नवरात्र में नौ दिन उपवास करने की परम्परा रही है | यूँ भी हर धर्म में उपवास को महत्व दिया गया है | उपवास के सिर्फ धार्मिक ही नहीं अन्य फायदे भी हैं ... जानिए क्या

उपवास का वैज्ञानिक महत्व
   उपवास का केवल धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक महत्व भी है | कैसे ? आइये जानते हैं चंद्रेश कुमार छतलानी जी के लेख  से ...
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जानिये क्या है उपवास का वैज्ञानिक महत्व 




सर्वप्रथम मैं पाठकों को एक सच्ची राय देना चाहूंगा, इस लेख को पढिए, एक बार, दो बार, फिर इसे भूल जाइए। अगर आप इसे कागज़ पर पढ रहे हैं और मन चाहे तो इसकी चिन्दी - चिन्दी करके ज़ोर से फूंकें, और फिर मौज से इसे धरती पर बिखरता हुआ देखिए।

सच पूछें तो उपवास पढ़ने की नहीं वरन् करने की चीज है। लेख, पुस्तकें आदि सिर्फ इसका सामान्य ज्ञान देकर आपको प्रेरित तो कर सकते हैं, लेकिन, अगर उपवास को वास्तव में जानना चाहते हैं तो उपवास कीजिए। यह अनुभव का ज्ञान है।

चलिए, अब हम चर्चा करते हैं कि रोग कैसे होते हैं ? थोड्रा सा घ्यान स्थिर कीजिए, और फिर पढि़ए, प्रत्येक रोग के फलस्वरूप किसी किसी रीति से शरीर से श्लेष्मा बाहर आता है। खांसी में, जुकाम में, क्षय में, मिरगी में, इत्यादि और भी कई रोग, कान के, आखों के, त्वचा के, पेट के एवं हृदय के, जिनमें श्लेष्मा का का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता है, उनमें भी रोग का कारण श्लेष्मा ही होता है। श्लेष्मा, तब शरीर से बाहर आने की वजह से रक्त में मिल जाता है, और ठंड की वजह से जहां रक्त नलिकाएं सिकुड़ गई हैं, वहां पहुंचकर दर्द पैदा करता है, और जब रोग बढ़ जाता है तो मवाद (सड़ा हुआ रक्त) उत्पन्न होता है।

यूं तो थोड़़ा श्लेष्मा प्रत्येक स्वस्थ - अस्वस्थ शरीर में होता ही है और यह मल के साथ थोड़ी - थोड़ी मात्रा में निकलता रहता है।

रोग की दशा में रोगी को श्लेष्मा विहिन खाद्य देना चाहिए। जैसे कि कोई फल या सिर्फ नींबू पानी।

चिकनाई, मांस, रोटी, आलू एवं अन्य कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थ जैसे चावल आदि के रूप में श्लेष्मा शरीर में पंहुचना बंद हो जाता है तो शरीर की जीवनी-शक्ति इकट्ठी होकर रक्त में मौजूद श्लेष्मा एवं मवाद को बाहर फैंकने को प्रवृत्त होती है। यह साधारणतः पेषाब के साथ निकलने लगता है। रोग के अनुसार शरीर के अन्य भागों से भी श्लेष्मा उत्सर्जित हो सकता है।

तो फिर भोजन की क्या आवष्यकता हैं ? इसलिए क्योंकि साधारण कार्यों एवं श्रम करने से शरीर की जो छीजन होती है, मस्तिष्क भूख लगने की सूचना भेजता है और खाने के पष्चात, यदि मस्तिष्क को किसी अन्य कार्य में लगाया जाए तो वह अपनी सारी शक्ति लगाकर किए हुए भोजन को पचाने का कार्य करता है, ताकि शरीर के सेल (कोषों) की मरम्मत हो सके, जीवन-दायिनी शक्ति उत्पन्न हो सके और शरीर गर्म रह सके।

प्रश्न यह भी उठता है कि मस्तिष्क को भोजन कहां से मिलता है? तो मित्रों एक सत्य और उजागर कर रहा हूँ कि,  मस्तिष्क अपनी खोई हुई ऊर्जा को आराम और निद्रा से पुनः प्राप्त कर लेता है।

हमारा मस्तिष्क हमारा सबसे अच्छा गाइड है, यदि मस्तिष्क कहता है कि रोग में भूख नहीं लगनी चाहिए, तो  भूख बन्द हो जाती है, ताकि शरीर की सारी ऊर्जा विजातिय द्रव्यों को शरीर से बाहर निकालने में ही खर्च हो, भोजन को पचाने में नहीं। यह हमारे मस्तिष्क की ही शक्ति है वो हमारे शरीर का विश्लेषण कर जिस तरह की आवश्यकता है वैसा व्यवहार शरीर से करवाता है|

एक सत्य यह भी है कि हमारे भोजन का जो भाग पचकर शरीर में लग जाता है, वही पुष्टिवर्धक होता है। बाकि या तो उत्सर्जित हो जाता है अथवा शरीर में जमा होता रहता है।

जब शरीर में इकट्ठे मल, विष, विजातिय द्रव्य अपने स्वाभाविक मार्ग से (श्वास, पसीना, मल उत्सर्जन आदि) से बाहर नहीं निकल पाते हैं तो अस्वाभाविक तरीकों से शरीर उन्हें उत्सर्जित करने की चेष्टा करता है, सामान्य तौर पर इसे रोग कहा जाता है।

दूसरे तरह के रोग वे होते है, जो विकार की अधिकता से जीवन शक्ति के हृास के कारण अंगो की कार्यप्रणाली को सुचारू रूप से चलने में बाधक होते है। धीरे-धीरे जीवन शक्ति का हृास इतना अधिक हो सकता है कि इसका पुननिर्माण अत्यन्त ही कठिन हो जाता है। प्रारम्भिक स्थितियों में अनावश्यक द्रव्य का शरीर में भोजन द्वारा जाना बन्द होने पर रोगमुक्त होने की पूर्ण संभावना होती है।

अर्थात् उपवास के द्वारा हम रोगमुक्त हो सकते है। उपवास प्रकृति की स्वास्थ्य संरक्षक विधि है, पूर्ण एवं स्थायी स्वास्थ्य का दाता है।

तो फिर उपवास कैसे किया जाए



उपवास करने के हेतु कुछ बिंदु निम्नानुसार है:
1.    उपवास करने के लिए शरीर में कुछ बल भी होना चाहिए और एक दृढ़ निश्चय भी।
2.    सर्वप्रथम छोटे-छोटे उपवासों का अनुभव होना चाहिए, उपवास का अनुभव होने पर सदैव किसी अनुभवी के निर्देशन में ही उपवास करे। पहले 2-3 दिन, फिर एक सप्ताह का और फिर और आगे।
3.    उपवास मे प्रकृति के निकट शुद्ध वायु मे रहें।
4.    कोशिश करें कि अकेले रहें।
5.    आराम अवश्य करें। उपवास के प्रारम्भ में सिरदर्द, कमजोरी, मूर्छा, अनिद्रा, आदि की शिकायत हो सकती है, जीभ गन्दी रह सकती है। धैर्य रखें चिकित्सक की सलाह लें।
6.    थोड़ी-थोड़ी कसरत रोज करें।
7.    बिना चिकित्सक की सलाह के, उपवास के साथ अन्य चीज़े, जैसे कि वाष्प स्नान आदि मिलाएं।
8.    उपवास आरंभ करने के एक सप्ताह पूर्व हल्का भोजन करें और इसे निरन्तर कम करते रहें।
9.    उपवास के आरंभिक दिनों को शरीर की सफाई में लगाओं। एनिमा लो, पानी पीओ, गहरी सांसे लो, नींबू पानी पीयो, रगड़-रगड़ कर स्नान करो।
अच्छा है कि एक सप्ताह तक एनिमा लेना चाहिए। सारे बदन को रगड़ कर नहाना चाएि। रोज टहलना चाहिए। पाव-पाव भर करके दिनभर में 2-2) सेर पानी पीना चाहिए। नींबू मिलाकर पीये तो और भी ठीक है। पर आधा पाव से अधिक नहीं अंगूर, संतरे का रस भी लिया जा सकता है। अनुभव के आधार पर धूप स्नान भी किया जा सकता है।
10.    उपवास के समय वायु विकार होने पर चोकर या इसबगोल का उपयोग किया जा सकता है साधरण ज्वर, दुर्गंधपूर्ण पसीने एवं बेस्वाद मुँह की चिंता नहीं करनी चाहिए।
11.    मानसिक स्थिति को संतुलित रखें। भय, चिंता को दूर रख कर शांत रहे।    
12.    उपावस को अत्यन्त सावधानी से तोड़ना चाहिए। उपवास में पाचन शक्ति मंद हो जाती है एवं आंते भी आराम की स्थिति में होती है। अतः शुरू में आसानी से पचने वाले खाद्य ही लेने चाहिए और एनिमा का प्रयोग भी करते रहने चाहिए। पहले दो-तीन दिन संतरे या अंगूर के रस पर फिर वो भी थोड़ा-थोड़ा, उसके बाद दूध या भूने आलू, भात, दलिया, पत्तेदार शाक  आदि 3-4 दिन तक।
13.    तले हुई, मैदे से बने हुए, चीनी युक्त, शराब या सिरका युक्त, कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य से उपवास के पश्चात कुछ दिन दूर ही रहना चाहिए।
14.    जितना हो उपवास संतरे के रस से तोड़ना चाहिए। बाद में पत्तेदार शाक उत्तम है। उपवास के फलस्वरूप बहुत सा विष रक्त में मिल जाता है, इसे नष्ट करने एवं फिर शरीर से उत्सर्जन के लिए प्राकृतिक लवणों की आवश्यकता होती है। ये लवण शरीर में फल-सब्जियों के द्वारा पहुँचाए जा सकते है। इसके विपरित पूर्ण भोजन (रोटी आदि) करना खतरे से खाली नहीं हैं। इसे कुछ समय तक स्थगित रखना चाहिए।
15.    उपवास को ठीक ढ़ंग से ना तोड़ा जाए तो, लाभ की बजाय नुकसान देह हो सकता है। प्रथम दिन केवल थोड़ा सा रस, दूसरे दिन पाव भर रस एक बार में, तीसरे दिन खट्टे/खटमीठे फल का गुदा, चैथे दिन फल के साथ थोड़ी सी कच्ची तरकारी। इसी तरह क्रम से उपवास तोड़ना चाहिए।
16.    उपवास कब्ज, रक्तल्पता, जोड़ो का दर्द, उदासी, चिंता, बेहद खुशी, दमा, मधुमेह आदि कईं स्थितियों (अधिकतर रोगों) में अत्यन्त लाभदायक है।
17.    उपवास के समय सदैव प्रसन्न आशावादी रहें, खुले में सोये, खुली हवा में रहें, त्वचा स्वच्छ रखें, पानी पीएं (सादा या नींबू मिलाकर), एनिमा लें।
18.    कोई भी विकार अत्यधिक बढ़ने पर, कमजोरी बहुत होने पर चिकित्सक की सलाह अवश्य लें।

उपवास में प्रत्येक उपवासी का अनुभव भिन्न हो सकता है, हालांकि आधार सभी का समान है। परन्तु यह सर्वथा सत्य है कि उपवास के द्वारा केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नहीं वरन् नैतिक और आध्यात्मिक क्षैत्र में भी ऊँचाईयों को छुआ जा सकता है।

 

लेखक:     चंद्रेश कुमार छतलानी

उदयपुर


जन्म स्थान - उदयपुर (राजस्थान)
शिक्षा - एम. फिल. (कंप्यूटर विज्ञान), तकरीबन १०० प्रमाणपत्र (ब्रेनबेंच, स्वीडन से)
लेखन - पद्य, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ

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atoot bandhan

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5 comments so far,Add yours

  1. रोचक जानकारी

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  2. उपवास करने वालों के लिए आवश्यक लेख

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  3. Bahut hi achchi jankari

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