हिंदी दिवस क्या केवल सभाओं तक सीमित रह गया है | हिंदी दिवस की सार्थकता की पड़ताल करती कविता

गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये
शर्मिंदा हूं---------------- सुनुंगा घंटो कल किसी गोष्ठी में, उनसे मै हिन्दी की पीड़ा, जो खुद अपने गाँव मे, शहर की अय्याशी के लिये-------- अपने पनघट की हिन्दी छोड़ आये। गंभीर साँसे भर, नकली किरदार से अपने, भर भराई आवाज से अपने, गाँव की एक-एक रेखा खिचेंगे, जो खुद अपने बुढ़े बाप के दो जोड़ी बैल, और चलती हुई पुरवट की हिन्दी छोड़ आये। फिर गोष्ठी खत्म होगी, किसी एक बड़े वक्ता की पीठ थपथपा, एक-एक कर इस सभागार से निकल जायेंगे, हिन्दी के ये मूर्धन्य चिंतक, फिर अगले वर्ष हिन्दी दिवस मनायेंगे, ये हिन्दी के मुज़ाहिद है एै,रंग--------- जो शौक से गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये।

@@@आप सभी को अंतरराष्ट्रीय हिन्दी दिवस की बधाई। रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)।


कवि


यह भी पढ़ें ..........











आपको  कविता  ".गाँव के बरगद की हिन्दी छोड़ आये ." कैसी लगी   | अपनी राय अवश्य व्यक्त करें | हमारा फेसबुक पेज लाइक करें | अगर आपको "अटूट बंधन " की रचनाएँ पसंद आती हैं तो कृपया हमारा  फ्री इ मेल लैटर सबस्क्राइब कराये ताकि हम "अटूट बंधन"की लेटेस्ट  पोस्ट सीधे आपके इ मेल पर भेज सकें 
Share To:

atoot bandhan

Post A Comment:

0 comments so far,add yours