घूरो , चाहें जितना घूरना है

घूरना पुरुषों की एक ऐसी आदत है बिना कुछ कहे सुने , छुए स्त्रियों के अस्तिव अपमानित कर देता है | पढ़िए वैशाली ने आखिरकार अपने बॉस की घूरने की आदत से कैसे छुटकारा पाया

घूरों चाहें जितना घूरना है



कहते हैं लड़कियां बहुत तेजी से बड़ी होती हैं  हैं | सही है पर ये कोई नहीं कहता की जितनी तेजी से लडकियां बड़ी होती हैं  है उतनी ही तेज़ी से बढ़ते हैं उनके सपने | कहे भी तो कैसे , अक्सर लडकियाँ  उन सपनों को किसी बड़े संदूक में छुपा लेती हैं | उस संदूक का नाम होता है "कल " | और उनके सपने उस कभी न खुलने वाले संदूक में उनके साथ - साथ ससुराल और अर्थी तक की यात्रा करते हैं | पर कुछ  जो बचपन में ही खोल देती हैं उस संदूक को और छिटक जाते हैं उनके सपने | इससे पहले की वो बीन पाए बड़ी ही निर्ममता से कुचल दिए जाते हैं उनके अपनों द्वारा , समाज द्वारा | विरली ही होती हैं जो सपनों की पताका थाम कर आगे बढती हैं | यहाँ भी उनकी राह आसान नहीं होती | बार - बार उनकी स्त्री देह उनकी राह में बाधक होती है | अपने सपनों को अपनी शर्त पर जीने के लिए उन्हें चट्टान बन कर टकराना होता है हर मुश्किल से | ऐसी ही एक लड़की है वैशाली



यूँ तो वैशाली अपने माँ -बाप की एकलौती बेटी है  | बहुत लाड -प्यार में पली |माँ - बाप की आँखों का तारा  जो इच्छा करती झट से पूरी हो जाती | छोटी - मोटी इच्छाओं  के आलावा एक इच्छा जो वैशाली बचपन से अपने मन में पाल रही थी वो थी आत्मनिर्भर होने की | माता - पिता ने भी झट से इजाज़त दे दी |हालांकि वो जानते थे की उनके छोटे शहर में अच्छी नौकरी कहाँ | नौकरी करने के लिए उसे दूसरे शहर उनसे दूर जाना पड़ेगा | पर  वो तो अपनी बेटी को खुश  देखना चाहते थे | इसलिए वो उसका साथ देने को पूरी तरह से तैयार हो गए |


वैशाली ने उच्च शिक्षा हासिल की | फिर उसकी नौकरी लग गयी | वो अपने माता - पिता से दूर अजनबी शहर में अपने सपने को तलाशने पहुँच गयी |


वैशाली ने  एक  गर्ल्स PG किराए पर ले लिया था | सब लडकियां ही थी | माता - पिता निश्चिन्त थे की उनकी लड़की  सुरक्षित है | वैशाली अपना रूम  एक और लड़की से शेयर करती थी | उसका नाम था मंजुलिका | मंजुलिका वेस्ट बंगाल से थी | जहाँ वैशाली दबी सिकुड़ी सी थी , मंजुलिका तेज तर्रार हाई -फाई | पर जरूरत ने दोनों में अच्छी दोस्ती करा दी |


ऑफिस का पहला दिन था | वैशाली ने अपनी जींस टी शर्ट  पहन ली | ये कपडे तो वो अपने  गृह नगर में भी पहना करती थी | पर जैसे ही वो बाथरूम से बाहर निकली , मंजुलिका ने सीटी बजाते हुए हुए ,"पटाखा  लग रही हो , क्या फिगर है तुम्हारी | वो भी हँस दी |


कभी उसने ध्यान ही कहाँ दिया था अपनी फिगर पर |  उसका ऊपर का हिस्सा कुछ ज्यादा ही भारी है यह उसे आज समझ आ गया था | जब ऑफिस जाते समय  हर किसी की नज़रें जैसे वहीं अटक रही थी | ऑफिस पहुँचने पर बॉस सन्मुख भाटिया ने उसे अपने  चैंबर में बुलाया | और पूरे दो मिनट तक उसके ऊपरी भाग को घूरते रहे | वैशाली को अजीब सी लिजलिजी सी फीलिंग हुई | जैसे सैंकड़ों चीटियाँ उसके शरीर को काट रही हों | उसने जोर से खांसा | बॉस को जैसे होश आया हो | उसे फ़ाइल पकड़ा कर काम समझाने लगे |


फ़ाइल ले कर वैशाली अपनी टेबल पर आ गयी | संज्ञा शून्य सी | अपने छोटे शहर में भी उसने लफंगे टाइप के लड़के देखे थे पर शायद हर समय माँ या पिताजी साथ रहते थे | इसलिए किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई थी | उफ़ ! कैसे टिकेगी वो यहाँ ?उसे पिता जी याद आने लगी | जब शीशे के पार केबिन में बैठे हुए उसने सन्मुख भाटिया को देखा था तो पिता की ही तरह लगे थे | ५० के आसपास की उम्र , हलके सफेद बाल ,शालीन सा चेहरा | बड़ा सुकून हुआ था की बॉस के रूप में उसे पिता का संरक्षण मिल गया है | क्यों एक पुरुष अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के लिए बस पुरुष  ही होता है |


अपने विचारों  को झटक कर वैशाली ने अपना ध्यान काम पर  लगाने का मन बनाया | आखिर वो यहाँ काम करने ही तो आई है | वो हिम्मत से काम लेगी और अपना पूरा ध्यान अपने सपनों को पूरा करने में लगाएगी |पर जितनी बार भी उसे बॉस के ऑफिस में जाना पड़ता उसका संकल्प हिल जाता |


PG में लौटने के बाद वैशाली खुद को बहुत समझाती कि  उसे बस अपने सपनों पर ध्यान देना है | पर उस लिजलिजी फीलिंग का वो क्या करे जो उसे अपनी देह पर महसूस होती | घंटों साबुन रगड़  कर नहाती पर वो फीलिंग निकलने का नाम ही नहीं लेती |


काश की सारे मैल साबुन से धोये जा सकते | 


हफ्ते भर में वैशाली जींस टॉप छोड़कर  सलवार कुरते  में आ गयी | १० दिन बाद दुपट्टा भी पूरा खोल कर लेने लगी और १५ वें दिन तक दुप्पट्टे में इधर - उधर कई सेफ्टी पिन लगाने लगी | पर बॉस की एक्स रे नज़रें हर दुपट्टे हर सेफ्टी पिन के पार पहुँच ही जाती | आखिर वो इससे ज्यादा कर ही  ज्यादा कर ही क्या  सकती थी |



आजिज़ आ कर वैशाली नौकरी छोड़ने का  मन बनाने लगी |



एक -एक दिन  कर के एक महीना बीता | पहली पगार उसके हाथ में थी | पर वो ख़ुशी नहीं थी जिसकी उसने कल्पना की थी | मंजुलिका ने टोंका ," आज तो पगार मिली है , पहली पगार | आज तो पार्टी बनती है | आज  वैशाली खुद को रोक नहीं पायी और जितना दिल में भरा था सब उड़ेल दिया |


मंजुलिका दांत भींच कर गुस्से में बोली ," सा SSS..., की माँ बहन नहीं है क्या ? उन्हें जा के घूरे जितना घूरना है
| और भी कुछ हरकत करता है क्या ?

नहीं , बस गंदे तरीके से घूरता है | ऐसा लगता है , ऐसा लगता है कि ... वैशाली  कुछ कह पाती तब तक मंजुलिका बोल पड़ी |  अब समझी तू जींस टॉप से सूट कर क्यों आयीं | अरे तेरी गलती थोड़ी न है | देख तब भी उसका घूरना तो बंद हुआ नहीं |कहाँ तक सोंचेगी | इग्नोर कर ऐसे घुरुओं को |


मैं सोंच रही हूँ , नौकरी बदल लूँ ..वैशाली ने धीरे से कहा |


मेरी बात पर मंजुलिका ने ठहाका  लगा कर कहा ,"नौकरी बदल कर जहाँ जायेगी वहां ऐसे ही घूरने वाले मिलेंगे बस नाम और शक्ल  अलग होगी | कहा न , इग्नोर कर |



तभी वैशाली की माँ का फोन आ गया | माँ बाबूजी उसकी पहली तनख्वाह की ख़ुशी  को उसके साथ बांटना  चाहते थे | माँ चहक कर बता रही थी की उन्होंने  मंदिर जा कर प्रसाद लगाया है आस - पड़ोस में बाँटा है | बाबूजी ने अपने ऑफिस  में सबको ट्रीट दी कि  जिस शहर में लडकियाँ बचपन में पढाई छोड़ देती हैं उनकी बहादुर बेटी अकेले अपने सपनों के लिए संघर्ष कर रही है |ओह माँ , ओह पिताजी , इतना ही कह पायी पर अन्दर तक भीग गयी वो इन स्नेह भरे शब्दों से |


सारी  रात वैशाली रोती रही | कहाँ उसके माता - पिता उस पर इतना गर्व कर रहे हैं और कहाँ वो नौकरी छोड़ कर वापस जाने की तैयारी कर रही है | वो भी किसी और के अपराध की सजा खुद को देते हुए |मंजुलिका कहती है , इग्नोर कर ...वही  तो कर रही थी , वही तो हर लड़की करती है बचपन से ले कर बुढापे तक | पर ये तो समस्या का हल नहीं है | इससे वो लिजलिजी वाली फीलिंग नहीं जाती |


पुरुष को जनने वाली स्त्री जिसकी कोख का सहारा भगवान् भी ढूंढते हैं उसे अपने ही शरीर के प्रति  क्यों अपराध बोध हो |


सुबह तक वैशाली ने फैसला कर लिया ...


आज उसने जींस टॉप ही पहना | पूरी हिम्मत के साथ ऑफिस गयी | बॉस ने उसे केबिन में बुलाया | उसे देख उनके चेहरे पर मुस्कुराहट तैर गयी | आँखे अपना काम करने लगी |


एक मिनट सर, वैशाली ने जोर से कहा | सन्मुख भाटिया  हडबडा कर उसके चेहरे की और देखने लगे |


 वैशाली ने फिर से अपनी बात पर वजन देते हुए  कहा ," एक मिनट सर , मैं यहाँ बैठ जाती हूँ फिर पांच मिनट तक आप मुझे जितना चाहिए घूरिये |और ये हर सुबह का नियम बना लीजिये | पर बस एक  बार  ताकि जितनी भी लिजलिजी फीलिंग मुझे होनी है वो एक बार हो जाए | उसके बाद जब अपनी सीट पर जा कर मैं काम करना शुरू करूँ तो मुझे ये डर न लगे की अभी फिर बॉस बुलाएँगे , फिर घूरेंगे और मैं फिर उसी गन्दी फीलिंग से उसी अपराध बोध से गुजरूंगी | जिस दिन से ऑफिस में आई हूँ ये सब झेल रही हूँ | जी में आया की पूँछू ,"माँ - बहन नहीं है क्या ,जितना  घूरना है उन्हें घूरों | पर नहीं मैं अब ये नहीं कहूँगी क्योंकि मैं जानती हूँ की आप नहीं कोई और  निश्चित तौर पर आपकी माँ , बहन को घूर रहा होगा | अपनी माँ -बहन , पत्नी ,बेटी सब  से कह देना की वो भी घूरने का टाइम फिक्स कर दें | दोनों का समय और तकलीफ बचेगी |


तालियों की गडगडाहट गूँज  उठी | बॉस के केबिन के गेट पर सारे को वकर्स  खड़े थे | वैशाली अंदर आते समय जानबूझ कर गेट जो खुला छोड़ आई थी |

बॉस शर्म से पानी - पानी हो रहे थे |

उसके बाद उन्होंने खुद ही अपनी घूरने की आदत छोड़ दी |

वैशाली ने उस दिन अपनी टेबल पर Alice Walker  का  एक बड़ा सा कोटेशन लिख कर लगा दिया ..


"The most common way women give up their power is by thinking they don't have any"


वंदना बाजपेयी


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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को : घूरो , चाहें जितना घूरना है
घूरो , चाहें जितना घूरना है
घूरना पुरुषों की एक ऐसी आदत है बिना कुछ कहे सुने , छुए स्त्रियों के अस्तिव अपमानित कर देता है | पढ़िए वैशाली ने आखिरकार अपने बॉस की घूरने की आदत से कैसे छुटकारा पाया
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अटूट बंधन : जो अटूट बंधन में बांधे आपके रिश्तों को
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