भारतीय संस्कृति में पति का नाम लेना वर्जित है | पति का नाम न ले पाने की विवशता में फंसी एक नयी नवेली दुल्हन का रोमांचक किस्सा

                                       
तुम्हारे पति का नाम क्या  है  ?




   आज सुबह सुबह श्रीमती जुनेजा से मुलाक़ात हो गयी | थोड़ी – थोड़ी देर में कहती जा रही थीं | रमेश की ये बात रमेश की वो बात | दरसल रमेश उनके पति हैं | वैसे भी आजकल पत्नियों द्वारा  पति का नाम लेना बहुत आम बात है | और क्यों न लें अब पति स्वामी नहीं बेस्ट फ्रेंड जो है | लेकिन श्रीमती जुनेजा जी ने मुझे अपनी प्यारी रिश्ते की भाभी जी का किस्सा याद याद दिला दिया | उनकी तकलीफ का महिलाएं आसानी से अनुमान लगा सकती हैं | ये उस समय की बात है जब पत्नियों द्वारा पति का नाम लेना सिर्फ गलत ही नहीं अशुभ मानते थे | तो भाभी  की कहानी उन्हीं की जुबानी ...

क्या – क्या न सहे सितम ... पति के नाम की खातिर 


 भारतीय संस्कृति में पत्नियों  द्वारा पति का नाम लेना वर्जित है।मान्यता है नाम लेने से पति की आयु घटती है। ,अब कौन पत्नी इतना बड़ा जोखिम लेना चाहेगी ?इसलिए  ज्यादातर पत्नियाँ पति  का नाम पूछे जाने पर बच्चों को आगे कर देती हैं "बेटा  बताओं तुम्हारे पापा का नाम क्या है ?"या आस -पास खड़े किसी व्यक्ति की तरफ बहुत  याचक दृष्टि से देखती हैं, वैसे ही जैसे गज़ ,ग्राह  के शिकंजे में आने पर श्री हरी विष्णु की तरफ देखता है "अब तो तार लियो नाथ ".  इस लाचारी को देखते हुए कभी -कभी इनीसिअल्स से काम चलाने के अनुमति धर्म संविधान में दी गयी है। परंतु जरा सोचिये .. आप नयी -नयी बहू हो ,सर पर लम्बा सा घूंघट हो , और आपके साथ मीलों दूर -दूर तक कोई न हो ,ऐसे में परिवार का कोई बुजुर्ग आपसे ,आपके पति का नाम पूँछ दे तो क्या दुर्गति या सद्गति होती हैं इसका अंदाज़ा हमारी बहने आसानी से लगा सकती हैं।  आज हम अपने साथ हुए ऐसे ही हादसे को साझा करने जा रहे है।

जब मुझसे पति का नाम पूंछा गया
 

                                                       जाहिर है बात तब की जब हमारी नयी -नयी शादी हुई थी।  हमारे यहाँ लडकियाँ मायके में किसी के पैर नहीं छूती ,पैर छूने का सिलसिला शादी के बाद ही शुरू होता है। नया -नया जोश था , लगता था दौड़ -दौड़ कर सबके पैर छू  ले कितना मजा आता था जब आशीर्वाद मिलता था।  लड़कपन में में तो नमस्ते  के जवाब में हाँ, हाँ नमस्ते ही मिलता था।  हमारी भाभी ने शादी से पहले हमें बहुत सारी  जरूरी हिदायतें दी बहुत कुछ समझाया पर ये बात नहीं समझायी की पारिवारिक समारोह में किसी बुजुर्ग के पैर छूने अकेले मत जाना।अब इसे भाभी की गलती कहें या हमारी किस्मतशादी के बाद हम एक पारिवारिक समारोह में पति के गाँव गए, तो हमने घर के बाहर चबूतरे पर बैठे एक बुजुर्ग के पाँव छू  लिए। पाँव छूते ही उन्होंने पहला प्रश्न दागा  "किसकी दुल्हन हो "? जाहिर सी बात है गर्दन तक घूँघट होने के कारण वो हमारा चेहरा तो देख नहीं सकते थे |हम  पति का नाम तो ले नहीं सकते और हमारी सहायता करने के लिए मीलों दूर -दूर तक खेत -खलिहानों और उस पर बोलते कौवों के अलावा कोई नहीं था ,लिहाज़ा हमारे पास एक ही रास्ता था की वो नाम ले और हम सर हिला कर हाँ या ना में जवाब दे। उन्होंने पूछना शुरू किया .............
                           पप्पू की दुल्हन हो ?हमने ना में सर हिला दिया।                          गुड्डू की ?
                          बंटू की ?
                         बबलू की ?
                                        मैं ना में गर्दन हिलाती जा रही थी ,और सोच रही थी की वो जल्दी से मेरे पति का नाम ले और मैं चलती बनू। पर उस दिन सारे ग्रह -नक्षत्र मेरे खिलाफ थे। वो नाम लेते जा रहे थे मैं ना कहती जा रही थी , घडी की सुइयां आगे बढ़ती जा रही थी ,मैं पूरी तरह शिकंजे में फसी  मन ही मन  पति पर बड़बड़ा रही थी "क्या जरूरत थी इतना ख़ास नाम रखने की ,पहला वाला क्या बुरा था ?  पर वो बुजुर्ग भी हार मानने को तैयार नहीं थे| उनकी यह जानने की अदम्य इक्षा  थी की उनके सामने खड़ी जिस निरीह अबला नारी ने अकेले में उनके पैर छूने का दुस्साहस किया है वो आखिर है किसकी दुल्हन ?असली घी खाए वो पूजनीय एक के बाद एक गलत नामों की सूची बोले जा रहे थे और मैं ना में गर्दन हिलाये जा रही थी।

पति के नाम के अतरिक्त ले डाले सारे नाम 


                                                 धीरे -धीरे स्तिथि यह हो गयी की उन्होंने मेरे पति के अतिरिक्त अखिल ब्रह्माण्ड के सारे पुरुषों के नाम उच्चारित कर दिए। जून का महीना ,दोपहर का समय ,भारी कामदार साड़ी सर पर लंबा घूँघट ,ढेर सारे जेवर पहने होने की वजह से मुझे चक्कर आने लगे। अब मैंने मन ही मन दुर्गा कवच का पाठ शुरू कर दिया "हे माँ ! अब आप ही कुछ कर सकती हैं ,त्राहि मांम ,त्राहि माम ,रक्षि माम रक्षि माम।

                                                            और  अंत में जब माँ जगदम्बा की कृपा से उन्हें मेरे पति का नाम याद आया तो मेरी गर्दन इतनी अकड़ गयी थी  की न हाँ में हिल सकती थी ना ,ना में ………
                                                     





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Atoot bandhan

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9 comments so far,Add yours

  1. बहुत खूबसूरत वाक्या... मजा आ गया और अपनी पुरानी यादें ताज़ा हो गई

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  2. Replies
    1. धन्यवाद प्रीती जी

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  3. बहुत बढ़िया

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  4. आदरनीय वंदना जी बहुत ही भावपूर्ण विषय चुना आपने -- बहुत रोचक लगा सारा लेख पढ़कर | गाँव में मैंने ऐसी बहुत सी बातें देखि और सुनी थी | अब ये वर्जनाएं खंडित हो रही है | किसी हद तक गलत होते हुए भी कितनी रोचक होती थी ये परम्पराएँ !!!!!!!!! सादर --

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  5. सभी मित्रों का हार्दिक धन्यवाद

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