कहानी -कडवाहट

कई बार जिंदगी की कडवाहट इतनी अधिक होती है कि इंसान अपना संतुलन भी खो बैठता है और गलत निर्णय लेने से भी अपने आपको नही रोक पाता है l मेरे ...



कई बार जिंदगी की कडवाहट इतनी अधिक होती है कि इंसान अपना संतुलन भी खो बैठता है और गलत निर्णय लेने से भी अपने आपको नही रोक पाता है l मेरे ही स्कूल की एक अध्यापिका ने अपने पति की प्रताडनाओं से तंग आकर अपना अंत कर लिया था इस खबर ने मुझे आज अन्दर तक झकझोर कर रख दिया था l

 बहुत ही सौम्य सुन्दर सुशील और बुद्धिमान थी रुचिका लेकिन उसकी नियति उसे कहाँ ले कर गयी, सोच कर मेरी पलकें गीली होती जा रही थीं उसके चेहरे में अपना ही चेहरा नज़र आने लगा था l कैसे सह गयी वो सब, मैं आज अपने अंतर्मन खुद से ही सवाल किये जा रही थी l सवाल जबाब में एक फिल्म की भांति सब आँखों के सामने चलने लगा था l 


प्यार सहयोग सम्मान जैसे शब्द के मायने तो मैं ब्याह के बाद ही भूल गयी थी l जान पायी थी तो बस पति की मार तिरस्कार दुत्कार और अपमान l अभी मेरी पढाई ख़तम भी नही हुयी थी कि घर वालों के लिए मेरी शादी की उम्र निकली जा रही थी l अठारह की उम्र तक मेरी सारी चचेरी बहने ब्याह दी गयी थी l शहर के सबसे नामी और प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण बराबरी का रिश्ता न मिल पाना भी एक समस्या सा बना हुआ था l पिता जी को उनके मित्र ने एक रिश्ता बताया लड़का सरकारी अस्पताल में फिजिशियन था जो सताईस बरस का था और मैं उन्नीस बरस की l मेरी शादी आनन फानन तय कर दी गयी l 


मेरी बीएससी के फाइनल एग्जाम भी शादी के बाद हो जायेंगे कहकर मुझे मेरी आगे की पढाई न रोकने का आश्वासन दे दिए गए और अगले ही महीने मेरी शादी भी कर दी गयी सारे रस्मो रिवाजों के बाद मैं ससुराल भी आ गयीl ससुराल में हफ्ते भर रहने के बाद एग्जाम के लिए वापस मायके आ गयी l एग्जाम और चचेरे भाई की शादी में तीन महीने गुज़र गये l घर में माँ पिताजी और दो भाई थे l एक दिन अचानक ही मेरी तबियत बिगड़ गयी और फॅमिली डॉक्टर को दिखाने पर मुझे मेरे माँ बनने की खबर मिली l इस खबर ने मुझे एक अजीब सी ख़ुशी तो दी लेकिन मुझे मेरे सपने धुंधले होते नज़र आने लगे lइस खबर को सुनते ही मेरे पति ख़ुशी से फुले नही समाये और मुझसे मिलने आ गये फिर अपने साथ ले आये l सरकारी आवास में मैं मेरे पति और एक दो नौकर थे l मेरे पति को अस्पताल से वक़्त कम ही मिलता था इसलिए मेरे साथ के लिए मेरी सास साथ रहने आ गयी l वक़्त बीतता गया अब तक मैं दो बेटों की माँ बन चुकी थी और किसी तरह एमएससी पूरी भी कर ली l दो छोटे बच्चों को सँभालने का दायित्व बताकर आगे पीएचडी करने का ख्वाब मुझसे छीन गया था l

 मै घर और बच्चों को सँभालने में लग गयी थी l इसी बीच हमारा स्थानंतरण दुसरे जिले में हो गया और हम नई जगह आ गये lमेरे पति देर रात जब हॉस्पिटल से लौटते तो डिनर के बाद थोड़ी शराब पीते थे और मुझसे भी साथ देने को कहते और मेरे मना कर देने पर मुस्कुराकर कहते,'तुम पियोगी तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा' है न l मेरे पति की बांतों से या व्यवहार से मुझे मुझसे असंतुष्ट होने का संशय मात्र भी अंदेशा अब तक नही था l 


नई जगह पर आने के कुछ ही दिनों बाद मेरे पति के व्यवहार में मेरे प्रति बदलाव आने लगे ,मैंने इसका कारण यहाँ की अत्यधिक व्यस्तता ही समझ स्वयं को दिलासे देना ही उचित समझा और कुछ ही दिनों बाद उनका व्यवहार मेरे प्रति एकदम ख़राब हो गया lकिसी बात पर असंतुष्ट होने पर गरम चाय, खाना, पेपरवेट, पानी, शराब जैसी चीजों का मेरे ऊपर फेंक देना अब उनकी आदत में शामिल हो चुका था l अक्सर वजह-वेवजह उनके हाथ मुझ पर उठने लगे थे मैं कारण जानने का जब भी प्रयास करती दो चार थप्पड़ खाती और खामोश हो जाती lएक रात मैं सारे काम ख़तम करके अपने बच्चों को सुला ही रही थी कि कॉलबेल बजी बाहर जाकर देखा तो मेरे पति शराब में बुत मुझे हज़ार गलियां दिए जा रहे थे l आगे बढ़कर मैं उन्हें संभाल कर बेड तक ले आई उनके जूते निकाले और नशा उतरने के लिए कॉफ़ी भी ले आयीl सुबह पुरे होशो-हवास में उन्होंने मुझे मायके चले जाने को कहा l मैं अकारण बच्चों के एक्जाम के बीच मायके जाने को उचित नही समझ पा रही थी और वैसे भी 7-8 वर्ष की शादी में चचेरे भाईबहनों के विवाह के अलावा कभी गयी ही नही थी, फिर कैसे आज....??और मैंने न ही जाने का निर्णय सुरक्षित कर लिया था l


अब तक मेरा उनसे मार खाना तिरस्कार सहना मेरी नियति बन चुकी थी और मुझे अब घर के नौकरों के सामने  बेवजह अपने पीटे जाने पर शर्म भी नही आती थी और रोज रात शराब पीने के बाद घर में हंगामे का होना आम बात हो चुकी थी l दोनों बेटे सहमे से रहने लगे थे l एक रात मैं अपने पति का इन्तजार करते करते बच्चों के पास ही सो गयी और ये सोचा कि किसी कारण बस मेरे पति हॉस्पिटल में ही रुक गए होंगे जैसा की किसी जरुरी कारण से करते भी थे,और सुबह जब अपने कमरे में पहुची तो देखा मेरे पति हॉस्पिटल की ही एक नर्स के साथ हम-बिस्तर हैं मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन ही सरक गयी मेरे जिस्म के एक एक घाव मुझ पर मेरी समझ पर तंज़ कसते हुए नज़र आ रहे थे और बीते सालों के हर सवाल का जबाब भी मेरे प्रत्यक्ष ही थे l मैं झट बाहर आ गयी और खुद को सँभालते हुए बच्चों को तैयार कर स्कूल को भेज दिया l बिना किसी शर्म झिझक या किसी भी गलती के एहसास से कोंसों दूर दोनों ब्रेकफास्ट की टेबल पर बैठ कर मुझे किसी नौकर की भांति आदेश दिए जा रहे थे मैं भी किसी स्वामिभक्त नौकर की भांति सेवा में थी lटेबल से उठते ही मेरे पति ने मुझसे कहा तुम मायके चली जाओ मैं तुम्हारी मनहूस शक्ल भी नही देखना चाहता|

 मैंने धीमी आवाज में कहा मैं मायके नही जाउंगी चाहे कुछ भी हो जाय और फिर मायके में मैं अपने घरवालों से आने का कारण क्या बताउंगी आपकी ही इज्ज़त पर धब्बा लगेगा मेरा इतना कहना ही था कि उनके लात घूंसे मुझसे मिलने लगे और जब थक गए तो किसी मरे हुए जानवर की तरह मेरे सिर के बालों से मुझे खींचते हुए घर के बाहर लाकर उठाकर पटक दिया और कहा न जाने का बहाना बनाती है और मुझे इलज़ाम देती है तभी एक नौकर मेरे बचाव में मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला कि साहब जाने दें मेमसाब को बहुत चोट लग गयी साहब माफ़ कर दीजिये अभी कुछ उल्टा पुल्टा हो गया साहब तो....अभी बात उसकी पूरी भी न हुयी थी कि ,'' डाक्टर त्रिपाठी अब रहने भी दो न ,मान जायेगी न ये औरत आपकी बात, इतनी मार कम नही थी, और अब हॉस्पिटल के लिए हम लेट हो रहे हैं,’ उस साधारण सांवले रंग की छोटी कद काठी अनाकर्षक नर्स ने कहा l मैं अब तक उसका नाम भी नही जान पाई थी l शाम को जब मेरे पति लौटे तो मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा कि मुझे यहीं रहने दें मैं कुछ भी नही बोलूंगी आप जो भी करना चाहते हैं कीजिये मैं आपके खुशियों में बाधा नही बनूँगी l 


इतना कहते ही मेरे पति का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया और मुझ पर लात घूंसे की बरसात होने लगी दोनों बेटे रोते और डरे हुए आकर मुझसे लिपट गए और पापा,' माँ को नही मारो, प्लीज, मत मारो, ऐसा कहने लगे l अब हाथ बेटो पर भी उठ गये थे l जनवरी की ठण्ड रात में मुझे दोनों बेटों सहित घर से बाहर निकाल दिया और कहा कि तेरी लिए इस घर में कोई जगह ही नही है l हम तीनो दरवाजे पर बैठे ठण्ड से कांपते रहे सुबह जब नौकरों ने दरवाजा खोला तो हम अन्दर गए l ठण्ड की वजह से बेटे दोनों बुखार के चपेट में आ गये थे l बेटों को दवा दी शाम को जब मेरे पति घर लौटे तो घर खाली दिखा पूछने पर पता चला कि बेटों की तबियत ख़राब है मैं भी वहीँ हूँ l मेरे पति उस कमरे तक आ पहुचे और उन्हें देखने के बाद हम तीनो ही फिर मार या घर से निकाले जाने के भय से कांपने लगे,लेकिन वो आज माफ़ी मांगते हुए कहने लगे मुझे माफ़ कर दो, ना जाने कहाँ का पाप मेरे सर पर सवार हो जाता है जो मैं अपने बच्चों के साथ अपनी ही बीबी के साथ कैसा अन्याय करता हूँ मुझे माफ़ कर दो l आज लगा जैसे एक पल को दुनिया ही बदल गयी l खाना भी उसी कमरे में मंगवाया और सभी साथ खा कर सो गये l सुबह बड़ी ख़ुशी ख़ुशी हॉस्पिटल भी गये l


एक हफ्ते तक सब कुछ नार्मल रहा एक क्षण को लगा कि शायद अब ईश्वर को मुझ पर और मेरे बेटों पर उसे तरस आ गया l इतवार की शाम किरन जो वही नर्स थी अपनी कर्कश वाणी से डॉक्टर त्रिपाठी ..डॉक्टर त्रिपाठी पुकारते हमारे बेड रूम तक आ पहुंची थी मैं उसे देख स्तब्ध, उसने मुझसे बड़ी ही बतमीजी पेश आते हुए मुझसे पूछा कि तुम अभी तक अपने पिल्लों को लेकर गयी नही कब छोडोगी हमें,सरदर्द बन गयी हो, दुश्मन हो तुम हमारे सुख चैन की l मैं ...मैं या तुम हमारी जिंदगी में ज़हर बनी हो,मैंने किरन से कहा और तभी हाथ में शराब की गिलास लिए मेरे पति हम तक आ पहुचे और मुझ पर बतमीजी से बात करने का आरोप देते हुए गिलास की शराब मेरे मुह पर फेंक दिया और मुझसे माफ़ी मांगने को कहने लगे और मेरे मना करते ही मेरे ऊपर लात घूंसे पड़ने लगे l 

अब तक मैं सारे सवाल के जबाब खुद ही पा चुकी थी और मेरे पास अब सिर्फ दो ही विकल्प थे --एक कि मैं सब सहती रहूँ दूसरा सब छोड़ कर भाग जाऊ lलेकिन मैं अपने माँ पिता जी और भाइयों को किसी तरह का दुःख नही देना चाहती थी इसलिए मैंने सब सहने का रास्ता ही चुना l अब मेरे घर की कहानी हर जुबान पर थी अब मुझे किसी से भी शर्म भी नही आती थी l मैंने सबको अपनी नियति मान कर खुद में सहने की हिम्मत दिन प्रति दिन बढ़ाने में जुट गयी थी और अब मेरे शरीर पर मेरे पति के साथ किरन भी हाथ साफ़ करने से ना चुकती थी l अब तक किसी को मेरे हाथ पाव टूटने या मरने का भी खौफ न रहा नौकरों को मेरे पास जाने और दवा न देने की सख्त हिदायत थी l मैं दर्द में कई कई दिन कराहती रहती दवा और देखभाल के नाम पर दो चार जूते पड जाते थे l 

शादी के अब तक 12-13 वर्ष भी बीत चुके थे सब झेलते लोगों के सामने झूठ बोलते अपने जख्मों को सबकी नज़रों से छुपाते बच्चों की सहमी जिंदगी को देखते सबको मैं अपनी ही नियति मान चुकी थी और ये तसल्ली भी दे चुकी थी कि इससे मेरी मुक्ति नही है और एक दिन मैं अपने ही पति के हाथों से जान गवां बैठुगी l लेकिन इन सबके बीच एक ही उम्मीद थी जो मुझे अन्दर ही अन्दर सब का सामना करने की शक्ति देते जा रही थी, वो थी मेरे बेटों की भविष्य और फिर मेरे छोटे-छोटे बेटों को अभी मेरे सहारे और देखभाल की भी बेहद जरुरत थी l जबकि मेरी शरीर पिटते पिटते ज़र्ज़र हो चुकी थी सिर के बाल खीच खीच उखड कर मुठी भर ही बचे थे मेरा रंग रूप मेरी सुन्दरता मेरी काबिलियत सारी धरी की धरी रह गयी थी l

आज पिताजी का फोन आया था कि भैया की बेटी की शादी है कार्ड भी जल्दी ही पहुच जायेगा और सभी को आना है मैंने अपने पति से बताया l मैं इन दिनों बहुत व्यस्त हूँ तुम ऐसा करों ड्राईवर के साथ हो आओ बच्चों के साथ तुम्हारा भी थोडा चेंज हो जाएगा ,ऐसा कह कर मेरे पति कमरे से बाहर चले गए l मैंने भी दो-तीन दिन में ही लौट आने की सोच कर पैकिंग कर ली और अगले ही हफ्ते ड्राइवर के साथ चली गयी l शादी के रीति-रिवाजों में सिरकत करने पति भी बाद में आये और जरुरी काम का बहाना ले कर 5-6 घंटे में ही वापस आ गये l शादी के सकुशल बीत जाने के बाद पिताजी भैया ने मुझसे जिद करते हुए कहा कि थोड़े दिन और रुक जाऊँ वैसे भी छोटी तुझे वक़्त ही कहाँ मिलता है आने का, दोनों भाभियाँ भी यही कह कर कुछ दिनों के लिए रोक ली l पिताजी और भैया को भी किसी काम से दुसरे शहर जाना था और रास्ता मेरे शहर से ही हो के जाता था निश्चय ये हुआ कि हफ्ते भर बाद मुझे छोड़ते हुए अपने काम के लिए आगे चले जायेंगे l


 एक हफ्ते बाद हम सब साथ अपने पति के घर आ गये l पिताजी और भैया ने हमें हमारे सामान के साथ घर में छोड़ा और बिना पीना पीये ही आगे के शहर की और निकल गये l मैं अपने कपडे बदलने के लिए बैग खोलने ही वाली थी कि मेरे पति किरन के साथ आये और मुझे देख मुझ पर चीखने चिलाने लगे मेरे कुछ न कहने पर मुझे खूब पीटा, मार पीट की आवाज सुनते ही दोनों बेटे मेरे पास आ गये और दो चार उन दोनों को भी लग गयी और आज फिर हमें घसीटते हुए घर से बाहर निकाल दिया और दोनों अपने बेड रूम में चले गए lमैं हमेशा की तरह दरवाजे की सीढियों पर बैठी दोनों बेटों को सीने से लगाये अपने भाग्य को कोसते हुए आंसू बहाए जा रही थी कि मैंने देखा पिताजी और भैया मेरे सामने खड़े हैं मैं अचकचा सी गयी और हैरान परेशान झट उठकर आसुंओं को छिपाते हुए दरवाजे को खोलने का प्रयास करने लगी लेकिन भैया और पिताजी मुझे ऐसा देख समझ ही नही पा रहे थे कि क्या है ये सब ,अभी तो सब ठीक ठाक ही छोड़ कर गए थे आखिर ये सब है क्या ??? 


मेरे दोनों बेटे फफक कर रो पड़े और नाना नाना कहते पिताजी से जा चिपके भैया ने भी उन्हें गोदी में उठा लिया और आंसू पोछते हुए पूछा क्या है ये सब ?? मेरे छोटे बेटे ने रोते हुए भैया से कहा ,''मामाजी पापा ने मम्मी को बहुत मारा है और पापा अक्सर ही मारते हैं जब भी किरन आंटी आती हैं पापा और ये काली वाली आंटी बहुत गन्दी है और इसी के कहने पर हम सब भूखे ही घर से बाहर कर दिए जाते हैं पानी बरसे ठण्ड रहे हम बाहर ही मम्मी की गोदी में चिपके रहते हैं और श्यामलाल अंकल(घर का नौकर) चुपके से शाल और कुछ खाने की चीज़े लाते हैं हमें यहाँ बहुत-बहुत डर लगता है l पिताजी और भैया की आँखें गुस्से से लाल हो रही थी भैया गुस्से में दरवाजे को खटखटाने लगे और जोर जोर से मेरे पति का नाम लेकर बुलाने लगे l दरवाजा खोलो नही तोड़ देंगे ,भैया ने गुस्से से कहा l 

आज अगर मेरे जरुरी कागजात यहाँ छूटे न होते तो हमें तो तुम्हारे वहशीपन का पता ही नही चलता ,हमारे घर में रिश्ता करके हमारे साथ नाम जुड़ने से पूरा तुम्हारा पूरा खानदान खुद को धन्य समझता है और तुम ...तुम मेरे बहन के साथ ऐसा बर्ताव.......किसी जानवर से भी बदत्तर ...कहाँ कमी रह गयी थी हमसे या मेरी बहन से ???तुम इतनी नीचता दिखाओगे हमने तो कभी सपने में भी नही सोचा था, भैया का गुसा इतना बढ़ गया था कि उन्होंने मेरे पति के गाल पर जोर का तमाचा दे मारा ,ये देख किरन सामने आ कर लड़ने लगी भैया से l पिताजी ने जोर की फटकार किरन को लगायी और मेरी तरफ देखते हुए मुझसे कहा कि छोटी तुम अपने और बच्चों के जरुरी सामान लो और यहाँ से चलो हम यहाँ एक सेकेण्ड के लिए भी तुझे नही छोडगे l तुमने बहुत सह लिया हमारे अनजाने में लेकिन अब बिलकुल भी नही lमैंने भी अपने सर्टिफिकेट्स और बेटों के रिजल्ट्स और उनके कुछ कापी किताब बैग में डाले और जो बैग ले कर लौटी थी वैसे ही बंद कर भैया ने गाड़ी में रखवा दिए जब हम गाड़ी तक आये तो हमारे घर के नौकर हमारे पडोसी जो गाड़ी के पास ही खड़े थे उन्होंने सारे हाल से भैया और पिताज़ी से अवगत करा दिया उसके बाद हम सब को अपने साथ ले कर गाड़ी में बैठ गये पिताजी मेरे बगल बैठ मेरे आंसू पोछते और खुद भी रोते रहे भैया बेटों को सँभालते रहे पिताजी ने ड्राइवर से घर वापस चलने को कहा ....थोड़ी ही दूर चलने पर पिताजी और भैया ने एक ही साथ ड्राईवर को पास के ही पुलिस स्टेशन चलने को कहा, वहां पहुच कर मेरे पति के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई l हम वहां के एक बड़े ऑफिसर के घर मे गए और सारे हाल विस्तार से बताया वो ऑफिसर भी अपनी बेटी की तरह मुझे स्नेह दिए और मुझे मेरे बेटों मेरे भैया और पिताजी को बिना जलपान और रात्रि भोजन के आने नही दिया और पूरी तरह से कड़ी करवाई और हमें पूर्ण सहयोग का आश्वासन दे कर विदा कर दिया l 


वो रात मेरी जिंदगी की आखिरी काली साबित हुयी और सुबह की फूटती किरणों के साथ मैं हर दुःख से मुक्त हो अपने मायके आ गयी l कुछ दिनों के केस चलने के बाद हमारा तलाक हो गया lमैंने पिताजी से कहकर दुसरे शहर में नये सिरे से जिंदगी की शुरुवात की lमैंने सबसे पहले अपनी पीएचडी पूरी की और यहाँ आकर बच्चों के लिए एक स्कूल खोल लिया, साथ ही दोनों बेटों की परवरिश में भी कोई कमी नही आने दी l वक़्त के साथ मैंने स्कूल के बाद एक गर्ल्स इंजीनियरिंग कॉलेज खोल कर स्वयम को व्यस्त रखते हुए हमेशा लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े होने की शिक्षा देने का प्रयास किया और दोनों बेटो को उच्च पदों पर कार्यरत देख कर हमेशा ही ईश्वर का धन्यवाद l


दीवार पर टंगे कैलेंडर तो पलट दिए जाते हैं लेकिन उन हर पन्नों के बीच खुशियों और ग़मों के दिन भी किसी लाश की तरह दब कर रह जाते हैं l मैं भी अब उस भयावह जिन्दगी को अपनी ताकत बना कर जीने की आदत डाल चुकी हूँ और जिंदगी की ज़हर में से कुछ बूंद अमृत की तलाश में मासूम बच्चों के साथ ही जिंदगी गुज़ार रही हूँ l

स्वेता मिश्रा 



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“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तर करवड़े अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा परवीन कुमार अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमरान रिजवी इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपवास उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत छठ जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम डोंगरा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बाल मनो विज्ञान बाल-मन बिल गेट्स बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता माता -पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वृद्धजन विमर्श वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार हेल्थ होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues clingy behaviour deepawali special E.book family and relationship issues father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories hindi story id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire senior citizen issues short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
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अटूट बंधन : कहानी -कडवाहट
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