January 2018
                                     
पापा की वो डांट या  जिन्दगी की परीक्षा में पास होने का मंत्र

जीवन में जो सबसे कीमती चीज हमें माता -पिता देते हैं वो है जीवन मूल्य | आज अपने पिता की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए एक ऐसी ही घटना   दिमाग में बार - बार घूम रही है , जिसे मैं आप सबके साथ शेयर करना चाहती हूँ |



उन दिनों गाँव से शहर आ कर बसे परिवार गाँव तो छोड़ आये थे पर अन्धविश्वास अपने साथ लेकर आये थे | आखिरी रोटी बड़ी होनी चाहिए उससे परिवार बढ़ता है , रात को सिल और बटना पास - पास नहीं रखना चाहिए नहीं तो लड़के दूर रहते हैं , घर से निकलते समय टोंकते नहीं हैं या दूध , हल्दी आदि का नाम नहीं लेते हैं और भी न जाने क्या -क्या ? पर उन सब लोगों के विपरीत पापा जो खुद गाँव से आकर बसे थे , इन सारे  अंधविश्वासों के खिलाफ थे और उन्होंने हमें बचपन इन बातों  को पता भी नहीं चलने दिया | जाहिर सी बात है हम इन सब से दूर थे | हालांकि बड़े होने पर मुझे पता चला कि अंधविश्वास  केवल वही नहीं होते जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं कई बार हम अपने कुछ नए अन्धविश्वास स्वयं गढ़ लेते हैं | अपनी जीवन में घटने वाली घटनाओं के कारण शुभ -अशुभ  अच्छा बुरा का हमारा एक निजी घेरा भी न चाहते हुए बनने  लगता है, हम जिसकी कैद में आने लगते हैं | इससे निकलने के लिए आत्मबल की जरूरत होती है |

जब पापा की डांट बनी   जिन्दगी की परीक्षा में पास होने का मंत्र 


                                             बात उन दिनों की है जब मैं B.Sc पार्ट वन में पढ़ती थी |  हमारे एग्जाम चल रहे थे | उस दिन केमिस्ट्री का फर्स्ट पेपर था|  जब मैं कॉलेज पहुंची तो सब सहेलियाँ पढने में लगी थी , मैं भी अपनी किताब खोल कर पढने लगी| तभी मेरी एक सहेली स्वाति  आई | ( आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि स्वाति हमारे कलास  की वो लड़की थी जो सबके हाथ देख कर भविष्य बताती थी , कुंडली देखने का भी उसको ज्ञान था और सिक्का खिसका कर भूतों से बात करने का भी, स्वाति लड़कियों से घिरी रहती, मेरी उससे कोई खास दोस्ती नहीं थी , फिर भी हम क्लास मेट थे तो बात तो होती ही थी ) स्वाति मेरे पास आ कर  मुझसे बोली ,  " यार , वंदना आज का तुम्हारा पेपर बहुत अच्छा होगा|  इससे पहले की मैं कुछ कह पाती , सभी सहेलियां कहने लगीं हाँ, इसने बहुत पढाई की है |  स्वाति बोली , पढाई तो की ही होगी, पर आज इसने जो येलो कलर का सूट पहना है वो इसके लिए बहुत लकी है | मैंने आश्चर्य से उसकी तरह देखा | उसने मुस्करा कर अपनी बात सिद्ध करते हुए कहा ,

" देखो तूने ये सूट साइंस क्विज में पहना था , तो हमारे कॉलेज को फर्स्ट प्राइज़  मिला |
फिर तुमने केमिस्ट्री प्रैक्टिकल में ये सूट पहना था , क्या वायवा गया था तुम्हारा |
और तब भी जब हम सब लोग क्लास में शोर मचा रहे थे तो दिव्या मैम की डांट तुम्हें छोड़ कर हम सब को पड़ी , मानो न मानो तुम्हें दिव्या मैम की  डांट से इस सूट ने बचाया |"


                            मैं उसकी बात पर हँस कर बोली , " क्या फ़ालतू सोंचती रहती है , इतने ध्यान से सबके सूट मत देखा करो |" | उस दिन का मेरा पेपर बहुत अच्छा गया | कॉलेज से निकलते समय स्वाति बोली , " देखा मैंने कहा था ना '|  अन्धविश्वास का एक बीज उसने मेरे मन की माटी  में रोप दिया था|


                         अगले पेपर  ओरगेनिक केमिस्ट्री का था | तीन दिन का गैप था|  मैंने अच्छी तैयारी  की थी | पर पता नहीं क्यों कुछ कमी से लग  रही थी | लग रहा था कि पेपर देखते ही बेंजीन रिंग्स आपस में रिंगा-रिंगा रोजेज खेलते हुए मिक्स न हो जाएँ | खैर मैं पेपर देने जाने के लिए तैयार होने लगी | कपड़ों की अलमारी खोलते ही वो पीला सूट दिख गया | एक ख्याल आया ट्राई करने में हर्ज ही क्या है , चलो इसे ही पहन लेते हैं | इस बार जानबूझ कर पीला सूट पहना | स्वाति द्वारा रोप गए बीज में अंकुर फूटने लगे थे |

                  अपनी आदत के अनुसार पापा मुझे एग्जाम के दिनों में खुद कॉलेज छोड़ने जाते थे |  उन्होंने गाडी निकाल ली थी , मैं जा कर बैठ गयी | पापा ने गाडी स्टार्ट की और हमेशा की तरह मेरी प्रेपरेशन के बारे में बात करने लगे | बातों  ही बातों में मैंने उन्हें कह दिया ,  " पापा आप जानते हैं आज मैंने वही सूट पहना है जो फर्स्ट पेपर में पहना था , वो अच्छा गया , तो ये भी अच्छा ही जाएगा |"

                           इतना सुनते ही पापा ने गाडी में ब्रेक लागाया और बैक कर घर की ओर जाने लगे | पापा का कठोर  चेहरा देख कर मेरी उनसे पूंछने की हिम्मत नहीं पड़ी | मुझे लगा पापा शायद गाडी के पेपर घर में भूल आये हैं | मन ही मन बुदबुदा रही थी , 'ओह पापा , एग्जाम में ही आपको गाडी के पेपर भूलने थे ?"


      घर आकर पापा ने गाडी रोक दी | फिर बहुत गंभीर आवाज़ में मुझसे कहा , " जाओ सूट बदल के आओ "|पापा की आवाज़ इतनी सख्त थी कि मेरी उनसे प्रश्न करने की हिम्मत ही नहीं हुई | मैं चुपचाप घर के अंदर  जा कर सूट बदल कर आ गयी | पापा ने मुझे कॉलेज छोड़ दिया और "आल दी बेस्ट" कहते हुए वापस चले गए |


                                 मेरा मूड बहुत खराब था , पापा को एग्जाम के दिन ऐसा नहीं करना चाहिए था | अरे एक दिन वही सूट पहन लेती तो क्या हर्ज था | खैर मैंने अपने मन को संयत किया |

 उस दिन का मेरा पेपर पहले वाले पेपर से भी ज्यादा अच्छा हुआ | आशा के विपरीत उस दिन पापा मुझे लेने भी आये | पेपर अच्छा होने के कारण मेरा मन खुश था , पर पापा को देखते ही मुझे सुबह की बात याद आ गयी | थोड़ी नाराजगी में मैं गाडी में बैठ गयी | पापा ने ही बात करना शुरू किया | मेरा पेपर  अच्छा हुआ है ये जानकार वो बहुत खुश हुए | उन्होंने कहा कि मुझे पता था , तुमने बहुत मेहनत  की है  तुम्हारा पेपर अच्छा होगा | इसीलिये मैंने तुमसे सूट बदलने को कहा था | ताकि अन्धविश्वास  का ये पौधा जड़ न  पकड़े |  इसको जितना जल्दी हो काट देना चाहिए | हमेशा अपनी मेहनत  पर भरोसा हो , किसी लकी चार्म पर नहीं |

लेकिन पापा मेरा मूड खराब होने से अगर मेरा पेपर बिगड़ जाता तो ?मैं फेल हो जाती तो ? मैंने तर्क करते हुए कहा |

" अगर तुम इस एग्जाम में फेल भी हो जाती तो जिंदगी के एग्जाम में फेल होने से बच जाती |" पापा ने द्रणता पूर्वक कहा |


                      पापा की बात से मैं निरुत्तर हो गयी | उसके बाद से  सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत पर भरोसा किया | पापा की दी हुई ये सीख आज भी मेरे जीवन की अमूल्य निधि है |  अपने या अपने परिवार के किसी हित पर जब मन कमजोर पड़  कर किसी लकी चार्म की ओर की और खिंचता है तो मुझे यही बात याद आ जाती है |


          और मैं जिंदगी के परीक्षा में पास हो जाती हूँ |

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अपने गुस्से को काबू में कैसे करें ?

सुबह अलार्म की घडी टाइम पर नहीं बजी ...अपने ऊपर गुस्सा आ रहा है |
  बच्चे ने पराठे खाने से साफ इनकार कर के सैंडविच खाने की फरमाइश कर दी ... बच्चे पर गुस्सा आ रहा है |
इतनी भाग -दौड़ के बाद भी बस लेट आई ... बस ड्राइवर पर गुस्सा आ रहा है |
                                                                    क्या आप कभी गिनते हैं कि सुबह सात  बजे से सुबह नौ बजे तक आप कितनी बार गुस्सा कर लेते हैं | इसी गति से दिन भर में कितनी बार गुस्सा कर लेते हैं या मात्र " मूड ऑफ " कह कर अपनों का कितना मूड ऑफ कर देते हैं| गुस्सा कैसा भी हो किसी पर भी हो उसका प्रभाव तन , मन और जीवन पर नकारात्मक ही पड़ता है| विज्ञान कहता है कि हम दिन भर काम करने में उतना नहीं थकते जितना एक घंटे गुस्सा करने में थक जाते हैं | गुस्सा बहुत ही स्वाभाविक है ये मान कर हम गुस्सा करते जाते हैं ...तब तक जब तक स्ट्रेस दिल , दिमाग को अपनी गिरफ्त में नहीं ले लेता| अगर आप चाहते हैं कि गुस्से को अपने ऊपर हावी न होने दें तो आपको गुस्से पर काबू करना सीखना होगा |

How to control your anger(in Hindi)


                                       अगर आप भी अपने गुस्से से परेशान  हो चुके हैं तो जरूर ही आप उसे अपने काबू में रखना चाहते होंगें | आइये हम आपको बताते हैं कि गुस्से पर कैसे काबू रखे| ये बहुत ही आसान है क्यों कि   आपको गुस्से को control में रखने के लिए थिंकिंग पर ध्यान देना है | जानिये कैसे -

अपनी इमोशनल चाभी अपने हाथ में रखे


                                              फलाने की हिम्मत कैसे हुई कि ऐसा कहे , ढिकाने ने मुझे देख कर आखिर मुँह क्यों फेर लिया , इसने, उसने  ने आखिर क्या समझ कर .... अकसर हमें गुस्सा इस बात पर आता है कि लोग हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ? यहाँ पर  हमारे स्ट्रेस में आने या गुस्सा करने का सीधा सा अर्थ है कि हमने अपने इमोशन की चाभी अगले को पकड़ा दी है | अब अगर किसी को पता चल जाए कि वो बस इतना सा कह कर या जरा सा मुंह बना कर आपका दिन बिगाड़ सकता है तो कोई क्यों न फायदा उठाये | बेहतर है की आप अपने इमोशन की चाभी अपने ही पास रखें |

                                    एक बहु और सास की कहानी याद आ रही है | एक बहु  अपनी सास को कुछ कहती नहीं थी बस उसके पानी मांगने या कोई काम कहने पर मुंह चिढ़ा देती थी , यह देख कर सास का गुस्सा सातवे आसमान पर चढ़ जाता और फिर वो बहु को अनाप शनाप जाने क्या -क्या बोलती रहती | बाहर से लोग केवल सास की आवाज़ सुनते बहु की नहीं | उन्हें लगता सास बुरी है जो गाय जैसी बहु पर गुस्सा करती हैं | यहाँ बहु जान गयी थी कि सास उसके मुंह बनाने पर चीखेगी-चिल्लाएगी | सास ने अपने गुस्से की चाबी बहु को दे दी थी | अगर लोगों को पता चल जाए कि हमें किस बात पर गुस्सा आता है तो वो दस बार हमें गुस्सा दिला सकते हैं | इसलिए कोई दूसरे को ये अधिकार मत दीजिये की वो आपको गुस्सा दिला सके |

दूसरों को दें बेनिफिट ऑफ़ डाउट


                               कई बार कोई व्यक्ति हमें  ऐसी बात कह जाता है जो हमें बहुत बुरी लग जाती है | उस बात पर हमें बहुत गुस्सा आता है | लेकिन जब आप आराम से सोंचतें  है तो देखते हैं की उस व्यक्ति का वो कहने का इरादा नहीं था | या जो हमने समझा , वो उस आशय के शब्द उसने कहे ही नहीं थे |

उदाहरण के लिए मीता की बेटी के १२ th में 70 % मार्क्स आये थे | दरसल वो कोचिंग और  स्कूल को संभाल  नहीं पा रहीथी | उसने कोचिंग पर ज्यादा ध्यान दिया और १२ th में प्रतिशत बिगड़ गया | मीता  ने उस समय उसका साथ दिया |बेटी ने अपनी पढाई जारी रखी और कॉलेज  में उसने बेहतर किया|  मीता की कोशिश यही रहती थी कि वो अपनी बेटी का आत्मविश्वास टूटने न दे |
समय आगे बढ़ा | मीता की छोटी बेटी 12 th में आ गयी | मीता उसे पढाई का महत्व समझा रही थी|  बीच में बेटी ने पूँछ दिया ," मम्मी आपके 12th में कितने नमबर आये थे| मीता ने कहा , "71% , फिर रुक कर बोली , तुम ज्यादा मेहनत करो , हमारे जमाने में 71 % बहुत होशियार बच्चों के आते थे , पर आज तो जो 71 -72 % लेकर आता है उसे मूर्ख हो कहते हैं | तभी दूसरे कमरे से बड़ी बेटी की आवाज़ आई ,"thank you" मम्मी , इतना कह कर उसने गेट बंद कर लिया| मीता का इरादा बड़ी बेटी को कमतर कहने का नहीं था , बस वो बात करते समय उसका वाकया  भूल गयी | परन्तु बड़ी बेटी बहुत दिन तक उससे नाराज़ रही , उसे लगा मम्मी ने उसे मूर्ख कहा है |

                            ऐसी बहुत सारी परिस्थितियाँ जिंदगी में आती हैं और हम  लम्बे समय तक गुस्सा पाले रहते हैं | जबकि बाद में बात साफ़ होने पर पता चलता है कि कहने वाले का वो आशय ही नहीं था जो हमने समझा |
कई बार तो ये गुस्सा जिंदगी भर पला रहता है | इसलिए बेहतर है कि बात बुरी लगने पर दूसरे को बेनिफिट ऑफ़ डाउट दें और बात को भूल जाएँ |


सोंच -समझ कर प्रतिक्रिया दें -


                                 एक पुरानी  कहावत है कि जब गुस्सा आये तो कुछ भी बोलने  से पहले धीमे -धीमे १० तक गिनें | ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि गुस्से में कुछ भी बोल देने से बात बिगड़ने का डर रहता है | दस तक गिनने में दिमाग को कुछ सोंचने समझने का मौका मिलता है | जिस कारण तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देता | अब यहाँ एक बात ख़ास है जो लोग तुरंत कुछ कह देते हैं उससे अगला तो नाराज़ हो ही जाता है , उनके लिए भी अच्छा नहीं होता | अगर हम अपने गुस्से का इजहार सही तरीके से करना सीख लें तो आधी से ज्यादा जीवन की समस्याएं खत्म हो जायेंगी |

                          अब जैसे महेश जी  का बच्चा टी . वी देख रहा है , पढ़ नहीं रहा | महेश जी  ऑफिस से  आते हैं  , उसे देखते ही गुस्से में टी वी बंद करके कहने लगते हैं कि , " रिक्शा चलाओगे , पढना नहीं बस बैठे , बैठे मेरे पैसों को खाते रहना | बच्चा उठ कर चला जाता है | वो किताब के आगे बैठा रहता है पर उसका मन पढने में नहीं लगता क्योंकि उसके दिमाग में पिता द्वारा कहे अपमान जनक  शब्द घूम रहे हैं, शायद ये शब्द कभी भी न निकलें | इसके विपरीत अगर महेश जी बेटे को टी .वी देखने देते , बाद में खाना खाते समय या रात को उसे अपने पास बुला कर समय व् पढाई के महत्व को प्यार से समझाते तो बच्चा उसे अवश्य समझता , साथ ही उसके मन में अपने पिता के लिए इज्ज़त बढ़ जाती|

                                            स्टीव जॉब्स को अपनी ही कंपनी से निकाल दिया गया था , पर उन्होंने तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी बल्कि दो कम्पनियाँ कड़ी करने के  प्रतिउत्तर दिया |गुस्से पर तुरंत प्रतिक्रिया न देकर समय पर प्रतिउत्तर दें |

दूसरों को क्षमा करें


                            दबा हुआ क्रोध वो जलता हुआ कोयला है जिसे आप अपने हाथ में इस आशा से पकडे रहते हैं कि समय आने पर दूसरों पर फेंक देंगे | लेकिन इससे पहले की उसे आप दूसरों पर फेंक पाए आप  खुद ही अपना हाथ जला बैठते हैं |

                                       अक्सर हम क्रोध को प्रदर्शित नहीं करते पी जाते हैं | कई बार हम पलट कर जवाब देने की स्थिति में नहीं  होते, जैसे कि अगर हमारा बॉस हमें डांट  रहा है , या क्लस में टीचर , या घर में कोई बड़ा  तो हम उसे सुनने के लिए विवश हैं उस गुस्से को  हम अक्सर प्रकट  नहीं करते पर वो गुस्सा एक जहर की तरह हमारे शरीर की धमनियों में भरा रहता है | इससे एक तरफ तो हम खुद नकारात्मक होते हैं व् दूसरी तरफ स्ट्रेस के शिकार होते हैं | बेहतर है ऐसी स्थिति में माफ़ कर दिया जाए | ये माफ़ी अपने भले के लिए है |

                                      मधुलिका की सास उससे अकसर भला -बुरा कहा करती थी | उसे बहुत गुस्सा आता , पर बहु होने के कारण वो कुछ कह ना पाती और गुस्सा अन्दर ही अन्दर पीती रहती | एक दिन उसने यूँही सोंच लिया कि सासू माँ ने  ऐसी ही  सास देखी हैं ये उन्हीं का बदला उससे ले रही हैं , वो दिल की बुरी हैं नहीं | कुछ दिन कह कर खुद ही शांत हो जायेंगी | ये ख्याल आते ही उसका गुस्सा शांत होने लगा | फायदा उसे ही मिला | क्योंकि अब वो पहले से ज्यादा खुश रहने लगी | धीरे - धीरे सास को भी उससे शिकायतें कम हो गयी | इसी आशय से सम्बद्ध एक कहानी यहाँ " चुटकी भर नमक" आप पढ़ सकते हैं |

लोगों को स्वीकार करें

                         कई बार हम गुस्सा इसलिए करते हैं , क्योंकि लोग हमारे मुताबिक़ नहीं होते | यहाँ हमें लोगों को स्वीकारना सीखना पड़ेगा | हमें समझना पड़ेगा कि लोग गलत या सही नहीं होते बस अलग होते हैं | वैसे ही जैसे बाग़ में फूल अलग होते हैं , रंग अलग होते हैं ...लोगों के ढंग अलग होते हैं |

                            मिस्टर खन्ना ने ऑफिस से एक आदमी को बस इसलिए निकाल दिया कि वो काम तो ठीक करते हैं पर बोलते बहुत हैं | वो आदमी तो चला गया , उसके बाद मिस्टर खन्ना को कोई काबिल आदमी नहीं मिला , जो उस काम को उसी सलीके से कर सके | कम्पनी को घाटा होने लगा , वही  आदमी फिर बुलाया गया | अब मिस्टर खन्ना को उससे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि वो जान गए थे कि वो भले ही ज्यादा बोलता हो पर आदमी काम का है | जरा अपनी रोजमर्रा की जिंदगी पर ध्यान दें ...वो भी कोई आदमी है उसे होली ही नहीं पसंद , यार जो पूजा नहीं करता न वो इंसान सच्चा तो हो ही नहीं सकता , उसके साथ तो बैठना भी मुमकिन नहीं है क्योंकि उसे काला रंग पसंद है और अक्सर वही पहनती है |

                                             हर इंसान की पसंद , नापसंद उसके काम करने का ढंग , सोंच हमसे अलग हो सकती है , गलत या सही नहीं | याद रखिये अगर हम इन भर तराजू लिए हुए नहीं घूमेंगे तो हम हर किसी को वैसे ही स्वीकार करने लगेंगे जैसे वो हैं | जाहिर से बात है कि फिर गुस्से का सवाल ही पैदा नहीं होता |

                                               गुस्सा हमारी खुशियों में जहर का काम करता है | इसलिए इन तरीकों को अजमा कर अपने गुस्से को control में रखिये और खुश रहिये |
                                   


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वैवाहिक जीवन कैसे सुखी हो ?


वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने मे कुछ तथ्यो का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। आपसी सूझबूझ व प्रेम से दामपत्य जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है। 

सुखी वैवाहिक जीवन  कैसे प्राप्त करें ?


कहते है शादी दो जिस्मो का नही दो आत्माओ का मिलन होता है जो परमात्मा के द्धारा भाग्य से विवाह पूर्व ही तय हो जाता है, और यूं कहे धरती पर आकर मिलन हो जाता है।परन्तु आज के प्रगतिशील युग मे जब स्त्री व पुरूष दोनो ही पढे लिखे, समझदार व जागरूक होते है कामकाजी होने के साथ साथ अपने अधिकारो के प्रति भी सजग व पूर्णतः युवा होते है। फिर भी कभी कभी विचारो मे तालमेल बैढाने मे थोडा टकराव होना स्वाभाविक है। 
वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने मे कुछ गलतियो से सबक लेकर व सहनशीलता का परिचय देकर सुखी बनाया जा सकता है। कुछ तथ्य है जो वेवाहिक जीवन को किसी ना किसी रूप मे प्रभावी बनते है। 

उमर का प्रभाव---

कहते हैफूल की कली नाजुक होती है, गुलदस्ते मे सजाते समय जैसे चाहो मोड लो, उसी प्रकार कच्ची  उमर की लडकी को अपने परिवार मे अपने संस्कारो मे ढाला जा सकता है किन्तु आजकल पढाई पूरी करते करते व नौकरी की सैटलमैन्ट करते करते कच्ची उमर पीछे छूट जाती है। पति की उमर यदि पत्नी से ज्यादा है तो वह अनुभवी होने के कारण पत्नी के बचपने को सम्भाल लेता है व अपनी राय देकर उसे संतुष्ट कर लेता है। इसके विपरित यदि पत्नी की उमर ज्यादा हो तो वो अपने पति को कम आंकती है, स्वयं को ज्यादा समझदार मान  पति की भावनाओ को ढेस पहुंचा देती है। 
पित्रसत्तात्मक  परिवार होने के कारण,सरनेम पति का होता है किन्तु आजकल पेनकार्ड बन जाने से सरनेम पीछे लगाने की मजबूरी हो जाती है स्त्री की। 

पहली नजर का प्यार_____

किसी भी स्त्री या पुरूष को पसन्द आने वाला जीवनसाथी की पहली नजर के प्यार की बात ही कुछ और है, इसीलिये आजकल सगाई होते ही दोनो आपस मे मिलना शुरू कर देते है।आपसी विचारो का लेनदेन रिशते को मजबूत बनानेमे सकारात्मक भूमिका अदा करते है। आपसी प्यार व समझ हावी हो जाती हैएक दूसरे पर। कभी कभी वो दोनो अपनी आभासी दुनिया मे इस कदर खो जाते हे कि परिवार मे अन्य सदस्यो की भावनाएं गौण होकर रह जाती है। 

उचित कद काठी_____

एक दूसरे से मिलकर अपनी जोडी सबसे सुन्दर हो, इस तरफ ज्यादा ध्यान हो जाता है। विवाह मे भी सब कहने लगते है :क्या जोडी है? इस उपमा से भी दोनो खुशी से अभिभूत होने लगते है। 





सलीकेदार व्यकितत्व______

स्त्री के सलीकेदार होने से पुरूष का भी सम्मान बढता है। स्त्री का स्वयं को ढंग से सजाकर रखना भी एक कला है,, बिखरे बाल, फटे वस्त्र पहन कर रहना आकारण हंसना व बै सिर पैरकी बाते करना फूहढता की निशानी है। स्त्री का व्यकितत्व मंहगे कपडो मे नही है, उसकी बातचीत का लहजा इतना सरल व स्पष्ट हो कि देखने वाला दांतो तले अंगूली दबाये। पुरूष का स्वभाव भी मीठा व नम्र हो। ससुराल वालो को आदर दे। 
संस्कारो पूर्ण व्यकित सभी के मन को भाता ह वो चाहे स्त्री हो या पुरूष। धर्म से जुडना ही संकारो से जुडना है। अच्छे संस्कार वाली लडकी ईशवर भय से पति का सम्मान करेगी। सीता सावित्री मे श्रद्धा रखने वाली पति का मंगल ही सोचेगी। स्वयं तो पूजा पाठ करेगी अन्य सदस्यो  को भी पूजा पाठ से जोडेगी। किन्तु आजकल नौकरी परजाने की जल्दी मे ये सब छूट रहा है। 

मितव्यता_____

आजकल मंहगाई चरम सीमा पर है। स्त्री पुरूष को  मितव्यता की आदत होगी तो वे बचत ज्यादा कर पायेगे। व खुश भी रह पायेगे। कयोकि आज के समयमे सुख सुविधाओ के चलते बाजार ऐसी क ई चीजो से भरा पडा है जिनके बिना भी घर चल सकता है। औरत कम खर्च करने वाली होगी तभी बचत कर घर चला पायेगी। 

सहनशीलता______

सबसे महत्वपूर्णहै सहनशीलता का गुण। 
वैवाहिक सम्बन्धो की मधुरता की पहली नींव सहनशीलता पर टिकी है। पुरूष को कितना भी गुस्सा आ रहा हो स्त्री चुप रहे तो पुरूष सामान्य हो जाता है। चुप रह करस्त्री मुस्कुराते हुऐ सहनशीलता का परिचय दे तो पुरूष भी उसकी ओर खिंचा चला आता है और उसकी नजरो मेआदर भीबढ जाता है। समझदार व सहनशील बहू परिवार की आंखो का तारा बन जाती है। पति का प्यार व ससुराल वालो का आदर पाकर औरत खुद तो खुशहाल बनती है परिवार मे खुशहाली का वातावरण बनाकर घर को स्वर्ग बना देती है। 

आज की आपाधापी जीवन मे ये चिन्तन का विषय है कि हम अपने दामपत्य जीवन को कैसी सुखी बनाएं। 
आओ विचार करे??
रीतू गुलाटी

                                   
लेखिका

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अंतस से -व्यक्ति से समष्टि की ओर बढती कवितायें

                                   कवितायें वैसे भी भावनाओं के कुसुम ही हैं और जब स्वयं कुसुम जी लिखेंगी तो सहज ही अनुमान लागाया जा सकता है कि उनमें सुगंध कुछ अधिक ही होगी| मैं बात कर रही हूँ कुसुम पालीवाल जी के काव्य संग्रह "अंतस से "की | अभी हाल में हुए पुस्तक मेले में इसका लोकार्पण हुआ है | यह कुसुम जी का तीसरा काव्य संग्रह है जो " वनिका पब्लिकेशन "से प्रकाशित हुआ है |मैंने कुसुम जी के प्रथम काव्य संग्रह अस्तित्व को भी पढ़ा है | अस्तित्व को समझने के बाद अपने अंतस तक की काव्य यात्रा में कुसुम जी का दृष्टिकोण और व्यापक , गहरा और व्यक्ति से समष्टि की और बढ़ा है | गहन संवेदन शीलता कवि के विकास का संकेत है | कई जगह अपनी बात कहते हुए भी  उन्होंने समूह की भावना को रखा है | यहाँ उनके 'मैं ' में भी 'हम 'निहित है |



'अंतस से'समीक्षा  -व्यक्ति से समष्टि की ओर बढती कवितायें 



 यूँ तो संग्रह में 142 कवितायें हैं | उन पर चर्चा को सुगम करने के लिए मैं उन्हें कुछ खण्डों में बाँट कर   उनमें से कुछ चयनित रचनाओं को ले रही हूँ | आइये चलें  'अंतस से ' की काव्य यात्रा पर


कविता पर ...
                 कवितायें मात्र भावनाओं के फूल नहीं हैं |ये विचारों को अंतस में समाहित कर लेना और उसका मंथन है | ये विचारों की विवेचना है , जहाँ तर्क हैं वितर्क  हैं और विचार विनिमय भी है |  इनका होना जरूरी भी है क्योंकि जड़ता मृत्यु की प्रतीक है | कविता जीवंतता है | पर इनका रास्ता आँखों की सीली गलियों से होकर गुज़रता है ... देखिये -





 अक्षर हूँ
नहीं ठहरना चाहता
रुक कर
किसी एक जगह



2
...

जहाँ विचार नहीं है
वहां जड़ता है
जहाँ जड़ता है
वहाँ जीवन नहीं
विचार ही जीवन है
जीवन को उलझने दो
प्रतिदिन संघर्षों से

3...

कविता कोई गणित नहीं
जो मोड़-तोड़ कर जोड़ी जाए

गणित के अंकों का
जोड़-गाँठ से है रिश्ता
किन्तु कविता का गणित
दिल से निकल कर
आँखों  की भीगी और सीली
गलियों से होकर गुज़रता है






रिश्तों पर ....

                    अच्छे रिश्ते हम सब के लिए जरूरी है क्योंकि ये हमें भावनात्मक संबल देते हैं | परन्तु आज के समय का सच ये है कि मकान  तो सुन्दर बनते जा रहे पर रिश्तों में तानव बढ़ता जा रहा है एकाकीपन बढ़ता जा रहा है | क्या जरूरी नहीं कि ह्म थोडा  ठहर कर उन रिश्तों को सहेजें -


आजकल संगमरमरी
मकानों में
मुर्दा लाशें रहती हैं
न बातें करती हैं
न हँसती ही हैं
उन्होंने बसा ली है
दुनिया अपनी-अपनी
एक सीमित दायरे में


२....


ख्वाबों के पन्नों पर
लिखे हुए थे
जो बीते दिनों के
अफ़साने
आज दर्द से लिपटकर
पड़पड़ाई हुई भूमि में
वो क्यूँ तलाशते  रहते हैं
दो बूंदों का समंदर


3 ...

सोंचती हूँ... जीवन की आपाधापी में
ठिठुरते रिश्तों को
उम्मीदों की सलाइयों से
आँखों की भीगी पलकों पर
ऊष्मा से भरे
सपनों का
एक झबला बुनकर
मैं पहनाऊं



नारी पर ...

                    नारी मन को नारी से बेहतर कौन जान सका है | जो पीड़ा जो बेचैनी एक नारी भोगती है उसे कुसुम जी ने बहुत सार्थक  तरीके से अपनी कलम से व्यक्त किया है |वहां अतीत की पीड़ा भी है , वर्तमान की जद्दोजहद भी और भविष्य के सुनहरी ख्वाब भी जिसे हर नारी रोज चुपके से सींचती है -

दफ़न रहने दो यारों !
मुझे अपनी जिन्दा कब्र के नीचे

बहुत सताई गयी हूँ मैं
सदियों से यहाँ पर
कभी दहेज़ को लेकर
तो कभी उन अय्याशों द्वारा
जिन्होंने बहन बेटी के फर्क को
दाँव पर लगा
बेंच खाया है दिनों दिन

2...

तुम लाख छिपाने की कोशिश करो
तुम्हारी मानसिकता का घेरा
घूमकर आ ही जाता है
आखिर में
मेरे वजूद के
कुछ हिस्सों के इर्द -गिर्द


3...

तुम्हारी ख़ुशी अगर
मेरे पल-पल मरने में
और घुट -घुट जीने में
विश्वास करती है तो
ये शर्त मुझे मंजूर नहीं

4...

चाँद तारों को रखकर
अपनी जेब में
सूरज की रोशिनी को जकड कर
अपनी मुट्ठी में
तितली के रंगों को समेट कर
अपने आँचल में
बैठ जाती हूँ
हवा के उड़न खटोले पर
तब बुनती हूँ मैं
अपने सपनों के महल को


5 ..
सतयुग हो या हो त्रेता
द्वापर युग हो या हो आज
सभी युगों में मैंने
की हैं पास
सभी परीक्षाएं अपनी
तुम लेते गए
और मैं देती गयी


6...

छोटे - छोटे क़दमों से चलते हुए
चढ़ना चाहती थी वो
सपनों की कुछ चमकीली उन सीढ़ियों पर
जिस जगह पहुँच कर
सपने जवान हो जाते हैं
और फिर ...
खत्म हो जाता है सपनों का आखिरी सफ़र

7 ...


मैं पूँछ ती हूँ इस समाज से
क्या दोष था मेरी पाँच साल की बच्ची का

लोग कह रहे हैं बाहर
छोटे कपडे थे ... रेप हो गया
क्या दोष था उसका !
बस फ्रॉक ही तो पहनी थी
पांच साल की बच्ची थी
वो उम्र में भी कच्ची थी


हाय .... कहाँ से ऐसी मैं साडी लाऊं
जिसमें अपनी बच्ची के तन को छुपाऊं !


समाज के लिए ....

                         किसी कवि के ह्रदय में समाज के लिए दर्द ही न हो , ऐसा तो संभव ही नहीं | चाहे वो आतंक वाद हो , देश के दलाल हो या भ्रस्टाचार हो सबके विरुद्ध कुसुम जी की कलम मुखरित हुई है |

वो सहमी सी आँखें
डरती है
एक ख्वाब भी
देखने से
जो गिरफ्त में
आ चुकी हैं
संगीनों के साए में
उनकी आँखों में
भर दिए गए हैं
कुछ बम
और बारूद

2.

ओ समाज के दलालों
कुछ तो देश का सोंचो
मत बेंचो अपनी माँ बहनों को
इन्हीं पर तुम्हारी सभ्यता टिकी है
और उइन्ही से तुम्हारी संस्कृति जुडी है

3.

अंधेरों से कह दो
चुप जाएँ कहीं जा कर
कलम की धर देखो
चमक उठी है हमारी
वहाँ की रोशिनी में
अंधेरों का कुछ काम नहीं


संग्रह से मेरी कुछ प्रिय कवितायें ........

                                                             आइये अब "अंतस से 'काव्य संग्रह की कुछ अपनी प्रिय कविताओं की बात करती हूँ | जिनमें 55 साला और का जोश व् फिर से जीने और सपने देखने की ललक काबिले तारीफ़ है | वहीँ , यशोधरा का स्वयं अपने पति को सन्यास मार्ग पर जाने के लिए कहना , यशोधरा की अपने पति के प्रति भावनाओं की गहरी समझ दिखाता है | यशोधरा की कविता से विरोधाभास उत्पन्न करते हुए  " पत्नी के  नाम एक खत" में सैनिक पति अपनी पत्नी को सोते हुए देश की रक्षा हेतु छोड़ कर जाता है | यहाँ सैनिक बुद्ध के सामान वैरागी है जो देश के लिए अपना सर्वस्य त्याग कर अपने प्राण भी नयोछावर करने जा रहा है| आइये इन कविताओं के कुछ अंशों का आनंद लें -

मनोबल पचपन साला औरत का

वो सुबह तडके उठ कर
नींद से बोझिल ...
किन्तु ,
आँखों की
परवाह किये बगैर
लग जाती है अपने काम पर
मानों ,
फिर्किको हाथों में फिट किये
और लगा लेती है वो
पैरों में पहिये
रसोई में पहुँचते ही


२...

जाओ प्रियतम जाओ
जाओ सिद्धार्थ जाओ
मैं यशोधरा
आज तुमसे कहती हूँ ...
अब नहीं रोकूंगी
मैं तुमको ...
तुमको जाना ही होगा
उस निर्वाण की खातिर
जिसको मैंने
कुछ सालों से तुम्हारी
आँखों में पढ़ा है


3.

एक खत पत्नी के नाम

मेरी हमदम
मेरी जान
लड़ने गया हूँ जंग पर
तुझे नींद में सोता छोड़ कर
मैं अपने देश की खातिर
बाँध लाया हूँ साथ में
तेरी यादों की गठरी को
और छोड़ आया हूँ
तेरे सुर्ख गालों पर
अपने प्यार के प्रतीक को


 कुसुम जी को उनके काव्य संग्रह "अंतस से " के लिए हार्दिक शुभकामनायें 

वंदना बाजपेयी 

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करवटें मौसम की - कुछ लघु कवितायें


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करवटें मौसम की - कुछ लघु कवितायें

डेज़ी नेहरा जी के काव्य संग्रह " करवटें मौसम की " जो की " विश्वगाथा" प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है,  की  कवितायें पढ़ते हुए ऐसा लगा जैसे कवियत्री के संवेदनशील मन में एक गंभीर चिंतन चल रहा है , जिसे वो कविता के माध्यम से आम पाठकों के लिए सरल से सरल शब्दों में कहना चाहती  है, परन्तु जब बात मन की हो तो इसके आयाम इतने विस्तृत होते हैं कि पाठक उस गहराई में बहुत देर तक घूमता रह जाता है, और प्रवेश करता है एक ऐसी सुरंग में जहाँ मानव मन की गुत्थियाँ खुलती चली जाती हैं | कम शब्दों गहरी बात कह देना डेजी जी की विशेषता है | उनके लघुकथा संग्रह 'कटघरे' में ये कला और उभर  कर आई है | दोनों ही पुस्तकों में मानव मन पर उनकी सूक्ष्म पकड़ दिखाई पड़ती है | हम आपके लिए  डेजी नेहरा जी के काव्य संग्रह " करवटें मौसम की " से कुछ लागु कवितायें लाये हैं | आप भी थोड़े शब्दों में गहरी बात का आनंद लीजिये |

करवटें मौसम की - गहरी बात कहती कुछ लघु कवितायें 


1)मौसम

कुदरत ने
 तो
भेजा था
हर मौसम
हर एक के लिए


फिर जाने...
 बटोरने वालों ने
किया
जुर्म


या
मौसमों ने
स्वयं ही किया
पक्षपात


किसी की झोली में झरे पतझड़ सारे
किसी के हिस्से खिले वसंत ही वसंत


2 )पंख

पंख आते -जाते रहते
मेरी दुनिया में
मौसमों के साथ

यही भला है
वर्ना ...
मैं भूल न जाता
जमीं पे पैर रखना


पढ़ें - कटघरे : हम सब हैं अपने कटघरों में कैद

३)जिंदगी

उलझे रहे
तो है जिंदगी
वरना
'सजा'है बस


विश्वास है
तो है 'बंदगी'
वरना
'खता 'है बस

उबर गए
तो है 'मुक्ति'
वरना
'तपस्या'है बस


4)मुस्काने हमारी
मुस्काने ...
पहले भी थी
स्वत :ही बेवजह किशोरावस्था में

मुस्काने....
अभी भी हैं
कढ़ी-गढ़ी दमदार परिपक्वता में


5)हर साल

सुना है
करते हो आत्मावलोकन
हर वर्ष के अंत में
लेते हो नया प्रण
हर बार , प्रारम्भ में ,


इन दो दिनों को छोड़
क्या करते हो
सारा साल ?


6 )परिवर्तन
वक्त बदलता है
संग 'सब'
नियम है, सुना है


तुम बदलें
रंग 'सब'
फिर मैंने ही ये पड़ाव
क्यूँ चुना है ?



7)आस 
अब
गम न हो
कोई
तुमसे

लो!
 छोड़ दी हर ख़ुशी की आस
जो जुडी है
तुम से


8)शुक्रिया

सपनों की वादी से
सच की छाती तक
अमृत की हंडिया से
विष की नदिया तक


ले आये तुम
तुम्हारा शुक्रिया !!


कि ...
इंसान की हार से
जीवन के सार से
परिचय जो करवा दिया
इतनी जल्दी



9)...मान लेती हूँ
तुझमें साँसे मेरी
 जानती हूँ
मुझमें साँसे तेरी
'मान'लेती हूँ

कि ...
बनी रहूँ मैं
बनाएं रखूँ तुझको


10)रंग
इन्द्रधनुषी
 रंगों से परे भी
होते हैं कई रंग


दिखा दिए
सारे ही मुझको
शुक्रिया जिन्दगी


वरना
काली-सफ़ेद भी
कोई जिंदगी होती ?


11)श्रेष्ठ योनि

जब सब होकर भी
कुछ नहीं तुम्हारे पास
अपनों से मिली बेरुखी
जी करती हताश


नाउम्मीद, अकेला और बदहवास
 'मन '
ठोकर सी मारता है
इस जीवन को
जिसे कभी
योनियों में श्रेष्ठ
स्वयं माना था उसने



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महात्मा गाँधी के 21 अनमोल विचार
सत्य, अहिंसा और त्याग के पुजारी महात्मा गाँधी जिका पूरा जीवन अपने आपमें एक ऐसी किताब है, जिसका हर पृष्ठ अनुकरण करने योग्य है| महात्मा गाँधी जिन्हें हम प्यार से बापू कहते है, ने  समय –समय पर जो कुछ भी कहा वो हर विचार मशाल की तरह सबको राह दिखाने वाला है, इसलिए सम्पूर्ण विश्व उनका सम्मान करता है| आज उनके इन्हीं अनमोल विचारों में से 21 मोती हम आपके लिए लाये हैं -


जाने-महात्मा गाँधी के 21 अनमोल विचार/ 21-best quotes Mahatma Gandhi (in Hindi) 




1 )आँख के बदले आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी

An eye for an eye only ends up making the whole world blind.


2)जब तक गलती करने की स्वतंत्रता न हो तब तक स्वतंत्रता का कोई मतलब नहीं है |

Freedom is not worth having if it does not connate freedom of error.


3)ख़ुशी तब मिलेगी जब आप जो कहते हो , सोंचते हों, करते हों सबमें सामंजस्य हो|

Happiness is when, what you think, what you say, and what you do are in harmony.


4)मौन सबसे सशक्त भाषण है, धीरे धीरे दुनिया आप को सुनेगी|

Silence is the strongest speech, gradually world will listen to you.


5)कोई गलती तर्क वितर्क करने से सत्य नहीं बन सकती, न ही कोई सिर्फ इसलिए सत्य गलत हो सहता है क्योंकि उसे कोई देख नहीं रहा है|

An error does not become truth by reason of multiplies propagation nor does truth become an error because nobody sees it


पढ़ें - महात्मा गांधी जी के प्रेरक प्रसंग

6)पूर्ण धरना के साथ बोला गया “ना” , दूसरों को खुश करने के लिए या समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए बोले गए ‘हाँ’ से बेहतर है |

A “no” uttered from deepest conviction is better than “yes” merely uttered to please or to avoid trouble .


7)क्रोध और असहिष्णुता सही समझ के दुश्मन हैं |

Anger and intolerance are the enemies of correct understanding.

मेरा जीवन मेरा सन्देश है|My life is my message.


8)अपनी गलती स्वीकारना, झाड़ू लगाने के सामान है जो सतह को चमकदार और साफ़ कर देती है|

Confession of errors is like broom which sweeps away the dirt and leaves the surface brighter and clearer.


9)ऐसे जियो जैसे की तुम कल मरने वाले हो, और ऐसे सीखो जैसे तुम हमेशा जिओगे|

Live as if you were to die tomorrow. Learn as if you were to live forever.


10)दुनिया हर किसी की जरूरत के लिए पर्याप्त हैं लेकिन हर किसी के लालच के लिए नहीं|

The world has enough to everyone’s need, but not enough for everyone’s greed.



महात्मा गाँधी के  अनमोल विचार



11)अपने एक काम द्वारा किसी को ख़ुशी देना, प्रार्थना के लिए झुके हजारों सरों से बेहतर है|

To give pleasure to a single heart by single act is better than a thousand heads bowing in prayer.


12)स्वयं को जानने का सबसे सही तरीका है दूसरों की सेवा में खुद को डुबो देना|

The best way to find yourself  is to lose yourself in the service of others.


13)आदमी अक्सर वो बन जाता है जो होने में वो विश्वास करता है| अगर मैं खुद से कहूँ कि मैं फलां चीज नहीं कर सकता , तो हो सकता है मैं उसे करने में असमर्थ हो जाऊं| इसके विपरीत अगर मैं ये कहता हूँ कि मैं इसे कर सकता हूँ तो निश्चित रूप से मैं उसे करने की क्षमता पा लूँगा , भले ही शुरू में मेरे पास वो क्षमता न रही हो|

A man often becomes what he believes himself to be. If I keep on saying to myself that I cannot do a certain thing , it is possible that I may end by really becoming incapable of doing it .on the contrary if I belief that I that I can do it , I shall surely acquire the capacity to do it, even if I may not have it in the beginning.




महात्मा गाँधी जी के विचार



14)एक देश की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से  आँका जा सकता है कि वहाँ जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है|
The greatness of a nation and its moral progress can be judged by the way its animals are treated.

जहाँ प्रेम है वहाँ जीवन है|
Where there is love there is life.


15)आपकी मान्यताएं आपके विचार बन जाते हैं, आपके विचार आप के शब्द बन जाते हैं, आपके शब्द आपके एक्शन बन जाते हैं , आपके एक्शन आपकी आदतें बन जाती हैं और आपकी आदतें आपके मूल्य बन जाते हैं और आपके मूल्य आपका भाग्य बन जाते हैं|

Your beliefs become your thoughts, your thoughts become your words, your words become your action, your action become your habits  and your habits  become your values, and your values become your destiny .



16)आप मानवता में विश्वास मत खोइए| मानवता सागर की तरह है, अगर सागर की कुछ बूंदें गन्दी हैं तो सागर गन्दा नहीं हो जाता|

You must not lose faith in humanity. Humanity  is like an ocean; if few drops of the ocean are dirty , the ocean does not become dirty.




गाँधी जी के विचार



17)हर रात जब मैं सोने जाता हूँ मैं मर जाता हूँ , हर सुबह जब 

मैं उठता हूँ तो मेरा पुर्नजन्म होता है|

Each night when I go to sleep I die, each morning when I wake up, I am reborn.


18)तुम जो करोगे वो नगण्य होगा, लेकिन ये जरूरी है कि तुम वो करो|

Whatever you do will be insignificant, but it is very important that you do it.


19)दुनिया में ऐसे लोग हैं, जो इतने भूखे हैं कि भगवान् भी उन्हें 

किसी और रूपमें नहीं दिख सकता, सिवाय रोटी के|

There are people in the world so hungry, that God cannot appear to them, except in the form of bread.


20)किसी चीज में विश्वास करना , लेकिन उसे न जीना, बेईमानी है |

To believe in something and not to live it, is dishonest.


21)आप मेरे शरीर को जंजीरों में जकड सकते हैं, मुझे यातना दे सकते हैं, यहाँ तक की मेरे शरीर को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन आप मेरे विचारों को कैद नहीं कर सकते|

You can chain me, you can torture me, you can even destroy this body, but you can never imprison my mind.

आप जो आज करते हैं उस पर भविष्य निर्भर करता है|The future depends on what you do today .
 

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कोई तो हो जो मुझे समझ सके

                                        एक कार एक दुकान के आगे आकर रूकती है | उसमें से एक ६ या ७ सात साल का बच्चा  अपने पिता की अँगुली पकड़ कर दुकान में घुसता है | उसे एक प्यारा सा पिल्ला ( पपी) चाहिए जो उसके साथ खेल सके |

दुकानदार एक से बढ़कर एक पल्ले दिखाता है , पर बच्चे की नज़र बार -बार उस पिल्ले  की तरफ जाती है जो दुकानदार के बगल में कुर्सी पर बैठा होता है | वो पिल्ला बहुत छोटा सा , सुन्दर सा क्यूट सा होता है |


बच्चा उसी  पिल्ले  की ओर अँगुली करके कहता है कि उसे वो पल्ला पसंद है, वह उसी को लेना चाहता है |


दुकानदार ने कहा कि वो उसका है वो बेचने के लिए नहीं है | दुकानदार फिर उस बच्चे से कहता है, " आइये , मैं आपको और बहुत सारे प्यारे -प्यारे पिल्ले दिखाता हूँ | " बच्चा देखता है उसे कोई पसंद नहीं आता| उसके मन में वही पल्ला बसा हुआ है जो दुकानदार के पास बैठा है |जिसे दुकानदार बेचने को तैयार नहीं है |

                  अंत में बच्चा अपने पापा के साथ वापस जाने लगता है तो दुकानदार उसे रोक कर कहता है कि , " मैं जानता हूँ तुम्हें ये पिल्ला पसंद हैं पर मैं उसे जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ क्योंकि उसके एक टांग नहीं है , वो तुम्हारे से दौड़ कर खेल नहीं पायेगा |



उसकी बात सुनकर बच्चा पलटता है और अपनी एक टांग से पेंट खिसका कर कहता है कि , " देखिये मेरी भी एक टांग नहीं है , मैं वही पिल्ला लेना चाहता हूँ | क्योंकि मैं चाहता हूँ कीस दुनिया में कोई तो हो जो मुझे समझ सके |


                              दोस्तों , कहीं न कहीं हम सब ढूंढते हैं एक ऐसे इंसान को जो हमें समझ सके | दर्द की भाषा नहीं होती , सिर्फ अहसास होता है |  इसीलिए खोज होती है ,पर क्या ये खोज पूरी हो पाती है ?मुश्किल है ... पर असंभव नहीं |खोज जारी रहती है ... ढूंढना जारी रहता है | कहीं न कहीं , किसी न किसी मोड़ पर ऐसा कोइमिल ही जाता है जो हमें पूरी तरह से समझता है | जीवन का आनन्द वहीँ से शुरू होता है |


टीम ABC

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