November 2017

इश्क़ वो आतिश है ग़ालिब

                                                              

                                  सुमी
                                 ------
      करवट बदलते-से समय में वह एक उनींदी-सी शाम थी । एक मरते हुए दिन की उदास , सर्द शाम । काजल के धब्बे-सी फैलती हुई । छूट गई धड़कन-सी अनाम ।
ऐसा क्या था उस शाम में ? धीरे-धीरे सरकती हुई एक निस्तेज शाम थी वह जिसे बाक़ी शामों के बासी फूलों के साथ समय की नदी में प्रवाहित किया जा सकता
था । उस शाम की चटाई को मोड़ कर मैंने रख दिया था एक किनारे ।
      लेकिन ज़रूर कुछ अलग था उस शाम में । घुटने मोड़े वह शाम अपनी गोद में कोई ख़ास चीज़ समेटे थी । कौन जानता था तब कि उन यादों के रंग इतने चटखीले होंगे कि दस बरस बाद भी ... कौन जानता था कि एक सलोना-सा सुख जो अधूरा रह गया था उस शाम , कि एक छोटी-सी बेज़ुबान इच्छा जो ख़ामोश रह गई थी उस शाम , आज न जाने कहाँ से स्वर पा कर कोयल-सी कूकने लगेगी मेरे जीवन में । कौन जानता था कि समय के अँधियारे में अचानक उस शाम की फुलझड़ियाँ जल उठेंगी और रोशन कर देंगी तन-मन को । मुझे कहाँ पता था कि उस शाम के बगीचे में मौलश्री के शर्मीले , ख़ुशबूदार फूल झरते रहे थे । आज कैसे दिसम्बर की वह शाम जून की इस सुबह में समय के आँगन में मासूम गिलहरी-सी फुदक रही है ।
       यादों के समुद्र के इस पार मैं हूँ । समय की साँप-सीढ़ी से बेख़बर । वह शाम आज यादों के समुद्र-तट पर स्वागत के सिंह-द्वार-सी खड़ी है । मैं हैरान हूँ वहाँ तुम्हें खड़ा पा कर -- लहरों के हहराते शोर के पास आश्वस्ति-सी एक सुखद उपस्थिति ... कॉलेज में भैया के दोस्त थे तुम । हमारे यहाँ बेहद पढ़ाकू माने जाते थे तुम -- शिष्ट और सौम्य-से । न जाने क्यों तुम्हें देख कर मेरे मन में गुदगुदी-सी होने लगती थी ... तुम जब मुस्करा कर मुझे ' हलो सुमी ' कहते तो भीतर तक खिल जाती थी मैं -- मेरे गालों की लाली से बेख़बर थे क्या तुम ? तुम्हारी हर अदा को कनखियों से देखती मैं तुम्हारी ख़ामोश उपस्थिति से भी खुश हो जाती ।
        पहली बार यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में मिले थे तुम मुझे -- लम्बी चोटी में सलवार-क़मीज़ पहने एक परेशान-सी लड़की कोई किताब ढूँढ़ती हुई । तुमने उस दिन लाइब्रेरी की हर शेल्फ़ छान मारी थी और आख़िर वह किताब मुझे ढूँढ़ कर दे ही दी थी । मैं तुम्हारी कौन थी ? ऐसा क्यों था कि जब तुम काफ़ी दिनों तक दिखाई नहीं देते या घर नहीं आते तो मैं गुमसुम रहने लगती थी ? चाय में चीनी की बजाए नमक डाल देती थी ? दाल या सब्ज़ी बिना नमक वाली बना देती ? रात में कमरे की बत्ती जलती छोड़ कर चश्मा पहने-पहने सो जाती ?
       जिस दिन पता चला कि तुम अब एम. बी. ए. की पढ़ाई करने आइ. आइ. एम., अहमदाबाद चले जाओगे , मैं बाथरूम में फिसल कर गिर गई थी । खाना बनाते समय मैंने अपना हाथ जला लिया था । उसी दिन मैंने यह कविता लिखी थी ।
शीर्षक था : " क्या तुम जानते हो , प्रिय ? " । कविता थी : " ओ प्रिय , मैं तुम्हारी आँखों में बसे / दूर कहीं के गुमसुम खोएपन से / प्यार करती हूँ , / मैं घाव पर / पड़ी-पपड़ी-सी / तुम्हारी उदास मुस्कान से / प्यार करती हूँ , / मैं हमारे बीच पड़ी /
अनसिलवटी चुप्पी से भी / प्यार करती हूँ , / हाँ प्रिय / मैं उन पलों से भी / प्यार करती हूँ / जब एकाकीपन से ग्रस्त मैं / तुम्हारे चेहरे में / अपने लिए / आइना ढूँढ़ती रहती हूँ / और खुद को / बहुत पहले खो गई / किसी अबूझ लिपि के / चटखते अक्षर-सी / बिखरती महसूस करती हूँ ... "
        भैया को तुम्हारे प्रति मेरे आकर्षण का पता चल गया होगा तभी तो एक दिन उन्होंने मुझसे कहा था , " सुमी , इंडिया में कास्ट एक बहुत बड़ा फ़ैक्टर होता है । हमें इसी समाज में रहना होता है । जात-पात के बंधनों को हम इग्नोर नहीं कर
सकते ।"
         तुम और मैं -- हम अलग-अलग जातियों के थे । तुम दलित थे जबकि मैं ब्राह्मण थी । हालाँकि इससे तुम्हारे प्रति मेरे आकर्षण में कोई अंतर नहीं पड़ा ।
          वह शाम कैसी थी । उस शाम जब मैं बुखार में पड़ी थी , तुम भैया से मिलने घर आए थे । अगले दिन तुम अहमदाबाद जा रहे थे । क्या यह दैवी इत्तिफ़ाक़ नहीं था कि उस शाम घर पर और कोई नहीं था ? सब लोग एक शादी में गए थे ।
         मैंने दरवाज़ा खोला था और तुम जैसे अधिकार-पूर्वक भीतर आ गए थे । क्या मेरा चेहरा बुखार की वजह से तप रहा था ? वर्ना तुमने कैसे जान लिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं थी ?
         " अरे सुमी , तुम्हें तो तेज बुख़ार है । " मेरे माथे को छू कर तुमने कहा था ।
         मेरे माथे पर तुम्हारे हाथों का स्पर्श पानी की ठंडी पट्टी-सा पड़ा था ।
         " दवाई ले रही हो कोई ? " तुम्हारे स्वर में चिंता थी । ऐसा क्या था जो तुम्हें भी मेरी ओर खींचता था ? क्या तुम्हें इसका अहसास था ?
         तुम देर तक मेरे सामने के सोफ़े पर बैठे रहे थे । क्या इस बीच मेरा बुखार बढ़ गया था ? मेरी आँखें मुँद-सी क्यों गई थीं ? जब आँखें खुली थीं तो तुम मेरे बगल में बैठे चिंतित स्वर में पूछ रहे थे , " सुमी , क्या तुम ठीक हो ? तुम्हारा बुख़ार बहुत तेज़ लग रहा है । लाओ , मैं तुम्हारे माथे पर ठंडे पानी की पट्टी कर दूँ । " यह सुन कर बीमारी में भी मैं कुछ सकुचा-सी गई थी ।
         तुम बहुत देर तक मेरे बगल में बैठ कर मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते रहे थे । मेरी आँखें मुँद गई थीं । अपने कोमल स्पर्श की हिलोरें मेरे भीतर छोड़ कर तुम बाक़ी लोगों के आने से पहले ही चले गए थे । मुझे एक पारदर्शी , झीने सुख में भिगो कर ।
         बस , इतना ही तो हुआ था उस आख़िरी शाम ... जब तुम मुझसे मिले थे ।
         किस्मत भी कैसे-कैसे खेल खेलती है । क्या नाम था तुम्हारे और मेरे इस रिश्ते का ? कल तुम अहमदाबाद चले जाने वाले थे । हमारे बीच अलग-अलग जातियों की ऊँची दीवार थी ...
         लेकिन तुम्हारा यह लम्बा जीवन इतना सूना और उदास कैसे रह गया ? क्या तुम्हारी पतंग का कोई धागा मेरी उंगली में बँधा रह गया था ? एक बार कहा तो होता कि तुम भी मुझ से ...
         कल दस बरस बाद जब अहमदाबाद आई और कॉन्फ़्रेंस में अचानक तुम से मुलाक़ात हो गई तो मेरे मन के ताल में तुम्हारी उपस्थिति गुड़ुप्-सी पड़ी, स्मृतियों की अनगिनत लहरें जगाती हुई । हिम्मत करके मैंने भरपूर निगाहों से तुम्हें एकटक देखा ।
तुम अब भी उतने ही आकर्षक लगे । क्या मैं तुम्हारी आँखों में भी अपने लिए चाहत के रंग देख रही थी ?
         हाँ , मैं तुमसे प्रेम करती थी । पर कभी कह नहीं पाई । उस शाम भी नहीं जो पीले पन्नों वाली किसी पुरानी किताब में दबे किसी मोरपंख-सी आज बाहर निकल आई है । मैं किसी निर्जन तट पर पड़ी सीपी थी , तुम्हारी उस लहर की प्रतीक्षा में जो मुझे फिर से भिगो कर साथ बहा ले जाएगी अपने अनंत समुद्र की गोद में । और आख़िर कल शाम मैं उस समुद्र के आगोश में थी ...

                                  मनु
                                ------
          अतीत के समुद्र से यादों के मोती चुगने की हसरत अब भी जवाँ है हमारे दिलों में । एक ऐसा अतीत जिस में मैं था , तुम थी , और अब हम उन यादों के मोतियों से भविष्य के लिए एक सुंदर माला बनाना चाहते हैं । बीते समय को लौटा लाने की चाहत की डोर से बँधे हैं हम दोनों । स्मृतियों के वसंत में कोई कोयल फिर से कूक रही है अस्तित्व की अमराइयों में । वर्षों के पतझड़ के इस पार रंग-बिरंगे फूल फिर से खिलने लगे हैं । दु:स्वप्नों के अँधेरे को चीर कर सूर्य की सुनहरी किरणें हम तक फिर से पहुँचने लगी हैं ।
          शायद तब हम स्वयं भी अपने-अपने दिलों की धड़कनों से पूरी तरह परिचित नहीं थे । तुम तब उन्नीस की थी और मैं इक्कीस का । मुझे हैरानी है कि दस बरस का लम्बा अंतराल भी स्मृति की स्लेट से उस शाम की छवि को नहीं पोंछ पाया ।
वह छवि हमारी यादों की डाल से अटकी किसी पतंग-सी रह-रह कर फड़फड़ाती
रही । वह शाम ... कितनी ख़ामोश और मासूम-सी थी । तुम थी , मैं था और तनहाई थी । कुछ इच्छाओं के फड़फड़ाते पंख थे । कुछ उम्मीदों के इंद्रधनुषी सपने थे । कुछ अस्पष्ट-सी छवियाँ थीं । कुछ नि:शब्द-से स्वर थे । खिड़की के बाहर पूर्णिमा का गोल चाँद निकल आया था । चुप्पी का संगीत चारो ओर बज रहा था । तुम्हारे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते हुए मुझे तुम अपनी-अपनी-सी क्यों लगी थी ? तुम से मेरा कौन-सा अनाम नाता था ? लाइब्रेरी में जब तक मैंने वह किताब ढूँढ़ कर तुम्हें दे नहीं दी थी , तब तक मुझे चैन क्यों नहीं आया था ? तुम्हारी मुस्कान मुझमें जलतरंग-सी क्यों बजने लगती थी ? क्या तुम्हारे मन में भी मेरे लिए कुछ था ?
          उस शाम तुम मेरे कितनी क़रीब थी । तुमने काली जीन्स पर लाल स्वेट-शर्ट पहन रखा था । हालाँकि तेज बुख़ार की वजह से तुम्हारा फूल-सा चेहरा मुरझा गया था । मैं जिस पंखुड़ी को जानता था , वह कुम्हलाई हुई थी । खिडकी से चाँदनी का एक टुकड़ा आ कर तुम्हारी गोद में बैठ गया था । और मुझे हाल ही में लिखी हुई अपनी एक कविता याद आ गई थी । शीर्षक था : " तुम जैसे " । कविता थी : " ओ प्रिये , / तुम जैसे / एक उन्मत्त / युवा भँवर , / तुम जैसे / सप्तम स्वर में बजता / एक
पियानो , / तुम जैसे / एक ऋचा आकाश तक जाती हुई , / तुम जैसे / फ़ौलाद और चाशनी की एक डोरी / मुझ से बँधी हुई , / तुम में आबाद हैं / प्रेम की अनगिनत अनुगूँजें , / जो वसंत करता है / फूलों के साथ / वह करना चाहता हूँ / मैं तुम्हारे साथ / ओ प्रिये ... "
           मैं तुम्हें प्यार से छूना चाहता था । लेकिन जब मैंने बुखार जाँचने के लिए तुम्हारा माथा छुआ तो चौंक गया उस तपिश से । तुम्हारे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते हुए मैंने ऐसा क्यों चाहा कि तुम्हें अपने सीने में भींच लूँ ? तुम्हारे चेहरे पर एक उदास मुस्कान थी । तुमने अपनी अक्षत कुँवारी आँखों से मुझे देखा और आँखें मूँद ली थीं । तुम्हें अब आराम आ रहा है , यह विचार मुझे क्यों ख़ुशी दे रहा
था ? क्या तुम मेरी उत्तेजना को , तुम्हारे स्पर्श की वजह से सुलगती हुई मेरी देह की आँच को भाँप सकी थी ? वह क्या चीज़ थी जिसने तुम्हें मुझ पर इतना भरोसा करने दिया था ?
            क्या तुम्हें पता है कि जब तुमने आँखें मूँदी हुई थीं , मेरे अधीर अधर तुम्हारे होठ चूमने के लिए तुम पर झुक आए थे ? वह कौन-सा अहसास था जिसने मुझे बीच में ही रोक लिया था ? क्या वह हमारे बीच मौजूद जातियों की ऊँची दीवार
 थी ? या वह प्यार को खो देने का भय था ? या अपने प्रति तुम्हारे विश्वास को नहीं तोड़ने की अदम्य इच्छा थी ? तुम्हें मुँदी आँखों वाले प्रदेश में अकेला छोड़कर मैं चुपचाप वहाँ से चला आया था ... तुम्हारी चितकबरी याद हृदय में समेटे ।अपना उदास अकेलापन अपने कंधों पर लिए ।
           मैं उस शाम के गाल पर ढुलक गई आँसू की बूँद था । मैं सप्तम स्वर से पहले ही टूट गई वीणा की तार का अधूरा संगीत था । हम रेल की उन दो समानांतर पटरियों-से थे जो कभी नहीं मिल पाए थे । हमारी अधूरी कथा झाड़ियों में खो गई उस गेंद-सी थी जो दोबारा नहीं मिली थी । मेरी रात का कोई दिन नहीं था । तुम्हारी शबरी के कोई राम नहीं थे । हम दोनों की आँखों में केवल जलते हुए आँसू थे । वह शाम एक अनसुलझी उलझन-सी हमारे बीच हमेशा मौजूद रही ।
            हालाँकि रेत-से फिसल जाते हैं जीवन के सभी पल हमारी मुट्ठी में से , लेकिन वह शाम ज़रूर फड़फड़ाती हुई अटकी रही होगी हमारे अवचेतन के किसी दरख़्त से । तभी तो कल जब दस बरस बाद तुमसे अचानक दोबारा मुलाक़ात हुई तो भूरी पड़ गई स्मृतियों की टहनी फिर से हरी हो गई । तुम्हें देखते ही मेरी धमनियों में फिर से उत्तेजना क्यों भरने लगी थी ? क्या यह नियति का कोई इशारा था कि जो लिखा है , वह हो कर रहेगा ? तभी तो बरसों से रुकी हुई एक कहानी फिर से चल निकली थी पूरी होने के लिए ...

                                सुमी
                              -------

           क्या यही नियति है ? दस बरस बाद मेरा अहमदाबाद आना । कॉन्फ़्रेंस में तुमसे अचानक मेरी मुलाक़ात हो जानी । समय की राख के ढेर में दबी चाहत की चिंगारियों का फिर से शोला बन जाना । हमारी ख़ामोशी में इच्छाओं के कितने निशाचर पंछी पंख फड़फड़ाने लगे थे ।हमारी आँखों में से कितनी अभिलाषाएँ झाँक रही थीं ।
           उस शाम की तरह कल एक और ऐतिहासिक शाम थी । कॉन्फ़्रेंस के बाद तुम मुझे अपने घर ले गए ।
           " बाक़ी लोग कहाँ हैं ? तुम्हारी पत्नी ? बच्चे ? " ड्राइंग-रूम में बैठते हुए मैंने पूछा ।
           " सुमी , मैंने शादी नहीं की । "
           " क्यों ? "
            तुम चुप थे किंतु तुम्हारी बोलती आँखें सब कुछ बयाँ कर रही थीं ।
           " और तुम ?  तुम्हारे पति क्या करते हैं ? कितने बच्चे हैं ? "
           " मनु , मैंने भी शादी नहीं की ... "

                              मनु
                             -----
           ... तो इतने सालों तक वही दर्द हम दोनों को सालता रहा था । हम चुप थे । और अचानक दस बरस पहले की वह शाम समय की केंचुली उतार कर हमारे बीच दोबारा आ बैठी । चमकती हुई । मेरा दिल तेज़ी से धड़क रहा था । मेरी नसों में रक्त का प्रवाह बढ़ गया था । और फिर बरसों से जमे हुए शब्द पिघल कर आतुरता से बहने लगे । तुम्हारी हथेली अपनी हथेलियों में थाम कर मैंने कहा , " सुमी , यह शाम साक्षी है कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ । जब से तुम्हें देखा था , तभी से तुमसे प्यार करता था । " और फिर धीमी लेकिन मज़बूत आवाज़ में तुमने कहा , " मनु , वह शाम साक्षी थी कि मैं भी आप से प्यार करती हूँ । बहुत पहले से । उस शाम जब मेरे होठ चूमने के लिए आप मुझ पर झुक आए थे , उससे भी पहले से । "
          " तुम उस शाम जगी हुई थी ? " मैंने थोड़ा झेंपते हुए पूछा ।
          " जगी तो आज हूँ मैं बरसों की गहरी नींद के बाद । " तुम फुसफुसाई थी ।
          फिर तुम एक इंद्रधनुषी हँसी हँसी थी । तुम्हारी आँखों में एक चमक थी । उस चमक में एक आमंत्रण था । वह आमंत्रण मुझमें इच्छाएँ जगा रहा था । जैसे कामना के चटख रंगों से भरी अतीत की वह शाम फिर से जवाँ हो गई थी ... मुझे क्या पता था कि यह रतजगा , यह दीवानगी इतनी मीठी होगी ...
           ...जब मुझे होश आया तो सभी बाँध टूट चुके थे । मांसल सुख मेरी मुट्ठी में था । बरसों से सूखी हमारी देह की मिट्टी तृप्त हो रही थी । हमारे होठ परस्पर चुंबन में जुड़े थे । हमारी देह गाढ़े आलिंगन में बँधी थी । तुम्हारे भीतर से केवड़े और खसखस जैसी ख़ुशबुएँ फूट रही थीं । मेरे होठ तुम्हारे कान की लवों को नया अर्थ दे रहे थे । तुम्हारे हाथ मेरे छाती के बालों में खो गए थे । तुम्हारी सुगंधित साँसों के शोर ने इस शाम में बेइंतहा मस्ती घोल दी थी । तुम्हारी देह अब भी खजुराहो की नर्तकियों-सी कँटीली थी । अँगीठी के तेज आँच-सी तपती मेरी देह के सभी रंध्र खुल रहे थे । एक सुखद ख़ुमार मुझ पर छाता जा रहा था । मेरी प्रेयसी मेरी बाँहों में थी । मेरी मरमेड मेरी निगाहों में थी । मैं गेंहुआ शंखों-से तुम्हारे उत्सुक उरोजों और तुम्हारे जामुनी कुचाग्रों में खुद को खोता जा रहा था । अधमुँदी आँखों से अब मैं प्रेम के अश्व की सवारी कर रहा था । हम दोनों एक ऐसी प्यास की गिरफ़्त में थे जो पीने के बाद भी निरंतर बढ़ती जा रही थी । " मनु , यू आर जस्ट ग्रेट ...! " मेरे कानों में तुम्हारी कामुक आवाज़ गूँज रही थी । मेरी धमनियों में रक्त के उफान का हहराता शोर था । फिर आह्लाद का ऊष्म , मीठा फ़व्वारा फूट पड़ा और हम दोनों उस नैसर्गिक सुख में बह गए ...

                               सुमी
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          आप सभी पाठकों को यह बताते हुए हमें हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि मैंने और मनु ने अपने परिवारों और रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद परिणय-सूत्र में बँध जाने का फ़ैसला किया है । कोर्ट-मैरेज होगी । आप सभी सुधी पाठकों का स्नेह और शुभकामनाएँ अपेक्षित हैं ।

                             ----------०---------

विख्यात कथाकार


 सुशांत सुप्रिय
         इंदिरापुरम ,
         ग़ाज़ियाबाद -201014
         ( उ. प्र. )

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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सुविख्यात लेखिका


हम आपके लिए लेकर आये हैं हिंदी साहित्य जगत की सुप्रसिद्ध रचनाकार मैत्रेयी पुष्पा जी के भाषण का एक अंश | अवसर था  हिंदी भवन में हिंदी मासिक पत्रिका अटूट बंधन के  सम्मान समारोह २०१५ के  आयोजन का  | कार्यक्रम की मुख्य अतिथि सुविख्यात लेखिका व् साहित्य एकादमी दिल्ली की उपाध्यक्ष श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी थी व् मुख्य वक्ता अरविन्द सिंह जी( राज्यसभा टी. वी ) व् सदानंद पाण्डेय जी ( एसोसिएट एडिटर वीर अर्जुन ) थे |

मैत्रेयी जी की सौम्य छवि में हर स्त्री को अपनापन  महसूस होता है | ये उस अपनेपन का असर ही तो है की मैत्रेयी जी बड़ी ही बेबाकी से स्त्री मन की बात को अपनी कलम के माध्यम से व्यक्त करती रही हैं | और स्त्रियों के जीवन को आसान बनाने की लड़ाई लडती रही हैं |

एक स्त्री ही स्त्री की शक्ति

सबसे पहले  श्रीमती मैत्रेयी पुष्पा जी ने सरस्वती प्रतिमा के आगे दीप जला कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया | उन्होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि एक स्त्री ही स्त्री की शक्ति हैं | उन्होंने आगे कहा कि ये पुरुष प्रधान समाज की सोंच है की ,” एक स्त्री दूसरी स्त्री को पसंद नहीं करती हैं , या नीचा दिखाने का प्रयास करती है , उनमें परस्पर वैमनस्य होता है | वास्तविकता इससे बिलकुल उलट है  |स्त्री की उपस्थिति में दूसरी स्त्री अपने को सुरक्षित व् सहज महसूस करती है |उसे आत्म रक्षा के लिए बनावटी आवरण नहीं ओढने पड़ते | यही कारण है की एक स्त्री दूसरी स्त्री का दुःख बहुत अच्छी तरह से समझ सकती है व् बाँट सकती है

मैत्रेयी पुष्पा जी ने महिला सिपाहियों के सामने दिए गए अपने भाषण का उल्लेख करते हुए कहा कि जब वो विद्यार्थी थी व् बस से स्कूल जाया करती थी तो स्त्री होने के नाते उन्हें जो कष्ट , ताने , अपमान सहने पड़ते थे उसे वो मौन होकर झेलने को विवश थी | रास्ते में एक थाना पड़ता था | दिल करता था बस से कूद कर वहां उस दुर्व्यवहार की शिकायत करे परन्तु पुरुष पुलिस कर्मियों के दुर्व्यवहार के किस्से उन्हें भयभीत करते थे | अगर कोई महिला पुलिस कर्मी वहां होती तो वह जरूर बस से उतर कर थाने जाती और बस उससे लिपट कर रो लेती | न वो कुछ कहती न वो कुछ सुनती पर सारा दर्द बिना कहे सुने बयाँ हो जाता |

उन्होंने आगे कहा की उनके इन शब्दों को सुन कर महिला सिपाही द्रवित हो उठी और हर महिला ने आगे आकर अपना एक किस्सा सुनाया | जो पुरुष शोषण कि दास्ताँ थी | सारा हाल सिसकियों से भर उठा | थोड़ी देर पहले जो महिलाएं अपने  सिपाही बनने  के अपने फैसले पर बहुत खुश नहीं थी वो गर्व से भर उठी व् उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि एक महिला दूसरी महिला कि उपस्थिति  में सुरक्षित महसूस करती है | श्रीमती पुष्प ने बताया कि बाद में उन्होंने  उनके हर किस्से को उन्होंने अपनी पुस्तक “ फाइटर कि डायरी" में उद्घृत किया है | जो उनकी अति लोकप्रिय पुस्तकों में से एक है |  

संपादन के क्षेत्र में महिला रचनाकारों का आगे आना सुखद


         अपनी बात पर जोर देते हुए श्रीमती पुष्पा ने कहा कि हर क्षेत्र में महिलाओ का आगे आना जरूरी हैं क्योंकि ये दूसरी महिलाओ को सुरक्षा का अहसास दिलाता है | उन्होंने ख़ुशी जाहिर की संपादन के क्षेत्र में आज महिलाएं आगे आ रही हैं | पर अभी और महिलाओं को आगे आना चाहिए | ये अभी तक स्त्रियों के लिए वर्जित क्षेत्र था | इस क्षेत्र में महिलाओं का आगे आना पुरुष संपादकों द्वारा महिला रचनाकारों के शोषण को रोकेगा | जिससे उनकी लेखनी मुखर हो सकेगी |


उन्होंने आगे कहाँ की साहित्य जीवन की शिक्षा देता हैं | व्यक्ति डाक्टर हो सकता है , इंजिनीयर हो सकता है , पर जिसने साहित्य नहीं पढ़ा उसने जीवन को नहीं पढ़ा |


प्रचार से नहीं विषय – वस्तु से चलती हैं पत्रिकाएँ


पत्र पत्रिकाओं के विषय में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक पत्रिका को रचनाकार मिल सकते हैं , बहुत प्रयास से उसका प्रचार प्रसार भी किया जा सकता है ,परन्तु अगर उसकी विषय वस्तु में दम नहीं होगा तो पाठक नहीं मिलेंगे | जिसक पत्रिका की विषय वस्तु में दम होगा उसे पाठक ढूंढ ढूंढ कर पढेंगे | रचना ठोस व् सत्य आधारित होनी चाहिए फिर चाहे उसमें आधुनिक जीवन शैली का वर्णन हो या लोकजीवन  का |


लोग हिंदी पढना चाहते हैं

उन्होंने इस दुष्प्रचार का विरोध किया कि लोग हिंदी पढना नहीं चाहते हैं | सच्चाई ये है कि लोग हिंदी साहित्य को पढना चाहते हैं , पर भ्रामक प्रचार से दूर हो रहे हैं | बार – बार ये बात फैलाई जा रही है की लोग हिंदी नहीं पढना चाहते | जो की सच नहीं है | उन्होंने डी यू के अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा की की वहां एक बार जाने पर उन्होंने छात्र – छात्राओं के मन में हिंदी के प्रति अथाह प्रेम देखा | परन्तु अफ़सोस इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किया जा रहा है | इसके लिए स्कूल , कॉलेजों में कविता कहानी की कार्यशालायें लगाने पर बल दिया |



                                                     अपने भाषण के अंत में उन्होंने एक बार फिर कहा की हर क्षेत्र में  स्त्रियो का आगे आना सुखद है और वः अपनी कलम से उनके लिए हर संभव लड़ाई लडती रहेंगी | 

टीम ABC





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अवास्तविक उम्मीदों से न टूटे रिश्ते की डोर


 शादियों का मौसम है | खुशियों का माहौल है | नए जोड़े बन रहे हैं | कितने अरमानों से दो लोग एक दूसरे के जीवन में प्रवेश करते हैं | मांग के साथ तुम्हारा मैंने माग लिया सनसार की धुन पर थिरकता है रिश्ता | फिर क्या होता है की कुछ ही दिनों में आपस में चिक- चिक शुरू होजाती है |सपनों का राजकुमार / राजकुमारी शैतान का भाई/बहन  नज़र आने लगता है | एक की पसंद के रंग दूसरे की आँखों में चुभने लगते हैं और एक की पसंद का खाना दूसरे के हलक के नीचे ही नहीं उतरता  और शादी टूटने की नौबत आ जाती है | हालांकि ये हर घर का किस्सा नहीं है | फिर भी अब इसका प्रतिशत बढ़ रहा है |

संभल कर -अवास्तविक उम्मीदों से न टूटे रिश्ते की डोर 


मेरी घनिष्ठ मित्र रीता की बेटी निधि और रोहन की शादी हुए अभी एक साल भी नहीं हुआ है  की उनके रिश्ते के टूटने की खबर आने लगी | पिछले साल उनकी शादी को याद करती  हूँ तो कितनी ही अच्छी स्मृतियाँ ताज़ा हो जाती हैं | रीता ने शादी के खर्च में जैसे खजाने के द्वार खोल दिए हों | और क्यों न खोलती एक ही तो बेटी है उसकी |फिर उनकी खुशियों की गारंटी भी उसके पास थी | निधि और रोहन पिछले कई सालों से एक दूसरे को जानते थे | उन्होंने ने ही विवाह का फैसला किया था | परिवार वालों ने तो बस मोहर लगायी थी |उस दिन दोनों की ख़ुशी छिप नहीं रही थी |  दोनों ही एक दूसरे को पा कर बहुत खुश थे | यह ख़ुशी विवाह समारोह में परिलक्षित हो रही थी |  निधि और रोहन दोनों ही अच्छे परिवारों से हैं | कोई  ऐसा दोष भी दोनों में दृष्टि गत नहीं  था | हम सब को इस विवाह के सफल होने की उम्मीद थी | शुरू –शुरू में उनकी खुशियों की खबर आती रहती थी |

फिर अचानक से ऐसा क्या हो गया जो दोनों एक –दूसरे से अलग होना चाहते हैं  | मैंने दोनों से अलग –अलग बात करने का निश्चय किया | ताकि इस टूटते हुए रिश्ते को संभाला  जा सके | पर दोनों से बात करके मेरे आश्चर्य की सीमा न रही | एक खूबसूरत रिश्ता छोटी –छोटी बातों पर टूटने की कगार पर था | ज्यादातर रिश्ते टूटने में दोनों परिवारों के बीच कुछ कटुता होती है | पर यहाँ मामला केवल उन दोनों के बीच का था | ये केवल निधि और रोहन का ही मामला नहीं है | ऐसा पहले भी होता आया है , जब दोनों में से एक या दोनों एक –दूसरे से ऐसी उम्मीदें पाल लेते हैं | जिनका पूरा होना मुश्किल है | हालांकि पहले ये  प्रतिशत बहुत कम था |

एक बात यह भी है  की पहले संयुक्त परिवारों के दवाब के कारण रिश्ता वेंटिलेटर पर चलता रहता था | दो लोग साथ  जरूर रहते थे पर पास  नहीं |  पर अब पति – पत्नी के अकेले रहने , तलाक   के समाज द्वारा मान्य  होने व् दोनों के आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के कारण इन  अवास्तविक उम्मीदों पर रिश्ते टूटने लगे हैं |

जाने कैसे अवास्तविक उम्मीदों से टूटती है रिश्ते की डोर 

             समस्या को समस्या कह देना किसी समस्या का अंत नहीं है | उसका समाधान खोजना आवश्यक है | जहाँ तक मैं समझती  हूँ की  जिस तरह फिल्मों और टी .वी में “ परफेक्ट रिश्ते को  दिखाया जाता है | उसे देखकर युवा मन अपने जीवन साथी  के लिए आदर्श कल्पनाएँ पाल लेते हैं | जो हकीकत के धरातल पर पूरी होती नहीं दिखती तो मन असंतोष से भर जाता है | पहले आपसी खटपट होती है जो रिश्ते की डोर को कमजोर करती है फिर एक –दूसरे से अलग होकर कोई दूसरा परफेक्ट साथी ढूँढने की चाह उत्पन्न होती है | दुखद है जब दो लोग एक दूसरे का हाथ थाम कर जीवन सफ़र में आगे बढ़ते हैं तो महज इन छोटी – छोटी अवास्तविक उम्मीदों से रिश्ता टूट जाए | भले  ही रिश्ते स्वर्ग में बनते हो पर निभाए धरती पर जाते हैं | और उनको ख़ूबसूरती से निभाना एक कला है | आज मैं यहाँ उन अवास्तविक अपेक्षाओं  पर चर्चा करूँगी  जिनकी वजह से रिश्ते टूट जाते हैं या कमजोर पड़  जाते हैं |

वो सदैव  रोमांटिक  ही रहेंगे –
                 कोई भी रिश्ता एक दूसरे के प्रति प्रेम  के साथ ही शुरू होता है | एक दूसरे को पसंद करना ही किसी रिश्ते की बुनियाद होती है | जाहिर है शुरू –शुरू में इसका इज़हार भी बहुत होता है | एक दूसरे ने क्या कपडे पहने हैं | कैसा दिख रहा है | कैसे बोल रहा है | इस बात पर साधारणतया ध्यान  भी बहुत जाता है | परन्तु जैसे  –जैसे रिश्ता पुराना पड़ता जाता है | जीवन की और जरूरते  प्राथमिकताओं में आ जाती हैं | इसका अर्थ यह नहीं है की प्रेम कम हुआ है बल्कि अर्थ यह है की अगला व्यक्ति जिम्मेदार है | जो प्रेम के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी निभाना चाहता है | अगर आप अपने साथी से कुछ खास बातें ही एक्स्पेक्ट करते रहेंगे  तो  आपको भी दुःख होगा व् यह साथी को भी उलझन होगी की की उसे हर समय आप को खुश करने के लिए कुछ खास काम करने होंगे |

ऐसी स्थिति में वो काम प्रेम नहीं ड्यूटी बन जायेंगे जिससे उनका सारा आनंद  ही खत्म हो जाएगा | बेहतर यही है की रोमांस को केवल बाँहों में बाहें डाल कर फिल्म  देखने , कैंडल लाईट डिनर  करने या महंगे गिफ्ट खरीद कर देने तक ही सीमित नहीं कर दिया जाए | जरूरी है रोमांटिक तरीकों के अलावा छिपे हुए प्रेम को पहचाना जाए जो एक दूसरे का ख्याल रखने , चिंता फिकर करने या हर परिस्तिथि में साथ खड़े होने से आता है | जैसे जैसे कपल प्रेम के  इन छिपे हुए तरीकों को समझना शुरू कर देंगे वैसे वैसे रिश्ता प्रगाढ़ होता जाएगा |

वो हमेशा सही ही बात बोलेंगे –

           जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे ,
                 तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे ...

                                 ये फ़िल्मी गीत सुनने में जितना हिट  है  वास्तविक जीवन में उतना ही फ्लॉप है |  अब जरा कोई रोमांटिक फिल्म याद करिए जो आप को बहुत पसंद आई हो | जब आप उसके एक – एक डायलाग पर गौर करेंगे तो आप पायेंगे की उसमें भी कुछ शब्द या वाक्य आप के मुताबिक़ सही नहीं थे | अब जरा सोचिये जो फिल्म इतनी मेहनत से सोच –समझ कर बनायी जाती है | जिसके एक –एक डायलाग पर घंटों काम होता है | वहाँ भी कुछ गलतियाँ हो जाती हैं तो यह तो जीवन है | अगर  आपस में यह अपेक्षा की जाए की अगला हमेशा सही बात ही बोलेगा तो दूसरे को अवश्य यह  महसूस होगा की उसका काम बस  एक व्यक्तिगत मनोरंजक का रह गया है | तो वो सोच –सोच कर बोलेगा | अर्थात कम बोलेगा |

रिश्ते दिल से बनते एन दिमाग से नहीं | आपसी बात –चीत कम होना किसी रिश्ते के टूटने का एक बड़ा कारण है | अगर कोई बात आप के मन की नहीं कही जा रही है तो बस उसके कहने का इंटेंशन देखना चाहिए | अगर वो हर्ट करने के लिए नहीं कही गयी है , तो ठीक है | क्योंकि हर कोई गलती करता है यहाँ तक की अकेले में बोले तब भी |

वो किसी और की तरफ ध्यान न दें

अक्सर रिश्ते टूटने  और गलतफहमियों की जड़ में यह बात होती है | यह सच है की प्रेम में पजेसिव फीलिंग्स लाता है | छोटा बच्चा अपनी माँ पर अधिकार भाव  के चलते उसे को किसी को छूने  भी नहीं देना चाहता है यहाँ तक की पिता को भी नहीं |  पर समझदारी आते आते ही वह यह बात समझने लगता है | यही बात रिश्तों में भी होती है | 

हर रिश्ता शुरूआती “ एक दूजे के लिए “ वाले दौर से गुज़रता है जहाँ तीसरे के लिए कोई स्थान नहीं होता | परन्तु ऐसा लम्बे समय तक नहीं हो सकता | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | आप को पा लेने के बाद अगला किसी और को नोटिस ही नहीं करेगा , ये न केवल अव्यवारिक है अपितु असंभव भी है | ओशो कहते हैं की आपके किसी गुण के कारण अगर आपका साथी आपको पसंद करता है तो  इसका मतलब है वह उस गुण का ग्राही है | वह हर किसी में , जिसमें वो गुण होगा नोटिस करेगा | पर गुणों को नोटिस करने व् प्रेम करने में अंतर है | प्रेम समग्र व्यक्तित्व के गुण –दोषों के साथ होता है , केवल एक गुण से नहीं |

ओशो एक बड़ी ही सुन्दर कहानी कहते हैं ,” एक पुरुष था | सौन्दयानुरागी | उसकी पत्नी बहुत सुन्दर थी | वह अपनी पत्नी की सुन्दरता की बहुत प्रशंसा  करता था | पत्नी खुश रहती | परन्तु जब वह किसी और स्त्री की सुन्दरता की प्रशंसा कर देता तो वह चिढ जाती | झगडे होते | धीरे –धीरे उसे सौन्दर्य से ही चिढ हो गयी | सुंदर वस्तुओ की तरफ ध्यान देना बंद कर दिया | अवचेतन मन में झगड़ों का भय बैठ  गया | पत्नी की सुन्दरता की भी तारीफ़ नहीं करने लगा | पत्नी अब भी दुखी रहने लगी...कैसा पति है ,कुछ भी अच्छे से अच्छा पहन लो ,   कभी तारीफ़ ही नहीं करता |
कहने का मतलब ये है की जो आपका जीवनसाथी है उस पर इतना दवाब न डालिए की वो किसी और की तारीफ़ ही न कर सके | ऐसे में एक अजीब सी घुटन महसूस होगी | जो रिश्ते में दरार का काम करेगी |

हमारे बीच कभी लड़ाई या झगडा नहीं होगा 

                   दूर से देखों तो चाँद कितना प्यारा लगता है | सुन्दर , शीतल , निर्मल ... पर उसी चाँद पर रहना पड़े तो ? क्या तब भी यही भाव  रहेंगे ? उसी तरह दो साथी जब साथ रहे और उनमें कभी झगडा न हो यह अवास्तविक परी कल्पना ही है | दो लोग बिलकुल एक जैसे नहीं हो सकते | बिलकुल झगडा न होने का मतलब या तो दोनों एक – दूसरे के प्रति इनडिफ़रेंट रुख अपनाए हुए हैं | यानी किसी के होने या न होने का मतलब   ही नहीं है | या फिर दोनों में से एक दूसरे के स्लेव ( गुलाम ) की तरह रह रहा है | दोनोही परिस्थितियों में जीवन का सुख कहाँ है |

ये छोटे –मोटे झगडे रिश्तों को तोड़ते नहीं उन्हें मजबूत बनाते हैं | जहाँ झगड़ों के दौरान एक दूसरे को अच्छी तरह समझते हैं वहीं रूठने –मनाने के दौर से गुज़र कर रिश्ता और निखर कर आता है | व् एक दूसरे के प्रति फुल एक्सेप्टेंस की मोहर लगाता है |

मेरे सारे रिश्ते मेरे जीवनसाथी को पसंद करेंगे 


मेरी माँ मेरी पत्नी को या पत्नी माँ को पसंद क्यों नहीं करती ? मेरे परिवार में मेरे पति से ज्यादा मेरी बहन के पति को क्यों पसंद किया जाता है ?ये बहुत छोटी या मामूली बात लग सकती है पर एक बार ये बात दिमाग में आते ही हम जीवन साथी में कमियाँ देखना शुरू कर देते हैं |  यह बहुत अवास्तविक अपेक्षा है की आप की जिंदगी में जितने दूसरे रिश्ते हैं वो आप के साथी को उस हद तक पसंद  करें या अच्छा समझे जैसा की आप समझते हैं | आपको अपने साथी के साथ जिंदगी बितानी है उन्हें नहीं | हर किसी की आपके साथी के बारे में अपनी अलग राय हो सकती है | बेहतर है की न तो आप उनकी राय बदलने की कोशिश करिए न अपनी |व्यक्ति कैसा होना चाहिए इसकी हर किसी की अपनी एक परिभाषा होती  है | तभी तो हर कोई एक ही व्यक्ति की तरफ आकर्षित नहीं होता | अगर आप चाहेंगे  की आप का हर रिश्तेदार आप के साथी की प्रशंसा करे तो निश्चित तौर पर आप अपने साथी पर कुछ खास तरह का व्यवहार करने का दवाब डालेंगे  | जो आपसी रिश्तों के लिए किसी भी तरफ से मुफीद नहीं है | क्योंकि मुखौटा लगा कर जीना आसान नहीं होता न आपके लिए न आपके साथी के लिए |

वो हमेशा मेरी भावनाओं को समझेगे

              यह सच है की  रिश्तों में एक –दूसरे को समझना जरूरी है पर आप के साथी के लिए यह असंभव है की वो सदा आपकी भावनाओं को समझ सके | या आपके मन की बात आप के बिना कहे जान सकें | इस्श्वर तक को अपने मन की बात समझाने के लिए हम रोज प्रार्थना में लम्बी लिस्ट पकडाते हैं पूरे उच्चारण के साथ | फिर जीवन साथी तो इंसान है भगवान् नहीं | जरूरी है की आप अपने साथी  को खुल कर अपनी भावनाओं के बारे में या किसी बात के लिए आप क्या महसूस करते हैं बताएं |अपने साथी से उम्मीद करना की वो आपके मन की बात पढ़ लेंगे, और उसी के मुताबिक काम  करेंगे , नासमझी  ही कहलाएगी | कोई भी रिश्ता आपसी संवाद से मजबूत  होता है | जितना खुल कर एक दूसरे से बात करेंगे , अपना पॉइंट ऑफ़ व्यू समझायेंगे , समय व्यतीत करेंगे तो  रिश्ता मजबूत होगा |

कोशिश कीजिये की अवास्तविक उम्मीदों से न टूटे रिश्ते की डोर 

                                      जब भी कोई रिश्ता शुरू होता है तो बहुत अरमानों के साथ शुरू होता है | उसे जीवन भर निभाने का भाव  होता है | इस नन्हे पौधे को स्नेह का खाद –पानी देने का संकल्प होता है | पर इन  अवास्तविक अपेक्षाएं की धूप इस  पौधे को पनपने ही नहीं देती | अगर आप का रिश्ता भी ऐसी धूप  से झुलस  रहा है तो पिक्चर परफेक्ट अपेक्षाएं हटा कर स्नेह की छाया  दीजिये ...कोशिश कीजिये की अवास्तविक उम्मीदों से न टूटे रिश्ते की डोर | सहेजिये , संभालिये और  फिर रिश्ते की घने बरगद के नीचे बैठ जीवन का आनंद  लीजिये |






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सुधीर द्विवेदी की लघुकथाएं




लघु कथाएँ साहित्य लेखन की लोकप्रिय विधा है| जिसमें थोड़े शब्दों में अपनी पूरी बात कह देनी होती है | आज हम आपके लिए लाये हैं सुधीर द्विवेदी जी की तीन लघुकथाएं | पढ़िए और अपनी राय दीजिये 



हौसला --(लघुकथा )

डरते डरते प्रवेश किया था मनोज ने उस आलिशान इमारत के अंदर । सुसज्जित कक्षाएं , हाई टेक वातावरण..सभी कुछ व्यवस्थित । 'यहाँ मेरे विनय का भविष्य अवश्य बन जाएगा। ' आश्वस्त हो मनोज ने पुराने फ़टे हुए बैग से साल भर से पेट काट काट कर जोड़े हुए पैसे काउंटर में जमा कर दिए। शहर के सबसे बड़े स्कूल में अपने बेटे का दाखिला करा वो यूँ महसूस कर रहा था मानो बहुत बड़ी जंग जीत आया हो । बाजार से सब्जी ले घर पहुंच कर झोला पत्नी को थमा दिया उसनें ।
" फिर टमाटर और प्याज नही लाये आप.." पत्नी झुंझला उठी थी ।
"अरे भागवान बेटे का एडमिशन बड़े स्कुल में कराना और रोज रोज टमाटर प्याज खाना .. बड़ा हौसला चाहिए हम जैसे आम आदमी के लिए ।"  कहते कहते मनोज ने चेहरे पर उभर आये दर्द को हँसी से छुपा लिया ।पत्नी चुप-चाप किचन में चली गयी थी |

मन का मरहम (लघुकथा )

"ओहो फिर से ये ककड़ फोड़ खेल । क्या मिलता है तुझे ये कंकड़ बिखरा के ?" दादा ने झिड़कते हुए नन्हे बिन्नू से पूछा ।
"दादा ये कंकड़ नही ऊ बिल्डिंग है जो बन गयी है हमारे खेतों को छीन । अब कुछ कर तो नही पाये सरकार का । तो इन्हें ही फोड़ मन भर लेते है ।“
“ अच्छा ! तो एक बड़ा पत्थर मुझे भी दे भला |”
“वो देखो.. फिर छितराई ससुरी एक और ।“ दोनों ख़ुशी से उछल पड़े |

पहचान (लघुकथा)


कृषि विज्ञान के छात्र एक पौधे पर अनुसन्धान कर रहे थे । कभी उसके रंग के आधार पे कोई नाम सुझाते कभी पत्तियों की बनावट के आधार पर कुछ । तभी एक देहाती लड़का दौड़ता हुआ आया और कुछ पत्तियाँ तोड़ने लगा "क्या तुम इस पौधे को पहचानते हो ?" उत्सुकता से एक शोधार्थी पूछ बैठा ।" बाबू जी इसकी पत्तियों का रस मेरी माँ की खाँसी तुरन्त दूर कर देता है रामबाण है ये मेरी माँ की खांसी के लिए । यही पहचान काफी है मेरे लिए ।"


सुधीर द्विवदी 
लेखक व् कवि

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