डिम्पल गौड़ 'अनन्या'

अहमदाबाद गुजरात 


आज भी नहीं ठहरोगे ? मालूम है तुम्हारा अक्स मेरे अन्दर पलने लगा है !
क्या ? यह नहीं हो सकता ! मेरी कुछ मजबूरियाँ हैं वेदैही !
मेरी ज़िन्दगी खुद एक मजबूरी बनकर रह गयी है विवेक ! सच कहूँ तो तुम कायर निकले !एक व्यंग्य उछला |




तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती ! घर परिवार की प्रतिष्ठा, समाज के बंधन और पार्टी के दायित्व..!!|”



ओह्हो ! तो इनके समक्ष मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं ! क्यों चले आए थे मेरी ज़िन्दगी में जब हिम्मत ही नहीं थी तुम्हारे अन्दर ! 

ठीक है मैं ही चली जाऊँगी तुम्हारी जिंदगी से दूर...बहुत दूर "भावुक हो उठी वह |
कुछ महीने उपरान्त विवेक को पार्टी अध्यक्ष निर्मित कर दिया गया | अब उस पर पदोन्नति, प्रसिद्धि और राजनीति का गहरा नशा चढ़ चुका था

वैदेही ने बीस सालों का लम्बा समय विवेक की यादों के सहारे बिता दिया मगर एक दिन उसकी शांत ज़िन्दगी में भूचाल आ गया.....

माँ ! मैं जो सुन रहा हूँ क्या वह सच है ? बताओ मुझे ? “

राजनीति ने अपना प्रभाव दिखलाना प्रारम्भ कर दिया था | विरोधियों के स्वर उग्र होने लगे | आरोप प्रत्यारोप की दूषित राजनीति ने उनके बीस वर्षों के छुपे रिश्ते को सबके सामने ला कर रख दिया | इस कड़वे सच ने कितनों की जिंदगी में हलचल मचा दी.. आखिर में पुत्र को तो पिता का नाम प्राप्त हो गया परन्तु  वैदेही आज भी गुमनाम ही है |


Share To:

atoot bandhan

Post A Comment:

0 comments so far,add yours