संकलनकर्ता - प्रदीप कुमार सिंह 
            मैं कोलकाता का रहने वाला हूं और मेरे पिता उद्योगपति है। आईआईटी मद्रास से ग्रेजुएशन करने के बाद मुझे मुंबई में प्राइसवाटरहाउस कूपर्स में नौकरी मिल गई। लेकिन बचपन से ही किसानों का मैं काफी सम्मान करता था, इसलिए उनको होने वाली परेशानियां मुझे उदास कर देती थी। हालांकि जमीनी स्तर पर मुझे इसका कोई समाधान नहीं मिलता था। नौकरी जाॅइन करने के कुछ ही समय बाद कंपनी ने मुझे छह महीने की एक परियोजना पर सऊदी अरब भेज दिया। लेकिन उन्हीं दिनों महाराष्ट्र के विदर्भ में कुछ किसानों की आत्महत्याओं की खबर सामने आई थी, जिसने मुझे फिर से बेचैन कर दिया था। मैं सोचता था कि अगर खेती लाभ का सौदा नहीं हुई, तो किसान खेती करना छोड़ देंगे।

            सऊदी अरब में काम करते हुए ही मैं एक बार छुट्टी लेकर भारत आया और कोलकाता के पास बालीचक, डेबरा और तेमाथानी जैसे गांवों का दौरा किया और वहां खेती को बहुत गौर से देखा। यह किसी गांव को नजदीक से देखने-जानने का मेरा पहला अवसर था। जल्दी ही मुझे एहसास हुआ कि महाराष्ट्र और बंगाल की खेती में बहुत अंतर है। महाराष्ट्र में भीषण जल संकट है, जबकि परिचम बंगाल में पानी की प्रचुरता है और जमीन भी उपजाऊ है, लेकिर किसान साल में तीन बार धान की फसल लेकर जल का दुरूपयोग कर रहे थे। उससे किसानों को पूरे साल में मात्र तीस हजार रूपये का मुनाफा हो रहा था और रासायनिक खादों के लगातार इस्तेमाल से मिट्टी की ऊर्वरा शक्ति को कहीं ज्यादा नुकसान हो रहा था। फसलों की उत्पादकता घट रही थी और खेती की लागत भी बढ़ रही थी। मैंने आईआईटी, खड़गपुर से इस संदर्भ में संपर्क किया।
            थोड़े दिनों बाद मैं अपनी नौकरी छोड़ आईआईटी, खड़गपुर में शोध से जुड़ गया। आठ महीनों तक मैंने दूसरे प्रोफेसरों के साथ धान और दूसरी फसलों पर शोध किया। उसके बाद खेती से जमीनी स्तर पर जुड़ने की इच्छा लिए शोध से मुक्त होकर घूमने लगा। मेघालय से महाराष्ट्र और हिमाचल से कर्नाटक तक मैं खेती की विविधताओं को देखता और किसानों के साथ ही रहता था।


            मैंने इस दौरान कई किसानों को देखा, जो प्राकृतिक खेती करते थे और अपने खेतों में रासायनिक खाद डालने से परहेज करते थे। मैंने महसूस किया कि प्राकृतिक खेती में शुरूआत में उत्पादन भले कम हो, पर बाद में न केवल उत्पादन बढ़ता है, बल्कि लागत लगभग शून्य रह जाती है और प्राकृतिक तरीके से उपजाई गई फसल का मोल बहुत अधिक होता है। मुझे याद है, मुजफ्फरनगर में मैं प्राकृतिक रूप से गन्ना उपजाने वाले एक किसान के खेत में पहुंचा था। वे गन्ने न केवल तुलनात्मक रूप से लंबे थे, बल्कि उनमें मिठास भी अधिक थी। यह सब देख-समझकर मैंने पिछले साल पश्चिम बंगाल में ही तीन एकड़ जमीन खरीदी।
            आज मैं हर तरह की सब्जियां और फल यहां उपजाता हूं। मैं शुरूआत में यह देखना चाहता हूं कि इस जमीन में क्या-क्या उपजाया जा सकता है। उसके बाद मैं फसल उपजाने के बाद में किसी निष्कर्ष पर पहुंचूंगा। मेरे इस प्रयोग से आसपास के किसान अचंभित हैं। मैं सबको यही कहता हूं कि खेती घाटे का सौदा नहीं है। अगर रासायनिक खादों से मुक्ति पाई जाए और खेती में नए प्रयोग किए जाएं, तो इस देश में खेती की तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी।
- विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित

साभार -अमर उजाला
फोटो क्रेडिट - अवध की आवाज़


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