समय वेग से आगे बढ़ रहा है और हम सब इसको पकड़ने की नाकाम कोशिश में लगे रहते हैं

गीत-वेग से बह रहा समय

वेग से बह रहा समय,
उम्र कटती जा रही है ।
विरह की बह रही नदी,
सब्र घटता जा रहा है ।

अब नहीं अंतर्मन से ,
लोगों की मिलती दुआ ।
हृदय का रस सूख कर,
स्नेह  मुरझाया  हुआ ।
क्या कहें  शूल से हीं ,
राह  पटता  जा रहा है ।
वेग से बढ ........

हैं जागें हम कि सोए 
हमको पता चलता नहीं ।
मौन उर भावों को भी, 
कोई अब पढता नहीं ।
इस मोहिनी संसार से , 
मन हटता जा रहा है ।
वेग से बढ ........

कोष खाली सपनों के, 
नींद कोषों दूरी पर ।
स्वर निकलते रूदन के ,
बहुत ही मजबूरी पर ।
कृष्ण पक्षी  चाँद तरह
तन सिमटा जा रहा है ।
वेग से बढ ......



प्रमिला श्री तिवारी

कवियत्री एवं गीतकार

पढ़िए अपनी मनपसंद कवितायेँ 



आपको आपको  कविता  "गीत-वेग से बह रहा समय" कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें 
Share To:

atoot bandhan

Post A Comment:

0 comments so far,add yours