हीनभावना, खुद को दूसरों से कमतर समझने से आती है| इसके कारण मन में निराशा व अवसाद पनपता है| जरूरी है इसे समझ कर इससे निकलने का प्रयास किया जाए|

क्या करें जब हो हीन भावना के शिकार

वो हर अनुभव जिसमें आप भी का सामना करते हैं वो आपकी शक्ति, साहस और आत्मविश्वास को बढ़ता है-अल्नोर रूजवेल्ट

हीन भावना दरअसल अपने को सबसे कमतर आँकने की भावना है| अब यहाँ ध्यान  देने की बात ये है कि जब कोई हमें कम कह रहा हो तो हम तर्क  से उसका मुंह बंद कर देंगे| जब हम खुद को ही कम समझ रहे हों तो क्या करेंगे? यहीं पर होता है हीन भावना का जन्म| जब हम अपने को हारा हुआ महसूस करते हैं|   मित्रों, आज के जीवन का सबसे प्रसिद्द वाक्य क्या है?


जिंदगी एक रेस है और हम सब उसे जीतने के लिए दौड़ रहे हैं|

                  अब जब दौड़ रहे हैं तो जाहिर सी बात है कोई नंबर  वन आएगा कोई टू, कई थ्री, तो कोई बहुत पीछे रह जाएगा|  हम सब जीतना चाहते हैं पर कई बार पीछे रह जाते हैं|  यहीं पर हीन भावना हमें घेर लेती है|  हम लाख चाह  कर भी उन लोगों का सामना करने से बचते हैं जो हमारे साथ चले थे और आज हमसे मीलों आगे हैं|   क्या इसके कारण रिश्ते तोड़े जा सकते हैं? इसमें उनकी कोई गलती भी तो नहीं है| यानी काम हमें अपने ऊपर करना है| 

                                    मुझे याद आता है कि बचपन में एक बार हम बच्चे स्कूल से घर डिब्बे वाले रिक्शा में जा रहे थे | मेरे हाथ में 50 पैसे का सिक्का था|  अमरुद खरीदनेके बाद वापस बचा था|  मैंने रिक्शे में सबको अमरुद बाँट दिए|  मेरे पास बचा वो सिक्का और अमरुद का एक टुकड़ा|  अमरुद का टुकड़ा तो जल्दी ही खत्म हो गया,पर सिक्का मेरे हाथ में ही रहा|  जो बातचीत के दौरान पांच मिनट में तीन बार गिरा| मैंने हँसकर अपनि सहेलियों से कहा, “लगता है कि ये सिक्का मेरे पास रहना ही नहीं चाहता इसीलिये बार-बार गिर रहा है”|   तभी मेरी एक सहेली बोली, “हो सकता है ये आप के पास ही रहना चाहता हो इसीलिये बार-बार गिर कर मिल भी रहा है”|

                        
                        बात सही थी|  उस बात को देखने का एक नजरिया ये भी हो सकता है|  जिंदगी को देखने का हमारा नजरिया क्या है इस बात पर हमारा आत्मविश्वास निर्भर करता है| ये निर्विवाद सत्य है कि जो लोग जिंदगी को सकारात्मक नज़रिए से देखते हैं उनका आत्मविश्वास ज्यादा होता है| 


How to conquer inferiority complex

                          


                               सब कहते हैं कि हीन भावना से निकलने के लिए  आत्मविश्वास बढाओ| बहुत सारे लेख व् वीडियो भी आप को इस बात पर मिल जायेंगे| परन्तु आत्मविश्वास आसानी से नहीं बढ़ता| इसके कम होने के पीछे हमारी गहरी जडें  हैं| अगर आप स्त्री हैं और किसी छोटे शहर से हैं, तो आपने, औरतें ये नहीं कर सकती, वो नहीं कर सकती इतनी बार आपने सुना होगा कि आपके मन में नकारात्मक डर गहरे बैठ गया होगा| इसके अतरिक्त भी बहुत सारी  वजहें हो सकती हैं जो बचपन में कही-सुनी गयी जिसके कारण हमारा मन हीन भावना से भर गया हो और  आत्मविश्वास कम हो गया हो|

                                      
                               अगर आप का आत्मविश्वास कम है तो इसका साफ़ मतलब है कि आप को आप की खूबियों की पहचान नहीं है|   आप अपने को दूसरों से कमतर समझते हैं| इसीलिए हीन भावना का शिकार रहते हैं | ऐसे में आप को किसी से मिलने जाना पड़े जिसने उस क्षेत्र में बहुत अच्छा किया हो जहाँ आपने पहला कदम रखा है|  तो आप को  भय लगना स्वाभाविक हैं| भले ही आप आत्मविश्वास को बढाने पर काम कर रहे होंगे पर  अचानक से हीन भावना के शिकार हो जायेंगे |
                   जैसा की मेरे साथ हुआ|  मैं अपनी दोनों सहेलियों के साथ टीचर बनना चाहती थी| पर कुछ तैयारी  में कमी, जानकारी में कमी रही होगी कि उन सब का चयन हो गया पर मेरा नहीं| उसके बाद मेरा विवाह हो गया|  फिर तो घर गृहस्थी में ऐसी फँसी की कुछ और सुध ही न रही|  समय की कमी के कारण सहेलियों से बातचीत भी बहुत कम हो गयी|  धीरे-धीरे वो सब दूर होती गयीं|  बच्चे बड़े हुए फुरसत मिली तो सोंचा अब कुछ अपने लिए किया जाए|  स्कूल तलाश करने लगी, पर मुझ पर "house wife" का लेबिल चपका हुआ था|  कोई अच्छा स्कूल नहीं मिला| एक साधारण स्कूल में नर्सरी टीचर बनी| उसी समय इंटर स्कूल गेट टुगेदर हुआ| मेरी दोनों सहेलियां प्रिंसिपल थी|  एक का तो अपना स्कूल था, और मैं नर्सरी में टीचर|  मन बहुत दुविधा में था, एक तरफ जहाँ बचपन की सहेलियों से मिलने की ख़ुशी थी वहीँ अपने लिए हीन भावना |  आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था| मैंने फंक्शन में न जाने का निर्णय लिया|  पर अपने खोल में छिप  कर बैठ जाना क्या ये सही निर्णय था? बिलकुल नहीं|  उनसे मिलने का अगला मौका जल्दी ही आ गया| अबकी मैंने अपने आप को तैयार किया|  हालांकि मैं अपने आत्मविश्वास को बढ़ाने पर काम कर रही थी|  पर इतनी जल्दी उसका बढना संभव नहीं था|  इसलिये मैंने अपने आपको दूसरी तरीके से तैयार किया| 


यहाँ मैं कुछ टिप्स दे रही हूँ जो आपके काम आएँगी-


अपनी बॉडी लेंगुएज पर ध्यान दें




                      हमारा शरीर हमसे ज्यादा बोलता है, या यूँ कहें कि ये, वो सब बोल देता है जो हम नहीं बोलना चाहते|   जब किसी से मिलने जाए तो अपनी बॉडी लेंगुएज द्वारा अपना कम आत्मविश्वास प्रकट न होने दें| ध्यान  रखे –


  • नाख़ून न कुतरे
  • हाथ पर हाथ न रगडें
  • बातों में हकलाहट न हो
  • सर झुका कर बात न करें
  • बहुत ज्यादा बोल कर या बिना वजह हंस कर अपनी हीन भावना छुपाने का प्रयास न करें |

अपनी उपलब्धियों को याद करिए 

                                       

                                             माना  कि आप को लग रहा है कि आज आप उनसे बहुत कम हैं , पर अतीत में कभी आप उनके बराबर या आगे भी रहे होंगे| आप उसी अतीत को याद करिए, जब आप उनके समकक्ष थे| इसके अतिरिक्त अपनी उन उपलब्धियों को याद करिए जो आप को जीवन में मिली हैं|  इससे आप का आत्मविश्वास बढेगा व् हीन भावना कम होगी | 


अपने करेक्टर से बाहर निकले
                              
                               अगर आप का आत्मविश्वास स्त्री, किसी विशेष धर्म, जाति या समुदाय का होने के कारण बहुत कम है तो अपने करेक्टर से बाहर निकलिए | आप खुद को केवल इंसान समझिये | दूसरा जिससे आप मिलने जा रहे हैं वो भी इन्सान ही है| तो फिर डर कैसा? बेफिक्र हो कर मिलिए, बात करिए|

थोड़ी देर के लिए किसी दूसरे करेक्टर में घुस जाइए

                               
                                          ये तो आपने पढ़ा ही होगा कि ये जीवन एक नाटक है और हम सब इसके पात्र हैं | अब इसे आप हकीकत बना दीजिये | कहने का मतलब ये है कि आप एक पात्र है जो अपना करेक्टर प्ले कर रहा है | ये वो करेक्टर है जिसका आत्मविश्वास बहुत कम है | इसके अन्दर हीन भावना है | इस कारण ये पात्र किसी से मिलना नहीं चाहता| अब थोड़ी देर के लिए मान लीजिये की आप वो होते जो आप बनने  की कल्पना करते हैं|  आप सोंच लीजिये कि आप वो है|  

आप कोई काल्पनिक फिक्शनल करेक्टर भी ले सकते हैं| वो जो आप को बहुत पसंद हो|  आप थोड़ी देर के लिए फील करिए कि आप वो हैं|  ऐसा मेंटल लेवल पर करिए| जब आप उस पात्र में घुस जायेंगे तो आप का आत्मविश्वास बढ़ जाएगा|  तब आप आसानी से उस व्यक्ति से बात कर पायेंगे जिससे बात करने से आप डर रहे थे|  ये केवल एक मेंटल बूस्ट अप है|  जो आपको उस परिस्थिति में  बहुत साथ देगा| 


 समझिये हीन भावना के सच को 

                               हीन भावना का जन्म तब होता है जब हम बाहरी व्यक्ति पर अपने को अच्छा समझे जाने, स्वीकार किये जाने की अपेक्षा रखते हैं|  जब ये अपेक्षा खत्म हो जायेगी तो हीन भावना अपने आप खत्म हो जायेगी| इसके लिए आप को समझना होगा कि हम सब एक वृत्त में घूम रहे हैं, आज जिसके पीछे हम भाग रहे हैं वो किसी और के पीछे भाग रहा है| कहने का मतलब ये है कि जिसे हम आत्मविश्वास से भरा समझ रहे हैं कहीं पर वो भी कमजोर है| सबसे खास बात ये है कि ये बस एक यात्रा ही तो है, जिसे भरपूर ख़ुशी के साथ जीना है| न आगे की चिंता में न पीछे की याद में|  हीनभावना से ग्रसित होकर हम इस अनमोल  यात्रा का आनंद क्यों खोएं|  इसलिए हीन भावना से निकल कर यात्रा का आनंद लेना है तो गुनगुनाना होगा ...

                    तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय 

छाया सिंह 

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atoot bandhan

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4 comments so far,Add yours

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    1. जी , प्रदीप जी,आप को मेल कर देते हैं | आप क्रेडिट के साथ पोस्ट कर सकते हैं |

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