April 2018

बुद्ध पूर्णिमा पर सत्रह हाइकु

हायकू काव्य की एक विधा है जो नौवी शताब्दी से प्रचलन में आई | ये बहुत ही गहन विधा है जिसमें  कम से कम शब्दों में अपनी बात कही जाती है | हायकू कविता  की बनावट 5-7-5 होती है | बुद्ध पूर्णिमा पर पढ़ें -

भगवान् बुद्ध  को समर्पित 17 हाइकु 


नहीं आसान 
स्वयं बुद्ध बनना 
हों समाधान।

सिखाए पानी 
नदी मचाती शोर 
सागर शांत।


पहने अहं
ढीले वस्त्रों समान 
उतारें सहम

भौतिक मोह
भस्म कर डाले जो 
वही है बुद्ध।

क्षमा है शक्ति 
मिटाती क्रोध शोक 
उपजे प्रेम।

मार्ग हो धर्म 
अपनाइए साथ 

मिटे अँधेरा 
धम्मपद का ज्ञान 
देवे सवेरा।

महान पल 
अस्वीकारें सहाय 
मुक्ति संभव।

बीता है भूत 
भविष्य आया नहीं 
है मात्र क्षण।

बदलें दिशा 
चलते चलो तभी 
सुधरे दशा

रचते स्वयं 
सेहत रोग शोक 

पवित्र बोल 
कर्म में परिणत 
तभी सार्थक।

शांति भीतर 
कस्तूरी के समान 
करती वास।

वहीं है खुशी
जो सहेजते इसे 
रखते पास।

प्रबुद्ध बनें
सर्व जन हिताय 
समृद्ध बनें।

जैसा सोचते 
कर्म यथानुसार
वैसा बनते।

पवित्र मन 
समझ से उपजे
वो सच्चा प्रेम।
————————
डा० भारती वर्मा बौड़ाई 

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बुद्ध पूर्णिमा - भगवान् बुद्ध ने दिया समता का सन्देश


आज से 2500 वर्ष पूर्व निपट भौतिकता बढ़ जाने के कारण मानव के मन में हिंसा का वेग काफी बढ़ गया था। इस कारण से मानव का जीवन दुःखी होता चला जा रहा था, तब परमात्मा ने मनुष्यों पर दया करके और उन्हें अहिंसक विचार का व्यक्ति बनाकर उनके दुखों को दूर करने के लिए भगवान बुद्ध को धरती पर भेजा।


बुद्ध पूर्णिमा - भगवान् बुद्ध ने प्रदान किया  समता का सन्देश 


बुद्ध जयन्ती/बुद्ध पूर्णिमा बौद्ध धर्म में आस्था रखने वालों का एक प्रमुख त्यौहार है। बुद्ध जयन्ती वैशाख पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का स्वर्गारोहण समारोह भी मनाया जाता है। इस पूर्णिमा के दिन ही 483 ई.पू. में 80 वर्ष की आयु में, देवरिया जिले के कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया था। भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। आज बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में करोड़ों लोग इस दिन को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए बुद्ध विष्णु के नौवें अवतार हैं। अतः हिन्दुओं के लिए भी यह दिन पवित्र माना जाता है। यह त्यौहार भारत, नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाइलैंड, कंबोडिया, मलेशिया, श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया तथा पाकिस्तान में मनाया जाता है।

(2) बुद्ध के मन में बचपन से ही द्वन्द्व शुरू हो गया था:- 

गौतम बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु राज्य के लुंबिनी (जो इस समय नेपाल में है) में हुआ था। उनके पिता राजा शुद्धोदन व माता का नाम महामाया था। आपके बचपन का नाम सिद्धार्थ गौतम था। सिद्धार्थ का हृदय बचपन से करूणा, अहिंसा एवं दया से लबालब था। बचपन से ही उनके अंदर अनेक मानवीय एवं सामाजिक प्रश्नों का द्वन्द्व शुरू हो गया था। जैसे - एक आदमी दूसरे का शोषण करें तो क्या इसे ठीक कहा जाएगा?, एक आदमी का दूसरे आदमी को मारना कैसे एक क्षत्रिय का धर्म हो सकता है?

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वह एक घायल पक्षी के प्राणों की रक्षा के लिए मामले को राज न्यायालय तक ले गये। न्यायालय ने सिद्धार्थ के इस तर्क को माना कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। सिद्धार्थ एक बीमार, एक वृद्ध तथा एक शव यात्रा को देखकर अत्यन्त व्याकुल हो गये। सिद्धार्थ युद्ध के सर्वथा विरूद्ध थे। सिद्धार्थ का मत था कि युद्ध कभी किसी समस्या का हल नहीं होता, परस्पर एक दूसरे का नाश करने में बुद्धिमानी नहीं है।


(3) ‘बुद्ध’ ने बचपन में ही प्रभु की इच्छा और आज्ञा को पहचान लिया था:-

बुद्ध ने बचपन में ही ईश्वरीय सत्ता को पहचान लिया और मानवता की मुक्ति तथा ईश्वरीय प्रकाश ;क्पअपदम म्दसपहीजमदउमदजद्ध का मार्ग ढूंढ़ने के लिए उन्होंने राजसी भोगविलास त्याग दिया और अनेक प्रकार के शारीरिक कष्ट झेले। अंगुलिमाल जैसे दुष्टों ने अनेक तरह से उन्हें यातनायें पहुँचाई किन्तु धरती और आकाश की कोई भी शक्ति उन्हें दिव्य मार्ग की ओर चलने से रोक नहीं पायी। परमात्मा ने पवित्र पुस्तक त्रिपिटक की शिक्षाओं के द्वारा बुद्ध के माध्यम से समता का सन्देश सारी मानव जाति को दिया। त्रिपटक प्रेरणा देती है कि समता ईश्वरीय आज्ञा है, छोटी-बड़ी जाति-पाति पर आधारित वर्ण व्यवस्था मनुष्य के बीच में भेदभाव पैदा करती है। इसलिए वर्ण व्यवस्था ईश्वरीय आज्ञा नहीं है।  अतः हमें भी बुद्ध की तरह अपनी इच्छा नहीं वरन् प्रभु की इच्छा और प्रभु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रभु का कार्य करना चाहिए।

(4) वैर से वैर कभी कभी नहीं मिटता अवैर (मैत्री) से ही वैर मिटता है:-


जो मनुष्य बुद्ध की, धर्म की और संघ की शरण में आता है, वह सम्यक् ज्ञान से चार आर्य सत्यों को जानकर निर्वाण की परम स्थिति को पाने में सफल होता है। ये चार आर्य सत्य हैं - पहला दुःख, दूसरा दुःख का हेतु, तीसरा दुःख से मुक्ति और चैथा दुःख से मुक्ति की ओर ले जाने वाला अष्टांगिक मार्ग। इसी मार्ग की शरण लेने से मनुष्य का कल्याण होता है तथा वह सभी दुःखों से छुटकारा पा जाता है। निर्वाण के मायने है तृष्णाओं तथा वासनाओं का शान्त हो जाना। साथ ही दुखों से सर्वथा छुटकारे का नाम है- निर्वाण। बुद्ध का मानना था कि अति किसी बात की अच्छी नहीं होती है। मध्यम मार्ग ही ठीक होता है। बुद्ध ने कहा है - वैर से वैर कभी नहीं मिटता। अवैर (मैत्री) से ही वैर मिटता है - यही सनातन नियम है।

(5) पवित्र त्रिपिटक बौद्ध धर्म की पवित्र पुस्तक है:- 

भगवान बुद्ध ने सीधी-सरल लोकभाषा ‘पाली’ में धर्म का प्रचार किया। बुद्ध के सरल, सच्चे तथा सीधे उपदेश जनमानस के हृदय को गहराई तक स्पर्श करते थे। भगवान बुद्ध के उपदेशों को उनके शिष्यों ने कठस्थ करके लिख लिया। वे उन उपदेशों को पेटियों में रखते थे। इसी से इनका नाम पिटक पड़ा। पिटक तीन प्रकार के होते हैं - पहला विनय पिटक, दूसरा सुत्त पिटक और तीसरा अभिधम्म पिटक। इन्हें पवित्र त्रिपिटक कहा जाता है। हिन्दू धर्म में चार वेदों का जो पवित्र स्थान है वही स्थान बौद्ध धर्म में पिटकों का है।

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 बौद्ध धर्म को समझने के लिए धम्मपद का ज्ञान मनुष्य को अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाने के लिए प्रज्जवलित दीपक के समान है। संसार में पवित्र गीता, कुरान, बाइबिल, गुरू ग्रन्थ साहब का जो श्रद्धापूर्ण स्थान है, बौद्ध धर्म में वही स्थान धम्मपद का है। त्रिपटक का संदेश एक लाइन में यह है कि वर्ण (जाति) व्यवस्था ईश्वरीय आज्ञा नहीं है वरन् समता ईश्वरीय आज्ञा है। जाति के नाम से छोटे-बड़े का भेदभाव करना पाप है। 

(6) सभी धर्मों के हृदय से मानव मात्र की एकता का सन्देश प्रवाहित हो रहा है:-   

मानव के विकास तथा उन्नति में धर्म का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। वास्तव में धर्म मानव जीवन की
आधारशिला है। भिन्न-भिन्न धर्मों के पूजा-उपासना की अलग-अलग पद्धतियों, पूजा स्थलों तथा ऊपरी आचार-विचार में हमें अन्तर दिखाई पड़ता है, पर हम उनकी गहराई में जाकर देखे तो हमें ज्ञान होगा कि सभी धर्मों के हृदय से मानव मात्र की एकता का सन्देश प्रवाहित हो रहा है। भगवान बुद्ध का आदर्श जीवन एवं सन्देश युगों-युगों तक मानव मात्र को समता तथा एकता की प्रेरणा देता रहेगा। 


(7) सम्राट अशोक ने हिंसा का मार्ग छोड़कर अहिंसा परमो धर्म का मार्ग अपनाया:-


बुद्ध के समय में सम्राट अशोक राज्य के विस्तार की भावना से युद्ध के द्वारा खून की नदियाँ बहा रहा था। वह अपने बेटे-बेटी को संसार का सारा सुख देने के लिए यह महापाप कर रहा था। अशोक के कानों में जब बुद्ध का अहिंसा परमो धर्म का सन्देश सुनायी पड़ा। तब अशोक ने सोचा अरे अहिंसा परमो धर्म होता है। मैं तो हिंसा कर रहा हूँ। अशोक के अंदर द्वन्द्व शुरू हो गया। वह बुद्ध की शरण में चला गया। बुद्ध की शिक्षाओं से अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया। अशोक की प्रेरणा से उसके बेटे महेन्द्र तथा बेटी संघमित्रा ने अनेक देशों में जाकर बुद्ध के समता व अहिंसा के सन्देश को व्यापक रूप से पहुँचाया।


(8) बुद्ध के जीवन से मानव कल्याण की सीख मिलती है:-

बुद्ध ने डाकू अंगुलिमाल, नगर वधू आम्रपाली, सम्राट अशोक, शुद्धोदन, पुत्र राहुल आदि सभी को अहिंसा की राह दिखायी। बुद्ध ने बुद्धं शरणं गच्छामि (अर्थात मैं बुद्ध की शरण में जाता हूँ), धम्मं शरणं गच्छामि (अर्थात मैं धर्म की शरण में जाता हूँ) तथा संघं शरणं गच्छामि (अर्थात मैं संघ की शरण में जाता हूँ) की शिक्षा दी। बुद्ध ने कहा कि केवल बुद्ध की शरण में आने से काम नहीं चलेगा, धर्म की शरण में आओ फिर उन्होंने कहा कि इससे भी काम नहीं चलेगा संघ की शरण में आकर उसके नये-नये सामाजिक नियमों को भी मानने से अब काम चलेगा। भगवान बुद्ध का जीवन हमें सीख देता है कि कैसे एक साधारण गृहस्थ व्यक्ति भी अहिंसा, समता तथा परहित की भावना से मानव कल्याण की उच्च से उच्चतम अवस्था तक पहुँच सकता है।

(9) सभी धर्मों का सार मानव कल्याण है:- 

मानव समाज आज नवीन और महान युग में प्रवेश कर रहा है। प्रगतिशील धर्म का उद्देश्य प्राचीन विश्वासों के महत्व को कम करना नहीं है बल्कि उन्हें पूर्ण करना है। आज के समाज को विख्ंाडित करने वाले परस्पर विरोधी विचारों की विविधता पर जोर नहीं बल्कि उन्हें एक मिलन-बिन्दु पर लाना है। अतीत काल के अवतारों की महानता अथवा उनकी शिक्षाओं के महत्व को कम करना नहीं बल्कि उनमें निहित आधारभूत सच्चाईयों को वर्तमान युग की आवश्यकताओं, क्षमताओं, समस्याओं और जटिलताओं के अनुरूप दुहराना है।

सीता के पक्ष में हमें खड़ा  करने वाले भी राम ही है

सारी सृष्टि को बनाने वाला और संसार के सभी प्राणियों को जन्म देने वाला परमात्मा एक ही है। सभी अवतारों एवं पवित्र ग्रंथों का स्रोत एक ही परमात्मा है। हम प्रार्थना कहीं भी करें, किसी भी भाषा में करें, उनको सुनने वाला परमात्मा एक ही है। अतः परिवार तथा समाज में भी स्कूल की तरह ही सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ मिलकर एक प्रभु की प्रार्थना करें तो सबमें आपसी प्रेम भाव भी बढ़ जायेगा और संसार में सुख, एकता, शान्ति, करूणा, त्याग, न्याय एवं अभूतपूर्व समृद्धि आ जायेगी।
’’’’’ 
- डा0 जगदीष गांधी, षिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

षिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक   सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

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जीवन को दिशा दिखाते भगवान् बुद्ध के 21 अनमोल विचार


भगवान् गौतम बुद्ध का जन्म ५६३ इसवी पूर्व कपिलवस्तु के लुम्बनी मे हुआ था | बचपन में उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया | गौतम कुल में जन्म लेने के कारण उन्हें गौतम भी कहा जाता था | बचपन  से ही उनका आध्यात्मिक रुझान था | पिता ने उन्हें संन्यास से रोकने के लिए उनका विवाह यशोधरा से कर दिया | उनका एक पुत्र राहुल भी हुआ | महल घर -परिवार ये सारे आकर्षण उन्हें बाँध कर रख नहीं पाए | उन्होंने परिवार को त्याग कर वैराग्य ले लिया | गया में  वटवृक्ष वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ | तभी से वो बुद्ध कहलाये | ज्ञान का प्रचार ही उनके जीवन का उद्देश्य था | ८० वर्ष की आयु में उन्हें निर्वाण की  प्राप्ति हुई | प्रस्तुत हैं -

जीवन को दिशा देते  भगवान् बुद्ध के 21 अनमोल विचार 



1)शांति अन्दर से आती है , इसे बाहर मत ढूंढो |

2)अगर आप वास्तव में स्वयं को प्रेम करते हैं तो आप कभी किसी को ठेस नहीं पहुंचा सकते |

3)जीवन में आपका उद्देश्य अपना उद्देश्य पता करना है और उसमें जी जान से जुट जाना है |

4)आप केवल वही  खोते हैं जिससे आप चिपक जाते हैं |

5)पहुँचने से अधिक जरूरी है ठीक से यात्रा करना |


हम जो सोचते हैं वो बन जाते हैं |


6)हर सुबह हम पुन : जन्म लेते हैं | हम आज क्या करते हैं यही सबसे ज्यादा मायने रखता है |

7)जो बुद्धिमानी से जिए उन्हें मृत्यु का भय नहीं होना चाहिए |

8)जूनून जैसे कोई आग नहीं है , लालच जैसा कोई दरिंदा नहीं है ,मुर्खता जैसा कोई जाल नहीं है और लालच जैसी  कोई धार नहीं है |

भगवान् बुद्ध के अनमोल विचार


9)पवित्रता या अपवित्रता अपने आप पर निर्भर करती है , कोइकिसी दूसरे को पवित्र नहीं कर कर सकता |

10)स्वयं पर विजय पाना दूसरों पर विजय पाने से बड़ा काम है |


सच्चा प्रेम समझ से उत्त्पन्न होता है |


11)यदि  आपकी दया आपको सम्मिलित नहीं करती , तो वो अधूरी है |

12)दर्द निश्चित है , दुःख वैकल्पिक है |

13)जो जगा है उसके लिए रात लम्बी है , जो थका है उसके लिए दूरी लम्बी है , जो मुर्ख सच्चा धर्म नहीं जानता उसके लिए जीवन लम्बा है |

14) हर मनुष्य अपनी सेहत या बीमारी का रचियता है |

15)ख़ुशी उन जगहों पर कभी नहीं आएगी जो उसकी सराहना नहीं करते जो उनके पास पहले से मौजूद है |

शांति अंदर से आती है इसे बाहर मत खोजो 

16) अगर आप दिशा नहीं बदलते तो संभवत : आप वहीँ पहुँच जायेंगे जहाँ आप जा रहे हैं |

17)पानी से सीखो , नदी शोर मचाती है पर सागर की गहराई शांत रहती है |

18)भूत पहले ही बीत चूका है , भविष्य अभी आया नहीं है | तुम्हारे जीने के लिए बस एक ही क्षण है |

बागवान बुद्ध के २१ अनमोल विचार


19)जिस  क्षण आप सारी  सहायता अस्वीकार कर देते हैं , आप मुक्त हो जाते हैं |

20)अपने अहंकार को एक ढीले -ढाले कपडे की तरह पहनें |

21)आप चाहें जितने पवित्र शब्द पढ़ लें , जितने बोल लें , वे आप का क्या भला करगें जब आप उन पर कार्य नहीं करते हैं |

घृणा घृणा से नहीं प्रेम से खत्म होती है ये एक शाश्वत सत्य है |


अटूट बंधन परिवार

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मैं माँ की गुडिया , दादी की परी नहीं...बस एक  खबर थी



वो मेरा चौथा जन्मदिन था
माँ ने खुद अपने हाथों से सी कर दी थी
गुलाबी फ्रॉक
खूब घेर वाली
जिसमें टंके  हुए थे छोटे -छोटे मोती
माँ ने ही बाँध दिया था
बड़ा सा फीता मेरे बालों पर
और बोली थी मुस्कुरा कर
अब लग रही है बोलती सी गुडिया

तभी दादी ने बुलाया
खोंस दिया मेरे बालों पर गुलाब का फूल
खुशबू बिखेरता
फिर लेती हुई
बलैया
कहने लगी
अब लग रही है हूर


बुआ ने पहना दी थी
छम -छम करती  पायल
पांवों में
चूम कर मेरा माथा कहने लगी मुझे परी
पापा  ने किया था वादा
शाम को ढेर से खिलौने लाने का


मैं इठलाती सी चल पड़ी बाहर
सब दोस्तों को दिखाने
अपनी , पायल अपना फूल , और गुलाबी फ्रॉक
तभी नुक्कड़ की  दूकान वाले चाचा ने
चॉकलेट दिखाते बुलाया अपने पास
और मैं चली गयी दौड़ते -इठलाते
मेरा जन्मदिन जो था
कैसे इनकार करती चाचा के  तोहफे का


बड़ी चॉकलेट दिलाने की कह कर
चाचा ले चले मुझे अंगुली थाम कर
दूर ... झाड़ियों के पीछे
और चाचा के निकल आये सींग
उफ़ कितना दर्द था
मैं चिल्लाती रही , पापा बचाओ , मम्मी बचाओ
कोई तो बचाओ
आ दर्द हो रहा है
लग रही है
कोई तो बचाओ

झाड़ियों से टकराकर मेरे आवाज़  आती रही वापस
टूट गए मेरी फ्रॉक के मोती
बिखर गयी गुलाब की पंखुड़ियां
टूटते रहे पायल के रौने मेरी हर चीख के साथ
मेरी गुलाबी फ्रॉक हो गयी लाल


हां वो मेरा चौथा  जन्मदिन था
जब मैं माँ की गुडिया नहीं , दादी की परी नहीं , बुआ की हूर नहीं
बस एक खबर थी ...
एक दर्दनाक  खबर
जिसका  अस्तित्व
अगली दर्दनाक खबर आने तक था

मालिनी वर्मा

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फर्क

सुधाकर बाबू का किस्सा पूरे  ऑफिस में छाया हुआ था | सुधाकर बाबू की अखबार के एक अन्य कर्मचारी से ठन  गयी थी | सुधाकर बाबू प्रिंटिंग का काम देखते थे और दीवाकर जी अखबार का पहला पेज डिजाइन करता थे  | सुधाकर बाबू की दिवाकर जी से कैंटीन में चाय समोसों के साथ गर्मागर्म बहस हो गयी |  यूँ तो दोनों की अपने -अपने पक्ष में दलील दे रहे थे | इसी बीच  सुधाकर बाबू ने दिवाकर जी पर कुछ  ऐसी फब्तियां कस दी कि दिवाकर जी आगबबबूला हो गए | तुरंत सम्पादक के कक्ष में जा कर लिखित शिकायत कर दी कि जब तक  सुधाकर बाबू उनसे माफ़ी नहीं मांगेंगे तब तक वो अखबार का काम नहीं संभालेंगे, छुट्टी ले कर घर पर रहेंगे | संपादक जी घबराए | दिवाकर जी पूरे दफ्तर में वो अकेले आदमी थे जो अख़बार का  पहला पेज डिजाइन करते थे | पिछले चार सालों  में उन्होंने एक भी छुट्टी नहीं ली थी | कभी छुट्टी लेने को कहते भी तो अखबार के मालिक सत्यकार जी उन्हें मना लाते |



सम्पादक जी ने हाथ -पैर जोड़ कर उन्हें हर प्रकार से मनाने की कोशिश की पर इस बार वह नहीं माने | अगर कल का अखबार समय पर नहीं निकल पाया तो लाखों का नुक्सान होगा | कोई और व्यवस्था भी नहीं थी |  उन्होंने सुधाकर जी को बुलाया | पर वो भी  माफ़ी मांगने को राजी न हुए | मजबूरन उन्हें बात मालिक तक पहुंचानी पड़ी | बात सुनते ही अखबार के मालिक ने आनन् -फानन में सुधाकर जी को बुलाया |

प्रायश्चित

इस बार सुधाकर जी भी गुस्से में थे | उन्होंने मालिक से कह दिया की बहस में कही गयी बात के लिए माफ़ी वो नहीं मांगेंगे | क्योंकि बहस तो दोनों तरफ से हो रही थी | दिवाकर जी को बात ज्यादा बुरी लग गयी तो वो क्या कर सकते हैं | आखिर उनकी भी कोई इज्ज़त है वो यूँही हर किसी के आगे झुक नहीं सकते | सत्यकार जी ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की |उन्होंने कहा कि आपसी विवाद में अगर किसी को बात ज्यादा बुरी लग गयी है तो आप माफ़ी मांग लें | दिवाकर जी यूँ तो कभी -किसी से माफ़ी माँगने को नहीं कहते |  उन्होंने सुधाकर  जी को लाखों के नुक्सान का वास्ता भी दिया |  पर सुधाकर जी टस से मस न हुए | उन्होंने इसे प्रेस्टीज इश्यु बना रखा था | उनके अनुसार वो माफ़ी मांग कर समझौता नहीं कर सकते |


दूसरा फैसला


अंत में सत्यकार जी ने सुधाकर जी से  पूंछा ,  " आपकी तन्ख्य्वाह कितनी है ?

सुधाकर जी ने जवाब दिया - १५००० रुपये सर

सत्यकार जी बोले , मेरे ऑफिस का १५ ०००० करोंण का टर्नओवर हैं | पर मैं विवादों को बड़ा बनाने के स्थान पर जगह -जगह झुक जाता हूँ | शायद यही वजह है कि हमारे बीच  १५००० रुपये से १५००० करोंण का फर्क है |


देर शाम को दिवाकर जी अपनी टेबल पर बैठ कर अखबार का फीचर डिजाइन कर रहे थे और सुधाकर जी  टर्मीनेशन लैटर के साथ ऑफिस के बाहर निकल रहे थे | विवाद को न खत्म करने की आदत से उनके व्  सत्यकार जी के बीच सफलता का फर्क कुछ और बड़ा हो गया था |

बाबूलाल

लेखक

मित्रों एक कहावत है जो झुकता है वही उंचाई  पर खड़ा रह सकता है | छोटी -छोटी बात को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने वाले जीवन में बहुत ऊंचाई पर नहीं पहुँच पाते |


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राग पुराना

' तुमने तो फिर  वही पुराना राग अलापना शुरू कर दिया .'
' जीवन के बहुत से सच हमेशा ताजे  बने रहते हैं , वे कभी .......!.' 
' बस - बस . मुझे पता है , आगे क्या कहोगे .  तुम जैसे इमोशनल लोगों की यही तो प्राब्लम है कि मौका लगते ही   किताबी बातें शुरू कर देते हो .
' किताबों में लिखी बातें  हवा में  नहीं बनती . जिंदगी के खट्टे - मीठे , तल्ख या मधुर अनुभव  और घटनाएँ  ही तो शब्दों में पिरोई जातीं हैं जो किताब बन कर सबके सामने आती हैं , कोई - कोई उसे पढ़   लेता है और प्रभावित भी होता है  . ये बात अलग है कि आज कल अधिकांश लोगों को यह सौभग्य नहीं मिलता या उन्होंने   खुद को इससे दूर कर लिया है .'.





' देखो , मैं आज किसी बहस - वहस के मूड में नहीं हूँ . बहस करनी  है तो घर वापस चल सकते हो .' 
' यह क्या बात हुई ! जब कोई जवाब नहीं मिलता तो हमेशा डांटने के मोड में आ जाती  हो ? अच्छा बताओ तुम्हें मेरे साथ कहीं भी जाना  अच्छा लगता है या नहीं   ?' 


'  तुम्हारा साथ हो और घूमना हो . वो बात अपनी जगह है परन्तु तुम्हारे साथ आने का खास मतलब यह है की मुझे घूमना और कोई भी नई जगह देखना अच्छा लगता है ,यह अलग बात है कि  तुम मेरे साथ होते हो तो मैं स्वयं को सुरक्षित महसूस करती   हुँ . दुनियादारी पर तुम्हारी पकड़ में हमेशा समझदारी दिखाई देती है  . तुम्हारे साथ मैं वह सब शेयर कर लेती हूँ जो उनके और  किसी के साथ शेयर  नहीं कर पाती . तुम मुझे और मेरी दुविधाओं को बड़ी संजीदगी से समझते ही नहीं , उन्हें टेकल भी कर लेते हो . तुममे और भी ऐसा बहुत कुछ है जो मैं भले ही मैं कह न सकूँ पर वह  है जो  मुझे तुम्हारे साथ समय बिताने को मजबूर करता है .मैं तुम्हारे साथ घूम कर इस बड़े से  शहर की हर जगह देखना   पसंद करती हूँ , शॉपिंग करना पसंद करती हुँ . '

' पर मेरे साथ सिर्फ इतना ही नहीं है !'
' हाँ - हाँ जानती हूँ कि क्या कहोगे !'
' क्या कहूँगा ....?'



' वही गुलशन नंदा के उपन्यास में लिखी बात कि सुधा , मुझे तुम्हारा साथ इसलिए पसंद है क्योंकि मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हुँ और अगर मैं तुमसे झूठ बोल रहा होऊंगा तो वह झूठ तुमसे नहीं , अपने आप से बोल रहा होऊंगा . यही न मेरे  मजनूँ मियां .'   

 
' अगर यह किसी रूमानी उपन्यास का डायलॉग है तो यही सही क्योंकि यही मेरा सच है और अगर तुम इसे झूठ मानती हो  तो ठीक है साथ रहकर  हमें किसी पाप का भागीदार नहीं बनना चाहिए . चलो घर वापस चलते हैं .'


' नहीं न बाबा . इतनी जल्दी दिल छोटा  नहीं करते मेरे भोले प्रेमी महोदय  .  दुनिया के हर लेखक ने यह भी तो  लिखा है, जिसे हम सभी ने  कभी न कभी पढ़ा भी है कि   प्रेमिका की ना में भी उसकी हाँ  ही होती है . मैं तुम्हे प्यार करती हूँ , इसलिए भी तुम्हारे साथ घूमना और समय बिताना पसंद करती हूँ . प्रेमिका के मन की इतनी सी बात  भी नहीं समझते क्या ?
वह अवाक् परन्तु आत्मीय दृष्टि से उसे निहारता रहा .


'अब अपनी किताबों से बाहर निकलो और देखो मैना के उस जोड़े को , कैसे एक - दूसरे के साथ चुपचाप  अपनी भाषा में बतिया रहे है . चलो हम उनकी बातों को समझने की कोशिश करें .' सुधा के हाथ अनजाने ही न जाने कब , सुधांशु के हाथों में आ गये और उनकी पकड़ मजबूत हो ती  गयी और उनके कदम मैना के जोड़े के करीब पहुँच गए .


 वहां बैठने के कुछ देर बाद  सुधांशु  ने  धीमें से कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे की सुधा ने  टोका , " " देखो फिर वही अपना पुराना राग मत अलाप देना , मुझे इस प्यारे से अल्हड़ जोड़े की बातें समझने दो ."


 सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा 

लेखक


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किताबें

मैंने हमेशा कल्पना की है कि स्वर्ग एक तरह का पुस्तकालय है -जोर्ज लुईस बोर्गेज 

किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं | ये अपने अंदर  विश्व का सारा ज्ञान समेटे हुए होती हैं | केवल किताबों को पढ़कर एक कोने में रख देना ही काफी नहीं है उन्हें समझ कर उस ज्ञान को आत्मसात करना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए | 


किताबें /Kitaabein poem in Hindi


मुझे 
मुफ़्त में 
न लेना कभी 
जब भी लो 
मूल्य देकर ख़रीदना 
मैं अलमारी में 
बंद होकर नहीं,
तुम्हारे 
हृदय में 
मीत बन कर 
रहना चाहती हूँ 
मन से मन तक की 
निर्बाध यात्रा 
करना चाहती हूँ 
सुगंध बन सर्वत्र 
बिखरना चाहती हूँ
—————————


किताबें


२—
मिल 
जाती हूँ
विमोचन कार्यक्रमों में 
मुफ़्त में 
तो सहेज कर 
रख लेते हो अपने 
सजे-धजे ड्रॉइंगरूम की 
बड़ी सी अलमारी में
आने-जाने वालों पर 
अपने पुस्तक प्रेमी होने का
प्रभाव डालने को, 
पर पढ़ते नहीं कभी तुम मुझे!
सुनो! 
एक सलाह देती हूँ 
जहाँ भी 
कोई भी तुम्हें 
दे कोई पुस्तक मुफ़्त में 
तो मना करना सीख लो 
लेनी ही तो 
उसका मूल्य देना सीख लो 
मूल्य दोगे तो 
कम से कम 
अपने दिए पैसों का 
मूल्य चुकाने को 
उसे पढ़ने की 
आदत डालना तो 
सीखोगे।
—————-
डा० भारती वर्मा बौड़ाई


लेखिका

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सिर्फ 15 मिनट -power of delayed gratification


आजकल बस" दो मिनट "के जमाने में सिर्फ १५ मिनट साल भर लम्बा लग रहा होगा | पर ये सिर्फ 15 मिनट वैज्ञानिकों द्वारा छोटे बच्चों पर किये गए शोध का नतीजा हैं जो आगे जा कर यह तय करते हैं कि बच्चे की शिक्षा , स्वास्थ्य व् सफलता कैसी रहेगी | तो आइये जाने सिर्फ 15 मिनट का राज


सिर्फ  15 मिनट और सफलता /role of delayed gratification



                               बहुत पहले की बात है अमेरिका में एक प्रयोग किया गया | जिसमें  छोटे बच्चों को अकेले बारी -बारी से  एक कमरे में भेजा गया ,जहाँ उनकी फेवरेट चॉकलेट रखी थी | साथ में कुछ पजल गेम  भी रखे थे | बच्चों से कहा गया कि आप एक चॉकलेट अभी ले लो, या फिर अगर आप 15 मिनट वेट कर सकते हो तो 15 मिनट बाद आप दो चॉकलेट  ले सकते हैं |  कुछ बच्चों से तो बिलकुल भी धैर्य नहीं हुआ उन्होंने तुरंत चॉकलेट ले ली | और खा भी ली , कुछ ने थोड़ी देर रुक कर खायी | कुछ बच्चे थोड़ी देर अपने को इधर-उधर उलझाए रखे फिर 15 मिनट से पहले ही बस एक चॉकलेट ले ली | पर कुछ बच्चे पूरे 15 मिनट तक कमरे में इधर उधर दौड़ते रहे , कुछ खेलते रहे या पज़ल सॉल्व  करते रहे पर उन्होंने कैसे भी कर के वो 15 मिनट पार कर दिए | उसके बाद उन्हें दो चॉकलेट मिलीं |

आप सोच रहे होंगे बात तो छोटी सी  है | इससे क्या फर्क पड़ता है बच्चों ने तुरंत चॉकलेट ले ली या 15 मिनट बाद ली | परन्तु यही प्रयोग का हिस्सा था | उन बच्चों को निरंतर ऑब्जर्व किया गया | करीब २५ साल बाद ये निष्कर्ष निकाला गया किजिन बच्चों ने तुरंत चॉकलेट ले ली थी उनकी तुलना में जिन बच्चों ने 15 मिनट इंतज़ार किया था उनके पढाई में मार्क्स अच्छे आये , स्वास्थ्य अच्छा रहा व् रिश्ते अच्छे रहे व् उन्होंने जीवन में अधिक सफलता पायी |

ये 15 मिनट का प्रयोग एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रयोग था जो यह बताता हैं  कि जब हम किसी किसी मनपसंद  काम से खुद को डिस्ट्रेक्ट कर पाते हैं तभी हम लॉन्ग टर्म गोल को पा पाते हैं | ये लॉन्ग टर्म गोल हमारा स्वास्थ्य है , रिश्ते हैं , शिक्षा है व् सफलता है | इसे delayed gratification भी कहते हैं |

जानिये सिर्फ 15 मिनट कैसे आपको पीछे खींचते हैं 



अब मान लीजिये कि आप क्लास में वार्षिक परीक्षा में प्रथम स्थान पाना चाहते हैं | इसके लिए आप को साल भर कम से कम चार घंटे रोज पढना होगा | बीच में कई बार मेहमान घर आयेंगे , कभी सब दोस्त लेटेस्ट मूवी देख रहे होंगे या कभी आपका फेवरेट क्रिकेट मैच टी . वी पर आ रहा होगा | आप चार घंटे तभी पढ़ पायेंगे जब आप इन डिस्ट्रेक्ट करने वाली चीजों से अपना ध्यान हटा पायेंगे | अगर आप मनपसन काम को करने लगेंगें तो आप चार घंटे रोज पढने का लक्ष्य पूरा नहीं कर पायेंगे |


या फिर आपको किसी रिश्तेदार की बात बुरी लगी आपने तुरंत ही उसे जा कर खूब भला बुरा सुना दिया , बाद में आपको पता चला कि आपके समझने में गलती हुई थी | आप लाख सॉरी बोले अब वो रिश्ता पहले जैसा नहीं रहेगा | याद रखिये अच्छे रिश्ते भी हमारा लॉन्ग टर्म बांड होते है | टूटे लव बांड के साथ जिन्दगी बहुत मुश्किल होती है |


या आप वेट लॉस  की तैयारी कर रहे हैं | अब आपके सामने आपकी मनपसंद डिश  गाज़र का हलुआ आती है  अगर आप खुद पर कंट्रोल नहीं कर पायेंगे तो आप  निश्चित रूप से  कटोरी भर हलुआ खा ही लेंगे और आप की कई दिनों की मेहनत  पर पानी फिर जाएगा |


ज्यादातर वही लोग सफल हुए हैं जिन्होंने सफलता के लॉन्ग टर्म प्लान बनाए हैं | उसके लिए उन्होंने लम्बे समय तक फ्री में काम किया है |  अनुभव प्राप्त किया है , और शुरू पर पैसों पर बिलकुल फोकस नहीं किया है | जाहिर है की ज्यादातर काम पैसे कमाने के लिए ही किये जाते हैं |  परन्तु जो लोग शुरू से पैसे पर फोकस करते हैं वो एक काम को ज्यादा दिन तक नहीं कर पाते और कोई दूसरा काम शुरू कर देते हैं , जिस कारण वो पैसे तो कमाने लगते हैं पर उन्हें बड़ी सफलता नहीं मिलती |


कैसे करे खुद पर कंट्रोल 

खुद पर कण्ट्रोल करने के कुछ तरीके हैं , जिन पर हम बारी -बारी से चर्चा करेंगे | 


खुद को डिस्ट्रेक्ट करें 




                           आप को बस वही करना है जो बच्चों ने किया था |  यानि  की आप  को अपने मनपसंद काम को करने से रोकना है | बच्चों ने चॉकलेट खाने से अपने को रोकने के लिए पज़ल खेली थी , दौड़ लगायी थी या कुछ और किया था | अब किसी भी तरीके से आप को भी डिस्ट्रेक्ट करना है ...


जैसे अभी आप का मन गाज़र का हलुआ खाने का हो रहा है तो आप खुद  को डिस्ट्रेक्ट करने के लिए वाक् पर चले जाए , कुछ व्यायाम  करलें , किसी सहेली से फोन कर लें या फिर कोई हल्का स्नैक जैसे मुरमुरे , खीरे  , ककड़ी आदि खा लें , जिससे आपकी हलुआ खाने की इच्छा खत्म हो जाए |


तीन  गेंदों में छिपा है आपकी ख़ुशी का राज 

आपका गोल है कि साल में आपको १लाख २० हज़ार रुपये बचा कर  किसी स्कीम में डालने हैं | यानी आपको हर महीने १०, ००० रूपये बचाने हैं | ऐसे में आप को खुद को छोटी -छोटी चीजें खरीदने से रोकना है  |  तो ऐसी मार्किट जाने से बचे जहाँ वो चीजें मिलती हैं | अगर जरूरी काम से जाएँ तो उन दुकानों से बच कर रहे | टी वी के ऐड न देखे ताकि बार -बार मन न चले |



अपने को सही रीजन बताये 


                            जब आप किसी लॉन्ग टर्म गोल को प्राप्त करने के लिए मेहनत कर रहे हों और आप को टेम्परेरी टेम्पटेशन को हराना हो तो आपको सही रीजन देना होगा | जैसे आप वेट  लॉस करना चाहते हैं और अपने से यह कहते हैं कि मैं अपनी सहेलियों को वजन घटा कर दिखा दूँगी तो ये बहुत काम नहीं करेगा उसके स्थान पर अगर आप कहेंगीं कि मैं वजन इसलिए घटाना छाती हूँ ताकि मैं स्वस्थ  रहूँ और एक बेहतर जिन्दगी जी सकूँ |

आप स्टूडेंट हैं तो रीजन दीजिये कि मेडिकल या इंजिनीयरिंग एंट्रेंस की  तैयारी इस लिए कर रहे हैं क्योंकि आप अपना ड्रीम जॉब करना चाहते हैं | अगर आप ये सोच कर पढ़ रहे हैं की मम्मी की इच्छा है तो आप ज्यादा घंटे पढ़ नहीं पायेंगे और क्रिकेट मैच आपका ध्यान खींच ही लेगा |


अपने को इनाम दें 


                           अपने लॉन्ग टर्म गोल को अचीव करने के लिए बीच -बीच में खुद को इनाम दें | जैसे ...


अगर आप ने आज की चार घंटे की पढाई पूरी कर ली है तो क्रिकेट या कोई और पसंद का शो देख लें |

आप का वेट लॉस प्रोग्राम सही जा रहा है तो  महीने में एक बार अपनी मनपसंद  डिश खा लें |


 या फिर जब आपने पैसे बचाने का गोल पूरा कर लिया हो  किसी मनपसंद जगह घूम आइये , कोई मनपसंद ड्रेस ले लीजिये या कोई मनपसंद  होटल में डिनर कर लीजिये |


आज के समय में बहुत जरूरी है delayed gratification


यूँ तो ये लेख delayed gratification पर हुए प्रयोग पर ही आधारित है | क्योंकि वेट लॉस , ज्यादा देर तक पढना , पैसा सही जगह इन्वेस्ट करना ये सब सफल जीवन  के लिए जरूरी हैं | परन्तु ये सब इतने आसान  नहीं हैं इसके लिए मन को अपने लक्ष्य पर केंद्रित करना बहुत  जरूरी है | ये तभी हो पायेगा जब हम  मनपसंद काम को करने से खुद को रोक कर जरूरी लक्ष्य पर फोकस्ड   रहे | आज के समय में जब एक क्लिक  पर मनोरंजन , बढ़िया खाना और मनी ट्रांसफर हो सकता है तो खुद को सिर्फ 15 मिनट भी  रोक पाना बहुत मुश्किल है | परन्तु खास बात ये है कि जब सब खुद को रोक पाने में असफल हैं और आप ऐसा कर पाते हैं तो सेहत , शिक्षा और सफलता को आपकी मुट्ठी में करने से कोई नहीं रोक सकता |



तो आज आपने कुछ अच्छा पाने के लिए खुद को कितनी देर डिस्ट्रेक्ट किया ?


वंदना बाजपेयी 


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