September 2017
                                                   

कहते हैं भाई बहन का रिश्ता कच्चे धागे में बंधा दुनिया का सबसे पक्का रिश्ता होता है | क्योंकि वहां लेने देने की भावना से परे सिर्फ स्नेह होता है | सौ फीसदी खरा , सोने सा |

कहते ये भी हैं जब कोई इस लोक से दूर चला जाता है तो वो तारा बन जाता है | कल रात आसमान बहुत साफ़ था | बहुत सारे तारे टिमटिमा रहे थे | और उनके बीच मैं ढूंढ  रही थी अपने "ओम भैया"को | शायद ये , शायद वो ...फिर दिखा सबसे चमकीला तारा | हां वही, वही तो हैं भैया |

दशहरा हमारे देश का एक प्रमुख त्योहार है।  इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है।

(1) दशहरा पर्व हर्ष और उल्लास का त्योहार है:-
दशहरा हमारे देश का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं तथा रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। यह हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। व्यक्ति और समाज में सत्य, उत्साह, उल्लास एवं वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों-काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। दशहरे का सांस्कृतिक पहलू भी है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में सुनहरी फसल उगाकर अनाज रूपी संपत्ति घर लाता है तो इस प्रसन्नता के अवसर को वह भगवान की कृपा मानता है और उसे प्रकट करने के लिए वह उनका पूजन करता है।
(2) दशहरा पर्व का सन्देश है कि अहंकार के मद में चूर व्यक्ति का अंत बुरा होता है:-
इस दिन भगवान राम ने राक्षस रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था और सारा समाज भयमुक्त हुआ था। इस दिन कुछ लोग शारीरिक आरोग्यता तथा आध्यात्मिक विकास के लिए व्रत एवं उपवास करते हैं। कई स्थानों पर मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन भी किया जाता है। दशहरा अथवा विजयादशमी राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह हर्ष, उल्लास तथा विजय का पर्व है। देश के कोने-कोने में यह विभिन्न रूपों से मनाया जाता है, बल्कि यह उतने ही जोश और उल्लास से दूसरे देशों में भी मनाया जाता है जहां प्रवासी भारतीय रहते हैं। यह दिन हमें प्रेरणा देता है कि हमें अंहकार नहीं करना चाहिए क्योंकि अंहकार के मद में डूबा हुआ व्यक्ति एक दिन अवश्य असफल हो जाता है। रावण चारों वेदों का ज्ञाता और महावीर व्यक्ति था परन्तु उसका अंहकार ही उसका तथा उसके कुटुम्ब के विनाश कारण बना। यह त्योहार जीवन को हर्ष और उल्लास से भर देता है, साथ ही यह जीवन में कभी अंहकार न करने की प्रेरणा भी देता है। रोशनी का त्योहार दीवाली, दशहरा के बीस दिन बाद मनाया जाता है। किसी ने सही ही कहा है कि बुराई का होता है विनाश, दशहरा लाता है उम्मीद की आस।

(4) राम के समक्ष सबसे बड़ा संकट कब पैदा हुआ? 

पिता की पहली आज्ञा सुनकर राम आनंदित हो गये कि मुझे अपने पूज्य पिता जी की आज्ञा पालन करने का सुअवसर प्राप्त होने के साथ ही साथ मुझे वन में संत-महात्माओं के दर्शन करने एवं उनके प्रवचन सुनकर अपने जीवन में प्रभु की आज्ञाओं के जानने का सुअवसर मिलेगा तथा मुझे ईश्वर की आज्ञाओं का ज्ञान होगा एवं उन पर चलने का अभ्यास करने का सुअवसर प्राप्त होगा। किन्तु पिता की दूसरी आज्ञा सुनकर कि प्रिय राम तुम वन में न जाओ और यदि तुम वन गये तो मैं प्राण त्याग दूँगा। इससे राम के मन में द्वन्द्व उत्पन्न हो गया कि पिता की इन दो आज्ञाओं में से किस आज्ञा को माँनू? क्या करूँ, क्या न करूँ? मैं पिता की पहली आज्ञा मानकर वन में जाऊँ या पिता की दूसरी आज्ञा मानकर और वन न जाकर अयोध्या का राजा बन जाऊँ?

(5) राम का संकट कैसे दूर हुआ? 

राम ने अपने ऊपर आये इस संकट की घड़ी में हाथ जोड़कर परम पिता परमात्मा से प्रार्थना की और पूछा कि मैं क्या करूँ? पिता की पहली आज्ञा माँनू या दूसरी? राम को परमात्मा से उत्तर मिल गया। परमात्मा ने राम से कहा, तू तो मनुष्य है और हमने मनुष्य को विचारवान बुद्धि दी है। मनुष्य उचित-अनुचित का विचार कर सकता है। मनुष्य यह विचार कर सकता है कि मेरे किसी भी कार्य का अंतिम परिणाम क्या होगा? पशु यह विचार नहीं कर सकता। क्या तू अपनी विचारवान बुद्धि का प्रयोग करके उचित और अनुचित का निर्णय नहीं कर सकता? राम का द्वन्द्व उसी पल दूर हो गया। राम को यह विचार आया कि यदि राजा दशरथ के वचन की मर्यादा का पालन करने के लिए मैं वन में न गया तो पूरे समाज में चर्चा फैल जायगी कि राजा अपने वचन से मुकर गया है। एक राजा के इस अमर्यादित व्यवहार के कारण समाज अव्यवस्थित हो जायगा। अतः मुझे वन अवश्य जाना है।
(6) दशरथ तथा राम की सोच में क्या अंतर था? 

राम ने प्रभु इच्छा को जानकर दृढ़तापूर्वक वन जाने का निर्णय कर लिया। राम ने यह निर्णय इस आधार पर लिया कि यदि राजा की 14 वर्ष वन जाने की आज्ञा के पालन तथा वचन की लाज एक बेटा नहीं रखेगा तो समाज में क्या सन्देश जायेगा? परमात्मा द्वारा निर्मित मानव समाज परमपिता परमात्मा का अपना निजी परिवार है तथा इस सृष्टि के सभी मनुष्य उसकी संतानें हैं। मित्रों, आप देखे, दशरथ की दृष्टि अपने प्रिय पुत्र के प्रति
अगाध भौतिक प्रेम व अति मोह एवं स्वार्थ से भरी होने के कारण उनका राम को कई तरीके से वन न जाने की सीख देना तथा यदि फिर भी राम वन चले जाय तो प्राण त्यागने तक का निर्णय कर लेना परमात्मा एवं उसके समाज के व्यापक हितों के विरूद्ध है।


वहीं दूसरी ओर उनके बेटे राम की दृष्टि आध्यात्मिक होने के कारण पिता की अतिवेदना की बिना परवाह किये हुए ही उनका वन जाने का निर्णय समाज को मर्यादित होने की सीख देने वाला था। मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने अपने जीवन से समाज को यह सीख दी कि मानव की एक ही मर्यादा या धर्म या कत्र्तव्य है कि यदि अपनी और अपने पिता की इच्छा और परमात्मा की इच्छा एक है तो उसे मानना चाहिये किन्तु यदि हमारी और हमारे शारीरिक पिता की इच्छा एक हो किन्तु परमात्मा की इच्छा उससे भिन्न हो तो हमें अपनी और अपने पिता की इच्छा का नहीं वरन् केवल परमात्मा की इच्छा और आज्ञा का पालन करना चाहिये। परमात्मा सबसे बड़ा है। वे सारी मानव जाति का पिता, माता तथा बन्धु-सखा है।

(7) सीता अपने अंदर के द्वन्द्व से कैसे ऊपर उठी? 
इसी तरह सीता माता द्वारा लिया गया निर्णय संसार की स्त्रियों के लिए एक सुन्दर उदाहरण है। वन जाते समय राम अपनी पत्नी सीता से कहते हंै - हे जनक नंदनी, तुम वन जाने की जिद्द न करो। तुम सुकोमल हो। वन की भयंकर तकलीफों को तुम सहन नहीं कर सकोगी। हे सीते, तुम वन में न जाओ और तुम महल में ही रहो। पति राम की यह आज्ञा सुनकर सीता दुःखी हो गई और सोचने लगीं कि ‘क्या करूँ और क्या न करूँ?’ सीता के मन में द्वन्द्व शुरू हो गया। सीता ने संकट की इस घड़ी में हाथ जोड़कर परमात्मा का स्मरण किया। सीता को अंदर से उत्तर मिल गया। सीता तू मनुष्य है तूझे विचारवान बुद्धि मिली है। पति संकट में हो और यदि पत्नी साथ नहीं देगी तो परमात्मा के व्यापक समाज में परिवार की संस्था ही कमजोर पड़ जायगी। तू अपने पति की आज्ञा को मानकर यदि तू वन में न गई तो समाज में गलत सीख चली जायेगी और सभी स्त्रियां ऐसा ही आचरण करेंगी। परमात्मा  द्वारा निर्मित समाज ही कमजोर हो जायगा। सीता ने निश्चय किया कि मैं परमात्मा द्वारा निर्मित समाज के लिए गलत उदाहरण नहीं बनूँगी और प्रभु इच्छा के पालन के लिए वन जाऊँगी और सीता वन न जाने की राम की आज्ञा को तोड़कर उनके साथ वन गयी।


(8) जो परमात्मा की राह में धैर्यपूर्वक सहन करते हैं परमात्मा उनकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ा देता है:- 

प्रभु की राह से विमुख होकर पिता दशरथ समाज को गलत सीख देकर संसार से चले गये। बेटे राम ने वन जाने का निर्णय लेकर पिता के वचन की लाज बचाने की कोशिश की। प्रभु की इच्छा के विरूद्ध जाने का दण्ड बहुत खतरनाक है। आज राजा दशरथ का नाम लेने वाले कम लोग हैं। सीता तथा राम के अनेक मंदिर हैं। दशरथ का एक भी मंदिर नहीं है। प्रभु की राह चलने के कारण संसार में युगों-युगों तक जय सिया-राम होती रहेगी जो भगवान की राह पर धैर्यपूर्वक सहन करते हंै परमात्मा उनकी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ा देता है। समाज में जब मानव जीवन अमर्यादित हो गया तब मानव जीवन में मर्यादा पालन की भावना उत्पन्न करने के लिए परमपिता परमात्मा ने मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम को इस संसार में भेजा और उन्होंने अपने जीवन से मर्यादा पालन की शिक्षा देकर मानव जीवन को मर्यादित बनाया।

(9) युगावतार भारी कष्ट उठाकर मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन जीने की राह दिखाते हैं:-

यदि राम अपने पिता का त्याग कर प्रभु इच्छा के पालन के लिए वन को न गये होते, यदि सीता अपने पति राम की इच्छा का उल्लंघन कर प्रभु प्रेम के लिए वन न गई होती तो समाज की क्या स्थिति होती? सम्पूर्ण समाज मर्यादा विहीन बन गया होता। सर्वत्र रावण जैसे दबंग एवं मर्यादाविहीन व्यक्तियों का राज होता। युग-युग में परमात्मा की ओर से संसार में युगावतार के रूप मंे आकर साधु प्रवृत्ति के लोगों का कल्याण करते हैं तथा दुष्ट प्रकृति के लोगों का विनाश करते हैं। मनुष्य को उसके कत्र्तव्यों का बोध कराकर उसके चिन्तन में परिवर्तन कर देते हैं। युगावतार जादू की छड़ी घुमाकर सारे दुःख दूर नहीं करते वरन् भारी कष्ट उठाकर मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन जीने की राह दिखाते हैं।

(10) ‘हनुमान’ ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया:- 
हनुमान ने परमात्मा को पहचान लिया और उनके चिन्तन में भगवान आ गये तो वह एक छलाँग में मीलों लम्बा समुद्र लांघकर सोने की लंका पहुँच गये। हनुमान में यह ताकत परमात्मा की इच्छा तथा आज्ञा को पहचान लेने से आ गयी। प्रभु भक्त हनुमान ने पूरी लंका में आग लगाकर रावण को सचेत किया। हनुमान के चिन्तन में केवल एक ही बात थी कि प्रभु का कार्य के बिना मुझे एक क्षण के लिए भी विश्राम नहीं करना है। हनुमान ने बढ़-चढकर प्रभु राम के कार्य किये। हनुमानजी की प्रभु भक्ति यह संदेश देती है कि उनका जन्म ही राम के कार्य के लिए हुआ था। हमें भी हनुमान जी की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।

(11) ‘राम’ ने प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया:- 

लंका के राजा रावण ने अपने अमर्यादित व्यवहार से धरती पर आतंक फैला रखा था। राम ने रावण को मारकर धरती पर मर्यादाओं से भरे ईश्वरीय समाज की स्थापना की। चारों वेदों का ज्ञाता रावण ने अपनी इच्छा पर चलने के कारण अपना तथा अपने कुटुम्ब का विनाश करा लिया। जबकि जटायु, रीक्ष-वानरों, केवट, शबरी आदि ने प्रभु की इच्छा तथा आज्ञा को पहचानकर प्रभु का कार्य किया। परमात्मा की ओर से राम की आत्मा में कोई पवित्र पुस्तक अवतरित नहीं हुई है। राम के मर्यादापूर्ण जीवन चरित्र पर आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व संत तुलसीदास द्वारा अपनी अन्तःप्रेरणा से लिखी रामचरित मानस सबसे अधिक लोकप्रिय हुई हैं। मानव जाति के लिए रामचरित मानस की शिक्षायें अनुकरणीय है। इसलिए हमें भी राम की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।

(11) विद्यालय पूजा, इबादत, प्रेयर, अरदास का भवन है:- 

विद्यालय एक ऐसा स्थान है जहाँ सभी धर्मों के बच्चे तथा सभी धर्मों के टीचर्स एक स्थान पर एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का यही सही तरीका है। सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, शान्ति, न्याय एवं अभूतपूर्व भौतिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि आ जायेगी। विद्यालय है सब धर्मों का एक ही तीरथ धाम - क्लास रूम शिक्षा का मंदिर, बच्चे देव समान। स्कूल पूजा, इबादत, प्रेयर, अरदास का भवन है।

’’’’’  डा0 जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं
संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ



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विजयदशमी में बुराई के प्रतीक रावण का प्रभु श्रीराम द्वारा वध किया जाता है | पर आज रावण एक नहीं अनेक हैं, और राम एक भी नहीं | पढ़िए खूबसूरत कविता "आज का रावण" 




भारतीय नारी का प्रेम

बड़ा विचित्र है भारतीय नारी का प्रेम
वह विदेशियों की तरह
चोबीसों घंटे करती नहीं है
आई लव यू –आई लव यू का उद्घोष
बल्कि
गूथ कर खिला देती है प्रेम
आटे  की लोइयों में
कभी तुम्हारे कपड़ों में
नील की तरह छिड़क देती है
कभी खाने की मेज पर इंतज़ार करते हुए
दो बूँद आँखों से निकाल कर 
परोस देती है खाली कटोरियों में
कभी बुखार में
गीली पट्टियाँ बन कर
बिछ –बिछ जाती है
तुम्हारे माथे पर 
जानती है वो की मात्र क्षणिक उन्माद नहीं है प्रेम
जो ज्वार की तरह चढ़े और भाटे  की तरह उतर जाये
और पीछे छोड़ जाये रेत  ही रेत
और मरी हुई मछलियां
हां उसका प्रेम
ठहराव है गंगा –जमुना के दोआब सा
जहाँ लहराती है
संस्कृति की फसलें



समर्पण 

बचपन में 
स्मरण नहीं कब ............. 
जब   अम्मा ने 
बताया था शिवोपासना का महत्त्व 
 कि शिव -पार्वती  सा होता है 
पति -पत्नी का बंधन 
 और मेरे केश गूँथते हुए 
बाँध दिया था मेरा मन 
तुम्हारे लिए 

तब अनदेखे -अनजाने ही 
तुम लगने लगे थे 
चिर -परिचित 
और तभी से 
शुरू हो गया था 
मेरा समर्पण 
तुम्हारे लिए


जब तुम थे अलमस्त 
गुल्ली -डंडा खेलने में 
तब नंगे पाँव 
शुरू हो गयी थी मेरी यात्रा 
शिवाले की तरफ 
तुम्हारे लिए 


जब तुम किशोरावस्था में 
मित्रों के साथ 
गली चौराहे  नुक्कड़ पर 
आनंद ले रहे थे जीवन  का
मैं जला  रही थी 
नन्हा सा दिया 
तुलसी के नीचे 
तुम्हारे लिए  


जब तुम सफलता के हिमालय पर 
चढ़ने के लिए 
लगा रहे थे 
ऐड़ी -चोटी का जोर 
मैंने शुरू कर दिए थे 
सोलह सोमवार के व्रत 
तुम्हारे लिए 


वर्षों  अनदेखा -अंजाना 
 रिश्ता निभाने के बाद 
जब अग्नि को साक्षी मान मंत्रोच्चार के साथ 
किया था तुम्हारे जीवन में प्रवेश 
तब से 
पायलों की छन -छन से 
चूड़ी की खन -खन से 
माथे की बिंदियाँ से 
हाथों की मेहँदी से 
सुर और रंग में ढलती ही रही हूँ 
तुम्हारे लिए 


जब -जब सूखने लगा तुम्हारा जीवन 
शोक और दर्द की ऊष्मा से 
तो भरने को दरारे 
सावन की बदली बन बरसी हूँ 
तुम्हारे लिए 

पर क्यों यह प्रश्न 
कौंधता है 
बिजली सम मन में 
अब बता भी दो ना 
क्या बचपन से लेकर आज तक 
तुम्हारे मन में भी रहा है 
वैसा ही समर्पण 
मेरे लिए.………………  




लाल गुलाब


आज यूं ही प्रेम का
उत्सव मनाते
लोगों में
लाल गुलाबों के
आदान-प्रदान के बीच
मैं गिन रही हूँ
वो हज़ारों अदृश्य
लाल गुलाब
जो तुमने मुझे दिए
तब जब मेरे बीमार पड़ने पर
मुझे आराम करने की
हिदायत देकर
रसोई में आंटे की
लोइयों से जूझते हुए
रोटी जैसा कुछ बनाने की
असफल कोशिश करते हो
तब जब मेरी किसी व्यथा को
दूर ना कर पाने की
विवशता में
अपनी डबडबाई आँखों को
गड़ा देते हो
अखबार के पन्नो में
तब जब तुम
"मेरा-परिवार " और "तुम्हारा-परिवार"
के स्थान पर
हमेशा कहते हो "हमारा-परिवार"
और सबसे ज़यादा
जब तुम झेल जाते हो
मेरी नाराज़गी भी
और मुस्कुरा कर कहते हो
"आज ज़यादा थक गई हैं मेरी मैडम क्यूरी "
नहीं , मुझे कभी नहीं चाहिए
डाली से टूटा लाल गुलाब
क्योंकि मेरा
लाल गुलाब सुरक्षित है
तुम्हारे हिर्दय में
तो ताज़ा होता रहता है
हर धड़कन के साथ।

"प्रेम कविता "

मैं लिखना चाहती थी
प्रेम कविता
पर लिख ही नहीं पायी
ढालना चाहती थी ,उस गहराई को
पर शब्द कम पड़ गए
उकेरना चाहती थी ,उस गम्भीरता को
पर वाक्य अधूरे छूट गए
नहीं व्यक्त कर पायी
अपने मन के वो भाव
जब तुम्हारे साथ
खाना खाने की प्रतीक्षा में
दिन -दिन भर भूखी बैठी रही
जब तुम्हारी मन पसंद
डिश बनाने के लिए
सुबह से ले कर रात तक
हल्दी और तेल लगी साडी में
नहीं सुध रही
अपने बाल सवाँरने की
जब तुम्हारे घर देर से आने पर
और फोन न उठाने पर
चिंता और फ़िक्र में
डबडबाई आँखों से तुम्हारी कुशलता हेतु
मान लेती हूँ निर्जला व्रत
जब तुम्हारी गृहस्थी के
कुशल संचालन में
घडी की सुइयों के मानिंद
बिना उफ़ किये ,चलती रहती हूँ
चौबीसों घंटे ,बारहों महीने
अनवरत -लगातार
मुझे मॉफ करना
सुबह से शाम तक न जाने
कितनी प्रेम कवितायेँ लिखती हूँ मैं
जो तैरती है हमारे बीच हवा में
बजता है जिनका संगीत
घर के कोने -कोने में
पर नहीं पहना पाती
उन्हें शब्दों के वस्त्र
क्योंकि मेरा प्रेम
सदा से था ,है और रहेगा
मौन ,अपरिभाषित और अव्यक्त

"लाल से लाल तक "

विदाई की बेला में
आँखों में अश्रु लिए
एक ही जीवन में दो जन्मों के 
मध्य का पुल पार कर जब लाल जोड़े में
प्रवेश किया था तुम्हारे घर में
तब से
अपनी लाल बिंदियाँ पर
सजाया है परिवार का मान
लाल चूड़ियों की धुरी पर रख कलाई
निभाएं है असंख्य कर्तव्य
पैरों में लगी लाल महावर से
रंगती रही हूँ ,तुम्हारी जिंदगी,
अनंत बार बांधें है मन्नत के लाल धागे
तुम्हारी छोटी -छोटी ख़ुशी के लिए
पर जब भी जुड़े हैं
यह दो हाँथ अपने लिए
माँगा है ,बस इतना ही
की विदाई की बेला में
जब पार करू
दो जन्मों के मध्य का पुल
तब तुम आँखों में
दो बूँद प्रेम के अश्रु लेकर
भर देना मेरी मांग पुनः
लाल सिन्दूर से
ऊपर से नीचे तक
और
पूरा हो जाये मेरा
"लाल से लाल "तक का सफर


वंदना बाजपेयी









दुर्गा अष्टमी पर विशेष - आस्थाएं तर्क से तय नहीं होती 


            आज दुर्गा अष्टमी है | ममतामयी माँ दुर्गा शक्ति स्वरूप हैं | एक तरफ वो भक्तों पर दयालु हैं तो दूसरी तरफ आसुरी प्रवत्तियों का संहार करती हैं | वो जगत माता हैं | माँ ही अपने बच्चों को संस्कार शक्ति और ज्ञान देती है | इसलिए स्त्री हो या पुरुष सब उनके भक्त हैं | वो नारी शक्ति व् स्त्री अस्मिता का प्रतीक हैं | जो अपने ऊपर हुए हमलों का स्वयं मुंह तोड़ जवाब देती है | दुर्गा नाम अपने आप में एक मंत्र है | जो इसका उच्चारण करते हैं, उन्हें पता है की उच्चारण मात्र से ही शक्ति का संचार होता है | नवरात्रि इस शक्ति की उपासना का पर्व है |





रंगनाथ द्विवेदी। जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।

मै पंडित नही------------ तेरी मस्जिद का अजा़न, और तेरी बस्ती का जुलाहा हूँ। देख लेता हूँ सारे कौमो का खुदा मै, फिर बुनता हूं एक धागे से मुहब्बत की चादर, मै कबीर सा हिन्दू ---------------- और उसकी मस्ती सा जुलाहा हूँ।


 डॉक्टर रमेश चंद्र की लघुकथाएं सादगी से भरी हुई है। जैसा उनका सहज जीवन है, वैसी ही उनकी लघुकथाएं हैं ।उनका जीवन उनकी लघुकथाओं में प्रतिबिंबित होता है। उनकी लघुकथाएं जनपक्षधर हैं ,और लघुकथा में लोक मांगलिक चेतना होना जरूरी है। उसी से जन जागृति आती है। यह बात वरिष्ठ कथाकार सूर्यकांत नागर ने 'क्षितिज' संस्था द्वारा आयोजित डॉक्टर रमेश चंद्र के लघुकथा संग्रह ' मौत में जिंदगी ' के लोकार्पण प्रसंग पर, अपने अध्यक्षीय उदबोधन में कहीं। उन्होंने यह भी कहा कि, लघुकथा को किसी नियमावली में नहीं बांधा जा सकता। शिल्प के स्तर पर निरंतर प्रयोग हो रहे हैं, और प्रयोग से ही प्रगति होती है।

अमेरिका की सिलिकाॅन वेली की तरह भारत को इण्टरनेशनल रिसर्च की वैश्विक प्रयोगशाला बनाने के निर्माण में साधनारत युवा वैज्ञानिक डा. रविकांत


सरिता  जैन
ये कहानी है तीन मित्रों की |  उनमें से एक था मुस्लिम , एक , सवर्ण और एक दलित |नाम थे रहमान , राम और भीम  | तीनों एक दूसरे के सुख - दुःख के साथी |  रोज शाम को उनकी बैठक होती रहती थी | बातें भी बहुत होती | जैसा की पुरुषों में होता है अक्सर राजनैतिक चर्चाएं होने लगती हैं | यूँ तो तीनों कहने को बात कर रहे होते |पर कहीं न कहीं उनके मन में अपनी जाति और धर्म की भावना छिपी रहती  | इस कारण जब भी कोई खबर सामचारपत्रों में आती सबका उसको देखने का एंगल अलग अलग होता | इस कारण कभी कभी हल्की बहस भी हो जाती |


गुरु कीजिये जानी के , पानी पीजे छानी ,
 बिना विचारे गुरु करे , परे चौरासी खानी ||
                                                        कबीर दास







©किरण सिंह 
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हमारे लिए गर्मी की छुट्टियों में हिल स्टेशन तथा सर्दियों में समुद्री इलाका हमारा ननिहाल या ददिहाल ही हुआ करता था! जैसे ही छुट्टियाँ खत्म होती थी हम अपने ननिहाल पहुंच जाया करते थे जहाँ हमें दूर से ही देख कर ममेरे भाई बहन उछलते - कूदते हुए तालियों के साथ गीत गाते हुए ( रीना दीदी आ गयीं...... रीना दीदी........) स्वागत करते थे कोई भाई बहन एक हाथ पकड़ता था तो कोई  दूसरा और हम सबसे पहले  बाहर बड़े से खूबसूरत दलान में बैठे हुए नाना बाबा ( मम्मी के बाबा ) को प्रणाम करके उनके द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर देकर अपनी फौज के साथ घर में प्रवेश करते थे!

आज साहित्य के क्षेत्र में सम्मान समारोह आम हो गए हैं | कोई कितना भी कलम घिस ले पर सम्मान के लिए जुगाड़ चाहिए | जगह - जगह बटते सम्मानों की हकीकत का पर्दाफाश  करती लघुकथा ... सम्मान 
संजय कुमार गिरि

एक व्यक्ति :सम्मान ले लो .....सम्मान ले लो भाई ...सम्मान !
दोसरा व्यक्ति :अरे भाई ये आप क्या बेच रहे हो ?
पहला व्यक्ति :जी सम्मान बेच रहा हूँ !
दूसरा व्यक्ति :सम्मान ?ये सम्मान क्या होता है ?
पहला व्यक्ति :भाई क्या आपने "साहित्य सम्मान "नहीं सुना कभी ?
दूसरा व्यक्ति :भाई ये सम्मान तो "हिंदी साहित्य" की सेवा करने वाले साहित्यकार व्यक्ति को ही मिलता है न ?




रोचिका शर्मा
       चेन्नई

अपनी बेटी के बी. ए. अंतिम वर्ष में दाखिला लेते ही मैने उसके लिए योग्य वर तलाशना शुरू कर दिया और बेटी को बोला " थोड़ा घर का काम-काज भी सीखो, सिलाई , कढ़ाई और साथ-साथ में ब्यूटी-पार्लर का कोर्स भी कर लो । लड़का योग्य हो तो उसके परिवार वाले लड़की में भी तो कुछ गुण देखेंगे ना । वैसे तो हम अपने व्यवसाय वाले लेकिन लड़की नौकरी वाला लड़का चाहती थी सो नौकरी वाला लड़का ढूँढना शुरू किया । इधर बेटी ने भी पास के ब्यूटी-पार्लर में कोर्स करना शुरू कर दिया ।

प्रिया मिश्रा
सतना म.प्र.



1)नादान सी वो लड़की 

कब हो गई सयानी
नादान सी वो लड़की
पत्तो से खेलती थी
पेड़ो पे झूलती थी
हर रोज थी जो गढ़ती
कोई नई सी कहानी
कब हो गई सयानी?


सविता मिश्रा 
"बुढऊ देख रहें हो न हमारे हँसते-खेलते घर की हालत!" कभी यही आशियाना गुलजार हुआ करता था! आज देखो खंडहर में तब्दील हो गया|"
"हा बुढिया चारो लड़कों ने तो अपने-अपने आशियाने बगल में ही बना लिए है! वह क्यों भला यहाँ की देखभाल करते|"
"रहते तो देखभाल करते न" चारो तो लड़लड़ा अलग-अलग हो गये|"

किरण सिंह 

हिन्दू धर्म में व्रत तीज त्योहार और अनुष्ठान का विशेष महत्व है। हर वर्ष चलने वाले इन उत्सवों और धार्मिक अनुष्ठानों को हिन्दू धर्म का प्राण माना जाता है  इसीलिये अधिकांश लोग इन व्रत और त्योहारों को बेहद श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाते हैं।व्रत उपवास का धार्मिक रूप से क्या फल मिलता है यह तो अलग बात है लेकिन इतना तो प्रमाणित है कि व्रत उपवास हमें संतुलित और संयमित जीवन जीने के लिए मन को सशक्त तो करते ही हैं साथ ही सही मायने में मानवता का पाठ भी पढ़ाते हैं!


संजीत शुक्ला
नवरात्रों के दिन चल रहे हैं | हर तरफ श्रद्धालु अपनी मांगों की लम्बी कतार लिए देवी के दर्शन के लिए घंटों कतार में लगे रहते हैं | हर तरफ जय माता दी के नारे गूँज रहे हैं , भंडारे हो रहे हैं , कन्या पूजन हो रहा है | और क्यों न हो जब माँ सिर्फ माँ न हो कर शक्ति की प्रतीक हैं |परंपरा बनाने वालों ने सोचा होगा की शायद इस बहाने आम स्त्री को कुछ सम्मान मिले , उसके प्रति मर्यादित दृष्टिकोण हो | कन्या को पूजने वाले अपने घर की कन्याओं पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगाए | पर दुर्भाग्य ,” कथनी और करनी में बहुत अंतर है | आज भी आम स्त्री आम स्त्री ही है | ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरे हाथ में अखबार है | और उसमें छपी खबर मुझे विचलित कर रही है | खबर है दूसरी बार कन्या पड़ा करने के जुर्म में एक स्त्री को उसके ससुराल वालों ने इतना मारा की उसकी मृत्यु हो गयी |



रंगनाथ द्विवेदी। जौनपुर(उत्तर-प्रदेश) आज म्याँमार से भगाये गये लाखो लाख रोहिंग्या मुसलमान इतने शरीफ़ और साधारण नागरिक वहाँ के नही रहे,अगर रहे होते तो उन्हें आज इस तरह के हालात से दो-चार न होना पड़ता और उन्हें सेना लगाकर जबरदस्ती वहाँ से न निकाला गया होता।वहाँ के अमन चैन के जीवन मे ये आतंकियो की तरह अंदर ही अंदर एक दूषित इस्लाम( इस्लामी आतंकवाद ) का बारुद बिछाना शुरु कर दिये थे जिसकी परिणति या प्रतिफल उन्हें इस तरह भुगतना पड़ रहा हैं ।


वंदना बाजपेयी
हमारे जीवन का सबसे खूबसूरत हिस्सा  बचपन होता है | पर बचपन की खासियत जब तक समझ में आती है तब तक वो हथेली पर ओस की बूँद की तरह उड़ जाता है | जीवन की आपा धापी  मासूमियत को निगल लेती है | किशोरावस्था और नवयुवावस्था  में हमारा इस ओर ध्यान ही नहीं जाता |उम्र थोड़ी बढ़ने पर फिर से बचपन को सहेजने की इच्छा होती है |


पंकज 'प्रखर 
सरला अब उठ खड़ी हुई थी ये विवाह उसके माता-पिता और गर्वित के माता-पिता की ख़ुशी से हुआ था| लेकिन न जाने क्यों गर्वित उससे दुरी बनाये रखता था न जाने उसे स्त्री में किस सौन्दर्य की तलाश थी ये सोचकर उसके माथे पर दुःख की लकीरें उभर आई | पति का उसके प्रति यह व्यवहार, ताने, व्यंग्य, कटूक्तियों की मर्मपीड़क बौछार सुनते- सुनते उसका अस्तित्व छलनी हो गया था।

वरिष्ठ लेखिका रश्मि प्रभा जी की कलम में जादू है | उनके शब्द भावनाओं के सागर में सीधे उतर जाते हैं | आज हम रश्मि प्रभा जी की पांच कवितायें आपके लिए ले कर आये हैं जो पाठक को ठहर कर पढने पर विवश कर देती हैं |

एक माँ से मिले हो ?


तुम एक स्त्री से अवश्य मिले होगे 
उसके सौंदर्य को आँखों में घूँट घूँट भरा भी होगा 
इससे अलग
क्या तुम सिर्फ और सिर्फ 
एक माँ से मिले हो ?
उसकी जीवटता,

वंदना बाजपेयी

  हिन्दुओं में पितृ पक्ष का बहुत महत्व है | हर साल भद्रपद शुक्लपक्ष पूर्णिमा से लेकर आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के काल को श्राद्ध पक्ष कहा जाता है |  पितृ पक्ष के अंतिम दिन या श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को  महालया  भी कहा जाता है | इसका बहुत महत्व है| ये दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन्हें अपने पितरों की पुन्य तिथि का ज्ञान नहीं होता वो भी इस दिन श्रद्धांजलि या पिंडदान करते हैं |अर्थात पिंड व् जल के रूप में अपने पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं | हिन्दू शस्त्रों के अनुसार पितृ पक्ष में यमराज सभी सूक्ष्म शरीरों को मुक्त कर देते हैं | जिससे वे अपने परिवार से मिल आये व् उनके द्वरा श्रद्धा से अर्पित जल और पिंड ग्रहण कर सके |श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक का किया जाता है |  



रश्मि सिन्हा 
अम्माँ नही रही। आंसू थे कि रुकने का नाम नही ले रहे थे।
स्मृतियां ही स्मृतियां, उसकी अम्माँ, प्यारी अम्माँ ,स्मार्ट अम्माँ। कब बच्चों के साथ अंग्रेजी के छोटे मोटे वाक्य बोलना सीख गई पता ही नही चला।


प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी
संकलन: प्रदीप कुमार सिंह
            पंजाब प्रांत का एक छोटा सा नगर है मोगा। यहां के बाशिंदे हरमिंदर भुल्लर को बास्केट बाॅल का बड़ा शौक था। बचपन में उन्होंने स्कूल टीम में खेला भी, मगर खेल को करियर बनाने की उनकी तमन्ना अधूरी रह गई। फिर उन्हें एक बड़े वकील के दफ्तर में मुंशी की नौकरी मिल गई। कुछ दिनों के बाद ही मोगा की रहने वाली सतविंदर से उनकी शादी हो गई। परिवार बस गया और जिंदगी चल पड़ी। घर की जिम्मेदारियों के बीच बास्केट बाॅल का बुखार फीका पड़ने लगा। अब यह साफ हो चुका था कि वह खिलाड़ी नहीं बन सकते।



रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
तुम भी अब स्वर्ण-भस्म और शीलाजीत सी------- कोई दवाई खाओ---राधे माँ। बर्दाश्त नही हो रहा आशाराम और राम-रहिम से, स्याह कोठरी का खालीपन, किसी बगल की बैरक मे कैसे भी हो------- तुम आ जाओ--राधे माँ।



किरण सिंह 
बहुत दिनों से कहना चाह रही थी तो सोंची आज कह ही दूँ... अरे भाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो मैं क्यों चुप रहूँ भला!
बात बस इतनी सी है कि यह मुख पोथी जो है न आजकल की सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पत्रिका है जहाँ हर प्रकार के साहित्यिक तथा असाहित्यिक रचना को थोक भाव में मुफ्त में स्वयं प्रकाशित किया जा सकता है तथा नाम या बदनाम कमाया जा सकता है ! इतना ही नहीं आजकल तो लाइव आकर अपनी रचनाएँ सुनाया भी जा सकता है यहाँ! फिर काहे को छपने छपाने की मृगतृष्णा में पैसा देकर इक्का दुक्का रचना छपवाई जाये जिसके कि पाठक तो मिलने से रहे हाँ आलमारियों की शोभा अवश्य बढ़ेगी !



डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
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      हिंदी की दशा कैसी है, किस दिशा में जा रही है, क्या हो रहा है, क्या नही हो रहा है, सरकार क्या कर रही है..आदि-आदि पर हिंदी दिवस आने से कुछ पहले और कुछ बाद तक चर्चा चलती रहती है। इस रोदन, गायन-चर्चा से अच्छा क्या यह नहीं होगा कि हिंदी के लिए कुछ सार्थक  करने का जरिया हम स्वयं ही बनें।


रंगनाथ द्विवेदी।
शर्मिंदा हूं----------------
सुनूंगा घंटो कल किसी गोष्ठी में, उनसे मै हिन्दी की पीड़ा, जो खुद अपने गाँव मे, शहर की अय्याशी के लिये-------- अपने पनघट की हिन्दी छोड़ आये।


                                                     -नवीन मणि त्रिपाठी 

      दिसंबर का आखिरी सप्ताह ......बरसात के बाद हवाओं के रुख में परिवर्तन से ठंडक  के साथ घना कुहरा समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था । हलकी हलकी पछुआ हवाओं की सरसराहट ........... पाले की फुहार के साथ सीना चीरती हुई  बर्फीली ठंठक एक आम आदमी का होश फाख्ता करने के लिए काफी थी । पिछले पन्द्रह दिनों से सूर्य देव के दर्शन नहीं हुए थे । छोटी छोटी चिड़ियाँ भी पेट की लाचारी की वजह सी निकल तो आती परंतु  फुदकने के हौसले बुरी तरह पस्त नज़र आ रहे थे । कुहरे में का अजीबो गरीब मंजर पूरा दिन 
टप.........टप      ......टपकटी शीत की बूंदे......शहर का तापमान एक दो डिग्री के आसपास ठहरा हुआ .......। अखबारों में मवेशियों और इंसानो की मौत की ख़बरें  आम बनती जा रही थी । कम्बल रजाई सब के सब बे असरदार हो गए , ज्यादा तर घरों में अलाव जलने लगे ।  सरकारी इन्तजाम में चौराहे पर अलाव जलने लगे । सर्दी का आलम बेइंतहां कहर बरपा कर रहा था  ।


रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)। आज की तारीख़ का सबसे मुफिद और त्वरित फायदेमंद अगर कोई धंधा है तो वे एकमात्र कारआमद लाभकारी धंधा कोई शिक्षालय खड़ा कर चलाना है।ये एक एैसा शैक्षणिक हसीन रेस्टोरेन्ट है जिसके तिलिस्म मे फंसा अभिभावक अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा के चक्कर मे खिचा चला आता है,एैसी तमाम इमारते हर शहर मे नाजो अदा से सजी सँवरी खड़ी है।




अपने अतीत और वर्तमान के मध्य उलझ कर अजीब सी स्थिति हो गई थी दिव्या की! खोलना चाहती थी वह अतीत की चाबियों से भविष्य का ताला! लड़ना चाहती थी वह प्रेम के पक्ष में खड़े होकर वह समाज और परिवार से यहाँ तक कि अपने पति से भी जिसके द्वारा पहनाये गये मंगलसूत्र को गले में पहनकर हर मंगल तथा अमंगल कार्य में अब तक मूक बन साथ देती आई है ! जो दिव्या अपने प्रेम को चुपचाप संस्कारों की बलि चढ़ते हुए उफ तक नहीं की थी पता नहीं कहाँ से उसके अंदर इतनी शक्ति आ गयी थी दिव्या में ! 
दिव्या अपनी पुत्री में  स्वयं को देख रही थी ! डर रही थी कि कहीं उसी की तरह उसकी बेटी के प्रेम को भी इज्जत की बलि न चढ़ा दी जाये! सोंचकर ही सिहर जा रही थी कि कैसे सह पायेगी उसकी बेटी संस्कृति अपने प्रेम के टूटने की असहनीय पीड़ा......मैं तो अभिनय कला में निपुण थी इसलिए कृत्रिम मुस्कुराहट में
 छुपा लेती थी अपने हृदय की पीड़ा......