August 2017

किरण सिंह 

आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा यह कहते सुना जाता है कि आजकल लोग एकाकी होते जा रहे हैं , सामाजिकता की कमी होती जा रही है, अतिथि को कभी देव समझा जाता था लेकिन आजकल तो बोझ समझा जाने लगा है आदि आदि..! 


यह सही भी है किन्तु जब हम इस तरह के बदलाव के मूल में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें दोष किसी व्यक्ति विशेष का न होकर आज की जीवन शैली, शिक्षा  - दीक्षा , एकल तथा छोटे परिवारों का होना, घरों के नक्शे तथा पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण है! 
कामलो सो लाडलो
motivational story on " work is worship" 

वंदना बाजपेयी 
मित्रों , कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता | किसी भी व्यक्ति की महानता इस बात में है की वो जो भी काम करें उसे पूरी समग्रता के साथ करे | क्योंकि व्यक्ति की पहचान उसके काम से है | आज आपके साथ काम के महत्व को दर्शाती एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत कर रही हूँ |


डॉ . आशुतोष शुक्ला 


किडनी शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। किडनी रक्त में मौजूद पानी और व्यर्थ पदार्थो को अलग करने का काम करता है। इसके अलावा शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में भी सहायता प्रदान करता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है। इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो शरीर की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है।

                              लगातार दूषित पदार्थ खाने, दूषित जल पीने और नेफ्रॉन्स के टूटने से किडनी के रोग उत्पन्न होते हैं। इसके कारण किडनी शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। बदलती लाइफस्टाइल व काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों में जंकफूड व फास्ट फूड का सेवन ज्यादा करने लगे हैं। इसी वजह से लोगों की खाने की प्लेट से स्वस्थ व पौष्टिक आहार गायब होते जा रहें हैं।

motivational article on competing with
yourself 

- प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’,
लेखक एवं समाजसेवी, लखनऊ

प्रतिस्पर्धा  केवल ये नहीं है की आप दूसरों से कितना बेहतर है | बल्कि असली प्रतिस्पर्धा ये है की आप कल जो थे उससे आज कितने बेहतर हुए हैं ... अज्ञात 



आज का युग घोर प्रतिस्पर्धा का युग है। विश्व के हर क्षेत्र में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की आपाधापी मची है। उचित-अनुचित को ताक पर रखकर सफलता प्राप्त करने के हर तरीके अपनाये जा रहे हैं। ऐसे विषम समय में हमें यह समझना होगा कि प्रतिस्पर्धाओं का उद्देश्य बालक की आंतरिक गुणों की अभिव्यक्ति क्षमता को विकसित करना होता है। यदि हम अपनी मौलिक चीजों को औरों के सामने अपने ढंग से प्रस्तुत करना चाहते हैं तो इसके लिए इस तरह की प्रतिस्पर्धाओं की आवश्यकता पड़ती है।

(लघुकथा)
-विनोद खनगवाल ,सोनीपत (हरियाणा)

सरकार के द्वारा इस बार दिवाली पर चीन निर्मित उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। टीवी पर खबरों में लोग इन उत्पादों का बहिष्कार करके देशभक्ति निभाने की कसमें खा रहे थे। इस विषय पर पड़ोसी दोस्तों के साथ एक गर्मागर्म चर्चा के बाद मैं भी अपनी बेटी के साथ दिवाली की खरीदारी करने चल दिया था।
  


चिंतन मंथन - घर में बड़ों को हर बात में अपनी बेबाक राय देते बच्चों की भूमिका कितनी सही कितनी गलत 

घरों में बड़ों का रोल निभाते बच्चे 



 विकास की दौड़ती गाड़ी  के साथ हमारे रिश्तों के विकास में बड़ी उथल पुथल हुई है | एक तरफ बड़े " दिल तो बच्चा है जी' का नारा लगते हुए अपने अंदर बच्चा ढूंढ रहे हैं या कुछ हद तक बचकाना व्यवहार कर रहे हैं वहीं बच्चे तेजी से बड़े होते जा रहे हैं | इन्टरनेट ने उन्हें समय से पहले ही बहुत समझदार बना दिया | माता - पिता भी नए ज़माने के विचारों से आत्मसात करने के लिए हर बात में बच्चों की राय लेते हैं | हर बात में अपनी राय देने के कारण जहाँ बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ा है | पारिवारिक रिश्तों में अपनी बात रखने का भय कम हुआ है वहीं कुछ नकारात्मक परिणाम भी सामने आये हैं | अत : जरूरी ही गया है की इस बात पर विमर्श किया जाए की बच्चों की ये नयी भूमिका कितनी सही है कितनी गलत | 
       

वंदना बाजपेयी

डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम की गिरफ्तारी के बाद जिस तरह से भीड़ पगलाई और उसने हिंसा व् आगजनी का सहारा लिया |उससे तो यही लगता है की बाबा के भक्त आध्यात्मिक तो बिलकुल नहीं थे | आध्यात्म तो सामान्य स्वार्थ से ऊपर उठना सिखाता है | आत्म तत्व को जानना सिखाता है | जो सब में मैं की तलाश करता है वो तो चींटी को भी नहीं मार सकता |फिर इतनी हिंसा इतनी आगज़नी
रंगनाथ द्विवेदी

बाबाओ को गदराई दैहिकता ललचा रही----------- औरत इन्हें भी हमारी तरह भा रही। सारे प्रवचन भुल रहे, बिस्तर पर हर रात एक यौवन का सेवन, तन्दुरुस्ती एैसी कि एक जवान से ज्यादा------- औरत की जिस्म पे बाबा जी झूल रहे।



किरण सिंह 
निजता एक तरह की स्वतंत्रता है | एक ऐसा दायरा जिसमें व्यक्ति खुद रहना चाहता है | इस स्वतंत्रता पर हर व्यक्ति का हक़ है - रौन पॉल 

जिस प्रकार महिलाएँ किसी की बेटी बहन पत्नी तथा माँ हैं उसी प्रकार पुरुष भी किसी के बेटे भाई पति तथा पिता हैं इसलिए यह कहना न्यायसंगत नहीं होगा कि महिलायें सही हैं और पुरुष गलत ! पूरी सृष्टि ही पुरुष तथा प्रकृति के समान योग से चलती है इसलिए दोनों की सहभागिता को देखते हुए दोनों ही अपने आप में विशेष हैं तथा सम्मान के हकदार हैं! 

                          क्या आप का घर अक्सर बहुत बेतरतीब रहता है ? क्या आप अपना पुराना सामान मोहवश  फेंक नहीं पाते ?क्या आप को पता होता है कि उपयुक्त चीज आपके पास है पर आप उसे सही  समय पर ढूढ़ नहीं पाते ? अगर ऐसा है तो जरा अपने स्वाभाव पर गौर करिए .......... आप कार  ड्राइव करते समय किसी कि बाइक या सायकिल के छू जाने पर बेतहाशा उत्तेजित हो जाते हैं ,मार-पीट पर ऊतारू हो जाते हैं अकसर आप सड़क ,भीड़ और लोगों पर गुर्राते हैं ?या आप  बात बेबात पर अपने बच्चों को पीट देती है ,घर कि काम वाली से झगड़ पड़ती है ।


सुनीता त्यागी 
मेरठयू. पी.
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एकमात्र पुत्री के विवाह के उपरांत मिसिज़ गुप्ता एकदम अकेली हो गयी थीं। गुप्ता जी तो उनका साथ कब का छोड़ चुके थे। नाते रिश्तेदारों ने औपचारिकता निभाने के लिए एक-दो बार कहा भी था कि अब बुढ़ापे में अकेली कैसे रहोगी, हमारे साथ ही रहो। बेटी ने भी बहुत अनुरोध किया; परन्तु मिसिज़ गुप्ता किसी के साथ जाने को सहमत नहीं हुईं। 


डॉ मधु त्रिवेदी
हर विघ्न के विनाशक सारे जहाँ में जो
देवता गणेश जी की इनायत हमें भी है
कारज सफल करे अब कोई न चूक हो
किरपा बनी रहे ये इजाजत हमें भी है


गणेश चतुर्थी पर विशेष 
प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा के बाद ही किसी दूसरे देवी देवता की पूजा होती है | अत : हर पूजा में गणेश जी की पूजा अनिवार्य है | पूजा के साथ गणेश जी की कहानियाँ  भी सुनाई जाती हैं | आज हम आके लिए वो चार कहानियाँ लाये हैं जो पूजा के समय सुनाई जाती हैं | 

  चंद्रेश कुमार छतलानी
शाम के धुंधलके में भी दूर पड़े अख़बार में रखे रोटी के टुकड़े को उस भूखे लड़के ने देख लियावो दौड़ कर गया और अख़बार को उठा लिया|

"ये मुझे दे..." उसमें से वो रोटी निकालने लगा ही था कि एक सूटधारी आदमी ने उसे डांटते हुए अखबार छीन लिया|



-रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर--प्रदेश)।

औरतो की खूशनुमा जिंदगी मे जह़र की तरह है तलाक-------

किसी का दुःख समझने के लिए उस दुःख से होकर गुज़ारना पड़ता है – अज्ञात

रामरती देवी कई दिन से बीमार थी | एक तो बुढापे की सौ तकलीफे ऊपर से अकेलापन | दर्द – तकलीफ बांटे तो किससे | डॉक्टर के यहाँ जाने से डर लगता , पता नहीं क्या बिमारी निकाल कर रख दे | पर जब तकलीफ बढ़ने लगी तो हिम्मत कर के  डॉक्टर  के यहाँ  अपना इलाज़ कराने गयी | डॉक्टर को देख कर रामरती देवी आश्वस्त हो गयीं | जिस बेटे को याद कर – कर के उनके जी को तमाम रोग लगे थे | डॉक्टर बिलकुल उसी के जैसा लगा | रामरती देवी अपना हाल बयान करने लगीं | अनुभवी डॉक्टर को समझते देर नहीं लगी की उनकी बीमारी मात्र १० % है और ९० % बुढापे से उपजा अकेलापन है | उनके पास बोलने वाला कोई नहीं है | इसलिए वो बिमारी को बढ़ा  चढ़ा कर बोले चली जा रहीं हैं | कोई तो सुन ले उनकी पीड़ा | अम्मा, “ सब बुढापे का असर है कह  सर झुका कर दवाई लिखने में व्यस्त हो गया | रामरती देवी एक – एक कर के अपनी बीमारी के सारे लक्षण गिनाती जा रही थी | आदत के अनुसार वो डॉक्टर को बबुआ भी कहती जा रही थी |
रामरती देवी : बबुआ ई पायन में बड़ी तेजी से  पिरात  है |
डॉक्टर – वो कुछ  नहीं
 पढ़िए " यकीन "पर एक खूबसूरत  कहानी 

किरण सिंह
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अभी मीना को दुनिया छोड़े कुछ दो ही महीने हुए होंगे कि उसके  पति महेश का अपनी बेटी के रिंग सेरेमनी में शामिल होने के लिए हमें निमंत्रण आया! जिस समारोह का मुझे बेसब्री से इंतजार था पर उस दिन मेरा मन बहुत खिन्न सा हो गया था तथा मन ही मन में महेश के प्रति कुछ नाराजगी भी हुई थी मुझे ! मैं सोचने लगी थी कि वही महेश हैं न जो अपनी माँ के मृत्यु के छः महीने बाद भी घर में होली का त्योहार नहीं मनाने दिये! घर के बच्चों ने भी तब चाहकर भी होली नहीं खेली थी और ना ही नये वस्त्र पहने थे ! याद आने लगा कि जब होली के दिन किसी ने सिर्फ टीका लगाना चाहा था तो ऐसे दूर हट गये थे जैसे कि किसी ने उन्हें बिजली की करेंट लगा दी हो, पर मीना के दुनिया से जाने के दो महीने बाद ही यह आयोजन........ मन तो हो रहा था कि उन्हें खूब जली कटी सुनाऊँ पर...! जाना तो था ही आखिर मीना मेरी पक्की सहेली जो थी .. इसके अलावा महेश जी और  मीना ने जो मेरे लिए किया उसे कैसे कभी भूल सकती थी कि जब मेरी ओपेन हार्ट सर्जरी दिल्ली में हुई थी तब ये लोग ही उस घड़ी में हर समय हमारे साथ खड़े रहे!



सीताराम गुप्ता,
दिल्ली

     अधिकांश लोगों का मत है कि किसी भी कार्य को सही अथवा शुभ मुहूर्त में ही किया जाना चाहिए क्योंकि शुभ मुहूर्त में किए गए कार्यों में ही अपेक्षित पूर्ण सफलता संभव है अन्यथा नहीं। मोटर गाड़ी या प्राॅपर्टी खरीदनी हो, मकान बनवाना प्रारंभ करना हो, गृह प्रवेश करना हो अथवा विवाहादि अन्य कोई भी मांगलिक कार्य हो लोग प्रायः शुभ मुहूर्त में ही ये कार्य सम्पन्न करते हैं। अब तो बच्चों को भी मनचाहे महूर्त में पैदा करवाने का प्रचलन प्रारंभ हो गया है। बारह दिसंबर सन् 2012 के बारह बजे का तथाकथित शुभ मुहूर्त आप भूले नहीं होंगे जब पूरी दुनिया में अपरिपक्व नवजात शिशुओं को निर्दयतापूर्वक इस संसार में लाने के प्रयास किए जा रहे थे। ये बाज़ारवाद की पराकाष्ठा है जहाँ अज्ञान व अंधविश्वास फैला कर लागों का बेतहाशा शोषण किया जा रहा है।
काश जाति परिवर्तन का मंत्र होता
क्या मन्त्र से जाति बदल सकती है 



किरण सिंह
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बिना किसी पूर्व सूचना दिए ही मैं नीलम से मिलने उसके घर गई...! सोंचा आज सरप्राइज दूं | घंटी बजाते हुए मन ही मन सोंच रही थी कि इतने दिनों बाद नीलम मुझे देखकर उछल पड़ेगी..! पर क्या दरवाजा आया खोलती है और घर में घुसते ही चारों तरफ़ सन्नाटा पसरा हुआ | मेरा तो जी घबराने लगा और आया से पूछ बैठी कि घर में सब ठीक तो है न....! तभी अपने बेडरूम से नीलम आई और अपने चेहरे की उदासी पर पर्दा डालने के लिए मुस्कुराने का प्रयास करती हुई...! पर मैं अपने बचपन की सहेली के मनोभावों को कैसे न पढ़ लेती|फिर भी प्रतिउत्तर में मैं भी मुस्कुराते हुए उसके समीप ही सोफे पर बैठ गई....!


शरबानी  सेनगुप्ता
वह कोयले के टाल  पर बैठी
लेकर हाथ में सूखी रोटी
संकुचाई सिमटी सी बैठी
पैबंद लगी चादर में लिपटी
 मैली फटी चादर को कभी
वह इधर से खींचती
उधर से खींचती
न उसमें है रूप –रंग ,और न कोई सज्जा
सिर्फ अपने तन को ढकना चाहती
क्योंकि उसे आती है लज्जा ||


ओमकार मणि त्रिपाठी 
( पूर्व प्रकाशित ) 

मैं समुद्र के किनारे बैठा हुआ था  | लहरे आ रही हैं जा रही थीं  | बड़ा ही मनोरम दृश्य था  | पास में कुछ बच्चे खेल रहे थे  | एक बच्चे के हाथ से नारियल छूट कर गिर गया  | लहरें उसे दूर ले गयीं  | बच्चा रोने लगा  | तभी लहरे पलट कर आयीं , शायद बच्चे का नायियल वापस करने , वो नारियल वापस कर फिर अपनी राह  लौट गयीं  | माँ बच्चे को गोद में उठा कर बोली , “ देखो तुमने समुद्र को नारियल दिया था तो उसने भी तुम्हें नारियल दिया | रोया न करो , अपनी चीज बांटोगे तो दूसरा भी अपनी चीज देगा | 


(हास्य-व्यंग्य)
अशोक परूथी ‘मतवाला’
हाय GST (वस्तु एंव सेवा कर)

आजकल जी. एस. टी.  यानि वस्तु एंव सेवा कर को लेकर भारत में जनता ने दंगा-फसाद किया हुआ है औरकुछ लोग  समाज में तरह-तरह की भ्रांतियां फैला रहे हैं! इस कर को लेकर पानी के गिलास के साथ भी लोगों की रोटी इनके हलक से नीचे नहीं उतर रही ! सरकार ने इस कर का नाम सोच समझ कर रखा है - वस्तु एंव सेवा कर.




- प्रदीप कुमार सिंह पाल’, 
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
रोज के अख़बारों में न जाने कितनी खबरें ऐसी होती हैं जहाँ संवेदनहीनता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है | क्या आज हम सब संवेदनहीन हो गए हैं ? हमारे पास दूसरों  की मदद करने का समय ही नहीं है या हम करना ही नहीं चाहते ? क्या आज  का जमाना ऐसा हो गया है जो " मेरा घर मेरे बच्चो में सिमिट गया है |कहीं न कहीं हम सब पहले की तरह मिलजुल कर रहना चाहते हैं | एक संवेदनशील समाज चाहते हैं | पर हम सब चाहते हैं की इसकी शुरुआत कोई दूसरा करे | पर हर अच्छे काम की पहल स्वयं से करनी पड़ती है | एक बेहतर समाज निर्माण के लिए हर व्यक्ति के सहयोग की आवश्यकता होती है | 




अर्चना बाजपेयी

रायपुर (छत्तीस गढ़ )  
 क्लिक , क्लिक , क्लिक ... हमारा स्मार्टफोन यानी हमारे हाथ में जादू का पिटारा | जब चाहे , जहाँ चाहे सहेज लें यादों को | कोई पल छूटने न पाए , और हम ऐसा करते भी हैं | माँल  में गए तो चार साड़ियों की फोटो खींच भेज दी सहेलियों को व्हाट्स एप पर | तुरंत सबकी राय आ गयी | खुद को भी फैसला लेने में आसानी हुई | ये तस्वीरे हम खुद खींचते हैं अपनी सुविधा से अपनी मर्जी से | पर अगर यही काम कोई दूसरा करे बिना हमारी जानकारी के बिना हमारी मर्जी के तो ? 
मनोबल न खोये




         हम अपने जीवन में अनेक सपने सजाते हैं | निरंतर अनेक इच्छाएँ पैदा करते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए बड़े-बड़े लक्ष्य बनाते हैं | अपने इन्हीं लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अनेकानेक योजनाएँ बनाते हैं और जी जान से जुट जाते हैं किन्तु विडंबना ये है कि अक्सर हम किसी भी काम के पूरा होने में अधिक समय लगता देखकर निराश हो उठते हैं और अपनी उन योजनाओं को बीच में ही छोड़ देते हैं | कहीं न कहीं हम नकारात्मकता से भर उठते हैं और अपने समस्त प्रयास बंद कर देते हैं | यह निराशा और नकारात्मक सोच ही हमारी सफलता की राह की सबसे बड़ी बाधा है | काफी साल पहले मैंने एक किस्सा सुना था जो कुछ यूँ था –

शशि बंसल
भोपाल ।
लघुकथा )
" सुनो जी ! इस बार नए साल की पार्टी के लिए मुझे हीरों का हार चाहिए ही चाहिए ।पूरी कॉलोनी में एक मैं ही हूँ , जिसके पास एक भी ढंग का हार नहीं ।"
"
जब तुमने निर्णय ले ही लिया है तो कोई इनकार कर सकता है भला ।सोच तो मैं भी रहा था , नई गाड़ी लेने की । तीन साल से एक ही गाड़ी चलाते-चलाते बोर हो गया हूँ । "
"
तो खरीद लीजिये न ।"



लघुकथा 
पूनम पाठक
इंदौर ( म. प्र. )
सब तरफ चुप्पी छाई थी . कहीं कोई आवाज नहीं थी सिवाय उन लड़कों के भद्दे कमेंट्स की जो उस बेचारी को सुनने पड़ रहे थे . लेकिन किसी की हिम्मत उन लड़कों से भिड़ने की नहीं थी लिहाज़ा सभी मूकदर्शक बन चुपचाप तमाशा देख रहे थे . मैंने भी अपने काम से काम रखने वाली नीति अपनाते हुए मोबाइल पर अपनी निगाहें नीची कर ली थीं , कि तभी तड़ाक की आवाज ने जैसे सभी को जड़वत कर दिया . 



अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब फेसबुक पर sarahah एप लांच हुआ और देखते ही देखते कई लोगों ने डाउनलोड करना शुरू कर दिया | मुझे भी अपने कई सहेलियों की वाल पर sarahah एप दिखाई दिया और साथ ही यह मेसेज भी की यह है मेरा एक पता जिसपर आप मुझे कोई भी मेसेज कर सकते हैं | वो भी बिना अपनी पहचान बाताये | आश्चर्य की बात है इसमें मेरी कई वो सखियाँ भी थी जो आये दिन अपनी फेसबुक वाल पर ये स्टेटस अपडेट करती रहती थी की ,मैं फेसबुक पर लिखने पढने के लिए हूँ , कृपया मुझे इनबॉक्स में मेसेज न करें | जो इनबॉक्स में बेवजह आएगा वो ब्लाक किया जाएगा | अगर आप कोई गलत मेसेज भेजेंगे तो आपके मेसेज का स्क्रीनशॉट शो किया जाएगा , वगैरह , वगैरह | मामला बड़ा विरोधाभासी लगा , मतलब नाम बता कर मेसेज भेजने से परहेज और बिना नाम बताये कोई कुछ भी भेज सकता है | जो भी हो इस बात ने मेरी उत्सुकता सराह एप के प्रति बढ़ा दी | तो आइये आप भी जानिये सराह ऐप के बारे में ," की ये कितना ख़ास है और कितना बकवास है |

लेखिका – श्रीमती सरबानी सेनगुप्ता
जीवन भर दौड़ने भागने के बाद जब जीवन कि संध्या बेला में कुछ पल सुस्ताने का अवसर मिलता है तो न जाने क्यों मन पलट पलट कर पिछली स्मृतियों में से कुछ खोजने लगता है | ऐसी ही एक खोज आज कल मेरे दिमाग में चल रही है , जो मुझे विवश कर रही है यह सोचने को कि ईश्वर कि बनायीं इस सृष्टि में , जन्म जन्मांतर के खेल में कुछ कड़ियाँ ऐसी जरूर हैं जो हमें पिछले जन्मों के अस्तित्व पर सोचने पर विवश कर देती हैं |

उत्पल शर्मा "पार्थ" 
राँची -झारखण्ड
वक़्त हो चला था परिवार वालों से विदा लेने का, छुट्टी ख़त्म हो गयी थी। घर से निकलने ही वाला था सहसा सिसकियों की आवाज से कदम रुक गए, मुड़ कर देखा तो बूढी माँ आँचल से अपने आंसुओं को पोछ रही थी। 
सूट की भूख

 सरबानी सेनगुप्ता  
आज जहाँ भी जाओ लेडीज सूट और कुर्तों का बोलबाला है | चाहे वो मॉल  हो या पटरी पर लगी दुकानें | सूट की भूख दिन को ही नहीं रात को भी औरतों को जगाये रखती है | यहाँ मैं अपने मोहल्ले का जिक्र कर रही हूँ |


©किरण सिंह
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हे श्याम सलोने आओ जी 
अब तो तुम दरस दिखाओ जी 

राह निहारे यसुमति मैया 
तुम ठुमक ठुमक कर आओ जी 

आओ मधु वन में मुरलीधर
प्रीत की बंशी बजाओ जी


कभी - कभी हमें एक तर्क पूर्ण दिमाग के जगह एक खूबसूरत दिल की जरूरत होती है जो हमारी बात सुन ले - अज्ञात 
                                 उफ़ !कितना बोलते हैं सब लोग , बक - बक , बक -बक | चरों तरफ शोर ही शोर | ये सच है की हम सब बहुत बोलते हैं | पर सुनते कितना हैं ?हम सुबह से शाम तक कितने लोगों से कितनी साड़ी बातें करते हैं | पर  कभी आपने गौर किया है की जब मन का दर्द किसी से बांटना चाहो तो केवल एक दो नाम ही होते हैं | उसमें से भी जरूरी नहीं की वो पूरी बात सुन ही लें | 


अद्भुत संयोग है की इस बार जन्माष्टमी व् स्वतंत्रता दिवस एक साथ मनाया जा रहा है | लीलाधर , नन्द नंदन योगेश्वर श्रीकृष्ण जिन्होंने जन्म के साथ ही परतंत्रता के खिलाफ युद्ध की शुरुआत कर दी थी | उन्होंने अपने जीवन पर्यंत उस समय प्रचलित अनेकों बन्धनों अनेकों कुरीतियों व् परम्पराओं को तोडा व् उनसे आज़ादी दिलवाई | आज ये अनुपम संयोग संकेत दे रहा है की भले ही सन १९४७ में हमें स्वतंत्रता मिल गयी हो पर आज़ादी की लड़ाई अभी बाकी है | ये लड़ाई किसी विदेशी आक्रांता के खिलाफ नहीं वरन अपने ही देश में व्याप्त भ्रष्टाचार , धर्मिक विद्वेष व् सामाजिक कुरीतियों के साथ हैं | जिनसे हमें स्वयं ही अपने - अपने स्तर पर लड़ना है और स्वतंत्र होना है |
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस व् जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें



डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई, देहरादून, उत्तराखंड
जय गान करें
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भारत का जय गान करें
आओ हम अपने भारत की
नई तस्वीर गढ़ें
भारत का....
अपनी कीमत खुद पहचाने
हम क्या हैं खुद को भी जाने
यूँही नही मिली एै दोस्त-------------- गुलाम भारत के पिजड़े की चिड़ियाँ को आजादी। यूँही नही इसके पर फड़फड़ाये खुले आकाश----- बहुत तड़पी रोई पिजड़े मे इसके उड़ने की आजादी।



कान्हा तेरी प्रीत में ~पढ़िए प्रभु श्रीकृष्ण को समर्पित डॉ . भारती वर्मा की कवितायें 


1--कान्हा
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कान्हा तेरी प्रीत में
हुई बावरी मैं
तेरे रंग में रंग कर
हुई साँवरी में 
भावे न अब कछु मोहे
तुझे देखती मैं
दिवस हो या रैन अब

गीता का तीसरा अध्याय कर्म योग के नाम से भी जाना जाता है प्रस्तुत है गीता के  कर्मयोग  की सरल काव्यात्मक व्याख्या /geeta ke karmyog ki saral kaavyaatmak vyakhya 

श्रीमती एम .डी .त्रिपाठी ( कृष्णी राष्ट्रदेवी ) 

अर्जुन ने प्रभु से  कहा 
सुनिए करुणाधाम 
मम मन में संदेह अति 
निर्णय दें घनश्याम 

15 अगस्त पर एक खूबसूरत कविता

---रंगनाथ द्विवेदी

अपनो के ही हाथो--------- सरसैंया पे पीड़ाओ के तीर से विंधा, भीष्म सा पड़ा है------पन्द्रह अगस्त।



डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई, देहरादून, उत्तराखंड
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            स्वतंत्रता का क्या अर्थ है? 
स्वतंत्रता का अर्थ वही है जो हम समझना चाहते हैं, जो अर्थ हम लेना चाहते हैं। यह केवल हम पर निर्भर है कि हम स्वतंत्रता,स्वाधीनता,स्वच्छंदता और उच्छ्रंखलता में अंतर करना सीखें।



वंदना बाजपेयी
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ये जीवन एक सफ़र ही तो है और हम सब यात्री 

जीवन की गाडी तेजी से आगे भागती जा रही है | खिड़की से देखती हूँ तो खेत खलिहान नहीं दिखते | दिखता है जिन्दगी का एक हिस्सा बड़ी तेजी से पीछे छूटता जा रहा | वो बचपन की गुडिया , बचपन के खिलौने कब के पीछे छूट गए , पीछे छूट गए वो चावल जो ससुराल में पहला कदम रखते ही बिखेर दिए थे द्वार पर , बच्चों की तोतली भाषा , स्कूल का पहला बैग , पहली सायकिल ... अरे - अरे सब कुछ पीछे छूट गया | घबरा कर खिड़की बंद करती हूँ | 

15 अगस्त ‘‘स्वतंत्रता दिवस’’ पर विशेष लेख

- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) हम लाये हैं तूफान से किश्ती निकाल के:-

भारत के लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी कुर्बानियाँ देकर ब्रिटिश शासन से 15 अगस्त 1947 को अपने देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया था। तब से इस महान दिवस को भारत में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने देश की आजादी के लिए एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की थी। देश को अन्यायपूर्ण अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान तथा त्याग का मूल्य किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता।

15 अगस्त ‘‘स्वतंत्रता दिवस’’ पर विशेष लेख

- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) हम सब मिलकर संकल्प लेते हैं, 2022 तक नए भारत के निर्माण का:-
            1942 में हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक संकल्प लिया था, ‘भारत छोड़ोका और 1047 में वह महान संकल्प सिद्ध हुआ, भारत स्वतंत्र हुआ। हम सब मिलकर संकल्प लेते हैं, 2022 तक स्वच्छ, गरीबी मुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त, आतंकवाद मुक्त, सम्प्रदायवाद मुक्त तथा जातिवाद मुक्त नए भारत के निर्माण का। भारत के लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपनी कुर्बानियाँ देकर ब्रिटिश शासन से 15 अगस्त 1947 को अपने देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया था। तब से इस महान दिवस को भारत में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने देश की आजादी के लिए एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की थी। देश को अन्यायपूर्ण अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी से आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले लाखों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान तथा त्याग का मूल्य किसी भी कीमत पर नहीं चुकाया जा सकता।
प्रस्तुति - मीना त्रिवेदी
संकलन - प्रदीप कुमार सिंह 
वह अपने इलाके की सबसे लंबी लड़की थीं। सड़क पर चलतीं, तो लोग पीछे मुड़कर जरूर देखते। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के छोटे से कस्बे चकदा में पली-बढ़ीं झूलन को बचपन में क्रिकेट का बुखार कुछ यंू चढ़ा कि बस वह जुनून बन गया। एयर इंडिया में नौकरी करने वाले पिता को क्रिकेट में खास दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि उन्होंने बेटी को कभी खेलने से नहीं रोका। मगर मां को उनका गली में लड़कों के संग गेंदबाजी करना बिल्कुल पसंद न था। बचपन में वह पड़ोस के लड़कों के साथ सड़क पर क्रिकेट खेला करती थीं उन दिनों वह बेहद धीमी गेंदबाजी करती थीं लिहाजा लड़के उनकी गंेद पर आसानी से चैके-छक्के जड़ देते थे। कई बार उनका मजाक भी बनाया जाता था। टीम के लड़के उन्हें चिढ़ाते हुए कहते-झुलन, तुम तो रहने ही दो। तुम गेंद फेंकोगी, तो हमारी टीम हार जाएगी।

डॉ० मधु त्रिवेदी
प्राचार्य
शान्ति निकेतन कॉलेज ऑफ बिज़नेस
मैनेजमेन्ट एण्ड कम्प्यूटर साइन्स आगरा।


जीवन संध्या में दोनों एक दूसरे के लिए नदी की धारा थे | 
जब एक बिस्तर में जिन्दगी की सांसे गिनता है तो दूसरा उसको सम्बल प्रदान करता है, जीवन की आस दिलाता है।दोनों जानते थे कि जीवन का अन्त निश्चित है, फिर भी जीवन की चाह दोनों में है। होती भी क्यों न हो, जीवन के आरम्भ से दोनों के लिए एक मित्र, सहपाठी और जीवनसाथी एवं बहुत कुछ थे।