के चरणों में गिर गया और बोला ," बाबा आप तो वही हैं फिर आपने मुझे उस समय क्यों नहीं बताया | 
                            बाबा बोले बेटा मैंने पहले ही कहा था की जब अलख जागेगी , सच्ची प्यास लगेगी | तभी वो गुरु तुम्हें मिलेगा और तभी ज्ञान | अब देखो मैं तुम्हारे सामने बैठा था | अपने लक्षण बता रहा था | पर तुम्हें मैं दिखाई ही नहीं दिया तुम जवानी के जोश में थे | तुम्हें लगा खूब यात्राएं , करूँगा ढूँढूंगा , गुरु तो मिल ही जाएगा |आद्यात्म पाने की चीज नहीं है , मिटने की चीज है | जब अहंकार मिट जाता है तब यात्रा शुरू होती है |  तब तुम्हें प्यास नहीं थी जोश था | इतनी यात्राएं करते - करते तुम्हारी प्यास बढ़ गयी |अहंकार मिट गया | तब तुम्हें मैं नज़र आ गया | मैं भी २० साल से तुम्हारा इंतज़ार ही कर रहा था | 
                                  कहने का तात्पर्य ये है की सच्चा गुरु तब मिलता है जब प्यास लगी हो , अलख जगी हो | वर्ना पडोसी जारहा है और हम भी चल दिए तो सामाजिक समूह का विकास होता है आध्यात्मिकता का नहीं |  

सच्चा गुरु मिलने पर खोना नहीं है 
                        एक तो सच्चा गुरु मिलना आसान नहीं है | मिल जाए तो बड़े जातां से उसकी शरण में रहना चाहिये | क्योंकि अगर परमात्मा रूठ जाए  तो गुरु की शरण में जाने पर पुन : परमात्मा मिल सकता है | पर अगर गुरु रूठ जाए तो परमात्मा को पाने की कोई राह ही नहीं है | कबीर दास जी कहते हैं ..

कबीर ते नर अंध हैं गुरु को कहते और
हरि रूठे गुरु ठौर हैं , गुरु रूठे नहीं ठौर 

गुरु के प्रति जितनी आस्था उतना ही आध्यात्मिक लाभ 
                          प्रश्न ये उठता है की एक ही गुरु होने पर भी सबकी एक समान आध्यात्मिक उन्नति क्यों नहीं हो पाती |उसका उत्तर आस्था में छिपा है | गुरु के
प्रति  जितनी आस्था होगी | उतना ही लाभ होगा | आस्था वो बिंदु है जहाँ तर्क खत्म हो जाते हैं | इसीलिए कई बार गुरु के प्रति प्रबल आस्था रखने वाले व्यक्ति उनके अनुसार कहते हुए आध्यात्मिक मार्ग में उनसे भी ऊपर उठ जाते हैं | आस्था का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है |
                                   आज का दिन गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा व्यक्त करने का दिन है , उनके चरणों में नमन कर कहने का दिन है ... 

   गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः ,
गुरुर साक्षात परम ब्रह्म , तस्मै श्री गुरुवे नमः  

आप सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें   

वंदना बाजपेयी 

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