" अतिथि देवो भव् " : तब और अब

किरण सिंह  आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा यह कहते सुना जाता है कि आजकल लोग एकाकी होते जा रहे हैं , सामाजिकता की कमी होती जा रही है, ...


किरण सिंह 

आजकल अधिकांश लोगों के द्वारा यह कहते सुना जाता है कि आजकल लोग एकाकी होते जा रहे हैं , सामाजिकता की कमी होती जा रही है, अतिथि को कभी देव समझा जाता था लेकिन आजकल तो बोझ समझा जाने लगा है आदि आदि..! 


यह सही भी है किन्तु जब हम इस तरह के बदलाव के मूल में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि इसमें दोष किसी व्यक्ति विशेष का न होकर आज की जीवन शैली, शिक्षा  - दीक्षा , एकल तथा छोटे परिवारों का होना, घरों के नक्शे तथा पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण है! 
एकल परिवारों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा मनोनुकूल जीवनशैली तो रहती है जहाँ किसी अन्य का रोक - टोक नहीं होता इसीलिये इसका चलन बढ़ भी रहा है ! किन्तु एकल परिवारों तथा आज की जीवनशैली में मेहमानवाजी के लिए समय निकालना जरा कठिन है! 



संयुक्त परिवार में हर घर में बूढ़े बुजुर्ग रहते थे जिनके पास काम नहीं होता था या कर नहीं सकते थे तो जो भी आगन्तुक आते थे बूढ़े बुजुर्ग बहुत खुश हो जाया करते थे क्योंकि कुछ समय या दिन उनके साथ बातें करने में अच्छा गुजर जाता था तथा मेहमान भी मेहमानवाजी और अपनापन से प्रसन्न हो जाते थे! इसके अलावा बच्चे भी मेहमानों को देखकर उछल पड़ते थे क्योंकि एक तो मेहमान कुछ न कुछ मिठाइयाँ आदि लेकर आते थे इसके अलावा घर में भी तरह-तरह का व्यंजन बनता था जिसका बच्चे लुत्फ उठाते थे! तब घर की बहुओं को चूल्हा चौका से ही मतलब रहता था बहुत हुआ तो थोड़ा बहुत आकर मेहमानों को प्रणाम पाती करके हालचाल ले लिया करतीं थीं और बड़ों के आदेश पर खाने पीने आदि की व्यवस्था करतीं थीं! मतलब संयुक्त परिवार में हर आयु वर्ग के सदस्यों में काम बटे हुए होते थे जिससे मेहमान कभी बोझ नहीं लगते थे बल्कि उनके आने से घर में और खुशियों का माहौल रहता था ! 


किन्तु एकल परिवारों में बात से लेकर खाने - पीने रहने - सोने तक सब कुछ का इन्तजाम घर की अकेली स्त्री को ही करना पड़ता है क्योंकि पुरुष को तो आॅफिस टूर आदि से फुर्सत ही नहीं मिलता और घर में जब स्मार्ट और सूघड़ बीवी हो तो वे निश्चिंत भी हो जाते हैं ! और बच्चों पर भी पढ़ाई का बोझ इतना रहता है कि उनके पास मेहमानवाजी करने का फुर्सत नहीं रहता! यदि वे मेहमानों के साथ बैठना चाहें भी तो मम्मी पापा का आदेश होता है कि जाओ तुम फालतू बातों में मत पड़ो अपनी पढ़ाई करो!  ऐसे में मेहमानों के आगमन पर काम के बोझ के साथ-साथ स्त्रियों का अपना रूटीन खराब हो जाता है ! जिससे खीजना स्वाभाविक ही है! 



जहाँ घरेलू स्त्री है वहाँ तो फिर भी ठीक है किन्तु जहाँ पर पति पत्नी दोनों ही कार्यरत हैं वहाँ की समस्या तो और भी जटिल है! और उससे भी ज्यादा मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले दम्पत्तियों के पास तो मेहमानों के लिए बिल्कुल भी समय नहीं है क्योंकि उनका रुटीन भी कुछ अलग है ! कभी नाइट शिफ्ट तो कभी डे शिफ्ट... ऐसे में उनके पास सिर्फ वीकएंड बचता है जिसमें उन्हें आराम भी करना होता है और घूमना भी होता है जो कि निर्धारित ही रहता है ऐसे में उनके पास अचानक कोई मेहमान टपक पड़े तो फिर दिक्कत तो होगी ही! 



अब हम बात करते हैं कि पहले अतिथि देव क्यों होते थे ! इसका सीधा उत्तर है कि पहले अतिथि बिना आमन्त्रण के नहीं आते थे , और जब कोई किसी को आमन्त्रित करता है तो अवश्य अपना समय, सामर्थ्य को देखते हुए आत्मीय जन को ही करता होगा तो वैसे अतिथि तो कभी भी प्रिय ही होंगे! 


बात मित्रों की हो या रिश्तेदारों की जाना वहीं चाहिए जहाँ पर आत्मीयता हो और आपके जाने से आपके मित्र या रिश्तेदार को खुशी मिले! यदि मित्रों या रिश्तेदारों के पास जाना हो तो जाने से पहले सूचित अवश्य कर दें ताकि आपका मित्र या रिश्तेदार आपके लिए समय निकाल सके! 


जाने के बाद मेजबान के कार्य में थोड़ी बहुत मदद अवश्य करें! 
# अपना सामान यथास्थान ही रखें ! बच्चे साथ हों तो उनपर ध्यान दें! 
# घर का सामान यदि बिखर गया हो तो धीरे से ठीक कर दें! 
# और सबसे जरूरी कि जो भी व्यंजन खाने पीने के लिए परोसे जायें उसका तारीफ अवश्य कर दें! 
फिर देखियेगा आप अवश्य ही अतिथि के रूप में देव ही महसूस करेंगे! 

मेजबानों को भी चाहिए कि अपने कीमती समय में से थोड़ा समय निकालकर मेहमानों को खुशी - खुशी दें ! विश्वास करें इससे खुशियों में गुणोत्तर बढ़ोत्तरी होगी! 





परिचय ...
साहित्य , संगीत और कला की तरफ बचपन से ही रुझान रहा है !
याद है वो क्षण जब मेरे पिता ने मुझे डायरी दिया.था ! तब मैं कलम से कितनी ही बार लिख लिख कर काटती.. फिर लिखती फिर......... ! जब पहली बार मेरे स्कूल के पत्रिका में मेरी कविता छपी उस समय मुझे जो खुशी मिली थी उसका वर्णन मैं शब्दों में नहीं कर सकती  ....!

घर परिवार बच्चों की परवरिश और पढाई लिखाई मेरी पहली प्रार्थमिकता रही ! किन्तु मेरी आत्मा जब जब सामाजिक कुरीतियाँ , भ्रष्टाचार , दबे और कुचले लोगों के साथ अत्याचार देखती तो मुझे बार बार पुकारती रहती थी  कि सिर्फ घर परिवार तक ही तुम्हारा दायित्व सीमित नहीं है .......समाज के लिए भी कुछ करो .....निकलो घर की चौकठ से....! तभी मैं फेसबुक से जुड़ गई.. फेसबुक मित्रों द्वारा मेरी अभिव्यक्तियों को सराहना मिली और मेरा सोया हुआ कवि मन  फिर से जाग उठा .....फिर करने लगी मैं भावों की अभिव्यक्ति..! और मैं चल पड़ी इस डगर पर ... छपने लगीं कई पत्र पत्रिकाओं में मेरी अभिव्यक्तियाँ ..! 

पुस्तक- संयुक्त काव्य संग्रह काव्य सुगंध भाग २ , संयुक्त काव्य संग्रह सहोदरी सोपान भाग 2
मेरा एकल काव्य संग्रह है .. मुखरित संवेदनाएं
फोटो कोलाज 
फर्स्ट फोटो क्रेडिट - आध्यात्म विश्वविद्यालय
सेकंड फोटो क्रेडिट - legacy of wisdom

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.कमलेश मिश्रा “मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनन्य गौड़ अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अनूप शुक्ला अन्तर करवड़े अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा परवीन कुमार अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अविनीश त्रिपाठी अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आराधना सिंह आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंतजार इंदु सिंह इमरान रिजवी इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपवास उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ऐब्युसिव रिश्ते ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कर्मका सिद्धांत कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानियाँ कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह किस्सा टाइम्स कु. शान्ति पाल ‘प्रीति’ कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर क्रिसमस क्षितिज संस्था ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती ग़ालिब गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत चॉकलेट केक छठ छाया सिंह जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जल जिनपिंग जी एस टी जीवनी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे टेंशन ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डेजी नेहरा डेटिंग टिप्स डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .जगदीश गाँधी डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तरसेम कौर तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा तोहफा त्यौहार दशहरा दहेज़ प्रथा दीपक मित्तल दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दीप्ति निगम दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नया साल नव वर्ष नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी न्यू इयर रेसोल्युशन पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय पतंग परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्यावरण पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम डोंगरा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रतियोगिता प्रथम पोस्ट प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रमिला श्री तिवारी प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बहु बाइबल बाबु लाल बाबुल बाबू लाल बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बाल मनो विज्ञान बाल-मन बिल गेट्स बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर बेटी ब्लू व्हेल ब्लैक डॉट ब्लॉगिंग भगवान् भाई - 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