गीली मिटटी के कुम्भकार

बच्चे गीली मिटटी की तरह होते हैं | आप ही वो कुम्भकार हैं जो अपने बच्चों को गढ़ते हैं | अगर आप चाहते हैं कि आपके बच्चे बड़े होने पर आपसे हर सुख-दुःख साझा करें तो इसकी शुरुआत उनके बचपन से करनी होगी |

गीली मिटटी के कुम्भकार

मेरी सहेली रागिनी मेरे घर आई हुई थी. अभी कुछ ही देर हुए होंगे कि मेरी बेटी का फोन आ गया, मैं रागिनी को चाय पीने का इशारा कर बेटी के साथ तन्मयता से बातें करने लगी. हर दिन कि ही तरह बेटी ने अपने दफ्त्तर की बातें, दोस्तों की बातें बताते, घर जा कर क्या पकाएगी इसका मेन्यू और तरीका डिस्कस करते हुए मेरा, अपने पापा, नाना-नानी सहित सबका हाल-चाल लेती हुई फोन को रखा. जैसे ही मैंने फोन रखा कि रागिनी बोल पड़ी,“तुम तो बड़ी लकी हो, तुम्हारी बेटी तुमसे कितनी बातें करती है. मेरे बेटें तो आठ-दस दिनों तक फोन नहीं करते हैं. मैं करती हूँ तो हूँ-हाँ कर संछिप्त सा बतिया कर फोन ऑफ करने उत्सुक हो जाते  हैं. लड़की है ना, इसलिए इतना बातें करती है.

मैंने छूटते कहा,“नहीं, ऐसी बात नहीं है. मेरा बेटा भी तो हॉस्टल में रह कर पढ़ रहा है. वह भी अपनी दिन भर की बातें, पढाई-लिखाई के अलावा अपने दोस्तों के विषय में और उसके कैंपस में होने वाली गतिविधियों  की भी जानकारी देता है. सच पूछो तो रागिनी मुझे या मेरे बच्चों को आपस में बातें करने के लिए टॉपिक नहीं तलाशने होते हैं”.

                              मैं रागिनी के अकेलेपन और उदासी का कारण समझ रही थी. बच्चे तो उसके भी बाहर चले गए थे पर उसका अपने बच्चों के साथ सम्प्रेषण का स्तर बेहद बुरा था. उसे पता ही नहीं रहता कि उसके बच्चों के जीवन में क्या चल रहा है. बेटें उदास हैं या खुश उसे ये भी नहीं पता चल पता. कई बार तो वह, “बेटा खाना खाया, क्या खाया” से अधिक बातें कर ही नहीं पाती थी.


            मैं रागिनी को बरसों से जानती हूँ, तबसे जब हमारे बच्चे छोटें थें. मैं जब भी रागिनी के घर जाती, देखती कि वह या तो किसी से फोन पर बातें कर रही है या कान में इयरफोन लगा अपना काम कर रही है. उसके घर दिन भर टी वी चलता रहता था. बच्चें लगातार घंटों कार्टून चैनल देखते रहते. रागिनी या उसके पति का भी पसंदीदा टाइम पास टी वी देखना ही था. अब जब बच्चों ने बचपन में दिन का अधिकाँश वक़्त माँ-पिता से बातें किये बगैर ही बिताया था तो अचानक से उन्हें सपना तो नहीं आएगा कि माँ-पापा से भी दिल की बातें की जा सकती हैं.


माता -पिता हैं गीली मिटटी के कुम्भकार 


वाकई ये माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती है कि वो अपने बच्चों के वक़्त को – उनके बचपन को किस दिशा में खर्च कर रहें हैं. 


बच्चे तो गीली मिटटी की तरह होतें हैं. उस गीली मिटटी को अच्छे आचार-व्यवहार और समझदारी की मद्ध्यम आंच में पका कर ही एक इन्सान बनाया जाता है. जन्म के पहले-दूसरे महीने से शिशु अपनी माँ की आवाज को पहचानने लगते हैं. 

महाभारत में अभिमन्यु तो अपनी माँ के गर्भ से ही चक्रव्यूह  भेदने की कला सीख कर पैदा हुआ था. रिसर्च भी  ये बताते हैं कि बच्चा गर्भ से ही अपने माता-पिता की आवाज को सुनने समझने लगता है. इस लिए बच्चों के सामने हमेशा ही अच्छी- अच्छी बातें करें. अनगढ़ गीली मिटटी के बने बाल मानस को आप जैसे चाहें ढाल लें. इस पर बाल मनो चिकित्सक मौलिक्का शर्मा बताती हैं कि जो माता-पिता अपने बच्चों से शुरुआत से ही खूब बतियातें हैं, हँसतें हैं हंसाते हैं, अपनी रोजमर्रा की छोटी छोटी बातें भी शेयर करते हैं, उन के बच्चों को भी आदत हो जाती है अपने पेरेंट्स से सारी बातें शेयर करने की. और ये सिलसिला बाद की जिन्दगी में भी चलती रहती है. लाख व्यस्तताओं के बीच अन्य दूसरी जरूरी कामों के साथ बच्चे अपने माता-पिता से जरुर बतिया लेंगे.



अपने बच्चों को दें क्वालिटी टाइम 


संयुक्त परिवारों में बच्चों से बातें करने, उन्हें सुनने वाले कई लोग होते हैं माता पिता से इतर, इसके विपरीत एकल परिवारों में माँ-बाप दोनों अपने अपने काम से थके होने चलते बच्चों को क्वालिटी टाइम ही नहीं देते हैं बातचीत करनी तो दूर की बात है.


 होली फॅमिली हॉस्पिटल , बांद्रा, मुंबई के चाइल्ड साइकोलोगिस्ट डॉक्टर अरमान का कहना है कि “अपने बच्चों के बचपन को सकारात्मक दिशा में खर्च करना पेरेंट्स का प्रथम कर्तव्य है”. 


अक्सर घरों में बच्चों को टी वी के सामने बिठा दिया जाता है, खाना-पीना खाते हुए वे घंटों कार्टून देखते रहतें हैं. खुद मोबाइल, कंप्यूटर या किसी भी अन्य चीज में व्यस्त हो जातें हैं. इस दिनचर्या में एक बेहद औपचारिक बातों के अलावा पेरेंट्स बच्चों से बातें ही नहीं करतें हैं.




बच्चों से बचपन से करें बात




बचपन से डालें बातचीत की आदत 

बच्चे के सामने बातें करना मानो आईने के समक्ष बोलना. आपके बोलने की लय, स्वर, लहजा, भाषा वे सब सीखते हैं. बातचीत ही वो पल होतें हैं जब आप अपने अनुभव और विचारों से उन्हें अवगत करतें हैं. अपनी सोच उनमें रोपित करतें हैं. जैसा इंसान उसे बनाना चाहतें हैं वैसे भाव उसमे भरतें हैं. आप जब बूढ़े हो जाएँ और तब भी आपके बच्चें आपसे बातें करने को लालायित रहें इसके लिए आपको उसके गोद में रहने से ही शुरुआत करनी होगी.


१- छोटे बच्चों को खिलाते पिलाते, मालिश करते, नहलाते यानि जब तक वह जगा रहे उसके साथ कुछ न कुछ बोलतें रहें. ऐसे बच्चे जल्दी बोलना भी शुरू करतें हैं.
२- थोड़ा बड़ा होने पर गीत और कहानी सुनाने की आदत डालें. कथा-श्रवण की आदत उसे कुछ ही वर्षों में पठन के लिए उत्प्रेरित करेगी. रंग बिरंगे किताबों से उन्हें लुभाएँ और किताबों से दोस्ती कराने की भरसक कोशिश करें.
3- टीवी चलाने के घंटे और प्रोग्राम तय करें. अनवरत अनर्गल अनगिनत वक़्त तक टी वी आप भी ना देखे ना ही बच्चें को देखने दें. अपने मन को यदि आप थोड़ा साध लेतें हैं तो यकीन मानिये आप स्वअनुशासन का एक बेहतरीन पाठ अपने बच्चों को पढ़ा देंगें.
४- छोटे बच्चों में आप कई अच्छे संस्कार रोपित कर सकतें हैं अपने सम्प्रेषण के जरिये. जैसे देश प्रेम, स्वच्छता. सच बोलना, लड़की को इज्जत देना इत्यादि. आज का आपके द्वारा रोपित बीज रूपेण संस्कार के वट वृक्ष के तले भविष्य में समाज और देश खुशहाल होगा.
६- छोटा बच्चा यदि कुछ बोलता है तो उसे ध्यान से सुनें. कई बार मातापिता बच्चों की बातों को अनसुनी करते हुए अपने धुन में रहतें हैं. अपने बच्चों की बातों को तवज्जों दे, उन्हें ये महसूस होना चाहिए कि आप उनकी बातों को हमेशा ध्यान से सुनेगें चाहे कोई और दुनिया में उसकी बातें सुने या नहीं. सच कहा जाये तो उससे बढ़ कर दुनिया में कुछ नहीं.
७- लगातार सम्प्रेषण से ही आप बच्चे में किसी भी तरह की आ रही तब्दीलियों को भांप सकेंगें. ठीक इसी तरह जब आप से अलग वह रहेगा/रहेगी तो आपकी अनकही बातों को वह महसूस कर लेगा. मेरी बेटी हजारों मील दूर फोन पर मेरी आवाज से समझ जाती है कि मैं बीमार हूँ , दुखी हूँ या उससे कुछ छुपा रहीं हूँ.
८- बच्चों के संग बोलते-बतियातें आप दुनियादारी की कई बातें उन्हें सीखा सकतें हैं. एकल परिवार में रहने वाला बच्चा भी इसी जरिये रिश्तों ओर समाज के तौर तरीकों से वाकिफ होता जाता है. बच्चें यदि आपसे पूरी तरह खुले रहेंगे तो आप उन्हें बैड टच-गुड टच और  सेक्स सम्बंधित ज्ञान भी आसानी से दे सकेंगें.
९- सिर्फ छुट्टियों में बात करने या वक़्त देने वाली सोच से आप बच्चों के कई हाव-भाव से अनभिग्य रह जातें हैं. हर दिन होते रहने वाली बातचीत आपको बच्चें के मानस से जोड़ देती है. परीक्षा की घडी हो या पहले प्यार का पल युवा होते बच्चें, अपनी बचपन की आदतानुसार आपसे शेयर करतें रहेंगे. फिर दुनिया में आपसे बेहतर काउन्सलर उसके लिए कोई नहीं होगा.
१०- यकीन मानिये अपने बच्चों से बेहतर मित्र दुनिया में कोई नहीं होता है. सम्प्रेषण वह पुल होता है जो आपको अपने बच्चें से जोड़े रखता है ताउम्र.
   


चाइल्ड सायकोलोजिस्ट  डॉक्टर रीमा सहगल कहतीं हैं कि निरंतर संवाद से बच्चें भावनात्मक रूप से जुड़ें रहतें हैं फिर उनकी विकास की सीढियां हो या आपकी उम्र की ढलान, दोनों स्वत: एक दूजे से जुड़े सुखद भाव से जीवन नैया को पार लगा लेतें हैं. 


 
रीता गुप्ता 
रांची  


लेखिका



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