कैसे रिश्तों में डालें नयी जान

हम सब रिश्तों को सहेजना चाहते हैं पर पहल नहीं करना चाहते | अपने रिश्तों में नयी जान डालने के लिए दूसरों से ज्यादा अपना व्यवहार समझना होगा


                                           
कैसे रिश्तों में डालें नयी जान

 

रोज ही शाम को लीला बाई से मिलना होता था पार्क में आतीं तो अपने परिवार की बात किए बिना न रहतीं ।मैं भी सोचती कि उम्र हो गयी किंतु इनका दिल है कि परिवार में ही बसा है फिर भी मैं उनका दिल रखने के लिए उनकी बातें सुन लेती सोचती कि मुझे तो बच्चों को ले पार्क में आना ही है फिर इनकी बात सुन लूँ  तो क्या जाता है |


कई बार बोर भी हो जाती उन्हीं बातों को बार-बार सुन किंतु वह भी तो मुझे अपना समझ बताती हैंउनका मुख्य विषय  होता उनका पोता । कहतीं "आज फेसबुक पर नये फोटो डाले है बहू ने, प्राइज़ मिला है पोते को पढ़ाई में प्रथम आया है कभी कहतीं स्कूल बास्केट बाल टीम में सेलेक्ट हो गया है और क्यूँ न हो बड़े लाड़-प्यार से पाला है उसे किंतु अब बेटे का तबादला हो गया है तो मिल नहीं पाती उस से ,, बस छुट्टियों का इंतजार है ,तभी एक दिन इंटेरकौम कर बोलीं कुछ दिनों के लिए बेटे के घर जा रही हूँ "


मैने वजह पूछी कहने लगीं "वापिस आ कर बतावुँगी अभी फ्लाइट का समय हो गया है " और जब वे दो माह बाद वापिस आईं और शाम को पार्क में मिलते ही मैं पूछ बैठी "आंटी मिल आईं पोते से और मैं ने उन्हें छेड़ते हुए कहा आज मेरे ज़मीन पर नहीं हैं कदम " इतना सुनते ही रो पड़ीं बेचारी कहने लगीं क्या बताऊं और जो उन्होंने बताया वाकई दिल को दुखाने वाला था चलिए मैं ही सुनाती हूँ आपको उनकी कहानी 


जब स्वार्थ  रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए 


लीला जी अपने इकलौते पोते के प्यार में पागल थी किंतु मजबूरी जब से बेटे का तबादला हो गया था सिर्फ़ गर्मी की छुट्टियों में ही पोते से मिल पाती । जब उसका पोता छुट्टियों में उसके पास आता वह उसकी पसंद के खाने खिलोनों एवं किताबों का भंडार लगा देती ,नित नये पकवान खिलाती । एसे करते पाँच वर्ष बीत गये और पोता पूरे सोलह वर्षों का हो गया ।

तभी एक दिन उसके बेटे का फोन आया और बेटा बोला बहू का एक्सीडेंट हो गया है तो माँ तुम आ जाओ घर और अस्पताल दोनों ही संभालने पड़ेंगे । बेचारी ने झट से अपना सूटकेस तैयार किया और रवाना हो गयी अपने बेटे के घर जाने के लिए । मन में बहू के एक्सीडेंट का तो दुख था किंतु अपने पोते से मिलने की  खुशी भी थी । बेटे के घर पहुँचते ही पहले दिन से ही पूरे घर एवं अस्पताल की ज़िम्मेदारी संभाल ली ।

 उसके बेटे ने भी कहा माँ पोते के स्कूल व सोने -उठने के टाइम का थोड़ाध्यान रखनापरीक्षा नज़दीक है सो उसे थोड़ा पढ़ने के लिए भी कह देना । लीला जी ने भी अपना समझ पोते के रख-रखाव में कोई कमी न छोड़ी । तभी एक रात पोते के कमरे में दूध का गिलास ले कर गयी और पोते को अपने मित्र से बात करते सुना । पोता कह रहा था  यार क्या करूँ ये बुड्ढी सारे दिन पहरेदारी करती है ,जब से आई है नाक में नकैल डाल रखी है न खुद चैन से रहती है न मुझे बैठने देती है " यह सुन लीला जी  के तो पैरों तले ज़मीन खिसक गयी । चुपचाप दूध का गिलास टेबल पर रख कमरे से बाहर आ गयी । मगर आँसू थे कि थमने का नाम ही न ले रहे थे और कानों  में एक ही शब्द गूँज रहा था बुड्ढी... बुड्ढी.... बुड्ढी

मैं सोचती रह गयी कि आख़िर कहाँ कमी रह गयी थी कि बेटे-बहू,लीला बाई सभी तो अपनी जगह सही थे फिर भी पोते का व्यवहार ऐसा  कई दिनों तक जवाब नहीं मिला मुझे फिर समझ में आया कि  शायद आज के परिवेश में जहाँ नौकरी-पेशा लोग अपने परिवारों से अलग रह रहे है तो एक पीढ़ी दूसरी तक वे संस्कार पहुँचा ही नहीं पा रही है सब एक दूसरे के बंधनों से आज़ाद रहना चाहते हैं शायद एक दूसरे को देख कर चलन ही एसा बन गया है कि हर कोई सिर्फ़ ज़रूरतों को महत्व दे रहा है रिश्तों को नहीं बेचारी लीला बाई जिन की जान पोते में बस्ती थी उनका दिल  सदा के लिए टूट गया ।

रिश्तों के पौधे को समय पर सींचे 



वहीं एक और नयी आंटी थीं अभी कुछ दिन पहले ही नयी दिखाई देने लगी थीं और सभी को बाय-बाय कहती नज़र आईं सो किसी ने पूछ ही लिया अरे अभी आई अभी गयी तो बताने लगीं वे अपनी कहानी लीजिए उन्हीं के मुख से सुन लीजिए

६५ वर्ष की उम्र में मुझे वृद्धाश्रम  भेजने की बात घर में हई तो मेरा दिल दहल उठा । मैं कोसने लगी अपने बेटे व बहू को । मन ही मन सोच रही थी बहू ने पट्टी पढ़ाई होगी बेटे को । वरना मेरा बेटा तो राम सा है ,एसा कभी ना करता ।


अब तो घर में पानी भी पीने को मन न करता । सोचती एक टुकड़ा न तोड़ूं इस घर में । क्या फायेदा हुआ बेटे को पाल-पोसकर इंजिनियर बनाने का । दूसरा बच्चा भी न किया ,सोचा एक ही को अच्छा कर लूँगी । पर " हाय री किस्मत " । अब यह दिन देखने पड़ रहे हैं अपने बेटे के घर में रहने को भी जगह नहीं । आख़िर माँगती ही क्या हूँ इस से दो वक़्त की रोटी ! वह भी नहीं खिला सकता।  क्या फायेदा औलाद पैदा करने का ? बेटा मुझे बार-बारसमझाताकहता " सब तुम्हारे भले के लिए ही कर रहा हूँ माँ "  मैं सोचती सब चिकनी-चुपड़ी बातें ! बार-बार बोलता माँ उधर तुम्हारी सार -संभाल अच्छे से हो जाएगी हम तो मियाँ-बीबी नौकरी वाले हैं घर में तुम्हें अकेली कैसे छोड़ दें ऊपर से मेरा बार-बार विदेश जाना । तुम्हारी हारी-बीमारी देखने वाला कौन है घर में नौकर रख दें लेकिन आज के नौकरों का भी तो भरोसा नहीं बड़े-बूढ़ों को अकेले पाकर ना जाने क्या कर डालें ।

 मैं कुछ ना बोली । मन में सोचा " सब बनावटी दिखावा " । बस दस दिन बचे थे मुझे जाने मेंतभी मेरा १७  वर्षीय पोता छुट्टियों में हॉस्टिल से आया । बेटा-बहू दोनों तो नौकरी पर चले जाते पोता सारे दिन दोस्तों से फोन पर बात करता  या  कंप्यूटर  पर  खेलता ।  मैं सोचती इससे थोड़ा बात करूँ ,तो कहता " दादी डिस्टर्ब मत करो " मैं सोचती अजीब है क्या जमाना आ गया है शिष्टाचार संस्कार नाम की तो कोई चीज़ ही नहीं । बात तक करना पसंद नहीं करता ।

 सोचा अब घर छोड़ना तो तय है जाते-जाते बहू को थोड़ा सुना जाऊँ । एसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा । शाम को बहू नौकरी से आई मैं भी इंतजार कर रही थी । सो आते ही लगी जली-कटी सुनाने । तुम क्या मुझे घर में नहीं रख सकती ?   अर्ररे संस्कार हैं कि नहीं और तो और पोते को भी पट्टी पढ़ा दी । बात तक नहीं करता मेरे से । बहू थोड़ी देर तो चुपचाप सुनती रही फिर उस से रहा न गया । बोली मांजी इतने वर्ष मैने आप की एक भी बात का जवाब नहीं दिया । अच्छा तो नहीं लगता कहने को लकिन आप ने भी कौन सी ज़िम्मेदारी निभाई अपनी ?शादी के बाद आज तक मेरी हर ज़रूरत पर मैंने आप से मदद चाही आप तो कभी हमारे पास आई ही नहीं । 

यहाँ तक कि प्रथम वर्ष में ही इस पोते के  जन्म के समय न चाहते हुए भी आप ने मुझे मायके भेज दिया । मेरी तो माँ  भी नहीं । मेरे पिताजी ने  नौकरानियों  के भरोसे मेरा प्रसव व जापा करवाया । और रही बात इस पोते की ! तो बताइए कौन से दिन आप ने इसे लोरियाँ सुनाईं कब आप ने इसे गोद में खिलाया मैंने आप को अपने पास बार-बार बुलाने की कोशिश की लेकिन आप साथ में रहना नहीं चाहती थीं । मेरे लिए नहीं अपने पोते के लिए तो आप आ सकती थीं । उसे नौकरों के भरोसे पाल-पोस कर बड़ा किया मैंने और जब उनका विश्वास न होता मैं बार-बार आपको अपने पास बुलाती ,इसी पोते के लिए । तब आप ही ने कहा ना इसे हॉस्टिल में डाल दो । अगर आप शुरू से साथ रहतीं तो मेरी भी थोड़ी चिंता कम हो जाती माँजी । तभी आप जवान थीं, आपको किटी-पार्टीफिल्में देखनाबाबूजी के साथ सैर-सपाटा अच्छा लगता था मगर माफ़ कीजिए माँजी, आप की तरफ से मेरी गृहस्थी को कोई सहयोग ना था  ।


उसके शब्द काँटों की तरह मेरे कानों में चुभ रहे थे लेकिन ठीक ही तो कह रही थी वो सास का कौन सा फर्ज़ अदा किया था मैंने कौन सी दादी जैसे लाड़-लड़ाए थे मैंने अपने पोते को आज मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो रहा था । मैं सोचती थी जब तक हाथ-पैर चलें घूम-फिर लें । इस पोते के पैदा होने पालने-पोसने,  हारी-बीमारीकहीं भी तो मदद नहीं की थी मैंने । मैं सोचती थी बहू नौकरी करे तो अपनी ज़िम्मेदारी से । पहले बेटे को पाला अब क्या इस का परिवार पालूं सब मेरी ज़िम्मेदारी थोड़ी है ?

अगर मैंने पोते को प्यार दिया होता तो क्या आज वह ना कहता " दादी नहीं जाएँगी " काश इन सब बातों को मैंने कल समझा होता तो आज ये दिन ना देखना पड़ता । मैंने ही रिश्तों को समझने में भूल की । मेरा रिश्ता सिर्फ़ बेटे  तक ही सीमित ना था । बहू एवं पोते के लिए भी मेरी ज़िम्मेदारी बनती थी । मैंने स्वयं ही इन “ रिश्तों की गर्माहट “ को ख़त्म कर दिया था । पश्चाताप के आँसू मेरी आँखों से बह रहे थे । अपनी बहू से मैं बोली " काश ये सब मैं पहले ही समझ जाती " कहते हैं "लड्डू में जितना गुड़ डालो उतना ही मीठा होता है "  मैंने स्वयं ही रिश्तों की वह मिठास ख़त्म कर दी थी ।

बहू बोली , माफ़ कीजिए मांजी महंगाई इतनी है दोनों का नौकरी करना भी तो ज़रूरी है पहले जैसा जमाना नहीं रहा अबफिर भी मैं समय निकाल कर आप से मिलने आऊँगी उसकी यह बात सुन कर मेरी आँखों से खुशी के आँसू निकल पड़े  ,  अब मुझे कोई दुख ना था वृद्धाश्रम जाने का " तभी पोता हंसते हुए बोला " दादी माँ आप भी हॉस्टिल जाने की तैयारी कीजिए और मैं भी अगली छुट्टी में आएँगे " मैं उस की बात सुन कर मुस्कुरा दी  । मैंने खुशी-खुशी अपना सूटकेस तैयार कर लिया ।


रिश्तों में भरे अपनेपन का अहसास 



मैं फिर सोच में पड़ गयी की दोनों आंटी की कहानी बिल्कुल एक दूसरे से उल्टी है
और अब मुझे सब बिल्कुल साफ समझ आ रहा था कि हमारे  यहाँ एक कहावत है "जिसकी लाठी उसी की भैंस " यदि यह हम रिश्ते निभाते हुए इस्तेमाल करें तो रिश्तों में कड़वाहट तो आ ही जाएगी ,  फिर क्या बूढ़े  क्या जवान वक़्त तो अपनी चाल बदल ही लेगा कभी अच्छा कभी बुरा । ज़रूरत है अपने व्यवहार में मानवता लाने की जो कि आजकल प्रायः  ख़त्म ही होती जा रही है । 


किसी कमजोर को देख लाठी निकाल लेना कहाँ की इंसानियत है यह तो सभी को मालूम है जब बूढ़े होंगे तो अपने बच्चों पर ही निर्भर होंगे और बच्चों को भी मालूम है की उनके माता-पिता उनकी ही ज़िम्मेदारी है । किंतु यह सब किताबों फेसबुक स्टेटस या वाटसपप तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए । यह व्यवहार मे होना चाहिए । एक और व्यवहार मैं देख रही हूँ कि मिठास सिर्फ़ उपर से बोलने की ही रह गयी है जहाँ ज़िम्मेदारी आई नहीं की वहाँ से भाग निकालने की कोशिश शुरू हो जाती है । ज़रूरत है ज़िम्मेदारी को लेने वालों की हम चाहें कि घर में सब कुछ मेरे हिसाब से हो किंतु ज़िम्मेदारी मेरी नहीं तो एसा कैसे चलेगा । 


आप ज़िम्मेदारी लेंगे तो लोग आप की सुनने भी लगेंगे । आपको अधिकार तभी मिलेंगे जब आप ज़िम्मेदारी निभाएँगे । शायद यही कारण है कि  बच्चों के लिए होस्टल या क्रेश की व्यवस्था एवं बूढ़ों के लिए वृद्धहाश्रम अपने पैर बड़ी तेज़ी से पसर रहे हैं । परिवार में अनुशासन का अपना स्थान है किंतु वह एक सीमा तक वरना वह बंधन बनने लगता है और उससे तंग आ लोग उस बंधन को तोड़ ही देते हैं चाहे वे वृद्ध हों या जवान । एक दूसरेकी जिंदगी में ज़्यादा दखल देना भी ठीक नहीं । ज़रूरत है तो सिर्फ़ आपसी सामंजस्य बैठाने  की । मुझे एसा नहीं लगता कि माता-पिता अपने बच्चों के साथ नहीं रहना चाहते या फिर उनके बच्चे अपने माँ-बाप को साथ नहीं रखना चाहते । यह सिर्फ़ सोच का फ़र्क है । 


आप ही डाल  सकते हैं रिश्तों को नयी जान 


एसा भी कहते सुना है " एक माँ चार बेटों को पाल सकती है किंतु चार बेटे मिल कर एकमाँ को नहीं पाल सकते है " तो ज़रा सोचिए क्या माँ ने जब चार बेटे पाले तो क्या वह शत -प्रतिशत उन्हें खुश रख पाई हम अपना बचपन ही याद कर सकते हैं कभी एक भाई खुश तो और कभी दूसराकभी एक की पसंद की सब्जी तो कभी दूसरे की " माँ भी कह देती " चल बेटा आज दही से रोटी खा ले " किंतु वहीं चार बेटों के घर की पत्नियाँ अलग अलग घरों से आई है तो व्यवस्था भी अलग अलग ही होगी ज़रूरत है सामंजस्य बैठने की । यदि आपसी सामंजस्य हो तो शायद चार बेटे एक माँ  को बड़ी खुशी से पाल लें, यदि वह सामंजस्य होता तो वृधहाश्रम कभी न खुलते ।
फिर भी मैं यह कहूँगी कि किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी  तो एक बार करें शुरुआत दोनों पीढ़ियों के बीच सेतु बनाने की और अपने से बड़ों को मान सम्मान देकर छोटो के लिए  एक आदर्श स्थापित कर दें और फिर क्यूँ ये वृद्ध हो चिंतित और उपेक्षित  ?


रोचिका शर्माचेन्नई

लेखिका एवम कवियत्री



 यह भी पढ़ें ......



आपको आपको रोचिका शर्मा जी का लेख "कैसे रिश्तों में डालें नयी जान " कैसा लगा  | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें 

COMMENTS

BLOGGER: 1
Loading...
नाम

“मतवाला” #NaturalSelfi 15 अगस्त २६ जनवरी अंजू शर्मा अंतर्राष्ट्रीय बिटिया दिवस अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस अकेलापन अक्षय तृतीया अखिल राज शाह अगला कदम अजय कुमार अजय कुमार श्रीवास्तव अजय कुमार श्रीवास्तव (दीपू) अजय चंद्रवंशी अटूट बंधन अटूट बंधन अंक -१० अनुक्रमाणिका अटूट बंधन कवर पेज अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान अटूट बंधन सम्पादकीय अनामिका अनामिका चक्रवर्ती अनुपमा सरकार अन्तर करवड़े अन्तराष्ट्रीय वृद्ध जन दिवस अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) अपर्णा परवीन कुमार अपर्णा साह अम्बरीष त्रिपाठी अरविन्द कुमार खेड़े अर्चना नायडु अर्चना बाजपेयी अर्जुन सिंह अर्थ डे अशोक कुमार अशोक के परुथी आत्महत्या आध्यात्मिक लेख आभा दुबे आयुष झा "आस्तीक " आलोक कुमार सातपुते आशा पाण्डेय ओझा आसाढ़ पूर्णिमा इंजी .आशा शर्मा इंदु सिंह इमरान रिजवी इमोशनल ट्रिगर्स ई बुक ईद उत्पल शर्मा "पार्थ" उपवास उपासना सियाग उमा अग्रवाल उम्मीदें उषा अवस्थी एकता शारदा एम्पैथी ओमकार मणि त्रिपाठी ओशो औरत कंगना रानौत कंचन पाठक कंचन लता जायसवाल कबीर करवाचौथ कर्म कल्पना मिश्रा बाजपेयी कवि मनोज कुमार कविता बिंदल कहानी कहानी संग्रह कार्ल मार्क्स काव्य जगत काव्यजगत किरण आर्य किरण सिंह कुमार गौरव कुसुम पालीवाल कृष्ण कुमार यादव कैंसर ग़ज़ल गणेश चतुर्थी गहरा दुःख गाँधी जयंती गिरीश चन्द्र पाण्डेय गीता गुरु गुरु दक्षिणा गुरु पूर्णिमा गुस्सा चंद्रेश कुमार छतलानी चन्द्र प्रभा सूद चन्द्र मौली पाण्डेय चीन चेतन भगत छठ जन्माष्टमी जय कन्हैया लाल की जिनपिंग जी एस टी जैन ज्योतिष झगडे टफ टाइम टीचर टीचर्स डे ठुमरी समाज्ञ्री गिरजा देवी डाॅ.भारती गाँधी डिम्पल गौड़ 'अनन्या ' डिम्पल गौड़ 'अनन्या' डॉ . आशुतोष शुक्ला डॉ .संगीता गाँधी डॉ अब्दुल कलाम डॉ अलका अग्रवाल डॉ जगदीश गाँधी डॉ भारती वर्मा बौड़ाई डॉ मधु त्रिवेदी डॉ रमा द्विवेदी डॉ लक्ष्मी बाजपेयी डॉ संगीता गांधी डॉ. भारती गांधी डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई डॉ.जगदीश गाँधी डॉली अग्रवाल ढिंगली तीज तीन तलाक तृप्ति वर्मा त्यौहार दशहरा दीपावली स्पेशल दीपिका कुमारी दीप्ति दीपेन्द्र कपूर दुर्गा अष्टमी देवशयनी एकादशी देश -दुनिया देश भक्ति की कवितायें धर्म नंदा पाण्डेय नन्हा गुरु नवरात्र नवीन मणि त्रिपाठी नागेश्वरी राव नारी निधि जैन निबंध निशा कुलश्रेष्ठ नीता मेहरोत्रा नीलम गुप्ता नेहा अग्रवाल नेहा नाहटा नेहा बाजपेयी पंकज प्रखर पंखुरी सिन्हा पंडित दीनदयाल उपाध्याय परिचर्चा -१ परिचर्चा -१ कवितायेँ पर्व त्यौहार पारदर्शिता पार्थ शर्मा पूनम डोंगरा पूनम पाठक प्रतिभा पाण्डेय प्रदीप कुमार सिंह ‘पाल’ प्रिंसेस डायना प्रिया मिश्रा प्रेम कवितायेँ प्रेम रंजन अनिमेष प्रेरक कथाएँ प्रेरक प्रसंग प्रेरक विचार फादर्स डे फीलिंग लॉस्ट फुंसियाँ फेसबुक फॉरगिवनेस फ्रेंडशिप डे फ्रेडरिक नीत्से बहादुर शाह जफ़र बाल कहानी बाल जगत बाल दिवस बाल मनो विज्ञान बाल-मन बिल गेट्स बीनू भटनागर बुजुर्ग बेगम अख्तर ब्लू व्हेल ब्लॉगिंग भाई - बहन भाई बहन भाग्य भावना तिवारी भोले बाबा मई दिवस मदर्स डे मम्मी महात्मा गाँधी महान व्यक्तित्व महेंद्र सिंह माँ माँ उषा लाल माँ सरस्वती माता - पिता माता -पिता मानव शरीर माया मृग मित्रता मित्रता दिवस मित्रता दिवस पर विशेष लेख मीना कुमारी मीना पाठक मीना पाण्डेय मुंशी प्रेमचन्द्र . कहानी मुकेश कुमार ऋषि वर्मा मृत्यु मृदुल यकीन रंगनाथ द्विवेदी रक्षा बंधन रचना व्यास रजनी भारद्वाज रमा द्विवेदी रश्मि प्रभा रश्मि बंसल रश्मि सिन्हा राजा सिंह राधा कृष्ण "अमितेन्द्र " राधा क्षत्रिय राधा शर्मा रितु गुलाटी रिया स्पीक्स रिश्ते रिश्ते -नाते रूचि भल्ला रूपलाल बेदिया रेप रोचिका शर्मा लघु कथाएँ लता मंगेशकर लली लेख लेबर डे वंदना गुप्ता वंदना बाजपेयी वसंत पंचमी विजयारतनम विनीता शुक्ला विनोद खनगवाल विभा रानी श्रीवास्तव विशेष दिवस विश्व हास्य दिवस विश्वजीत 'सपन ' वीणा वत्सल वीरू सोनकर वृद्धजन विमर्श वैलेंटाइन डे व्यंग शरद पूर्णिमा शशि बंसल शशि श्रीवास्तव शांति पुरोहित शान्ति पाल शान्ति पुरोहित नोखा शायरी शिक्षक दिवस शिखा सिंह शिव शिवलिंग शिवा पुत्र शिवानी कोहली शिवानी जैन शर्मा श्राद्ध पक्ष श्रीमती एम डी त्रिपाठी संगम वर्मा संगीता पाण्डेय संगीता सिंह "भावना " संजना तिवारी संजय कुमार अविनाश संजय कुमार गिरि संजय वर्मा संजय वर्मा "दृष्टी " संजीत शुक्ला संध्या तिवारी संवेदनशीलता संस्मरण सकारात्मक चिंतन सक्सेस स्टोरीज सतीश राठी सत्या शर्मा 'कीर्ति ' सद्विचार सन्यास सपना मांगलिक सफलता समीक्षा सरबानी सेनगुप्ता सराह सरिता जैन सविता मिश्रा साक्षात्कार साधना सिंह सामाजिक लेख सावन का पहला सोमवार साहित्यिक लेख सीताराम गुप्ता सीमा सिंह सुधीर द्विवेदी सुनीता त्यागी सुमित्रा गुप्ता सुशांत सुप्रिय सुशील यादव सूर्य सूर्योदय सेल्फ केयर स्ट्रेस ईटिंग डिसऑर्डर स्त्री देह और बाजारवाद स्त्री विमर्श स्मिता दात्ये स्मिता शुक्ला स्वतंत्रता दिवस स्वामी विवेकानंद स्वास्थ्य जगत स्वेता मिश्रा हलचल आस -पास हलचल आसपास हामिद हास्य योग हिंदी दिवस हेडी लेमार हेल्थ होली की ठिठोली aforestation agla kadam astrology atoot bandhan atoot bandhan cover page atoot bandhan editorial cancer children issues clingy behaviour deepawali special E.book family and relationship issues father's day fb feeling lost friendship day general article GST guru health hindi divas hindi poetry hindi stories hindi story id immortal personalities interview janmashtami karvachauth literary articles memoirs mother's day motivational quotes motivational stories nanha guru positive thinking pragnency raksha bandhan rape religion riviews Riya speaks sarahah app satire senior citizen issues short stories social articles spiritual articles stress eating sucesses sucesses stories swantantrta divas valentine day vandana bajpai women issues
false
ltr
item
अटूट बंधन : कैसे रिश्तों में डालें नयी जान
कैसे रिश्तों में डालें नयी जान
हम सब रिश्तों को सहेजना चाहते हैं पर पहल नहीं करना चाहते | अपने रिश्तों में नयी जान डालने के लिए दूसरों से ज्यादा अपना व्यवहार समझना होगा
https://4.bp.blogspot.com/-bjcN0PO0HC4/WgG1wFU14YI/AAAAAAAAHmI/zpaX1peI4aMDG6fm0NMR6MdW0Ka84_KFQCLcBGAs/s320/indian-1119233_960_720.jpg
https://4.bp.blogspot.com/-bjcN0PO0HC4/WgG1wFU14YI/AAAAAAAAHmI/zpaX1peI4aMDG6fm0NMR6MdW0Ka84_KFQCLcBGAs/s72-c/indian-1119233_960_720.jpg
अटूट बंधन
http://www.atootbandhann.com/2017/11/rishton-mein-nayi-jaan-hindi-article.html
http://www.atootbandhann.com/
http://www.atootbandhann.com/
http://www.atootbandhann.com/2017/11/rishton-mein-nayi-jaan-hindi-article.html
true
1089704805750007414
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy