February 2018
चेखव की अनूदित रूसी कहानी - दुख

" मैं अपना दुखड़ा किसे सुनाऊँ ? "
             शाम के धुँधलके का समय है । सड़क के खम्भों की रोशनी के चारों ओर बर्फ़ की एक गीली और मोटी परत धीरे-धीरे फैलती जा रही है । बर्फ़बारी के कारण  कोचवान योना पोतापोव किसी सफ़ेद प्रेत-सा दिखने लगा है । आदमी की देह जितनी भी मुड़ कर एक हो सकती है , उतनी उसने कर रखी है । वह अपनी घोड़ागाड़ी पर चुपचाप बिना हिले-डुले बैठा हुआ है । बर्फ़ से ढँका हुआ उसका छोटा-सा घोड़ा भी अब पूरी तरह सफ़ेद दिख रहा है । वह भी बिना हिले-डुले खड़ा
है । उसकी स्थिरता , दुबली-पतली काया और लकड़ी की तरह तनी सीधी टाँगें ऐसा आभास दिला रही हैं जैसे वह कोई सस्ता-सा मरियल घोड़ा हो ।
              योना और उसका छोटा-सा घोड़ा , दोनों ही बहुत देर से अपनी जगह से नहीं हिले हैं । वे खाने के समय से पहले ही अपने बाड़े से निकल आए थे , पर अभी तक उन्हें कोई सवारी नहीं मिली है ।


              " ओ गाड़ी वाले , विबोर्ग चलोगे क्या ? " योना अचानक सुनता है ," विबोर्ग ! "


               हड़बड़ाहट में वह अपनी जगह से उछल जाता है । अपनी आँखों पर जमा हो रही बर्फ़ के बीच से वह धूसर रंग के कोट में एक अफ़सर को देखता है , जिसके सिर पर उसकी टोपी चमक रही है ।


               " विबोर्ग ! " अफ़सर एक बार फिर कहता है । " अरे , सो रहे हो क्या ? मुझे विबोर्ग जाना है । "
                चलने की तैयारी में योना घोड़े की लगाम खींचता है । घोड़े की गर्दन और पीठ पर पड़ी बर्फ़ की परतें नीचे गिर जाती हैं । अफ़सर पीछे बैठ जाता है । कोचवान घोड़े को पुचकारते हुए उसे आगे बढ़ने का आदेश देता है । घोड़ा पहले अपनी गर्दन सीधी करता है , फिर लकड़ी की तरह सख़्त दिख रही अपनी टाँगों को मोड़ता है और अंत में अपनी अनिश्चयी शैली में आगे बढ़ना शुरू कर देता है । योना ज्यों ही घोड़ा-गाड़ी आगे बढ़ाता है , अँधेरे में आ-जा रही भीड़ में से उसे सुनाई देता है , " अबे , क्या कर रहा है , जानवर कहीं का ! इसे कहाँ ले जा रहा है , मूर्ख ! दाएँ मोड़ ! "


               " तुम्हें तो गाड़ी चलाना ही नहीं आता ! दाहिनी ओर रहो ! " पीछे बैठा अफ़सर ग़ुस्से से चीख़ता है ।
               फिर रुक कर , थोड़े संयत स्वर में वह कहता है , " कितने बदमाश हैं ...सब के सब ! " और मज़ाक करने की कोशिश करते हुए वह आगे बोलताहै , " लगता है , सब ने क़सम खा ली है कि या तो तुम्हें धकेलना है या फिर तुम्हारे घोड़े के नीचे आ कर ही दम लेना है ! "

              कोचवान योना मुड़ कर अफ़सर की ओर देखता है । उसके होठ ज़रा-सा हिलते हैं । शायद वह कुछ कहना चाहता है ।


               " क्या कहना चाहते हो तुम ? " अफ़सर उससे पूछता है ।
                योना ज़बर्दस्ती अपने चेहरे पर एक मुस्कराहट ले आता है , और कोशिश करके फटी आवाज़ में कहता है , " मेरा इकलौता बेटा बारिन इस हफ़्ते गुज़र गया साहब ! "
                " अच्छा ! कैसे मर गया वह ? "
                 योना अपनी सवारी की ओर पूरी तरह मुड़ कर बोलता है , " क्या कहूँ , साहब । डॉक्टर तो कह रहे थे , सिर्फ़ तेज़ बुखार था । बेचारा तीन दिन तक अस्पताल में पड़ा तड़पता रहा और फिर हमें छोड़ कर चला गया ... भगवान की मर्ज़ी के आगे किसकी चलती है ! "
                 " अरे , शैतान की औलाद , ठीक से मोड़ ! " अँधेरे में कोई चिल्लाया , " अबे ओ बुड्ढे , तेरी अक़्ल क्या घास चरने गई है ? अपनी आँखों से काम क्यों नहीं लेता ? "

                 " ज़रा तेज चलाओ घोड़ा ... और तेज ... " अफ़सर चीख़ा , ' नहीं तो हम कल तक भी नहीं पहुँच पाएँगे ! ज़रा और तेज ! " कोचवान एक बार फिर अपनी गर्दन ठीक करता है , सीधा हो कर बैठता है और रुखाई से अपना चाबुक हिलाता है । बीच-बीच में वह कई बार पीछे मुड़ कर अपनी सवारी की तरफ़ देखता है , लेकिन उस अफ़सर ने अब अपनी आँखें बंद कर ली हैं । साफ़ लग रहा है कि वह इस समय कुछ भी सुनना नहीं चाहता ।

                 अफ़सर को विबोर्ग पहुँचा कर योना शराबख़ाने के पास गाड़ी खड़ी कर देता है , और एक बार फिर उकड़ूँ हो कर सीट पर दुबक जाता है । दो घंटे बीत जाते हैं । तभी फुटपाथ पर पतले रबड़ के जूतों के घिसने की ' चूँ-चूँ , चीं-चीं ' आवाज़ के साथ तीन लड़के झगड़ते हुए वहाँ आते हैं । उन किशोरों में से दो लंबे और दुबले-पतले हैं जबकि तीसरा थोड़ा कुबड़ा और नाटा है ।


                 " ओ गाड़ीवाले ! पुलिस ब्रिज चलोगे क्या ? " कुबड़ा लड़का कर्कश स्वर में पूछता है । " हम तुम्हें बीस कोपेक देंगे । "
 *      *      *      *      *      *       *       *      *      *      *      *     *      *    *
                  योना घोड़े की लगाम खींचकर उसे आवाज़ लगाता है , जो चलने का निर्देश है । हालाँकि इतनी दूरी के लिए बीस कोपेक ठीक भाड़ा नहीं है , पर एक रूबल हो या पाँच कोपेक हों , उसे अब कोई एतराज़ नहीं ... उसके लिए अब सब एक ही है । तीनों किशोर सीट पर एक साथ बैठने के लिए आपस में काफ़ी गाली-गलौज और धक्कम-धक्का करते हैं । बहुत सारी बहस और बदमिज़ाजी के बाद अंत में वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि कुबड़े लड़के को खड़ा रहना चाहिए क्योंकि वही सबसे ठिगना है ।

                  " ठीक है , अब तेज़ चलाओ ! " कुबड़ा लड़का नाक से बोलता है । वह अपनी जगह ले लेता है , जिससे उसकी साँस योना की गर्दन पर पड़ती है ।
" तुम्हारी ऐसी की तैसी ! क्या सारे रास्ते तुम इसी ढेंचू रफ़्तार से चलोगे ? क्यों न तुम्हारी गर्दन ... ! "
                  " दर्द के मारे मेरा तो सिर फटा जा रहा है ," उनमें से एक लम्बा लड़का कहता है । " कल रात दोंकमासोव के यहाँ मैंने और वास्का ने कोंयाक की पूरी चार बोतलें चढ़ा लीं । "
                  " मुझे समझ में नहीं आता कि आख़िर तुम इतना झूठ क्यों बोलते
हो ? तुम एक दुष्ट व्यक्ति की तरह झूठे हो ! " दूसरा लम्बा लड़का ग़ुस्से में बोला ।
                  " भगवान क़सम ! मैं सच कह रहा हूँ ! "
                  " हाँ , हाँ , क्यों नहीं ! तुम्हारी बात में उतनी ही सच्चाई है जितनी इसमें कि सुई की नोक में से ऊँट निकल सकता है ! "
                  " हें , हें , हें ... आप सब कितने मज़ाक़िया हैं ! " योना खीसें निपोर कर बोलता है ।
                 " अरे , भाड़ में जाओ तुम ! " कुबड़ा क्रुद्ध हो जाता है । " बुढ़ऊ ,
तुम हमें कब तक पहुँचाओगे ? चलाने का यह कौन-सा तरीका है ? कभी चाबुक का इस्तेमाल भी कर लिया करो ! ज़रा ज़ोर से चाबुक चलाओ , मियाँ ! तुम आदमी हो या आदमी की दुम ! "
                 योना यूँ तो लोगों को देख रहा है , पर धीरे-धीरे अकेलेपन का एक तीव्र एहसास उसे ग्रसता चला जा रहा है । कुबड़ा फिर से गालियाँ बकने लगा है । लम्बे लड़कों ने किसी लड़की नादेज़्दा पेत्रोवना के बारे में बात करनी शुरू कर दी है ।

पढ़िए- बाबा का घर भरा रहे

योना उनकी ओर कई बार देखता है । वह किसी क्षणिक चुप्पी की प्रतीक्षा के बाद मुड़कर बुदबुदाता है , " मेरा बेटा ... इस हफ़्ते गुज़र गया । "
                  " हम सबको एक दिन मरना है । " कुबड़े ने ठंडी साँस ली और खाँसी के एक दौरे के बाद होठ पोंछे । " अरे , ज़रा जल्दी चलाओ ... खूब तेज ! दोस्तो , मैं इस धीमी रफ़्तार पर चलने को तैयार नहीं । आख़िर इस तरह यह हम सबको कब तक पहुँचाएगा ? "
                  " अरे , अपने इस घोड़े की गर्दन थोड़ी गुदगुदाओ ! "
                  " सुन लिया ... बुड्ढे ! ओ नर्क के कीड़े ! मैं तुम्हारी गर्दन की हड्डियाँ तोड़ दूँगा ! अगर तुम जैसों की ख़ुशामद करते रहे तो हमें पैदल चलना पड़ जाएगा ! सुन रहे हो न बुढ़ऊ ! सुअर की औलाद ! तुम पर कुछ असर पड़ रहा है या नहीं ? "
                  योना इन शाब्दिक प्रहारों को सुन तो रहा है , पर महसूस नहीं कर रहा ।
                  वह ' हें , हें ' करके हँसता है । " आप साहब लोग हैं । जवान हैं ... भगवान आपका भला करे ! "
                  " बुढ़ऊ , क्या तुम शादी-शुदा हो ? " उनमें से एक लंबा लड़का पूछता है ।
                  " मैं ? आप साहब लोग बड़े मज़ाक़िया हैं ! अब बस मेरी बीवी ही है  ... वह अपनी आँखों से सब कुछ देख चुकी है । आप समझ गए न मेरी बात । मौत बहुत दूर नहीं है ... मेरा बेटा मर चुका है और मैं ज़िंदा हूँ ... कैसी अजीब बात है यह । मौत ग़लत दरवाज़े पर पहुँच गयी ... मेरे पास आने की बजाए वह मेरे बेटे के पास चली गयी ... "
                 योना पीछे मुड़कर बताना चाहता है कि उसका बेटा कैसे मर गया ! पर उसी समय कुबड़ा एक लम्बी साँस खींच कर कहता है , " शुक्र है खुदा का ! आख़िर मेरे साथियों को पहुँचा ही दिया ! " 


और योना उन सबको अँधेरे फाटक के पार धीरे-धीरे ग़ायब होते देखता है । एक बार फिर वह खुद को बेहद अकेला महसूस करता है । सन्नाटे से घिरा हुआ ... उसका दुख जो थोड़ी देर के लिए कम हो गया था , फिर लौट आता है , और इस बार वह और भी ताक़त से उसके हृदय को चीर देता है । बेहद बेचैन हो कर वह सड़क की भीड़ को देखता है , गोया ऐसा कोई आदमी तलाश कर रहा हो जो उसकी बात सुने । पर भीड़ उसकी मुसीबत की ओर ध्यान दिए बिना आगे बढ़ जाती है । उसका दुख असीम है । यदि उसका हृदय फट जाए और उसका दुख बाहर निकल आए तो वह मानो सारी पृथ्वी को भर देगा । लेकिन फिर भी उसे कोई नहीं देखता । योना को टाट लादे एक क़ुली दिखता है । वह उससे बात करने की सोचता है ।
                  " वक़्त क्या हुआ है , भाई ? " वह क़ुली से पूछता है ।
                  " नौ से ज़्यादा बज चुके हैं । तुम यहाँ किसका इंतज़ार कर रहे हो ?
अब कोई फ़ायदा नहीं , लौट जाओ । "
                  योना कुछ देर तक आगे बढ़ता रहता है , फिर उकड़ूँ हालत में अपने ग़म में डूब जाता है । वह समझ जाता है कि मदद के लिए लोगों की ओर देखना बेकार है । वह इस स्थिति को और नहीं सह पाता और ' अस्तबल ' के बारे में सोचता है । उसका घोड़ा मानो सब कुछ समझ कर दुलकी चाल से चलने लगता है ।
***            ***           ***           ***           ***            ***          ***      ***

पढ़िए -कहानी प्रेरणा

                 लगभग डेढ़ घंटे बाद योना एक बहुत बड़े गंदे-से स्टोव के पास बैठा हुआ है । स्टोव के आस-पास ज़मीन और बेंचों पर बहुत से लोग खर्राटे ले रहे हैं । हवा दमघोंटू गर्मी से भारी है । योना सोये हुए लोगों की ओर देखते हुए खुद को खुजलाता है ... उसे अफ़सोस होता है कि वह इतनी जल्दी क्यों चला आया ।
               आज तो मैं घोड़े के चारे के लिए भी नहीं कमा पाया -- वह सोचता है ।
                एक युवा कोचवान एक कोने में थोड़ा उठकर बैठ जाता है और आधी नींद में बड़बड़ाता है । फिर वह पानी की बालटी की तरफ़ बढ़ता है ।
                " क्या तुम्हें पानी चाहिए ? " योना उससे पूछता है ।
                " यह भी कोई पूछने की बात है ? "

                " अरे नहीं , दोस्त ! तुम्हारी सेहत बनी रहे ! लेकिन क्या तुम जानते हो कि मेरा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा ... तुमने सुना क्या ? इसी हफ़्ते ... अस्पताल में ... बड़ी लम्बी कहानी है । "

                योना अपने कहे का असर देखना चाहता है , पर वह कुछ नहीं देख पाता । उस युवक ने अपना चेहरा छिपा लिया है और दोबारा गहरी नींद में चला गया है । बूढ़ा एक लम्बी साँस ले कर अपना सिर खुजलाता है । उसके बेटे को मरे एक हफ़्ता हो गया लेकिन इस बारे में वह किसी से भी ठीक से बात नहीं कर पाया
है । बहुत धीरे-धीरे और बड़े ध्यान से ही यह सब बताया जा सकता है कि कैसे उसका बेटा बीमार पड़ा , कैसे उसने दुख भोगा , मरने से पहले उसने क्या कहा और कैसे उसने दम तोड़ दिया । दफ़्न के वक़्त की एक-एक बात बतानी भी ज़रूरी है और यह भी कि उसने कैसे अस्पताल जा कर बेटे के कपड़े लिए । उस समय उसकी बेटी अनीसिया गाँव में ही थी । उसके बारे में भी बताना ज़रूरी है । उसके पास बताने के लिए इतना कुछ है । सुनने वाला ज़रूर एक लम्बी साँस लेगा और उससे सहानुभूति जताएगा । औरतों से बात करना भी अच्छा है , हालाँकि वे बेवक़ूफ़ होती हैं । उन्हें रुला देने के लिए तो भावुकता भरे दो शब्द ही काफ़ी होते हैं ।
                  चलूँ ... ज़रा अपने घोड़े को देख लूँ -- योना सोचता है । सोने के लिए तो हमेशा वक़्त रहेगा । उसकी क्या परवाह !
                  वह अपना कोट पहन कर अस्तबल में अपने घोड़े के पास जाता है । साथ ही वह अनाज , सूखी घास और मौसम के बारे में सोचता रहता है । अपने बेटे के बारे में अकेले सोचने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाता है ।
                  " क्या तुम डटकर खा रहे हो ? " योना अपने घोड़े से पूछता है ... वह घोड़े की चमकती आँखें देखकर कहता है , " ठीक है , जमकर खाओ । हालाँकि हम आज अपना अनाज नहीं कमा सके , पर कोई बात नहीं । हम सूखी घास खा सकते हैं । हाँ , यह सच है । मैं अब गाड़ी चलाने के लिए बूढ़ा हो गया हूँ ... मेरा बेटा चला सकता था । कितना शानदार कोचवान था मेरा बेटा । काश , वह जीवित होता ! "
                 एक पल के लिए योना चुप हो जाता है । फिर अपनी बात जारी रखते हुए कहता है , " हाँ , मेरे प्यारे , पुराने दोस्त । यही सच है । कुज्या योनिच अब नहीं रहा । वह हमें जीने के लिए छोड़कर चला गया । सोचो तो ज़रा , तुम्हारा एक बछड़ा हो , तुम उसकी माँ हो और अचानक वह बछड़ा तुम्हें अपने बाद जीने के लिए छोड़कर चल बसे । कितना दुख पहुँचेगा तुम्हें , है न ? "
                 उसका छोटा-सा घोड़ा अपने मालिक के हाथ पर साँस लेता है , उसकी बात सुनता है और उसके हाथ को चाटता है ।
                 अपने दुख के बोझ से दबा हुआ योना उस छोटे-से घोड़े को अपनी सारी कहानी सुनाता जाता है ।

                     ------------०------------

                                              --- मूल लेखक : अन्तोन चेखव
                                              --- अनुवाद : सुशांत सुप्रिय


लेखक


प्रेषकः सुशांत सुप्रिय
         A-5001 ,
         गौड़ ग्रीन सिटी ,
         वैभव खंड ,
         इंदिरापुरम ,
         ग़ाज़ियाबाद -201014
         ( उ. प्र. )

ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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होली के रंग कविताओं के संग

होली का त्यौहार यानि रंगों का त्यौहार , ये रंग हैं ख़ुशी के आल्हाद के , जीवंतता के , “बुरा न मानों होली है”के उद्घोष के साथ जीवन को सहजता से लेने के इन्हीं रंगों से तो रंग है हमारा जीवन , ऐसे ही विविध रंगों को सहेजते हुए हम आपके लिए लाये हैं  कुछ ख़ास कवितायें -

होली के रंग कविताओं के संग 


१—होली में 
———————
होली में
उड़े रे गुलाल
आओ रंगे तन मन हम!

बच्चों ने
थामी पिचकारी
भिगोने चले धम-धम!

बड़े चले
सब मिल कर
रंगे पुते जाने किधर!

स्त्रियों ने 
छेड़ी मीठी तान
नाचे गाएँ झूम झूम कर!

बच्चे बूढ़े
खाएँ मन भर
गुझिया मठरी ले ले थाल

कैसे कहें
रंगों ने जोड़े
दिल के टूटे हुए तार

होली आई
मस्ती भरी आज
करे मन वीणा झंकार।। 
———————————


२—होली पर 
——————-
दूर कहीं
सोच रही बिटिया
लेने आएगा भाई मुझे आज

सोचें देवर
पहली होली भाभी की
कैसे कैसे रंगना उन्हें आज

सरहद पर
सैनिक सपना देखे
अगली होली जाऊँगा मैं घर

मस्ती भरी होली
जैसी इस बार आई
ऐसी फिर आए सबके घर

खुशियों के रंग
मीठी गुझिया के संग
सबको बुलाए होली अगले वर्ष

सिंधारा देकर 
भेज रही बेटे को आज 
बिटिया के ससुराल में माँ।
———————————-
होली के रंग कविताओं के संग


३—पहली होली 
————————
तेरी
पहली होली
संग पिया परिवार के

खिलें
रंगों के इंद्रधनुष
तेरे घर-आँगन-द्वार में

महके
सुगंध पकवानों की
चतुर्दिक दिशाओं में

उड़ें
खुशियों के गुलाल
जहाँ-जहाँ तक दृष्टि जाए

दिखें
दूर-दूर तक चलती 
मस्ती भरी हवाएँ फागुन की 

रंगे
तन-मन तेरा
गाढ़े प्रेम रंग में

लाए
होली हर बार
नव उपहार आँचल में

हो सरल
हर कठिन परिस्थिति
हमारा आशीर्वाद होली में।
————————————-



४—रंग होली के 
———————-
रंग 
होली के 
तन से अधिक 
रंगे मन को 
गहनता से 
प्रेम में 

गहरा हो 
विश्वास तो 
जन्मती है कल्पना 
मन की आवाज़ 
करती उसे 
साकार  

तो चुन 
रंग कुछ ऐसे 
बने आवाज़ मन की 
रंग जाएँ रिश्ते भी 
निर्भय बन 
जीवन में 

हर रंग 
कहता सबसे 
सुनो मेरी कहानी 
बदलते हैं जीवन 
सही रंग से 

चलो 
कुछ रंग लेकर 
रंगे वो जिंदगियाँ 
लूट गए रंग जिनके 
उन्हें रंग आएँ 
अपनेपन में 

होली 
कहे अब 
दिखावा न हो 
हों मन कर्म भाव सच्चे 
तो खिले हर रंग 
आँगन में।
———————————-


५—-होली
——————-
होली 
———-
होली 
बरसाना की हो 
मथुरा वृंदावन की हो 
शांतिनिकेतन की 
गाँव शहर की हो
कहीं की भी हो 
खेले जाते जिसमें 
रंग फूलों के 
अबीर गुलाल के 
सच्चाई और विश्वास के 
तभी खिलते 
बिखरते सर्वत्र 
रंग उमंग उल्लास के
ख़ुशियों से सराबोर
जीवन में
पर 
सिर उठाती विकृतियाँ 
लील रही  
रंग होली के 
अब होली 
नहीं जगाती उमंग 
मन में रंगों से खेलने की 
जिनकी आड़ में 
विकृत मानसिकता 
करती बेरंग 
चेहरों को 
आइए 
खेलें होली 
शुचिता लिए रंगों से 
पकवानों की 
सुगंध के साथ
पर खेलें न कभी 
किसी की 
जिंदगी के साथ।
—————————
डा० भारती वर्मा बौड़ाई

लेखिका व् कवियत्री

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फिर से रंग लो जीवन


सुनो सखी , उठो
बिखरे सपनों से बाहर
एक नयी शुरुआत करो
किस बात का खामियाजा भर रही हो
शायद ...
मन ही मन सुबक रही हो
कालिख भरी रात तो बीत ही चुकी
नयी धूप , नया सवेरा
पेंड़ों पर चहकते पंछियों का डेरा
उमंग से भरे फूल देख रहे हैं तुम्हें
फिर तुम क्यों न भूली अपनी भूल
प्रेम ही तो किया था
ऐतबार के फूल अंजुली में भरकर आगे बढ़ी थीं
टुकड़े हुए अरमानों के महल
पर यही तो अंत नहीं है
इस विशालकाय भुवन में
एक कोना तुम्हारा है
जहाँ सतरंगी रंगों को
उमंग की पिचकारी में भरकर
दोनों बाहें फैलाकर
कोई बना सहारा है
आओ सखी आओ
अपने मन की होलिका जलाओ
दर्द तड़फ के  मटमैले आंसू
धो  डालो इस होली में
फिर इन्द्रधनुष के सारे रंग
भरो अपनी झोली में

सरबानी सेनगुप्ता 


लेखिका व् कवियत्री



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श्रीदेवी आज तू --------- लाइट,ऐक्सन,कैमरा यानी सबको तन्हा और, विरान कर गई। देखो हमारी भीगी नम आँखे------ हम कोई ऐक्टिंग नही करते, इसमे आज तेरे निभाये हर किरदार की वे---- हर एक सूरत उतर गई। तू क्या जाने कि तेरे जाने से, हमारी मुहब्बत के दरख्त़ो के सारे महबूब पत्तो को, तू दर-बदर-कर गई। हो सकता है कि इन दरख़्तो पे लगे फिर नये पत्ते, फिर पहले सी बहार आये, लेकिन तू क्या जाने कि किस तरह तेरे जाने से, हमारे दौरे शाख की बुलबुल, हमेशा कि खातिर हमारे मुहब्बत के शाख से उड़ गई। शायद आसमां पे भी खुदा को, अपनी सिनेमा की खातिर तेरे जैसे किरदार की जरुरत थी, शायद आज इसी से--------- तू हमसे और हमारे जैसे तमाम चाहने वालो से बिछड़ गई। सच यकीन नही हो रहा एै "रंग" आज----- की हमारे दिल और हमारे सिनेमा की श्रीदेवी मर गई।

अलविदा हम और हमारे दौर के कला की बेमिसाल मूरत यानी श्रीदेवी को।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर--


कवि

फोटो क्रेडिट -bollywoodhungama.com



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बच्चों के एग्जाम और मम्मी का टेंशन

बच्चों के एग्जाम शुरू हो गए हैं |एग्जाम के दिन यानी सपने ,  पढ़ाई , मेहनत और टेंशन के दिन | मुझे अभी भी याद आता है वो दिन जब मेरे  बेटे का मैथ्स का एग्जाम था |  उसे रात दो बजे तक पढ़ाने के बाद सुबह से उसे स्कूल भेजने की तैयारी में लग गयी थी | मन में उलझन सी थी बार –बार उसके वो सवाल याद आ रहे थे जिन्हें समझने में उसे थोड़ी ज्यादा देर लगी थी | चलते फिरते उसे उनके फार्मूले  याद करवा रही थी |आल दा बेस्ट कह कर बेटे को भेज तो दिया पर मन में खिच –खिच सी होती रही | क्या वो सारे सवाल हल कर पायेगा ? क्या वो अच्छे नंबर ला पायेगा ? न जाने कितने सवाल बार –बार दिमाग को घेर रहे थे | इंजायटी बढती जा रही थी |खैर पेपर हो गया | पर जब –जब बच्चों के एग्जाम होते हैं मेरी ही तरह सब माएं टेंशन से घिर जाती हैं | 

                   ऐसा ही टेंशन का एक किस्सा शर्मा अंकल सुनाते हैं, “  पिछले दिनों मैं सविता के घर गया। शाम को घूमने और मूड़ फ्रेश करने का समय होता है। इस समय सविता और उनके बच्चों को कमरे में देखकर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ। आज भी उस दिन का दृश्य मुझे याद है-बच्चे कमरे में पुस्तक लिये पढ़ने का अभिनय कर रहे थे और सविता बाहर बरामदे में बैठी थी, जैसे चौकीदारी कर रही हो। मुझे यह सब देखकर बड़ा विचित्र लगा था। उस दिन बातें औपचारिक ही हो पायी। मुझे ज्यादा जोर से बोलने पर मना करती हुई कहने लगी जरा धीरे बोलिये, बच्चे पढ़ रहे हैं  अगले महीने से उन लोगों की परीक्षा शुरू होने वाली है।
                       मीता जी का किस्सा  भी इससे अलग नहीं है | मीता   जी कहती हैं -कि शाम पांच से आठ और सुबह चार से छः का समय पढ़ाने के लिए इसलिये मैंने निर्धारित किया है, क्योंकि रात आठ बजे के बाद बच्चे ऊंघने लगते है  और जल्दी खाना दिया  तो सो जाते हैं । वैसे, सुबह चार बजे पढ़ने से जल्दी याद होता है, फिर छः बजे के बाद मैं घर के दूसरे कार्यो में व्यस्त हो जाती हूं।

आखिर क्यों 100 % के टेंशन में पिस रहे हैं बच्चे

                          मैं हूँ , सविता हो या मीता  यह समस्या आज हर घर में स्पष्ट देखने को मिलती है।, पढाई और एग्जाम  का प्रेशर  बच्चों पर तो होता ही हैं बच्चों के साथ-साथ मम्मी की भी दिनचर्या बदल जाती है। कहीं आना-जाना नहीं, पिक्चर देखना बंद,टी वी बंद ,  बच्चों के ऊपर सारा दिन निगरानी में ही निकल जाता है, कोई मिलने आये तो औपचारिक बातें करना, ज्यादा जोर से बातें करने से मना करना आदि।कुल मिला कर पूरा तनाव का वातावरण तैयार हो जाता है |  गौर किया जाए तो कहीं न कहीं पापा-मम्मी उनके परीक्षा फल को अपना प्रेस्टिज ईशु बना लेते हैं। फलां के बच्चे हमेशा मेरिट में आते हैं  उनके पापा-मम्मी उनका कितना ध्यान रखते हैं , आदि बातें सोचकर लोग ऐसा करते हैं। 


कैसे दूर करें बच्चों के एग्जाम और मम्मी का टेंशन 

                             परीक्षा के दिनों में अधिकतर माताएं  बच्चों को लेकर इस कदर परेशान होती  हैं, जैसे बच्चे उनके लिये समस्या हो। बच्चे तो पहले से ही एग्जाम टेंशन झेल रहे होते हैं | इस भयग्रस्त वातावरण का बच्चों के स्वास्थ्य , मानसिक स्थिति और पढ़ाई पर बुरा प्रभाव पड़ता है, परीक्षा के दौरान बच्चों और पेरेंट्स पर बेहतर रिजल्ट को लेकर मानसिक दबाव जबरदस्त होता है। ऐसे समय में कई बार बच्चों को कुछ मनोवैज्ञानिक समस्याए हो जाती है। वे एंजाइटीके शिकार तक हो जाते है और अवसाद में चले जाते है, जो कि काफी गंभीर है। परीक्षा के इस तनाव से कैसे निपटा जाए, आइए जानते है

बच्चे को लगे वो सब भूल जाएगा 


 सबसे पहली बात है कि बच्चों कि उम्र के हिसाब से उनके कोर्स डिजाईन होते है। जो बच्चे रोजाना पूरे  साल पढाई करते है, उन्हें इस तरह की  समस्या नहीं आती है। इसके अलावा पढाई के दौरान समय-समय पर माँक टेस्ट  और फीडबेक लेते रहे, उससे भी तनाव कम होता है। रोजाना एक्सरसाइज और ध्यान करने से भी बेस लाइन एंजाइटी (जिसमें नर्वसनेस बहुत जल्दी आ जाती है।) बहुत कम हो जाती है। इसके अलावा बच्चो को रोजाना अच्छी नींद लेना भी जरुरी है। पढाई के दौरान बच्चे अपने को क्रॉस चेक बिलकुल न करे, क्योंकि इस कारण से भी उनके अंदर एंजाइटी बढ़ सकती है। पढ़ते वक्त रटने के बजाय पॉइंट्स और कांसेप्ट क्लियर करें और हर चेप्टर के मुख्य पॉइंट्स को नोट जरुर करते रहे।
              परीक्षा के दौरान माँ  को यह चाहिए कि वो बच्चों के खान-पान पर विशेष ध्यान दे। दिमाग को उत्तेजित करने वाले पदार्थ जैसे चाय, कॉफ़ी को बच्चों को ज्यादा न दे। फ़ास्ट फूड्स कि जगह हेल्थी डाइट दें। उनकी नींद का ख्याल रखे। सोशल फंक्शन जैसे शादी वगैरह  में भी उन्हें न  ले जाएं और जितना हो सके पढाई का माहौल  घर में बनाएं।

त्यौहार और परीक्षा के बीच बच्चे कैसे बनाएं संतुलन 


 फाइनल एग्जाम त्यौहार के सीजन में होते हैं , एक तरह से ये  मन और इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखने की भी परीक्षा होती है । ऐसे में बच्चो को  चाहिए कि वो त्यौहार के चक्कर में अपने करियर  और पढाई से समझौता  ना करें। पढाई उनका प्राथमिक लक्ष्य है,जिसे लेकर वे हमेशा गंभीर रहे। त्यौहार उनका ध्यान पढाई से हटा सकते है। इसलिए उनपर ध्यान देने के बयाय वो पढाई पर ज्यादा ध्यान दें।
            माँ  को चाहिए त्यौहार के सीजन में भी जितना हो सके,घर माहौल  पढाई वाला बनाये रखे, ताकि बच्चों का मन ना भटके। बच्चो का कमरा ऐसी जगह होना चाहिए जहा महमानों कि आवाजाही ना हो, ताकि बच्चे शांति से पढाई के सके।


बच्चों के मन से परीक्षा का डर कैसे दूर करें  

जब बच्चा स्ट्रेस में खाना -पीना , सोना कम कर दे 

             स्ट्रेस को दूर करने के लिए सबसे अच्छा तरीका है कि बच्चे पर्याप्त नींद ले। पढाई के बीच  में दो से तीन  घंटे में कुछ न कुछ खाते रहे। परीक्षा के दौरान नई चीज बिलकुल न पढ़े, बल्की जो पहले पढ़ चुके है, उन्हें अच्छे से दोहरायें ।
               आप  बच्चो पर किसी तरह का दबाव न डालें। उन्हें पढाई के लिए प्रोत्साहित करें कि कैसे वो अच्छे से पढाई कर सकते है। उन्हें पढाई के लिए इजी ट्रिक्स बताये।

कैसा हो आपका बच्चों के साथ व्यवहार 

           चूँकि परीक्षा का दबाव बच्चो के साथ पेरेंट्स को भी होता है।इसलिए बच्चो को चाहिए कि अगर पेरेंट्स उन्हें कुछ कह भी देते है तो उस बात को दिल से ना लगाकर अपनी पढाई में पूरा ध्यान लगाए।
                       माँ को समझना  यह चाहिए कि बच्चों के अंदर जितनी क्षमता है,
उसके अनुरूप ही उनसे अपेक्षाए रखे। पेरेंट्स अपनी अधूरी इच्छाए बच्चो के जरिये पूरा करने की कोशिश ना करें।

जब बच्चा बहुत निराश हो 


अगर बच्चे को लग रहा है की वो पास नही हो पायेगा तो वो निराशा में डूब जाता है | ऐसे में बच्चा कम खाता है , एकांत में रहना पसंद करता है , सुस्त दिखाई देता है | ऐसे में बच्चे को खुलकर अपनी समस्या माता –पिता को बतानी चाहिए |
                 बच्चा अगर निराश दिखाई दे तो उसे अकेला न छोड़े | उसके साथ समय बिताएं | उसकी बात को ध्यान से सुनें | तुरंत उत्तर न देने लगें | अगर आप को भी लग रहा है की कहीं बच्चा वास्तव में फेल हो सकता है तो भी उसे प्रोत्साहित करें | अगर उसकी निराशा ज्यादा है तो मनोचिक्त्सक की सलाह लें |

सामजिक दवाब से बच्चे को कैसे बचाएं 


                  अरे आप का बिट्टू तो टॉप करेगा ही , या फलां बच्चा ज्यादा होशियार है | ये दोनों बातें बच्चे के मन पर सामाजिक दवाब को बढ़ाती हैं | जिससे बच्चा नर्वस होने लगता है | ऐसे में बच्चों को इस प्रकार के लोगों से बचना चाहिए जो उनके आगे हाई स्टैण्डर्ड रखते हैं या फ़ालतू तुलना से उनका मनोबल तोड़ते हैं |
               भूल कर भी अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों से न करें | अगर घर आया कोई व्यक्ति ऐसा कर रहा है तो उसके सामने ही अपने बच्चे के पोजिटिव पॉइंट्स बोले | इससे बच्चे का मनोबल बढेगा |
             तो ये थे कुछ टिप्स जिन्हें एग्जाम के दिनों में इस्तेमाल कर बच्चो का अपना टेंशन दूर कर सकते हैं | जिससे एग्जाम भी स्ट्रेस फ्री निपट जायेंगे व् रिजल्ट  भी मन माफिक आएगा |
सरिता जैन

                         
लेखिका
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