March 2018
अपराध बोध

 सर्दी हो या गर्मी, वह अपने नियमों की पक्की, सुबह जल्दी उठकर मंदिर जाना। उसके बाद ही चाय, पानी व अन्य काम करना। आज भी वह मंदिर से लौट चुकी थी। उसकी बहु अभी तक सो रही थी। बहु के नहीं उठने पर तमतमाई जोर की आवाज से सारे घर की चुपी को तोड़ दी, सारा दिन सोती ही रहेगी क्या ? जल्दी उठ ! सूरज सिर पर खड़ा है, ये बेषर्मों सी सो रही है।

सुनील की पत्नी जल्दी से कपड़े संभालते हुए उठी, दुपट्टा  सिर पर लेकर सबसे पहले सास के चरण छुए। खुश रहो ! दूधो नहाओ पुतो फलो! आजकल की बहुरियों का तो दिमाग ही खराब हो गया है। शर्म  लिहाज कुछ रही ही नहीं। अपनी सास के सामने भी पैर पसारे सोती रहती हैं। हम तो हमारी सास से पहले उठ जाती थी। सुबह जल्दी से नहाकर, चाय के साथ ही सास के पांव छूती । आज कल तो न दिन का पता न रात का। जब देखो खसमों के साथ कमरे में घुसी रहती हैं।

सुनील की पत्नी एक शब्द  भी नहीं बोली! तब तक चाय बनकर तैयार हो गई। इस दौरान सुनील भी घर आ चुका था। लो माॅं जी ! रख दे ! सुना तूने शर्मा  जी के लड़के की बहु के लड़का हुआ है, तुम्हारे साथ ही उनके लड़के की शादी  हुई थी। दो बार बच्चा गिराने के बाद। अब लड़का हुआ है। मुझे भी पोता चाहिए। बहुरी सुन रही है ना, मुझे भी पहला पोता ही चाहिए। हमारे पास इतने पैसे नहीं की हम भी वो क्या कहते हैं? सुनाग्राफी करवा लें। मेरा बेटा इतनी मेहनत कर हमारा खर्च चलाता है, कहीं लड़की हो गई तो कैसे संभालेगा, |

  सर्द हवाओं की सायं सायं ने जल्द ही सड़कों पर सन्नाटा फैला दिया।


आज सुनील का मन आॅटो लेकर जाने का नहीं था। उसे मालूम था कि ऐसे मौसम में सवारी मिलना मुश्किल  है, पर जाना तो पड़ेगा। घर का खर्च का अंतिम विकल्प यही आॅटो है। रोजाना की भांति उसने अपनी गाड़ी कस्बे के रेलवे स्टेशन  के बाहर नियत स्थान पर खड़ी कर दी। आज रात्रि 9 बजे यात्री ट्रेन समय पर थी। एक सवारी को वह छोड़कर वह आ चुका था। रात्रि 11.30 बजे की ट्र ेन का इंतजार कर रहा था। ट्रेन कोहरे के कारण लेट थी। वास्तविक समय का पता नहीं था। ठंड का कहर भी बढ़ता जा रहा था। उसने स्वयं को आॅटो में कैद कर सोने का विचार बनाया।

फैसला

आॅटो में बैठ उसने एक नजर आस पास दौड़ाई कहीं कोई नहीं। सारे दिन भार ढ़ोती सड़के अब शांत  होकर सो रही थी। आॅटो के पीछे दीवार के पास एक कुतिया अपने बच्चों के साथ सिमटे लेट रही थी। तभी उसकी नजर दूर से आती रोशनी पर गिरी। दूर से चमचाती रोशनी बड़ी तेजी से उसकी दिशा  में बढ़े जा रही थी। जरूर कोई गाड़ी तेजी में होगी। अचानक वह गाड़ी अस्पताल के पीछे से गुजरते गंदे बड़े बरसाती नाले के पास रूक गई। गाड़ी की हैड लाईटें बंद हो गई। रोड़ लाईट की धुंधली रोशनी में सड़क के किनारे खड़ी गाड़ी में कोई हलचल नहीं हो रही थी। अभी तक दरवाजा नहीं खुला था। थोड़े विराम के बाद दायीं ओर से दरवाजा खुला, एक लम्बा तगड़ा उतरा। चारों तरफ नजरें दौड़ाकर, गाड़ी के अंदर कुछ इशारा करते हुए गाड़ी की खिड़की में मुॅंह डाला। बायीं ओर का दरवाजा खुला। एक महिला अपने दोनों हाथों को सीने से लगाए, जिनके बीच में कपड़ा लिपटा था, गाड़ी से उतरी। महिला ने चारों तरफ नजरें दौड़ाई, एक खामोशी  के बाद बड़ी तेजी से नाले की ओर बढ़ी। नाले के पास जाकर एक बार फिर रूक कर चारों ओर नजरें दौड़ाई। इस बार उसने कपड़े को सीने से हटाकर नाले में फैंक दिया। बड़ी तेजी से इधर-उधर ताकती गाड़ी की ओर लपकी।

महिला पुरूश दोनों बिजली सी तेजी के साथ गाड़ी में बैठ गए। गाड़ी चालू हुई और बड़ी तेजी से यू टर्न मारते हुए उसी दिशा में ओझल हो गई जिस दिशा  से आई थी। एक बार फिर सन्नाटा कहीं कोई भी नहीं दिख रहा था। सिवाय रात के अंधेरें में चमकते तारों के, जमीन पर लेटी सड़क के, भौंकते आवारा कुत्तों के, सड़क के किनारों पर जलती लाईटों के, बहतीहवाओं के, बहुत कुछ था पर कुछ भी नहीं था।

 सुनील के दिल में कई सवाल तो उठे पर ठंड के बहाव में सभी के सभी दिमाग के एक कोने में जम कर रह गए। सिर खुजाते हुए सुनील अपने आप में बड़बड़ाते हुए, आॅटो के पीछे की सीट पर कम्बल के बीच दुबक कर लेट गया। चाय वाले की आवाज से उसकी आंख खुली। वह जल्दी से उठा ओर कम्बल लपेटे हुए स्टेषन की ओर बढ़ा। अभी सवारी गाड़ी के आने में समय था। महाराज - एक गर्मागर्म चाय देना। चाय की एक-एक घूंट उसके शरीर को उर्जा दे रही थी। तभी स्टेशन पर घोशण हुई, यात्री कृप्या ध्यान दे, यात्री गाड़ी प्लेट फार्म न. एक पर अगले दो मिनट में पंहुचने वाली है।

टिफिन

सुनील जल्दी से चाय खत्म कर ठीक रोज के निष्चित स्थान पर जाकर खड़ा हो गया। दो मिनट बाद गाड़ी स्टेश न पर पंहुच गई। सुनील को भी एक यात्री मिल गया। सुनील ने उन्हें टैक्सी में बिठा, मंजिल की ओर बढ़ा। गाड़ी अभी थोड़ी दूर बढ़ी ही थी कि सुनील ने देखा कि बहुत सारी भीड़ नाले के पास खड़ी है। सुनील ने सवारी से अनुरोध कर गाड़ी को रोका। जल्दी से भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा और देखा एक कपड़े के ऊपर शिशु  बालिका का शव पड़ा है, जिसकी नाल भी अभी पूरी तरह कटी नहीं, खून से सनी है।


 यह सब देखकर उसकी आंख के आगे रात का सारा घटनाक्रम दौड़ने लगा। उसके हाथ पैर फुलने लगे, सिर चकाराने लगा। जिस तेजी से वह भीड़ को चीरता हुआ आया था, अब उसी भीड़ से बाहर निकलना मुष्किल हो रहा था। भीड़ के बीच से पीसता हुआ गाड़ी तक पंहुचा। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था। गाड़ी को स्टार्ट कर सवारी से बिना बोले मंजिल की ओर बढ़ा।

इस दौरान उसके दिमाग में वही घटनाक्रम घूम रहा था, सवाल उठ रहा था कि इतना पैसा होने पर भी बच्ची को क्यों फैंक गए ? उन्हें दया नहीं आयी। 

काश  रात को ही मैं मौके पंुहच जाता और बच्ची की जान बचा लेता। मन ही मन अपने आप को कोस रहा था। सवारी को छोड़ वह सीधा घर पंहुचा, बिना बोले चारपाई पर लेट गया। उसकी पत्नी और अम्मा ने आज तक उसे इस तरह खामोश , बिना शोर  गुल किए घर में घुसते नहीं देखा था। आज उन्हें वह ठीक नहीं दिख रहा था। माॅं ने बहु की ओर देखा, बहु ने जैसे सब समझ लिया हो, वह सुनील के पास गई। आज आप बड़े परेशान लग रहे हैं। क्या हुआ ? सब ठीक तो है ना ,,, क्या हुआ बोलते क्यो नहीं ?

सुनील - नहीं कुछ नहीं हुआ। कुछ तो है तभी तो बैचेन दिख रहे हो। पत्नी के आग्रह पर सुनील ने सारा घटनाक्रम पत्नी को बता दिया। उसकी पत्नी भी सुनकर हैरान रह गई, पर उसने हिम्मत करते हुए कहा कि आप क्यों परेशान होते हो, आपने गुनाह थोड़ी किया है। जिसने किया है वह भुगतेगा। एक खामोशी  के बाद सुनील बोला, कोई नहीं भुगतेगा, भुगतेगी वो माॅं जिसकी वह बच्ची थी,भुगता उस बच्ची ने अपनी जान देकर |


अर्जुन सिंह






                     

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अहसास

कहते हैं बच्चे और बूढ़े एक सामान होते हैं ... बात -बात पर जिद्द करना मचलना , गुस्सा दिखाना और अपनी ही बात से मुकर जाना बढती उम्र में न जाने क्यों आने लगता है | जब कोई बच्चा होता है तो उसे अहसास होता है कि माता -पिता हमारे लिए  कितना कर रहे हैं ... पर क्या बुजुर्गों को भी ये अहसास होता है |


Ahsaas-Short story in hindi



                                                      80 बरस से ऊपर की उम्र , खाया -पिया कुछ पचता ही नहीं  , फिर भी न जाने क्यों जानकी देवी की जुबान साधारण खाने को देखते ही इनकार कर देती , हर समय अच्छे खाने  की फरमाइश करती | कभी बेसन के सेव , कभी पूरियाँ , कभी घी भरा सोहन हलवा ,   यही खाती | खा तो लेतीं पर पचा न पातीं | दस्त लग जाते | डॉक्टर ने भी तला -भुना खाने से मना  किया था , परन्तु जानकी देवी मानती नहीं , मनपसंद खाना न मिलने पर, जिद्द पकड़ लेती ,  पूरा घर सर पर उठा लेती | सबके सामने बहू  को दोष देते , तोहमत लगाते हुए कहतीं ," आजकल की बहुएं , बस चार रोटी तवे पर डाल कर खुद को कमेरा समझने लगती हैं | एक हमारा ज़माना था , मजाल है कि सास का कहा टाल  जाएँ | बताओ आज कहा था , २ , ४ पकौड़ी बना दे , वो भी नहीं बनायी | ऊपर से डॉक्टर का बहाना ले लेती हैं | ये तो मेरा बेटा श्रवण पूत है जो  साथ रह रही है , वरना कब की उसे ले कर अलग घर  बसा लेती |

                               शाम तक बात बेटे किशोर के पास पहुँच ही जाती | हमेशा की तरह किशोर अपनी पत्नी मृदुला को डांटते हुए कहता ," क्या तुम मेरी माँ को उनके मन का बना कर खिला नहीं सकती | माँ ने मेरे लिए कितना कुछ किया है , मैं उनके लिए उनकी इच्छा का खिला भी नहीं सकता |

लघुकथा - सीख


मृदुला तर्क देती ," मैं भरसक कोशिश करती हूँ  , माँ  की सेवा करने की , वो मेरी माँ जैसी ही हैं , पर क्या आप को पता है माँ का पेट कितना ख़राब रहता है , सादा खाना तो पचा नहीं पाती हैं , भारी खाना  खाते ही दस्त लग जाते हैं | कपडे गंदे हो जाते हैं | कई बार तो बाथरूम तक जा ही नहीं पातीं , बुजुर्ग हैं , पैंटी पहनने की आदत नहीं है , गुसलखाने तक जाते -जाते सारा आँगन गन्दा हो जाता है , मुझे साफ़ करना पड़ता है | ऐसे  ही दस्त छूट जाएँ तो कोई बात नहीं , कम से कम अम्माँ बदपरहेजी कर के उसे आमंत्रित तो न करें |

पत्नी का उत्तर  सुनते ही किशोर जी आगबबबूला हो जाते , जब मैं बचपन में कपडे गंदे कर देता था , तब माँ ने मेरे भी कपडे धोये  हैं , आँगन धोया है , अपना मुँह का कौर छोड़ कर मेरी गन्दगी साफ़ की है और हम उनके लिए इतना भी नहीं कर सकते , पकी उम्र है पता नहीं कब साथ छोड़ दें | अब अंतिम समय में उन्हें न सताओं , तुम्हें शर्म  नहीं आती ऐसा कहते हुए  , अपनी माँ होती तो कहतीं , सब कर लेतीं ... रहने दो तुम न करो , मैं ही नौकरी छोड़ अपनी माँ की सेवा करूँगा |


पति की बात पर मृदुला खुद ही शर्मिंदा  हो जाती | शायद उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था | कल को उसकी भी बहू  आएगी | शरीर का क्या भरोसा , उसका भी ऐसा ही हो सकता है | उसने अपना मन कड़ा कर लिया और वो काम सहजता से करने लगी जो एक माँ अपने बच्चे के लिए करती है | जानकी देवी भी मनपसंद  खाना मिलने से खुश थी , सब से  कहतीं , मेरा बेटा  बड़ा लायक है , मुझे किसी चीज की कमी नहीं होने देता | बेसन हो , प्याज हो , मिर्च हो सब इंतजाम रसोई में किये रहता है | बहू  को क्या करना है , बस घोलना है और कढ़ाई में चुआ देना है , करछुल से हिला कर निकाल देना है | पर मृदुला अब इन बातों को सुनी -अनसुनी कर देती | 


लघुकथा - चॉकलेट केक

                           दो साल बीत गए | मृदुला की माँ की की मृत्यु हो गयी | रोते -कल्पते वो मायके चली गयी | माँ की सेवा का दायित्व किशोर जी पर आ गया | तीन दिन ही बीते कि उन्होंने मृदुला को फोन कर दिया ," सुनो , माँ की तबियत ठीक नहीं है , मुझसे अकेले नहीं संभाला जा रहा है , दस्त इतने है की कपडे तो गंदे होते ही हैं , गुसलखाने तक जा ही नहीं पाती , सारा आँगन गन्दा कर देती हैं , कैसे करूँ मैं  ये सब , उबकाई सी आ जाती है , खाना भी नहीं चलता , मुझसे नहीं होगा ये सब , तुम आ जाओ , तेरहवीं को फिर चली जाना |


जानकी देवी जी जो दूसरे कमरे से ये सब वार्तालाप सुन रही थीं , उनकी आँखे डबडबा गयीं | आज उन्हें पहली  बार अहसास हुआ कि उनकी सेवा उनका बेटा नहीं बहू  कर रही थी |


अगली ही ट्रेन से मृदुला फिर  जानकीदेवी की सेवा के लिए हाज़िर थी |  उसके द्वारा पैर छूते ही जानकी देवी उसे सीने से लगते हुए बोली ," तुम थक कर आई हो , पहले थोडा आराम कर लो , फिर  मूँग की दाल की खिचड़ी बना लेना, अब खाना पचता नहीं, स्वाद का क्या है , इस उम्र में वो स्वाद तो आएगा नहीं , थोडा सा नीबू का रस डाल लूँगी , चल जाएगा "|

वंदना बाजपेयी

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खुद को अतिव्यस्त दिखाने का मनोरोग


और क्या चल रहा है आजकल .?
क्या बताये मरने की भी फुरसत नहीं,
और आपका,
यही हाल मेरा है , समय का तो पता ही नहीं चलता , कब दिन हुआ , कब रात हुई ... बस काम ही काम में निकल जाता है | दो मिनट सकूँ के नहीं हैं |
                              दो लोगों के बीच होने वाला ये सामान्य सा वार्तालाप है , समय भगा चला जा रहा है , हर किसी के पास समय का रोना है ,परन्तु सोंचने की बात ये है कि ये समय आखिर चला कहाँ जाता है | क्या हम सब इतने व्यस्त हैं या खुद को इतना व्यस्त दिखाना चाहते हैं |

खुद को अतिव्यस्त दिखाने का मनोरोग



                                       मेरी एक रिश्तेदार हैं , जिनके यहाँ मैं जब भी जाती हूँ , कभी बर्तन धोते हुए , कभी खाना बनाते हुए या कभी कुछ अन्य काम करते हुए  मिलती हैं ,और मुझे देख कर ऐसा भाव चेहरे पर लाती हैं कि वो बहुत ज्यादा व्यस्त है उन्हें एक मिनट की भी बात करने की फुरसत नहीं है | उनके घर जा कर हमेशा बिन बुलाये मेहमान सा प्रतीत होता है | कभी फोन करो तो भी उनका यही क्रम चलता है | परिवार में सिर्फ तीन बड़े लोग हैं , फिर भी उनको एक मिनट की फुर्सत नहीं है | कभी -कभी मुझे आश्चर्य होता था कि वही काम करने के बाद हम सब लोग कितना समय खाली बिता देते हैं या अन्य जरूरी कामों में लगाते हैं पर उनके पास समय की हमेशा कमी क्यों रहती हैं |  मुझे लगा शायद मेरे जाने का समय गलत हो , परन्तु और लोगों ने भी उनके बारे में यही बात कही तो मुझे अहसास हुआ कि वो अपने को अतिव्यस्त दिखाना चाहती हैं |

मनोवैज्ञानिक अतुल नागर के अनुसार हम खुद को अतिव्यस्त दिखा कर अपनी सेल्फ वर्थ सिद्ध करना चाहते हैं |


                          अभी कुछ समय पहले अमेरिका में एक ऑफिस में सर्वे किया गया | लोग जितना काम करते हैं उसकी उपयोगिता  को पैमाने पर नापा गया | देखा गया सिर्फ २ % लोग अतिव्यस्त हैं बाकी २० % के करीब प्रयाप्त व्यस्त की श्रेणी में आते हैं , बाकी 78 % लोग ऐसे कामों में खुद को व्यस्त किये थे जिसकी कोई उपयोगिता नहीं है या वो ऑफिस के काम की गुणवत्ता बढ़ने में कोई योगदान नहीं देता है | ये सब लोग अपने को अतिव्यस्त दिखने का प्रयास कर रहे थे |
                               


                                     क्या आप ने कभी गौर किया है कि आज कामकाजी महिलाओं के साथ -साथ घरेलू महिलाओं के पास भी समय की अचानक से कमी हो गयी है |  छोटा हो या बड़ा  हर कोई समय नहीं है का रोना रोता रहता है | ये अचानक सारा समय चला कहाँ गया | पहले महिलाएं खाली समय में आचार , पापड , बड़ियाँ आदि बनती , स्वेटर बुनती , कंगूरे  काढती थीं , लोगों से मिलती थी , रिश्ते बनती थीं | | आज महिलाएं ये सब काम बहुत कम करती हैं , फिर भी उनके पास समय का आभाव रहता है | वो बात -बात पर समय का रोना रोती हैं | आज जब की घरेलू कामों को करने में मदद कर्ण वाली इतनी मशीने बन गयी है तो भी आज की महिलाएं पहले की महिलाओं की तुलना में ज्यादा व्यस्त कैसे हो गयी हैं |

रीना जी का उदाहरण देखिये वो खुद को अतिव्यस्त कहती हैं ...वो सुबह ६ बजे उठती हैं ,वो कहतीं है वो बहुत व्यस्त हैं | कॉलोनी के किसी काम , उत्सव , गेट टुगेदर के लिए उनके पास समय नहीं होता | जबकि  घर में सफाई वाली बाई व् कुक लगी है | उनका  टाइम टेबल इस प्रकार है |

सुबह एक घंटे का मोर्निंग वाक
एक घंटे मेडिटेशन
दो घंटे घर के काम
एक घंटे नहाना धोना पूजा करना
दो घंटे फेसबुक
दो घंटे लंच के बाद सोना
शाम को एक घंटे वाक
एक घंटे जिम
दो  घंटे स्पिरिचुअल क्लास में जाना
दो घंटे टी.वी शो देखना
खाना - पीना
सोशल साइट्स पर जाना और सो जाना
                                     जाहिर है कि उन्होंने अपने को व्यस्त कर रखा है , लेकिन दुखद है कि वो कॉलोनी की अन्य औरतों को ताना मारने से बाज नहीं आती कि उनके पास समय की कमी है , वो बेहद  बिजी हैं | आखिर वो ऐसा क्यों सिद्ध करना चाहती हैं ?

एक व्यक्ति के अपने भाई से रिश्ते महज इसलिए ख़राब हो गए क्योंकि उसे लगा कि वो जब भी अपने भाई को फोन करता है वो हमेशा बहुत व्यस्त हूँ कह देता है , कई बार तो यह भी कह देता है कि अपनी भाभी से बात कर लो , मैं उससे पूँछ लूँगा | धीरे धीरे उस व्यक्ति को लगने लगा कि भाई अति व्यस्त दिखा कर उसकी उपेक्षा कर रहा है , उसे कहीं न कहीं ये महसूस करा रहा है की वो तो खाली बैठा है | ये बात उसे अपमान जनक लगी और उसने फोन करना बंद कर दिया | पिछले १५ सालों से उनमें बातचीत नहीं है |  क्या हमारे सारे रिश्ते अति व्यस्त होने की वजह से नहीं खुद को अतिव्यस्त दिखाने की वजह से खराब हो रहे हैं |

एक तरफ तो हम अकेलेपन की बात करते हैं , इसे बड़ी समस्या बताते  हैं , दूसरी तरफ हम खुद को अतिव्यस्त दिखा कर उन् से खुद दूरी बनाते हैं | क्या ये विरोधाभास आज की ज्यादातर समस्याओं की वजह नहीं है | 

खुद को अतिव्यस्त दिखा कर हम क्या सिद्ध करना चाहते हैं 


                                                 हम बचपन से प्रोडक्टीवीटी को समय की कमी से आंकने लगते हैं | हम सफल लोगों की दास्तानें सुन -सुन कर मन में ये भ्रम पाल लेते हैं कि जो सफल हैं उनके पास समय नहीं है | सफल होना सर्व सुलभ नहीं है | इसलिए ज्यादातर लोग खुद को बिना जरूरत के कामों में उलझा कर खुद को अतिव्यस्त होने का दिखावा करते हैं | इससे वो अपनी सेल्फ वर्थ महसूस कर अपने अहंकार की तुष्टि करते हैं | जबकि सच्चाई ये है कि सफल व्यक्ति ज्यादा अनुशासित , समय के पाबन्द , कामों को प्राथमिकता के आधार पर करने वाले होते हैं | एक कहावत है ...

" अगर आप चाहते हैं कि आप का काम समय पर पूरा हो जाए तो आप अपना काम उस व्यक्ति को सौंपें जो बहुत व्यस्त हो |"

अगर आप भी खुद को अतिव्यस्त दिखाते हैं 



                                           बिना काम के अनुपयोगी कामों में खुद को अतिव्यस्त दिखाने वाले लोग कहीं न कहीं low self esteem के शिकार होते हैं | घबराइये नहीं , इस समस्या से निजात पायी जा सकती है | इससे आपके रिश्ते मजबूत होंगे और जीवन सुखमय |



1)खुद को पहचानिए 

                   आप जो है सबसे अलग , सबसे अलहदा , और ब्रह्मांड की पहेली का वो हिस्सा हिस्सा हैं जो आपके बिना कम्पलीट ही नहीं होता | आप को ओवर बिजी दिखने के आवरण तले खुद  को कैद नहीं करना है | अपने दिन को देखिये | जरूरी और गैर जरूरी कामों के बारे में सोंचिये | सोंचिये आप ऐसा क्यों कर रहे हैं | अगर आप किसी अपने के ताने देने के कारण ऐसा कर रहे हैं( ऐसा महिलाओं के केस में अक्सर होता है , जब उनके पति या परिवार के लोग उन्हें ताना देते हैं कि आखिर तुम करती क्या रहती हो )  .... तो भी किसी भी आवरण से बाहर निकालिए | जो आपको मूल रूप में स्वीकार नहीं करता उसके लिए अपनी जिंदगी को नाटक मत बनाइये |

2) सच्चे रिश्तों पर समय खर्च करिए 


                                             अगर आप सच्चे रिश्तों के स्थान पर छोटे परदे या फेसबुक की काल्पनिक वाहवाही में खोये रहते हैं तो न तो आपके रिश्ते सुधरेंगें न ही सेल्फ एस्टीम बढ़ेगी | अगर आप अपने  परिवार के सदस्यों के साथ अच्छे , बुरे और बहुत बुरे समय को नहीं बिताते हैं तो आपको अपना पूरा अस्तित्व ही बेकार लगेगा चाहे आप सोशल मीडिया पर कितने भी व्यस्त क्यों न हों | खास कर जब अपने परिवार के साथ कहीं जाएँ तो मोबाइल स्विच ऑफ कर दें |

3)लोगों को सुने 
                         हर समय अपनी व्यस्तता बताने के स्थान पर लोगों को सुने | उनके किस्सों और उनकी जिंदगी को गहराई से लें | यहाँ हर कोई समस्याओं से जूझ रहा है | ये संसार एक दूसरे की परस्पर मदद से ही चलता है |लोगों को सुनने से आप उनसे गहरे से जुड़ते हैं |

4)मी टाइम नहीं है बिजी टाइम 



                                                             समझिये की खाली होना कोई गुनाह नहीं है | मैं बहुत बिजी हूँ कह कर अपने साथ धोखा मत करिए | समय का प्रबंधन करिए | जिसमें थोडा समय परिवार बच्चों और दोस्तों को दीजिये |उस समय को मी टाइम  कहिये बिजी टाइम नहीं | अगर कोई मशीन भी लगातार चले तो वह भी ख़राब होगी | अगर आप भी अतिव्यस्त दिखने की चाहमें दोस्तों , रिश्तों और खुद से दूरी बनांते हैं तो निराशा , अवसाद अवश्य आयेंगे |

                 
                                       तो ये थे  कुछ तरीके जिन्हें अपना कर आप खुद को अतिव्यस्त दिखाने के मनोरोग से न सिर्फ बाहर आ सकते हैं बल्कि एक खुशहाल जिंदगी भी जी सकते हैं |


सरिता जैन
               
                               

                         

लेखिका
                         




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जाने कितनी सारी बातें मैं कहते कहते रह जाती हूँ


लफ्जों को समझदारी में लपेट कर निगल जाती हूँ 
जाने कितनी सारी बातें मैं कहते कहते रह जाती हूँ । 

और तुम ये समझते हो ,मै कुछ समझ नही पाती हूँ 
है प्यार तुमको जितना मुझसे , मै समझ जाती हँ । 

बड़ी मुश्किल से मुहाने पर रोकती हूँ ...बेचैनी को 
और इस तरह अपना सब्र....मै रोज़ आजमाती हूँ । 

आरजू हो ,  किसी मन्नत के मुरादो में मिले हो तुम 
सलामत रहों सदा.... दुआ मैं दिन भर गुनगुनाती हूँ ।

चाहे तुम रहो जहां कहीं ....तुम मुझसे दूर नही हो 
आखें मैं बंद करू और  अपने मन में  तुम्हें पाती है ।

अब कहीं कहां मेरा...... कोई ठौर या ठिकाना 
एक कड़ी हर रोज़ तुम्हारे और करीब आती हूँ || 

_________ साधना सिंह 
                     गोरखपुर 

लेखिका


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प्रेम की परिभाषा गढ़ती - लाल फ्रॉक वाली लड़की



प्रेम ... एक ऐसा शब्द जो , जितना कहने में सहज है , उतना होता नहीं है , उस प्रेम में बहुत  गहराई होती है जहाँ दो प्राणी आत्मा के स्तर पर एक दूसरे से जुड़ जाते हैं | इस परलौकिक प्रेम से इतर दुनियावी  बात भी करें तो प्रेम वो है जो पहली नज़र के आकर्षण , डोपामीन रिलीज़ , और केमिकल केमिस्ट्री मिलने की घटनाओं को निथारने के बाद बचा रह जाता है वो प्रेम है |  प्रेम जितना जादुई है , उतनी ही जादुई है " लाल फ्रॉक वाली लड़की" ,  जो अपनी खूबसूरत लाल फ्रॉक में गूथे हुए है कई प्रेम कहानियाँ  ... जितनी बार वो इठलाती है, झड जाती है एक नयी प्रेम कहानी ... अपने अंजाम की परवाह किये  बगैर | मैं बात कर रही हूँ 'मुकेश कुमार सिन्हा' जी के लप्रेक संग्रह "लाल फ्रॉक वाली लड़की की "

प्रेम की परिभाषा गढ़ती - लाल फ्रॉक वाली लड़की 


                                                                 मुकेश कुमार सिन्हा जी कवितायें अक्सर फेसबुक पर पढ़ती रहती हूँ | उनका काव्य संग्रह हमिंग बर्ड भी पढ़ा है | उनकी यह पहली गद्य पुस्तक है , परन्तु इस पर भी उनका कवि मन हावी रहा है | शायद इसीलिये उन्होंने पुस्तक की शुरुआत ही  कविता से की है ..

स्मृतियों की गुल्लक में 
सिक्कों की खनक और टनटनाती हुई मृदुल आवाजों में 
फिर से दिखी वो 
'लाल फ्रॉक वाली लड़की "

                                  उसके बाद शुरू होती है छोटी-छोटी प्रेम कहानियाँ |जो बताती हैं कि प्रेम  उम्र नहीं देखता , जाति धर्म नहीं देखता , समय -असमय नहीं देखता , बस हो जाता है .... और फिर और अलग-अलग चलने वाली दो राहे किसी एक राह पर मिलकर साथ चल पड़ती है |

#प्रिडिक्टेबली इरेशनल की समीक्षा -book review of predictably irrational in Hindi

                       कहानियों में हर उम्र के प्रेम को समेटने की कोशिश की गयी है , कुछ कहानियाँ जो आज के युवाओं के फटफटिया प्रेम को दर्शाती है जो नज़र मिलते ही हो जाता है तो कुछ 'अमरुद का पेड़ ' हंसाती हैं ,  'सोना-चाँदी " जैसी  कुछ कहानियाँ है जो परिपक्व उम्र के प्रेम को दर्शाती हैं , "व्हाई शुड बॉयज हव आल द फन ' प्रेम की शुरुआत में ही उसका अंत कर देती हैं |

          संग्रह में 119 प्रेम कहानियाँ (लप्रेक ) हैं | इसका प्रकाशन 'बोधि प्रकाशन' द्वारा हुआ है | कवर पेज बहुत आकर्षक है | लप्रेक की ख़ूबसूरती ही इसमें है की उसे कम शब्दों में कहा जाए , अगर आप छोटी -छोटी हँसती , मुस्कुराती , गुदगुदाती प्रेम कहानियाँ पढने के शौक़ीन हैं तो ये आप के लिए बेहतर विकल्प है |

वंदना बाजपेयी

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book review of predictably irrational in Hindi



हम सब बहुत सोंच विचार कर निर्णय लेते हैं | फिर भी क्या हम सही निर्णय ले पाते हैं ? क्या हमारे निर्णय पर दूसरों का प्रभाव रहता है ?ऐसे कौन से फैक्ट्स हैं जो हमारे निर्णय को प्रभावित करते हैं ?ये बहुत सारे प्रश्न हैं जिनका उत्तर  MIT के Dan Ariely  की किताब  Predictably irrational में मिलता है | यह किताब विज्ञानं के सिद्धांतों पर आधारित है , जो बताती है कि कोई भी निर्णय लेते समय मनुष्य का दिमाग कैसे काम करता है और कैसे छोटी -छोटी चीजें उसके निर्णय को प्रभावित कर देती हैं |

प्रिडिक्टेबली इरेशनल की पुस्तक समीक्षा book review of predictably irrational in Hindi


                   मानव मष्तिष्क  के निर्णय लेने की क्षमता को वैज्ञानिक सिद्धांतों द्वारा प्रतिपादित करने वाली  किताब predictably irrational में Dan Ariely  कई प्रयोगों द्वारा मानव मन की गहराय में घुसते जाते हैं | ये वो गहराई है जो आपके निर्णय को प्रभावित करती है | 

                            कभी आपने सोंचा है एक रुपये की कैल्सियम की गोली के स्थान पर 40 रुपये की कैल्सियम की गोली का असर आप पर ज्यादा होता है | हम उस रेस्ट्रा का खाना खाना पसंद करते हैं जो एक बोतल कोक फ्री देता है बन्स्पत उसके जो उतने ही पैसे कम कर देता है | क्या आप ने गौर किया है कि ऐसा क्यों होता है ? यही नहीं काफी खरीदने से लेकर , वेट लोस के जिम तक , कोई सामान चुनने में , मित्र या जीवन साथी चुनने में  हमारा दिमाग एक खास तरीके से काम करता है .. जिसे Dan Ariely  ने predictably irrational का नाम दिया है | आइये जाने कि हमारा दिमाग कैसे काम करता है ...

1) तुलना ...

                  हमारा दिमाग दो चीजों में तुलना  करता है फिर निर्णय लेता है | इसे  आप ने देखा होगा कि  एक समान आकर की दो मेजें अगर एक लम्बाई में राखी जाये व् दूसरी चौड़ाई में  , फिर आप से पूंछा जाए कि कौन सी बड़ी है तो आप कहेंगे कि जो लम्बाई में रखी है | 

तुलनात्मक अध्यन

                              चित्र brainden.com से साभार 


इसी तरह से अगर दो समान आकार के गोले लें ... अब एक गोले के चरों और बड़े -बड़े गोले लगा दें व् दूसरे के चरों ओर छोटे -छोटे गोले लगा दें , अब आप से पूंछा जाए कि  कौन सा गोला बड़ा है तो निश्चित रूप से सबका जवाब होगा जिसके चरों ओर छोटे गोले हैं ... इसके पीछे एक साइंटिफिक कारण है .. वो ये की हमारा दिमाग अब्सोल्यूट में नहीं काम्पैरिजन में सोंचता है | 

तुलनात्मक अध्यन

फोटो wikimedia commons से साभार 


                                      अब जानिये तुलनात्मक अध्यन की वजह से हमारे निर्णय किस तरह से प्रभावित होते हैं ...

एक प्रयोग ...


एक बार लोगों  के सामने  थ्री days ट्रिप के ३ ऑप्शन रखे गए ...

अ ) पेरिस (फ्री ब्रेक फ़ास्ट के साथ )
ब) रोम ( बिना ब्रेकफास्ट के ) 
स) रोम (फ्री ब्रेक फ़ास्ट के साथ )

                              ८५ % लोगों ने रोम (फ्री ब्रेक फ़ास्ट के साथ ) के साथ चुना | क्या लोग रोम ही जाना चाहते थे पेरिस नहीं ... ऐसा नहीं है एक दूसरे ग्रुप पर इस प्रयोग को उलट कर किया गया | 

अ ) पेरिस (फ्री ब्रेक फ़ास्ट के साथ )
ब) पेरिस  ( बिना ब्रेकफास्ट के )
स) रोम (फ्री ब्रेक फ़ास्ट के साथ )

                         अबकी बार लोगों ने पेरिस फ्री ब्रेकफास्ट के साथ चुना | कारण स्पष्ट था लोगो ने उसे चुना जो उन्हें तुलना करने का अवसर दे रहा था व् उसे दरकिनार कर दिया जिसने तुलना करने का अवसर नहीं दिया | क्योंकि लोगों का दिमाग पहले तुलना पर जाता है |

दूसरा उदाहरण


एक मैगज़ीन है  "The Economist" उसने अपनी वेबसाइट पर मागज़ीन सबस्क्राइब करने के तीन तरीके बताये हैं ...


1)Economist  times –
वेब एडिशन $59
प्रिंट एडिशन -$ 125
प्रिंट & वेब एडिशन $  125

                
अब  केवल १६ % लोगों ने वेब एडिशन व् 84 % लोगों ने प्रिंट व् वेब एडिशन वाला थर्ड ऑप्शन चुना  और सेकंड ऑप्शन किसी ने नहीं चुना | जाहिर सी बात है जब प्रिंट व् वेब दोनों $125 में मिल रहे थे तो कौन मूर्ख होगा जो केवल प्रिंट एडिशन $125  में लेगा | अब सोंचने वाली बात है कि economist मैगज़ीन ने ऐसा बेवकूफाना ऑफर क्यों रखा | दरअसल  यह ऑफर द्वारा किये गए एक प्रयोग के बाद लाया गया| ने इस प्रयोग में लोगों को दो ग्रुप्स में बांटा ... दूसरे ग्रुप को ये ऑफर दिया गया और पहले ग्रुप को दिए गए ऑफर में बीच वाले ऑफर को हटा लिया गया , जिसकी वास्तव में कोई जरूरत ही  नहीं थी , तब परिणाम इस तरह से आये...


वेब एडिशन $ 59..... 75 % लोगों ने लिया
प्रिंट & वेब एडिशन $  125.... केवल 25 % लोगों ने लिया


                    
जाहिर है इससे कम्पनी को नुक्सान था | इसलिए उसने ऐसा ऑफर रखा |
यह दोनों उदाहरण हमें ये बताते हैं कि हमारा दिमाग चीजों का तुलनात्मक अध्यन करके निर्णय लेता है | जिन दो चीजों में समानता ज्यादा होती है उनमें से वो  तुलना करके नतीजा निकालता है | उस समय उसका ध्यान तीसरे ऑप्शन पर नहीं रह जाता | उसका काम बस इतना होता है कि वो कहे कि मुझे देखो , मुझसे तुलना करो फिर वो चुनो जो कम्पनी चाहती है |

रिश्तों में निर्णय 


तुलना का ये नियम केवल सामान पर ही नहीं रिश्तों पर भी लागू होता है | इसके लिए भी एक प्रयोग किया गया |  दो एक जैसे लोगों की तस्वीरे ली गयीं मसलन देव व् राज ( पाठकों की सुविधा के लिए नामों का भारतीयकरण किया है ) दोनों के एंगल अलग थे | अब लोगों को उनमें से एक को चुनना था | पर ये काम इस तरह से नहीं किया गया | उन्होंने तीन ऑप्शन बनाये | एक फोटो में देव की बिगड़ी हुई छवि बनायीं इस तरह से लोगों को अब देव , बिगड़ी छवि वाले देव व् राज के बीच में से एक को चुनना था ... ज्यादातर लोगों ने देव को चुना | इसी के लिए एक दूसरा प्रयोग किया गया जहाँ राज की छवि बिगाड़ दी गयी | अब लोगों को देव बिगड़े हुए राज व् राज में से एक को चुनना था ... आश्चर्य की बात है कि इस बार लोगों ने राज को चुना |लोगों ने हर बार एक ही व्यक्ति के खराब व् एक अच्छे ऑप्शन के बीच में से चुना जबकि दोनों बार उनके पास एक और व्यक्ति का अच्छा ऑप्शन था |



दुकानदार इसका कैसे प्रयोग करते हैं ...


अगर दुकानदार को कोई प्रोडक्ट अ , प्रोडक्ट ब की तुलना में ज्यादा बेंचना है तो वो एक अ  निगेटिव खड़ा कर देंगे | जिससे लोगों का ध्यान ब की तरफ जाए ही नहीं और वो सीधे अ ही खरीदे |

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि इसके लिए उन्होंने डॉक्टर्स पर भी प्रयोग किया और सिद्ध किया की प्रोफेशनल्स के  निर्णय को भी प्रभावित किया जा सकता है |

                                  तुलनात्मक अध्यन के अतिरिक्त फ्री या जीरो  कॉस्ट शब्द  का असर इतना गहरा  होता है कि लोग इसके अतरिक्त  दूसरे किसी ऑफर से तुलना कर ही नहीं पाते | अगर किसी ऑफर में कोई चीज ७५ रुपये दाम के साथ २५ की कोई चीज फ्री दे रहा है व् बिना ऑफर के उस चीज को ५० में बेंच रहा है तो लोग फ्री वाले ऑप्शन पर जायेंगे | 

लोग अगर किसी चीज की कीमत जो वो पहली बार मे पसंद करते हैं अपने मन में बिठा लेते हैं | काफी समय बाद भी जब वो चीज खरीदने जाते हैं तो तुलना उसी  दाम से करते हैं | और उसे सस्ता या महंगा घोषित करते हैं |

अत्यधिक भूख , प्यास , मानसिक , शारीरिक उद्वेग भी लोगों के निर्णय को प्रभावित करते हैं | अधिकतर विज्ञापन इसी बात को ध्यान में रख कर बनाये जाते हैं , जो उपभोक्ताओं के निर्णय को  भावनात्मक रूप से प्रभावित करते हैं | 


                                        predictably irrational  वैसे तो एक बिजनिस बुक है जो लोगों के BUYING BEHAVIOUR   के बारे में बात करती है | पर आम पाठक इससे काफी  लाभान्वित होता है जब वह समझ जाता है कि सारे प्रोडक्ट उसे इसी आधार पर बेंचे जा रहे हैं |  हालांकि ये एक सेट पैटर्न है,  पर कुछ हद तक वो इस पर लगाम लगा सकता है | दूसरी बात  वो इसका इस्तेमाल अपने निजी जीवन में भी कर सकता है | जैसे वो तुलनात्मक रूप से तब ज्यादा सुखी महसूस करेगा जहाँ वो ऐसे सर्किल का हिस्सा हो जिसमें बाकी सब उससे थोड़े छोटे हो | चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही ... यहीं से उसे एनेर्जी बूस्ट मिलेगा | जो उसे उस सर्किल की और अग्रसर होने में मदद करेगा जहाँ उसे और उन्नति करनी है |


                      कुल मिला कर मानव मन की गूंध पड़ताल करती हुई ये एक अच्छी किताब है | जैसा की लेखक स्वयं MIT से हैं व् ये किताब उनके शोध का एक हिस्सा है जिसे उन्होंने सरल भाषा में समझाने की कोशिश की है , जो इसकी लोकप्रियता का कारण है |

किताब के बारे में ज्यादा जानकारी आप विकिपीडिया से प्राप्त कर सकते हैं

नीलम गुप्ता

किताब का चित्र -amazon.in से

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श्री राम
तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को------ सब खीच रहे है राम! तेरी नगरी मे, तुम्हें टेंट से ढक कर, मंदिर यहीं बनायेंगे----- बस चीख रहे है राम। हर चुनाव के मुद्दे मे, बस भुना रहे अयोध्या को, कुछ न किया और कुछ न करेंगे, सच तो ये है कि, ये नकली भक्त है आपके सारे, जो अपने-अपने स्वार्थ का चंदन----- भर माथे पे टीक रहे है राम। तेरी पीड़ा की प्रत्यंचा को------ सब खीच रहे है राम। @@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर---222002 (उत्तर--प्रदेश)।

कवि
पढ़िए एक से बढाकर एक कवितायें काव्य जगत में



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मुझे शक्ति बनना होगा

                                  साल में दो बार नवरात्र  आती हैं | जहाँ हम सबका प्रयास रहता है कि पूजा -पाठ द्वारा देवी माँ को प्रसन्न करें व् उनका आशीर्वाद प्राप्त करें | आश्चर्य है कि शक्ति की उपासना करने वाले देश में स्त्री आज भी अबला ही है | वो कैसे सबला बनें |  इसका समाधान क्या है ? प्रस्तुत है इसी विषय पर एक कविता ...

माँ !मुझे शक्ति बनना होगा


माँ
आज तुम्हारे दरबार में सर झुकाते हुए
देख रही हूँ अपने पिता को
जिन्होंने मेरी शिक्षा
यह कह कर रोक दी थी कि
ज्यादा पढ़ा देंगे
 ढूंढना पड़ेगा
बहुत पढ़ा-लिखा  लड़का

देख रही हूँ अपने भाई को
जिसने कभी पलट कर
माँ से नहीं पूंछा कि
मेरी थाली में खीर
और बहन की थाली में खिचड़ी क्यों ?
नहीं पूछा कि
 मुट्ठी भर चावल के दानों को
आँचल में बाँध कर विदा कर देने के बाद
क्यों खत्म होजाता है
उसका इस घर पर अधिकार


मैं देख रही हूँ अपने पति को
जिन्होंने अपने घर की मर्यादा व् इज्ज़त के
कभी न खुलने वाले डब्बे में
मेरे सारे अरमानों , सपनों व् स्वतंत्रता को कैद कर लिया
कभी  ठहर कर सोंचने का प्रयास नहीं किया
उनके द्वारा हवा में उछाले गए दो जुमलों
'करती क्या हो दिन भर " और
'कमाता तो मैं ही  हूँ "
की तेज धार से
रक्त रंजित हो जाता है
मेरा आत्मसम्मान


मैं देख रही हूँ अपने पुत्र को
जिसकी रगों में दौड़ रहा है
मेरा दूध व् रक्त
फिर भी न जाने क्यों
बढते  कद के साथ
बढ़ रहा है उसमें
अपने पिता की सोंच का घनत्व
जो मुझे श्रद्धा से सर झुकाकर प्रणाम  करने के बाद भी
यह कहने से नहीं झिझकता कि
लड़कियाँ तो ये या वो काम कर ही नहीं सकती है


मैं देख रही हूँ
सामाज के हर वर्ग , हर तबके ,हर रंग के पुरुषों को
जो तुम्हारी उपासना करते हैं
जप ध्यान करते हैं
पर उन सबके लिए
अपनी माँ - बहन , बेटी के अतरिक्त
हर स्त्री
मात्र देह रह जाती है
जिसे भोगने की कामना है
कभी देह से ,
कभी आँखों से
और कभी बातों से



मैं देख रही हूँ
तुम्हारे सामने नत हुए
इन तमाम सिरों को
जो तुम्हें खुश करने के लिए
धूप, दीप , आरती ,और नैवेद्ध  कर रहे हैं अर्पित
ये तमाम बुदबुदाते हुए होंठ
पकड़ा रहे हैं तुम्हें अपनी मनोकामनाओं की सूची
कर रहे हैं इंतज़ार तुम्हारी एक कृपा दृष्टि का


माँ ,
आज तुम्हारे मंदिर में
इन घंटा -ध्वनियों के मध्य
तुम्हारी आँखों से बरसते हुए तेज को देखकर
मैं समझ रही हूँ
कि थाली में सजा कर
नहीं मिलते अधिकार
अपनी दयनीय दशा पर आँसू बहाने के स्थान पर
स्वयं ही अपने नाखूनों से फाड़ना होगा
समाज द्वारा पह्नाया गया
अबला का कवच
कि अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए
मुझे स्वयं शक्ति बनना होगा
हां ! मुझे शक्ति बनना होगा


वंदना बाजपेयी 


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filed under- navraatre, devi , durga , shakti , women 
                               

राम , हमारे आराध्य श्री राम , मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम | राम का चरित इतना ऊंचा , इतना विशाल है की वो इतिहास के पन्नों से निकल कर मानव के मन में बस गया |  जनश्रुति और महाकाव्यों के माध्यम से राम अपने उत्तम चरित्र के कारण युगों युगों तक मर्यादित आचरण की शिक्षा देते आये हैं |
                                                    राम - दो अक्षर का प्यारा सा नाम जो पतित पावनी गंगा की तरह मनुष्य के मन के सब पापों को हरता है | अगर प्रभु राम को ईश्वर रूप में न भी देखे तो भी उन चरित्र इतना ऊंचा है की की उन्हें महा मानव की संज्ञा दी जा सकती है |  बाल राम , ताड़का  का वध करने वाले राम , शिव जी धनुष तोड़ने वाले राम , पिता की आज्ञा  मान कर वन  जाने वाले राम , केवट के राम ,सिया के विरह में वन - वन आंसूं बहाते राम  अहिल्या का उद्धार करने वाले राम , शवरी के जूठे बेरों को प्रेम से स्वीकार करने वाले राम , रावण का वध करने वाले राम | राम के इन सारे रूपों में एक रूप ऐसा है जो की राम   के  लोक लुभावन रूप  पर प्रश्नचिन्ह लगाता है |
                           
गलतियों की सजा दें या माफ़ करें

सीमा जी मेरे पास बैठ कर आधे घंटे से अपनी एक सहेली की बुराई कर रही थी , जिसने अपने बेटे की शादी में उन्हें देर से कार्ड देने की गलती कर दी थी  , हालांकि उसकी सहेली ने कहा था कि कार्ड बाँटने का काम उसने स्वयं नहीं किया था | उन्होंने अपने एक सम्बन्धी को कार्ड व् गेस्ट लिस्ट पकड़ा दी थी , जब उन्हें उनकी गलती का पता चला तो शादी वाले दिन तमाम कामों में से समय निकाल कर स्वयं उनके घर उन्हें बुलाने गयीं, पर सीमा के हलक के नीचे ये तर्क  उतर नहीं रहा था |


                                       ये समस्या सिर्फ सीमा की नहीं है | हममें से कई लोग किसी दूसरे की गलती या खुद की गयी गलती को माफ़ नहीं कर पाते | उसकी नाराजगी या कसक जीवन भर पाले रहते हैं | सबंधों में दूरी बढ़ा  कर हम दूसरे व्यक्ति या खुद को सजा दे रहे होते हैं , जिसका खामियाजा हमें अपने स्वास्थ्य और ख़ुशी की कुर्बानी के रूप में देना  पड़ता है | हर गलती सजा देने के लायक नहीं होती | अलबत्ता कुछ गलतियाँ  सजा की हकदार होती है | क्या ये जरूरी नहीं कि हम समझ लें कि किन गलतियों पर सजा दी जाये किन पर नहीं |


गलतियों के लिए  सजा दें या माफ़ करें 


                                            गलतियों के लिए  सजा दें या माफ़ करें पर बात करने से पहले मैं आप को छोटे से दो उदहारण दूंगीं  | 

नन्हा सोनू डॉल हॉउस बना कर खेल रहा था | उसने  करीब एक घंटे की मेहनत से डॉल हाउस बनाया था | तभी उसका बड़ा भाई मोनू स्कूल से आया | वो एक छोटा सा प्लेन उठा कर दौड़ -दौड़ कर उसे उड़ाने लगा | इसी क्रम में वो सोनू के डॉल हॉउस से टकरा गया | डॉल हाउस टूट गया | सोनू जोर -जोर से रोने लगा | रोने की आवाज़ सुन कर उनकी माँ तृप्ति वहाँ आई | स्थिति समझ कर वो सोनू को समझाने लगी ," भैया ने जानबूझकर कर नहीं तोडा है , भूल से हुआ है , कोई बात नहीं मैं तुम्हारे साथ लग कर अभी दुबारा बना देती हूँ | तृप्ति सोनू के साथ डॉल हॉउस बनाने लगी व् उसने मोनू को दूसरे कमरे में खेलने को कह दिया | थोड़ी देर में मोनू भी सोनू के साथ खेलने लगा |

मुकेश जी के दोस्त सुरेश जी उनसे कई बार मिलने को कह चुके थे | मुकेश जी अपने व्यापर में इतने व्यस्त थे कि चाहते हुए भी समय नहीं  निकाल पाए | एक दिन अचानक उनके पास खबर आई कि कार एक्सीडेंट में सुरेश जी की मृत्यु हो गयी है | 35 साल के सुरेश जी का यूँ चले जाना किसी सदमें से कम नहीं था , पर मुकेश जी के मन में दर्द के साथ -साथ एक गिल्ट या अपराधबोध भी भर गया | उन्हें लगा उनसे बहुत बड़ी गलती हुई है | वो अपने मित्र के लिए समय नहीं निकाल पाए | इस अपराधबोध के कारण वो अवसाद में चले गए , व्यापार धंधा , घर-परिवार सब चौपट हो गया |


समझें गलती हुई है या की है 


                                  जब भी कोई गलती करता है या हमसे खुद ही कोई गलती हो जाती है तो हम दोष देना शुरू कर देते हैं | किसी को आरोपी सिद्ध कर देना समस्या का समाधान नहीं है | ऐसे मौकों पर हमें देखना चाहिए कि गलती की है या हो गयी है | अगर जानबूझ कर गलती किहे तो ये एक अपराध बनता है | अगर अनजाने में हो गयी है तो उसके लिए क्षमा कर देना अपने व् उस रिश्ते के लिए बेहतर है | जैसा कि सोमू की माँ ने मोनू  को गलत न मान कर किया | वहीँ मुकेश जी जो ये कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि उनका मित्र इतनी जल्दी दुनिया से चला जाएगा , उसके जाने के बाद खुद को व् अपने व्यापर को दोषी समझने लगे | काम से अरुचि हुई व् व्यापार ठप्प हो गया | .

खुश रहना चाहते हैं तो एक दूसरे की मदद करें 

जब भी कोई दूसरा गलती करे तो पहले ये पता लगाने का प्रयास करें कि गलती की है या अनजाने में हो गयी है | अगर दूसरे से अनजाने में गलती हो गयी है | उसका इरादा आप को ठेस पहुँचाने का या आप का नुक्सान करने का नहीं था तो उसे क्षमा कर दें |

  अगर आप से कोई गलती  अनजाने में हो गयी है तो खुद को भी क्षमा कर दें | मान के चलें कि इंसान गलतियों का पुतला है , गलतियाँ   हो जाती हैं | इस गलती से सबक लें और जिंदगी में आगे बढें |


जब जानबूझ कर गलती की जाये 

                                               जब कोई जानबूझ कर गलती करे तो उसे सजा अवश्य दें | क्योंकि अगर तब सजा नहीं दी जायेगी तो वो व्यक्ति फिर से गलती करेगा | बार -बार की गयी गलतियाँ उसे सुधरने का मौका नहीं देंगी और एक न एक दिन वो रिश्ता हमेशा के लिए खत्म हो जायेगा | पर सजा गलती के अनुसार ही होनी चाहिए जैसे ..

आप विद्यार्थी हैं व् आपका  मित्र आपसे नोट्स ले लेता है परन्तु आप को जरूरत पड़ने पर नहीं देता है , या आप की पढ़ाई  का तरीका जान लेता है पर अपना तरीका आप से शेयर नहीं करता है | ऐसे में आप भी उसके साथ वही व्यव्हार करिए , ताकि उसे समझ आ सके कि अगर वो आपसे दोस्ती चाहता है तो उसे भी आपकी तरह देना भी सीखना होगा |

अगर आप व्यापार करते हैं और आप का मित्र आप को गलत टिप्स बता कर आपका आर्थिक नुक्सान कर देता है परन्तु अपने व्यापर में अन्य तरीके आजमा कर मुनाफा कमाता है .. तो यह जानबूझ कर की गयी गलती है, उसे क्षमा करने के स्थान पर उससे दूरी बना लें क्योंकि जिसकी वृत्ति आपको नुक्सान पहुँचाने की है वो आप का मित्र नहीं है | इस दूरी से उसे सिग्नल मिल जाएगा की अगर वो पैतरे चलेगा तो आप को खो देगा , इसलिए उसे अपने पैतरे छोड़ कर सच्ची मित्रता अपनानी है |

अगर आप का जीवनसाथी  आप  से अपशब्द बोलता है या हाथ उठाता है तो ये जानबूझ कर करी हुई गलती है , यहाँ क्षमा करने का मतलब उस अपराध को स्वीकृति देना हैं | ऐसे में आप अपना विरोध दर्ज करिए | हो सके  तो कुछ दिन के लिए मायके चली जायें | जिससे उसे अहसास हो कि अगर वो आप के साथ ऐसा व्यवहार करेगा तो आप उसके साथ नहीं रहेंगी , ये भय उसे आगे से ऐसा व्यवहार करने से रोकेगा |


जब भगवान् राम ने पढ़ाया कार्पोरेट जगत का महत्वपूर्ण पाठ


अगर आप के बच्चे वृद्धावस्था में न आपको समय देते हैं न ही सेवा करते हैं तो उन्हें क्षमा मत करिए | अपने धन को अपने उन सेवकों को दीजिये जो आप की सेवा कर रहे हैं |

किसी ऐसे रिश्ते को मत ढोइये जहाँ व्यक्ति बार -बार गलती करता है | शुरू में आपको दर्द होगा परआपकी आने वाली जिंदगी सुखद होगी

अगर आप स्वयं कोई गलती जानबूझ कर करते हैं और बाद में पछताते हैं और सब कुछ ठीक करना चाहते हैं ... तो ये मान के चलिए कि सब कुछ पहले जैसा  होना संभव नहीं है | क्षमा करना या न करना आपके नहीं उस व्यक्ति के हाथ में है |  आप बस इतना कर सकते हैं कि उसके साथ आगे से सिर्फ अच्छा व्यवहार करें ,  जिससे आपका मन पवित्र होगा , फिर भी क्षमा करना इस बात पर निर्भर है कि उसकी आत्मा का घाव कितना गहरा है | एक पुरानी फिल्म 'दुश्मन चाचा ' इसी विषय पर आधारित है | जिसमें मृतक की पत्नी सबसे बाद में क्षमा कर पाती है क्योंकि उसकी आत्मा का घाव बहुत गहरा था |

अपराध और गलती में फर्क करिए | अगर कोई ऐसी गलती है जो अपराध के दायरे में आती है तो क़ानून का सहारा लेने में संकोच न करें |

                                           मित्रों , ये थे कुछ उपाय जिन पर चल कर हम यह निर्णय लें सकते हैं कि  किसी गलती पर क्षमा करें या सजा दें , सजा दें भी तो कितनी | उम्मीद है अब आप गलतियों का सही वर्गीकरण करने की गलती नहीं करेंगे |

नीलम  गुप्ता


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