बड़े कठिन होते हैं ये इंतज़ार के लम्हे | पर उस खामोशी में भी एक आवाज़ छुपी रहती है | कभी सुन के देखो |

 ये इन्तज़ार के लम्हें


अनजान बेचैनियों में लिपटे,  
मेरे ये इन्तज़ार के लम्हें 
तुम्हें आवाज़ देना चाहते हैं..  
पर मेरा मन सहम जाता है ।
तुम जानते हो क्यों?  
फिर सवाल...  
तुम हंस पड़ोगे ,
या तुम्हारे पास कोई लम्बी सी दलील होगी ,
लाज़मी है ... 
और तब भी मेरे लब खामोश ही होंगे ,
जबकि मेरे अंदर 
कितने सारे तुफान बांध तोड़ने पर आमादा है। 
मन का ना जाने कौन सा अनछुआ कोना 
बगावती हो रहा है...  मेरे ही खिलाफ़ .. 
जो भर लेना चाहते है सांसो मे इस लम्हें की खुश्बू 
भींग जाना चाहता है उठ रहे एहसासों के ओस में 
और खिलना चाहता है,  खिलखिलाना चाहता है 
तुम मत सुनना ये शोर 
क्योंकि मै जानती हूँ 
तुम अब भी हसोंगे या ... 
या तुम्हारे पास होगी वही लम्बी दलील ||

_________ साधना सिंह 
              गोरखपुर 

लेखिका






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atoot bandhan

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2 comments so far,Add yours

  1. बहुत खूब ... अनेक बिम्ब सजाएँ है इस गहरे एहसास में ...
    लाजवाब ...

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