प्रेम और इज्जत

©किरण सिंह  ************** अपने अतीत और वर्तमान के मध्य उलझ कर अजीब सी स्थिति हो गई थी दिव्या की! खोलना चाहती थी वह अतीत की चाबि...



©किरण सिंह 
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अपने अतीत और वर्तमान के मध्य उलझ कर अजीब सी स्थिति हो गई थी दिव्या की! खोलना चाहती थी वह अतीत की चाबियों से भविष्य का ताला! लड़ना चाहती थी वह प्रेम के पक्ष में खड़े होकर वह समाज और परिवार से यहाँ तक कि अपने पति से भी जिसके द्वारा पहनाये गये मंगलसूत्र को गले में पहनकर हर मंगल तथा अमंगल कार्य में अब तक मूक बन साथ देती आई है ! जो दिव्या अपने प्रेम को चुपचाप संस्कारों की बलि चढ़ते हुए उफ तक नहीं की थी पता नहीं कहाँ से उसके अंदर इतनी शक्ति आ गयी थी दिव्या में ! 
दिव्या अपनी पुत्री में  स्वयं को देख रही थी ! डर रही थी कि कहीं उसी की तरह उसकी बेटी के प्रेम को भी इज्जत की बलि न चढ़ा दी जाये! सोंचकर ही सिहर जा रही थी कि कैसे सह पायेगी उसकी बेटी संस्कृति अपने प्रेम के टूटने की असहनीय पीड़ा......मैं तो अभिनय कला में निपुण थी इसलिए कृत्रिम मुस्कुराहट में
 छुपा लेती थी अपने हृदय की पीड़ा......
क्यों कि बचपन से यही तो शिक्षा मिली थी कि बेटियाँ घर की इज्जत होतीं हैं , ... नैहर ससुराल का इज्जत रखना , एक बार यदि इज्जत चली गई तो फिर वापस नहीं आयेगी..! यह सब बातें दिव्या के मन मस्तिष्क में ऐसे भर गईं थीं कि उसने इज्जत के खातिर अपनी किसी भी खुशी को कुर्बान करने में ज़रा भी नहीं हिचकती थी ....यहाँ तक कि अपने प्रेम को भी...! 

प्रेम का  क्या... दिव्या ने तो प्रेम से भी कभी नहीं स्वीकारा कि वे उससे प्रेम करती है... क्यों कि उसे प्रेम करने का परिणाम पता था कि सिर्फ इज्जत की छीछालेदरी ही होनी है प्रेम में.........! 


नहीं नहीं मैं अपनी बेटी के साथ ऐसा नहीं होने दूंगी मन ही मन निश्चय करती हुई दिव्या  अपने अतीत में चली जाती है ! याद आने लगता है उसे अपना प्रेम जिसे वे कभी अपनी यादों में भी नहीं आने देती थी! 
जब कभी भी उसे प्रेम की याद आती उसकी ऊँगुलियाँ स्वतः उसके मंगलसूत्र तक पहुंच जातीं और खेलने लगतीं थीं मंगलसूत्र से और निकाल लेती थी विवाह का अल्बम जिसमें अपनी तस्वीरें देखते देखते याद करने लगती थी अपने सात फेरों संग लिए गये वचन! और दिव्या अपने कर्तव्यों में जुट जाती थी! 


वैसे तो प्रेम को भूला देना चाहती थी दिव्या कभी मिलना भी नहीं चाहती थी प्रेम से, फिर भी प्रेम यदा कदा दिव्या के सपनों में आ ही जाया करता था और दिव्या सपनों में ही प्रेम से प्रश्न करना चाहती थी तभी दिव्या की नींद खुल जाती थी और सपना टूट जाता था तथा दिव्या के प्रश्न अनुत्तरित ही जाते थे! झुंझलाकर वह कुछ कामों में खुद को व्यस्त रखने की कोशिश करती थी ताकि वह प्रेम को भूल सके.. लेकिन इतना आसान थोड़े न होता है पहले प्यार को भूलना..वह भी पहला ! वह जितना ही भूलने की कोशिश करती प्रेम उसे और भी याद आने लगता था! 

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किसी विवाह समारोह में गई थी दिव्या वहीं प्रेम से मिली थी! उसे याद है कि जब पहली बार आँखें चार हुईं थीं तो प्रेम उसे कैसे देखता रह गया था और दिव्या की नज़रें झुक गई थीं! शायद दिव्या को भी पहले प्यार का एहसास हो गया था तभी वह अपनी नजरें चाह कर भी नहीं उठा पाई थी शायद उसे डर था कि कहीं उसकी आँखें प्रेम से कह न दे कि हाँ मुझे भी तुमसे प्यार हो गया है! 

अक्सर प्रेम दिव्या से बातें करने का बहाना ढूढ लेता था! दिव्या तो सबकी लाडली थी इसलिए कभी दिव्या को कोई अपने पास बुला लेता था तो कभी कोई और प्रेम तथा दिव्या की बातें अधूरी ही रह जाती थी! 
दिव्या गुलाबी लिबास में बिल्कुल गुलाब की तरह खिल रही थी! जैसे ही कमरे से बाहर निकली उधर से प्रेम आ रहा था और दोनों आपस में टकरा गये! दिव्या जैसे ही गिरने को हुई प्रेम उसे थाम लिया दोनों की नज़रें टकराई और दिव्या शर्म से गुलाबी से लाल हो गई.. फिर झट से प्रेम से हाथ छुड़ाकर बिजली की तरह भागी थी दिव्या! 
विवाह के रस्मों के बीच भी दोनों की आँखें कभी-कभी चार हो जाया करतीं थीं फिर दिव्या की नज़रें झुक जाया करतीं थीं.. यह क्रम रात भर चलता रहा! 

कभी-कभी रस्मों रिवाजों के बीच दिव्या और प्रेम भी कल्पना में खो जाते और खुद को दुल्हा दुल्हन के रूप में सात फेरे लेते पाते तभी बीच में कोई पुकारता तो तंद्रा भंग हो जाती और धरातल पर वापस लौट आते ! 


विवाह सम्पन्न हो गया तो दिव्या अपने परिवार के साथ अपने घर लौटने को हुई लेकिन दिव्या का मन जाने का नहीं कर रहा था, वह चाह रही थी कि उसे कोई रोक लेता और उसकी आँखें तो प्रेम को ही ढूढ रहीं थीं पर प्रेम कहीं दिखाई नहीं दे रहा था! उदास दिव्या सभी बड़े परिजनों को प्रणाम तथा छोटों से गले मिलकर गाड़ी में बैठने को हुई तो प्रेम भी अचानक आ पहुंचा तथा धीरे से दिव्या के हाथ में कुछ सामान ( मिठाइयों वगरा के साथ) एक चिट्ठी भी पकड़ा दिया जिसे दिव्या बड़ी मुश्किल से सभी की नजरों से छुपा पाई थी! 


दिव्या का मन चिट्ठी पढने के लिए बेचैन हो रहा था! रास्ते भर सोंच रही थी कि प्रेम क्या लिखा होगा इसमें! घर पहुंच कर अपने कमरे में जाकर सबसे पहले चिट्ठी खोली जिसमें लिखा था.... 
दिव्या मैनें जब तुम्हें पहली ही बार देखा तो लगा कि मैं तुम्हें जन्मों से जानता हूँ! तुम मेरी पहली और आखिरी पसंद हो लेकिन पता नहीं मैं तुम्हें पसंद हूँ या नहीं... यदि तुम भी मुझे पसंद कर लो तो............. 
प्रेम 

तब दिव्या को तो मानो पूरी दुनिया भर की खुशियां मिल गयीं थीं ! उसे भी तो प्रेम उतना ही पसंद था बल्कि कहीं अधिक ही पर स्त्री मन प्रेम कितना भी अधिक कर ले पर प्रेम के इज़हार में तो हमेशा ही पिछड़ जाता है और इस मामले में पुरुष हमेशा ही अव्वल रहते हैं! 

दिव्या भी प्रतिउत्तर में प्रेम को चिट्ठी लिख दी जिसमें प्रेम की स्विकृति दे दी थी! परन्तु संकोचवश चिट्ठी पोस्ट नहीं कर सकी! इधर प्रेम प्रतिदिन दिव्या के पत्र की प्रतीक्षा करता रहा! 

एक सुबह अचानक दिव्या की मम्मी दिव्या से कहतीं हैं बेटी आज शाम तेरे ब्याह के लिए तुझे लड़के वाले देखने के लिए आने वाले हैं अभी नहा वहा कर आराम कर ले शाम को अच्छी तरह से तैयार हो जाना...... लड़का डाॅक्टर है... ऐसा घर वर मिलना बड़ा मुश्किल रहता है... वो तो तेरे मामा हैं कि किसी तरह बात पक्का कर आये हैं.. अब बस वे तुझे पसंद कर लें...अरे लो मैं भी कैसी बातें करने लगी अपने सर को हाथ से धीरे से पीटते हुए बोलीं थी दिव्या की मम्मी.. कि तुमसे सुन्दर उन्हें कौन मिलेगा बेटी.. बस आज ज़रा सा अच्छी तरह से बातें कर लेना... इज्जत का सवाल है ! 

तब दिव्या के मन में आया था कि वह अपनी माँ से प्रेम के बारे में बता दे पर माँ तो बिजली की तरह चली गई थी कमरे से और दिव्या के सामने उसके पापा पड़ गये....... पापा भी वही बात कि तुमसे सुन्दर उन लोगों को कहाँ कोई मिलेगा बेटा बस ज़रा ढंग से बात करना..! 

उस समय दिव्या को कुछ भी नहीं सूझ रहा था! 

एक तरफ़ उसका प्रेम तो दूसरी तरफ़ घर और खानदान की इज्जत! दिव्या ने अपने मन की तराजू पर बार - बार प्रेम और इज्जत को तोला लेकिन पता नहीं कैसे हर बार इज्जत का पलड़ा ही भारी हो जाता था! आखिर में दिव्या इज्जत को ही चुन ली! 

भूलने की कोशिश करने लगी प्रेम को , किन्तु प्रेम के चिट्ठी को फाड़ नहीं पाई! 
लड़के वाले आये और दिव्या को पसंद भी कर लिये! विवाह की तिथि निश्चित हो गयी! 
दिव्या के विवाह में प्रेम भी आया था! बार - बार दिव्या से मिलने के लिए एकान्त ढूढता रहा पर दिव्या तो विवाह के रस्मों रिवाजों में हमेशा ही लोगों से घिरी रहती थी! आखिर में  प्रेम दिव्या की सहेली के माध्यम से दिव्या से मिला और उसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद कर लिया! और फिर दिव्या को एक चिट्ठी पकड़ाया.... जिसमें लिखा था..... 

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दिव्या मैंने तुम्हारे उत्तर की प्रतिदिन प्रतीक्षा की पर नहीं मिला.. शायद मैं तुम्हें पसंद नहीं था.! 
खैर तुम खुश रहना तुम्हें तुम्हारे योग्य जीवनसाथी मिले हैं! भगवान तुम दोनों की जोड़ी सलामत रखे! 
और फिर मुस्कुराते हुए मुड़ गया अपने रूमाल से मुंह पोछते हुए... पता नहीं पसीना पोछ रहा था या आँसू ! 
उसके बाद कभी नहीं मिले दिव्या और प्रेम! क्यों कि दिव्या चाहती भी नहीं थी कि कभी प्रेम से उसका सामना हो ! शायद दिव्या नहीं भूल पाई थी प्रेम को... तभी तो यदा कदा गीत, गज़ल, शेर शायरी में लिख ही दिया करती थी प्रेम को! 

लेकिन आज दिव्या अपने आपको विवश पा रही थी.. सोंचने लगी अपनी बेटी संस्कृति के बारे में. कि क्या उसका भी प्रेम उसी के जैसा ही पवित्र होगा! क्या बाहर साथ-साथ रहते हुए क्या मानसिक रूप से ही जुड़े होंगे ये भी या फिर........क्यों कि उसे पता है कि आज की जेनरेशन के लिए शारीरिक सम्बन्ध भी कोई पाप नहीं है... इसके अलावा आज की क्लियर हर्टेड जेनरेशन को कहाँ आता है झूठी मुस्कान लबों पर बिखेरना! 
छिः कैसी बातें सोंच रही है..... कुछ ही पलों में दिव्या अपने आप से ही नाराज भी हुई लेकिन मन में ठान ली कि वह अपनी बेटी संस्कृति के प्रेम को इज्जत की बलि नहीं चढ़ने देगी ! 


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अटूट बंधन : प्रेम और इज्जत
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