मशहूर शायर ग़ालिब की शायरी का कौन दीवाना नहीं है | पेश है उनके जीवन के कई अनछुए पहलू

कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़ ए बयां और ...


जब – जब उर्दू शायरी की बात होगी तो ग़ालिब का जिक्र न हो ऐसा हो ही नहीं सकता | जिसको  दूर – दूर तक शायरी में रूचि न हो उससे भी अगर किसी शायर का नाम पूंछा जाए तो वो नाम ग़ालिब का ही होगा | अगर उन्हें शायरी का शहंशाह  कहा जाये तो अतिश्योक्ति न होगी | दरसल ग़ालिब की शायरी महज शब्दों की जादूगरी नहीं थी उसमें उनके जज्बात की मिठास ऐसे ही घुली  थी जैसे पानी में शक्कर ... जो पीने वालों को एक सुकून नुमा अहसास कराती है | हालांकि ग़ालिब की जिंदगी बहुत दर्द में गुज़री , ये दर्द उनके जज्बातों में घुलता – मिलता उनकी शायरी  में पहुँच गया |

ग़ालिब बुरा न मान जो वैज बुरा कहे 
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे 

 मिर्जा ग़ालिब की जीवनी /Biography of Mirza Ghalib

अपनी शायरी से लोगों के दिलों में राज करने वाले ग़ालिब का असली नाम मिर्जा असद उल्ला बेग खान था | जो उर्दू और फ़ारसी में शायरी करते थे | वो अंतिम भारतीय शासक बहादुर शाह जफ़र के दरबारी कवि थे | उनके मासूम दिल ने उस समय का ग़दर व् मुग़ल काल का पतन अपनी आँखों से देखा था | एक संवेदनशील शायर का ह्रदय उस समय के यथार्थ , प्रेम और दर्शन का मिला जुला रूप  में बिखरने लगा | हालांकि उस समय उन्हें कल्पना वादी बता कर उनकी शायरी का बहुत विरोध हुआ |इतने विरोधों के बाद भी उनकी ग़ालिब की शायरी आज भी शायरी क शौकीनों  की पहली पसंद बनी हुई है तो कुछ तो खास होगा ग़ालिब में |

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे 
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए-बयां और .. 

ग़ालिब का आरंभिक जीवन


मिर्जा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 179७ को आगरा में हुआ था | ग़ालिब मूलत : तुर्क थे | उनके दादा मिर्जा कोबान बेग खान समरकंद के रहने वाले थे जो अहमद शाह के शाशन काल में भारत आये थे | हालाँकि मात्रभाषा तुर्की होने के कारण अपने आरम्भिक प्रवास के दौरान उन्हें बड़ी दिक्कते आई | क्योंकि वो हिन्दुस्तानी के कुछ टूटे फूटे शब्द ही बोल पाते थे | कुछ दिन लाहौर रहने के बाद वो दिल्ली चले आये | उनके चार बेटे व् तीन बेटियाँ थी |उनके बेटे अब्दुल्ला बेग ग़ालिब के वालिद थे | उनकी माँ इज्ज़त –उत –निशा –बेगम कश्मीरी मुल्क की थी | जब ग़ालिब मात्र पांच साल के थे तभी उनका इंतकाल हो गया | कुछ समय बाद ग़ालिब के एक चाचा का भी इंतकाल हो गया | उनका जेवण अपने चाचा की पेंशन पर निर्भर था |


ग़ालिब जब मात्र 11 साल के थे तब उन्होंने शायरी लिखना शुरू कर दिया | उनकी आरम्भिक शिक्षा उनकी शिक्षित माँ द्वारा घर पर ही हुई | बाद में उन्होंने जो कुछ सीखा सब स्वध्याय व् संगति का असर था | कहने की जरूरत नहीं की ग़ालिब के सीखने की ललक व् काबिलियत इतनी ज्यादा थी की वो फ़ारसी भी यूँ ही सीख गए | ईश्वर के रहमो करम से वो जिस मुहल्ले में रहे वहां कई शायर रहते थे | जिनसे उन्होंने शायरी की बारीकियां सीखीं |

हमको मालूम  है जन्नत की हकीकत लेकिन 
दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है 

मात्र १३ साल की उम्र में उन्होंने उमराव बेगम से निकाह कर लिया | बाद में वो उनके साथ दिल्ली आ कर बस गए | यहीं उनके साथ उनका छोटा भाई भी रहता था | जो दिमागी रूप से अस्वस्थ था | सन १८५० में ग़ालिब अंतिम मुग़ल शासक  बहादुर शाह जफ़र के दरबार में उन्हें शायरी सिखाने  जाने लगे | बहादुर शाह जफ़र को भी शायरी का बहुत शौक था | उन्हें ग़ालिब की शायरी बहुत पसंद आई | इसलिए वो वहां दरबारी कवि बन गए | शायरी  की दृष्टि से वो एक बहुत ही अच्छा समय था |आये दिन महफिलें सजती और शेरो शायरी का दौर चलता | ग़ालिब को दरबार मे बहुत सम्मान हासिल था | उनकी ख्याति दूर दूर तक पहंचने लगी | इसी समय उन्हें दो शाही सम्मान “ दबीर उल मुल्क “ और नज़्म उद  दौला” का खिताब मिला | 


पर समय पलटा  ग़ालिब के भाई व् उनकी सातों संतानों की मृत्यु हो गयी | बहादुर शाह के शासन का अंत और उन्हें मिलने वाली पेंशन भी बंद हो गयी |


थी खबर गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्जे 
देखने हम भी गए पर तमाशा न हुआ 


ग़ालिब का व्यक्तित्व


 अपनी शायरी की सुन्दरता की तरह ही ग़ालिब एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थी | ईरानी होने के कारण बेहद गोरा रंग , लम्बा कद , इकहरा  बदन व् सुडौल नाक उनके व्यक्तिव में चार – चाँद लगाती थी | ग़ालिब की ननिहाल बहुत सम्पन्न थी | वो खुद को बड़ा रईसजादा  ही समझते थे | इसलिए अपने कपड़ों पर बहुत ध्यान देते थे |कलफ लगा हुआ चूड़ीदार पैजामा व् कुरता उनकी प्रिय पोशाक थी | उस पर सदरी व् काली टोपी उन पर खूब फबती  थी |ग़ालिब हमेशा कर्ज में डूबे  रहे पर उन्होंने अपनी शानो शौकत में कोई कमी नहीं आने दी |जब घर से बाहर जाते तो कीमती लबादा पहनना नहीं भूलते |

मुहब्बत में नहीं है फर्क जीने और मरने का 
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले 

ग़ालिब का रचना संसार


ग़ालिब ने गद्य लेखन की नीव रखी इस कारण उन्हें वर्तमान  उर्दू गद्य का जनक  का सम्मान भी दिया जाता है | इनकी रचनाएँ “लतायफे गैबी”, दुरपशे कावयानी ”, “नाम ए  ग़ालिब” , मेह्नीम आदि गद्य में हैं | दस्तंब में उन्होंने १८५७ की घटनाओं का आँखों देखा विवरण लिखा है | ये गद्य फारसी में है | गद्य में उनकी भाषा सदा सरल और सुगम्य रही है |

तोडा उसने कुछ ऐसे ऐडा से ताल्लुक ग़ालिब 
कि सारी  उम्र हम अपना कसूर ढूंढते रहे 

 “कुलियातमें उनकी फ़ारसी कविताओं का संग्रह है |उनकी निम्न  लोकप्रिय किताबें  हैं ..
उर्दू ए  हिंदी
उर्दू ए मुअल्ला
नाम ए ग़ालिब
लतायफे गैबी”,
दुरपशे कावयानी
                      इसमें उनकी कलम से देश की तत्कालीन , सामजिक , राजनैतिक और आर्थिक स्थिति का वर्णन हुआ है | उनकी शायरी संग्रह दीवान ए ग़ालिब के रूप में दस भागों  में प्रकाशित हुआ है | जिसका अनेक भाषाओँ में अनुवाद हुआ है |

ग़ालिब के अंतिम दिन व् मृत्यु
                               ग़ालिब का अंतिम समय अच्छा नहीं बीता | उनके सातों बच्चे अल्लाह को प्यारे हो गए |एक संतान को गोद के बच्चे की तरह पाला उसका भी इंतकाल हो गया |वो अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं थे |उनके जीवन  में प्रेम का आभाव था |

इश्क ने ग़ालिब निक्कमा कर दिया 
वर्ना हम भी आदमी थे काम के 

प्रेम की कमी के  कारण वे मानसिक रूप से परेशान रहते थे | इसी कारण किशोरावस्था में  ही उन्हें शराब की लत लग गयी | जो जिंदगी की मुसीबतों के साथ बढती गयी | जिस ग़ालिब को बहादुर शाह के दरबार में इतना सम्मान प्राप्त था उसे अंग्रेजों ने पूंछा भी नहीं | यहाँ तक की उनकी पेंशन  भी बंद करवा दी | अंतिम दिन बहुत बदहाली में बीते | शरीर कमजोर और खोंखला होता गया | १५ फरवरी 1869 को उनकी मृत्य हो गयी | लेकिन अपने चाहने वालों के दिलों में वो आज भी जिन्दा हैं और हमेशा रहेंगे |

चंद  तसवीरें ए बुता , चंद  हसीनों के खतूत 
बाद मरने के मेरे घर से ये सामन निकला 

 अनूप शुक्ला 

लेखक


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